Monday, 6 July 2026

राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति पर उठे यक्ष प्रश्न!

 कोलकाता की चौदह वर्षीय स्कूल छात्रा हेतल पारिख के साथ दिसम्बर 1989 में बलात्कार तथा हत्या करने के दोषी धनंजय चटर्जी की क्षमादान याचिका खारिज किये जाने के बाद उसे अन्ततः चौदह अगस्त 2004 को फांसी दे दी गयी। ज्ञातव्य है कि धनंजय एक लिफ्टमैन था तथा कालोनी में रहने वाली उक्त हेतल पारिख के साथ छेड़-छाड़ करता था। मना करने पर उसने न सिर्फ उस बच्ची के साथ बलात्कार किया बल्कि भेद खुल जाने के डर से हत्या कर दी। पश्चिम बंगाल के अलीपुर की निचली अदालत ने उसे अप्रैल 1991 में फांसी की सजा सुनाई जो कोलकाता हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट द्वारा बहाल रही। उसकी फांसी की तिथि 25 फरवरी 1994 नियत की गयी थी लेकिन राष्ट्रपति के समक्ष प्राण-दान की याचिका लम्बित होने के कारण वह टाल दी गयी। इस याचिका के खारिज होने के बावजूद उनकी फांसी कतिपय कारणों से टलती रही प्रायः दस वर्ष बाद इस वर्ष पच्चीस जून को जब फांसी देने की तैयारी की जा रही थी, तभी राष्ट्रपति भवन के एक संदेश द्वारा जीवन-दान की आशा की किरण जागी तथा उच्चतम न्यायालय ने फांसी पर राष्ट्रपति के निर्णय तक रोक लगा दी, लेकिन अन्ततः उसकी पत्नी पूर्णिमा द्वारा दायर क्षमादान याचिका खारिज हो गयी। अंतिम दिनों धनंजय तथा इसके परिवार वालों को प्रेस तथा मीडिया का पर्याप्त कवरेज मिला तथा क्षमादान याचिका खारिज किये जाने की मांग को लेकर उसने बुड्ढे माता-पिता, पत्नी तथा बच्चों ने व्यथित होकर खाना-पीना छोड़ दिया भी दिया। यही नहीं, परिवार वालों ने इसके मृत शरीर को लेने से इंकार कर दिया। इसी के कारण धनंजय की अपनी आंखें दान करने की अंतिम इच्छा भी पूरी नहीं हो सकी।

धनंजय प्रकरण के प्रकाश में आते ही कई मानवाधिकार संगठनों ने इसे क्षमादान देने तथा दण्ड विधान से फांसी की सजा समाप्त करने की पुरजोर वकालत की। ब्रिटेन सरकार तथा कई राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्वयंसेवी संस्थाओं ने अधिकारिक तौर पर उसकी फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदलने की सलाह दी तो पश्चिम बंगाल सरकार तथा हेतल के स्कूल की प्राचार्या, शिक्षिकाओं तथा छात्राओं समेत नारी अस्मिता की रक्षा में संलग्न संगठनों ने इस जघन्य अपराधी के प्रति दयाभाव न दिखलाने की मांग की। मीडिया तथा प्रेस द्वारा इस सारे मामले को प्रमुखता दिये जाने से जहाँ अलीपुर जेल के जल्लाद नाटा मालिक को कतिपय कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाने का सिलसिला प्रारम्भ हो चला वहीं देश के अन्यान्य हिस्सों में फांसी-फांसी का खेल खेलते कम से कम पांच अबोध बच्चों की हृदय विदारक मृत्यु के समाचार आये हैं।
धनंजय को फांसी दिये जाने पर जहाँ भारतीय दण्ड विधान में मृत्युदण्ड की अपरिहार्यता पर एक बार पुनः बहस छिड़ गयी है, वहीं राष्ट्रपति के क्षमादान विवेकाधिकार की पात्रता तय करने के लिये मानक निर्देशक सिद्धान्त लिपिबद्ध करने की मांग की जा रही है। प्रश्न किया जा रहा है कि जब 1994 में इसकी क्षमादान याचिका निरस्त कर दी गयी थी फिर इतने दिनों तक उसे संशय में क्यों रखा गया? फांसी देने में हुयी देरी के कारण ही उसे जनता के एक वर्ग से सहानुभूति मिली। यह भी प्रश्न अनुत्तरित है कि जब राष्ट्रपति ने उसकी दया-याचिकाऐं खारिज कर दी थी फिर 25 जून से तुरंत पहले किस मानवीय संवेदना से वशीभूत होकर उसकी फांसी की सजा रोकी गयी तथा उसके और उसके परिवार वालों को छद्म दिलासा दी गयी। इस प्रश्न का उत्तर भी समाज-शास्त्रियों तथा विधि-विशोषों से अपेक्षित है कि जब उच्चतम न्यायालय 'विरलों में भी विरलतम' मामलों में ही मौत की सजा सुनाता है, फिर ऐसे प्रकरणों में राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति का औचित्य ही क्या है? उच्चतम न्यायालय ने अपने एक निर्णय में अभिनिश्चित किया है कि फांसी देने में अत्यधिक देरी होने से कैदी को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में वर्णित प्राण तथा दैहिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के अन्तर्गत फांसी की सजा बदल कर आजीवन कारावास करवाने का पर्याप्त कारण हो जाता है। बाद में न्यायालय ने अपने मत में संशोधन कर दिया लेकिन फांसी की सजा पाये लोग अभी इसी खुश-फहमी में रहते हैं कि यदि उनकी फांसी की सजा ऐन-केन टलती रहे तो फिर शायद वह दुर्दिन देखने की नौबत न आये। इस प्रकरण के बाद मीडिया ने खोज कर कई ऐसे अन्य मामलों को उजागर किया है जिनमें फांसी की सजा पाने तथा क्षमादान की याचिका खारिज होने के चौदह-पन्द्रह साल बाद भी उसे कार्यान्वित नहीं किया गया है। इनमें कुछ 75 वर्ष वय प्राप्त कर चुके सिद्ध दोष भी हैं जो अब वैसे भी मौत की कगार पर हैं।
लगभग सभी संविधान कार्यपालिका के प्रधान को ऐसे व्यक्तियों को क्षमा प्रदान करने की शक्ति देते हैं जिनका किसी अपराध के लिये विचारण और दोष सिद्धि हुयी है। इस शक्ति के अनुसरण में सम्प्रभु को यह विशेषाधिकार होता है कि समाज तथा राज्य के प्रति किये गये अपराध को क्षमा कर दे तथा सिद्धदोष व्यक्ति के दण्ड को बदल दे, कम कर दे, विलम्बित कर दे या समाप्त कर दे। यह विशेषाधिकार काल से प्रायः प्रत्येक सभ्य राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष को प्राप्त रहा है। लेकिन भारत में अंग्रेजी हुकूमत स्वतंत्रता संग्राम के मतवालों को फांसी तथा काले पानी की सजा उनके मनोबल को तोड़ने तथा आंदोलन को कमजोर करने हेतु देती थी। अतः जब संविधान के अनुच्छेद 72 तथा 161 में क्रमशः राष्ट्रपति तथा राज्यपालों को क्षमादान की और कुछ मामलों में दण्डादेश के निलम्बन, परिहार तथा लघुकरण की शक्ति उल्लिखित की गयी तो सजा पाये व्यक्तियों को अपने किये पर पश्चाताप करने के अवसर के द्वारा खुलते दिखे।
क्षमादान शक्ति का उपयोग करने का मामला पहले-पहल सन् 1961 में पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता पाया जब नौसेना के कमांडर कैप्टेन के० एम० नानावती को अपनी पत्नी सिल्विया के कथित प्रेमी प्रेम आहूजा की हत्या के लिये फांसी की सजा सुनाई गयी। यह सिद्ध हो गया कि सिल्विया तथा प्रेम आहूजा में अवैध शारीरिक सम्बन्ध थे। नानावती इससे बहुत ही क्षुब्ध और अपमानित हुये तथा उन्होंने अवसर खोज कर प्रेम आहूजा की हत्या कर दी तथा स्वयं को कानून के हवाले कर अपना अपराध स्वीकार कर लिया। बम्बई हाई कोर्ट ने उन्हें जानबूझ कर तथा योजनाबना हत्या करने का दोषी पाया तथा फांसी की सजा दे दी। पत्नी की बेवफाई तथा इसके कथित प्रेमी द्वारा अपना मखौल उड़ाये जाने पर की गयी हत्या आम जनमानस में न्यायसंगत तथा उचित मानी गयी थी तथा विधि के तकनीकी पहलुओं से परे होकर कैप्टेन को क्षमादान देने के पक्ष में जनमत था।
वैसे तो बलात्कार तथा हत्या के सैकड़ों प्रकरण निर्णीत हुये है तथा उन पर जनमानस की रोष और आक्रोश भरी प्रतिक्रिया देखने-सुनने को मिली है लेकिन हितल पारेख के साथ घटित लोमहर्षक घटना पर सत्तर के दशक के उत्तरार्द्ध में दिल्ली की एक स्कूली छात्रा गीता चोपड़ा के साथ बलात्कार तथा विरोध करने पर उसकी और उसके भाई, संजय चोपड़ा की हत्या का मामला मनोमस्तिष्क में कौंध जाता है। एक सैन्य अधिकारी के दोनों बच्चे स्कूल जाने के लिये सामने से गुजरती हुयी एक कार से लिफ्ट मांग बैठे। कार में सवार कुख्यात अपराधी रंगा-बिल्ला ने कार में ही गीता के साथ बलात्कार किया और प्रतिरोध करने पर भाई-बहन को मौत के घाट उतार दिया। बाद में दोनों को फांसी की सजा हुयी। इनके द्वारा प्रस्तुत की गयी क्षमादान याचिका राष्ट्रपति द्वारा निरस्त कर दी गयी और उच्चतम न्यायालय ने कुलजीत सिंह बनाम उपराज्यपाल, दिल्ली (1982) के इस मुकदमे में राष्ट्रपति के क्षमादान सम्बन्धी अधिकारों तथा याचिकाओं पर अन्वेषण करने से यह कहकर इंकार कर दिया था कि इस बर्बर का जघन्य कांड की सजा सिर्फ फांसी ही हो सकती है तथा अपराधी किसी भी प्रकार से दया के पात्र नहीं है। स्वाभाविकतः इसी केस के आधार पर ही धनंजय की दया-याचिका निरस्त की गयी है।
स्वर्गीय इन्दिरा गाँधी के कथित हत्यारों को पर्याप्त सबूत के अभाव में मृत्युदण्ड दिये जाने पर सवाल खड़े किये गये थे तथा क्षमादान याचिका को साधिकार पाने के लिये उच्चतम न्यायालय में असफल प्रयास हुआ। केहर सिंह बनाम भारत संघ (1989) के इस वाद में उच्चतम न्यायालय ने क्षमादान की शक्ति के सम्बन्ध में निर्धारित किया था कि जो व्यक्ति राष्ट्रपति को क्षमादान के लिये आवेदन करता है, उसे राष्ट्रपति के समक्ष मौखिक सुनवाई का अधिकार नहीं है तथा इस शक्ति का प्रयोग राष्ट्रपति के विवेकाधीन है। न्यायालय ने यह भी कहा कि शक्ति का प्रयोग केन्द्रीय सरकार की सलाह पर किया जायेगा तथा न्यायालय मार्गदर्शन के सिद्धान्त अधिकथित करने की आवश्यकता नहीं समझता। एक अन्य मुकदमें, मारूराम बनाम भारत संघ (1980) में अभिनिर्धारित किया गया था कि न्यायालय वहाँ हस्तक्षेप कर सकेगा जहाँ राष्ट्रपति का निर्णय अनुच्छेद 72 के उद्देश्यों से पूर्णतया असंगत है या तर्कहीन, मनमाना, विभेदकारी असम्भावी है। राष्ट्रपति की क्षमादान आदि की शक्ति पर न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति से सम्बन्धित एक अन्य महत्त्वपूर्ण मुकदमा कृष्णा गाउंड बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1976) निर्णीत हुआ है। इसमें दो व्यक्तियों को कई हत्याओं के आरोप में फांसी की सजा दी गयी थी। अभियुक्तों का कथन था कि मृतकों से उनकी कोई निजी दुश्मनी नहीं थी तथा सामाजिक समानता लागू करने के लिये उन्होंने अमीर और सरमायदार लोगों की हत्या की थी। उच्चतम न्यायालय ने दुश्मनी के अन्तर्गत की गयी हत्या और राजनैतिक हत्या के फर्क को मानने से इंकार कर दिया था तथा स्थापित किया कि फांसी की सजा विरलतम प्रकरणों में ही दी जाती है। अतः अनुच्छेद 72 के अन्तर्गत विचार करते हुये किसी अन्यथा परिप्रेक्ष्य पर दृष्टिपात की आवश्यकता नहीं है।
क्षमादान की शक्ति ऐतिहासिक रूप से एक सम्प्रभु की शक्ति है, राजनैतिक रूप से एक अवशिष्ट शक्ति है तथा मानवतावादी दृष्टिकोण से यह एक अव्यक्त न्याय है जो वर्तमान न्याय प्रणाली से ऊपर उठकर समाज के कल्याण के लिये कार्य करती है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि क्षमा आदि की शक्ति भारत की सम्प्रभु जनता की है और जनता ने इसे देश के सर्वोच्च अधिकारी राष्ट्रपति को सौंप दिया है जिससे यह अपेक्षा की जा सकती है कि इसका प्रयोग युक्तिमुक्त तथा समाज के वृहत्तर हितों को ध्यान में रखकर किया जायेगा। 
भारतीय विधिक इतिहास में राजा नन्द कुमार परीक्षण (1779) एक महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर है जिसमें तत्कालीन गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स के खिलाफ बोलने की जुर्रत करने वाले बंगाल के अति प्रतिभाशाली जमींदार नन्द कुमार को एक छोटा सा ऋण न चुका पाने के आरोप में फांसी की सजा दे दी गयी थी। इतिहास में इसे राजा नन्द कुमार की 'न्यायिक हत्या' माना जाता है। थोड़े समय पूर्व अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान के भूतपूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को एक व्यक्ति की हत्या के प्रयास के षड्यन्त्र में शामिल होने के आरोप में फांसी दे दी गयी थी तथा तत्कालीन पाक राष्ट्रपति जिया उलहक ने एमनेस्टी इंटरनेशनल सहित दुनिया भर से पहुंची क्षमादान की अपीलों को नजर अंदाज कर भुट्टो को 'शहीद' बना दिया था। इसके विपरीत भारत में अभी हाल में स्वर्गीय राजीव गांधी की हत्या में शामिल नलिनी को उनके अबोध बच्चे की परवरिश करने देने के लिये श्रीमती सोनिया गांधी ने स्वयं राष्ट्रपति से उसे क्षमादान देने की गुजारिश की है। आस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स को उनके दो बच्चों के साथ जिंदा जलाकर मार डालने के दिल दहला देने वाले अपराध में फांसी की सजा पाये कुख्यात अपराधी दारा सिंह के प्रति दया दिखलाते हुये स्टेन्स की पत्नी ने भी क्षमा करने की अपील की है।
प्रमुख विधि शास्त्री ब्लैक स्टोन का कहना है कि क्षमादान की शक्ति राजतंत्र के लिये लाभदायक है लेकिन 'कानून के शासन' का हौसला रखने वाले प्रजातंत्र में इसके लिये कोई जगह नहीं है। लार्ड डेनिंग का मानना है कि न्यायिक प्रशासन की कोई भी मानवीय प्रणाली पूर्णतया दोषमुक्त नहीं हो सकती, लेकिन यदि किसी को इस पर शिकायत हो तो उसे न्यायिक प्रणाली में सुधार करने, उपचार देना चाहिए। लेकिन एक दोष सिद्ध व्यक्ति को क्षमादान देकर निर्दोष घोषित करना अनुचित है।
धनंजय के प्रति सहानुभूति इसलिये उपजी क्योंकि वह चौदह साल से जेल काट रहा था तथा पिछले दस साल से उस पर फांसी की सजा की तलवार लटकी रही। यदि उसे समय फांसी दे दी जाती तो सम्भवतः ऐसी प्रतिक्रिया नहीं होती। और इसका प्रमाण भी उसकी फांसी के एक दिन पहले ही देखने को मिला जब नागपुर में कई लड़कियों तथा औरतों की इज्जत के साथ खिलवाड़ करने के आरोपी अक्कू यादव को भरी अदालत में मार दिया गया। ऐसे व्यक्ति की हत्या पर आंसू बहाने की बजाय सभी ने राहत की सांस ली है।
राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति न्यायिक शक्ति से भिन्न है। यह शक्ति मुख्य रूप से मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित है। कई बार कोई व्यक्ति आवेश, भावावेश अथवा अकल्पित परिस्थितियों में कोई अपराध कारित कर देता है, तब राष्ट्रपति उस व्यक्ति की स्थिति, भावनाओं, परिस्थितियों, समाज पर उसके प्रभाव आदि को ध्यान में रखते हुये इस शक्ति का प्रयोग करता है। लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं है कि इस शक्ति का प्रयोग जघन्य अपराधियों के लिये भी किया जा सकता है। जीवनदान के इस अनुग्रह को पाने की स्थितियां स्पष्ट की जानी चाहिये तथा अनावश्यक विलम्ब नहीं होना चाहिये।

 

कानून का मखौल उड़ाती जातीय पंचायतें

 पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने राज्य की झज्जर जिले की असंधा ग्राम की एक जातीय पंचायत के उस आदेश के अमल पर रोक लगा दी है जिसके द्वारा वहाँ विवाहित दम्पत्ति के रूप में रह रहे रामपाल तथा सोनिया के तथाकथित सगोत्र विवाह को मान्यता देने से मना कर दिया था तथा यह फतवा दिया था कि वे 'भाई-बहन' की तरह रहें। पंचायत के इस अवैध आदेश से सकते की स्थिति में पहुँचे गये रामपाल ने तो तलाकनामे पर हस्ताक्षर भी कर दिये थे तथा सोनिया को बहन मानकर 'शगुन' के तौर पर दस रुपये देने की पेशकश की थी लेकिन सोनिया ने पंचायत के फैसले को मानने से इंकार कर दिया। सोनिया के साथ उसकी ननद सहित ससुराल के लोग तथा नारीवादी संगठन एकजुट हो गये तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रमुखता पाने के बाद विवाह को अवैध ठहराने वाले फतवे की तीखी आलोचना हुयी।

ज्ञातव्य है कि रामपाल का डेढ़ वर्ष पूर्व विवाह हुआ था तथा वर्तमान में सोनिया तीन माह की गर्भवती है। पंचायत का कथन था कि रामपाल का गोत्र 'दहिया' है तथा सोनिया 'राठी' गोत्र की है जिनमें विवाह वर्जित है क्योंकि दोनों में 'भाई-चारा' है। सोनिया की तरफ से पंचायत के समक्ष बताया गया कि वह वास्तव में 'हुड्डा' गोत्र की है जो सगोत्र की परिधि में नहीं आता है। लेकिन पंचायत ने इस तथ्य को नकारते हुए उनके विवाह को अवैध घोषित कर उन्हें 'भाई-बहन' के रूप में रहने का फरमान जारी कर दिया। गनीमत रही कि सोनिया ने पंचायत के फैसले के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया बल्कि उसके विरुद्ध संघर्ष करते रहने का एलान किया। सोनिया ने आरोप लगाया है कि उसके ससुराल वालों की सम्पत्ति हथियाने के इरादे से गाँव के असरदार लोगों ने एक साजिश की तहत उनके विवाह को अवैध घोषित करवाया है। उच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश पारित होने से पंचायत के निर्णय के प्रवर्तन पर फिलहाल रोक तो लग गयी है लेकिन कानून का मखौल उड़ाने वाले निर्णयों को प्रतिबन्धित करने के लिए प्रभावी कदम की आवश्यकता पर एक बार पुनः बहस छिड़ गयी है।
हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत वैध-विवाह की शर्तों में सगोत्र विवाह को अवैध, शून्य या शून्यकरणीय नहीं माना गया है। अधिनियम के अन्तर्गत 'सपिण्ड' तथा 'प्रतिबन्धित दाय' में पड़ने वाले स्त्री-पुरुष के मध्य विवाह अमान्य होता है। सपिण्ड में वे रिश्ते आते हैं जो हिन्दू विधि के अनुसार मृतक के लिए पिण्डदान करने के अधिकारी होते हैं यथा दादा, ताऊ, चाचा आदि के बच्चे। प्रतिबन्धित दाय के अन्तर्गत मातृ-पक्ष से बंधे हुये रिश्ते भी आते हैं। उदाहरणार्थ ममेरे, मौसेरे भाई-बहन आदि। इनके मध्य विवाह वर्जित है लेकिन यदि उनके  यहाँ प्रथा हो तो ऐसे विवाह को भी मान्यता देने का प्राविधान है। कई हिन्दुओं में मामा-भांजी के मध्य विवाह की परिपाटी है। इन रिश्तों के बच्चों के बीच कभी-कभार सेक्स-सम्बन्ध हो जाते हैं, जिनका खुलासा होने पर दोनों पक्ष के माता-पिता बच्चों का विवाह कर देने में ही भलाई समझते हैं। ऐसे विवाह भी विधि सम्मत होते हैं।
सगोत्रियों के मध्य विवाह पर रोक के पीछे कोई ठोस कारण नहीं है। दरअसल, एक ऋषि के यहाँ शिक्षा पाये शिष्यों को सगोत्र (सः गोष्ठ) माना जाता था तथा उनके मध्य भाई का रिश्ता माना जाता था। यहीं उनके बच्चों के मध्य भी प्रचलित था अतः उनके मध्य विवाह वर्जित रहा है। सपिण्ड तथा प्रतिबन्धित दाय के रिश्तों में वैज्ञानिक कारणों से विवाह हतोत्साहित किया जाता है क्योंकि ऐसे दम्पत्ति की संतानें कमजोर तथा अल्पजीवी होती हैं। लेकिन जहाँ तक कानून का प्रश्न है, वह इस प्रकार के विवाहों को भी कतिपय स्थितियों में मान्यता देता है।
रामपाल तथा सोनिया के तथाकथित सगोत्र विवाह के अटठारह महीने के बाद और वह भी जब पत्नी गर्भवती है, तब विवाह को रद्द करना तथा उन्हें भाई-बहन के रूप में जीवन-यापन करने का आदेश देना विधि के विरुद्ध तो है ही, सामान्य नैतिकता के सिद्धान्तों, जीवन मूल्यों, तथा परिवार की संस्था के प्रति घोर अवमानना का परिचायक है। पंचायत के बुजुर्ग सदस्यों ने इस बात पर विचार ही नहीं किया कि ऐसे 'भाई-बहन के संसर्ग से उत्पन्न जातक को समाज में कलंकित होने का दंश आजीवन झेलना पड़ेगा। ऐसे जातक से तो अवैध या नाजायज संतान की प्रास्थिति अच्छी होगी। ऐसा मानने का पर्याप्त कारण है कि जातीय पंचायत का यह निर्णय या तो जैसा सोनिया ने आरोप लगाया है, किसी अन्यथा उद्देश्य से लिया गया है, अथवा पंच-लोग गंभीर मानसिक रोगी हो गये हैं।
झज्जर की पंचायत द्वारा लिए गये उक्त निर्णय से पहले भी कई अन्य जातीय पंचायतों द्वारा इससे मिलते-जुते विधि विरुद्ध निर्णय लिये गये हैं। तथाकथित ऊंची तथा नीची जाति के लड़के-लड़कियों के मध्य प्रेम तथा विवाह को मान्यता न देकर उनको गांव-घर से बाहर करने तथा कई बार उनकी हत्या तक करने के फरमानों के समाचार अक्सर पढ़ने को मिलते हैं। अभी हाल मे मुजफ्फरनगर के गाँव की पंचायत द्वारा एक बलात्कारी से उसी लड़की का विवाह कराने का फरमान जारी कर दिया गया हालांकि व्यथित लड़की तथा उसके घर वाले उस कापुरुष से विवाह करने के बहुत खिलाफ थे।

रामपाल तथा सोनिया के उक्त प्रकरण से थोड़े ही दिन पूर्व आरिफ-गुड़िया-तौफीक के विवाह तथा गर्भ में पल रहे आठ माह के बच्चे को लेकर मुल्ला-मौलवियों की पंचायत ने अलग-अलग तथा परस्पर-विरोधी फतवे दिये थे। ज्ञातव्य है कि गुड़िया का विवाह भारतीय सेना के जवान आरिफ के साथ हुआ था। युद्ध भूमि में आरिफ लापता हो गया तथा भारतीय सेना ने उसे 'भगोड़ा' घोषित कर दिया था। आरिफ के आने की सम्भावना क्षीण होने पर गुड़िया का विवाह एक स्कूटर मैकेनिक तौफीक के साथ हो गया। वह तौफीक के बच्चे को गर्भ में आठ माह से पाल रही थी कि खबर आई कि आरिफ पाकिस्तान की जेल में बन्द है तथा शीघ्र ही छूट कर वापस अपने घर आ गया। आरिफ तथा तौफीक के बीच गेंद बनी गुड़िया तथा उसके पेट में पल रहे बच्चे को लेकर जिस प्रकार के फतवे विभिन्न मुस्लिम विचार-धारा के धर्मगुरुओं ने दिये है उससे स्थिति और अधिक उलझ गयी है तथा उस अजन्मे बच्चे की स्थिति पर चारों ओर से शंकायें की जा रही हैं।
अभी हाल ही में एक जाति विशेष की पंचायत द्वारा उन पुरुषों तथा महिलाओं को 'सम्मानित' कर अभिनन्दन किया गया जिनके आठ या उससे अधिक बच्चे हैं। राष्ट्रीय जनसंख्या नीति तथा उन पर बने कानूनों की खिल्ली उड़ाते हुए यह कार्यक्रम अल्पसंख्यकों के लिए प्रतिगामी संदेश ही देते हैं।
भारतीय संविधान में किसी पंचायत के अधिकार क्षेत्र में पति-पत्नी को भाई-बहन घोषित करना शामिल नहीं है। अतः हाईकोर्ट ने उस पर रोक लगा दी तथा मीडिया में प्रमुखता पाने के कारण रामपाल तथा सोनिया ने फिलहाल राहत की साँस ली होगी। इन जातीय पंचायतों का कोई वैधानिक अधिकार भी नहीं है लेकिन जाति में बेदखल कर दिये जाने के डर से भीरु लोग इनके निर्णय को आत्मसात् करने के लिए मजबूर होते हैं, तथा अधिकांश मामलों में इनका निर्णय अन्तिम और बाध्यकारी हो जाता है। वैसे हरियाणा, पंजाब, तथा पश्चिमी उत्तर-प्रदेश आदि क्षेत्र में गाँव की पंचायत तथा जातीय पंचायतें पर्याय के रूप में उभरी हैं क्योंकि वही व्यक्ति दोनों के कर्त्ताधर्त्ता होते हैं। स्थानीय दबंग लोगों के इशारे पर चलने वाली इन पंचायतों पर पुलिस तथा प्रशासन की पकड़ नहीं हो पाती तथा राजनीतिज्ञों एवं विधायकों का समर्थन होने के कारण इनका आतंकराज कायम रहता है। समय आ गया है कि ऐसी पंचायतों के गठन पर कानूनन रोक लगायी जाय तथा विधि विरुद्ध फरमानों को अपराध घोषित कर उनके लिए दण्ड की व्यवस्था की जाय। धार्मिक मामलों में कठमुल्लापन पर रोक के लिए त्वरित प्रयास अपरिहार्य हैं जिसमें समान नागरिक संहिता का परित होना शामिल है।

Sunday, 5 July 2026

लोकपाल विधेयक की परिधि और प्रासंगिकता

संसद के आगामी शीतकालीन अधिवेशन में लोकपाल विधेयक को एक बार पुनः पेश किये जाने की कवायद के साथ ही अन्यों के अतिरिक्त राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के क्षेत्राधिकार की परिधि में लाने को लेकर एक नयी बहस छिड़ गयी है। जहाँ वर्तमान राष्ट्रपति डा० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम तथा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इन संवैधानिक पद-धारियों को प्रस्तावित कानून से आच्छादित करने को उचित करार दिया है, वहीं वर्तमान उपराष्ट्रपति श्री भैरोंसिंह शेखावत तथा पूर्व प्रधानमंत्री श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह समेत कतिपय नेताओं ने इस ऊंचे पद को कानून के क्षेत्राधिकार से बाहर ही रखने की वकालत की है। ज्ञातव्य है कि लोकपाल विधेयक पहली बार 1969 में पेश किया गया था लेकिन पारित न हो सका। तब से लेकर 1998 तक विभिन्न सरकारों ने कतिपय संशोधनों के साथ इसे आठ बार लोकसभा में पेश किया लेकिन अभी तक सम्बन्धित कानून मरीचिका ही साबित हुआ है। प्रस्तावित कानून पर नयी बहस के साथ ही वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इसकी प्रासंगिकता तथा उपादेयता पर भी शंका जाहिर की जा रही है।
बीसवीं शताब्दी में लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना के साथ सरकारी कृत्यों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। सामाजिक सेवाओं तथा अर्थव्यवस्था के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु प्रजातांत्रिक सरकारों द्वारा नागरिकों के दैनंदिनी जीवन के प्रायः प्रत्येक पहलू में हस्तक्षेप होने लगा है। ऐसे हस्तक्षेप में वे कार्य भी आते हैं जो कार्यपालिका के विवेकाधीन होते हैं तथा जिनमें भ्रष्टाचार, पक्षपात, प्रमाद, अक्षमता, अनैतिकता, मनमानापन तथा विलम्ब की पर्याप्त गुंजाइश होती है। प्रशासन तथा व्यवस्थापिका पर नजर रखने के लिये 'प्रहरी', 'परिवाद अधिकारी' अथवा 'प्रशासन का संसदीय कमिश्नर' के नामों से प्रचलित 'अम्बुड्समैन' की संस्था की शुरुआत 1809 में सर्वप्रथम स्वीडन में हुयी थी। फिनलैण्ड, डेनमार्क, तथा नार्वे, ऐसे स्कैंण्डिनेवियन देशों से पल्लवित-पुष्पित होती यह संस्था न्यूजीलैण्ड, अल्जीरिया, मारीशस, गुयाना, कनाडा तथा इंग्लैण्ड सहित, अन्यान्य प्रजातांत्रिक देशों में अपना स्थान बना चुकी है। भूतपूर्व अटार्नी जनरल एम०सी० सीतलवाड ने साठ के दशक के प्रारम्भ में अपने यहाँ भी 'अम्बुड्समैन' की तर्ज पर केन्द्र में 'लोकपाल' तथा राज्यों में 'लोकायुक्त' की संस्थायें गठित करने का सुझाव दिया था। उड़ीसा, महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश तथा उत्तरांचल समेत कई राज्यों में लोकायुक्त कार्यरत हैं लेकिन केन्द्र में इसकी व्यवस्था अभी की जानी है।

शासन सत्ता के उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों के आचरण पर अंकुश के लिये भारतीय दण्ड संहिता, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम तथा जांच आयोग अधिनियम आदि कानून हैं तथा इनके प्रर्वतन के लिये पुलिस तंत्र के अलावा केंद्रीय सतर्कता आयोग तथा विभिन्न गुप्तचर एजेंसियां कार्यरत हैं। लेकिन एक आम नागरिक के लिए इनमें गति पैदा करना आसान नहीं है। अखबारों, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चैनलों आदि में जब मामला उछलता है तो सरकारें हरकत में आती हैं तथा जांचें बैठायी जाती हैं। लेकिन इन जांचों को राजनीति से प्रेरित कह कर स्थिति को धुंधा-धुंधा करने के प्रयास होते हैं, इनमें इतनी देर भी होती है कि तत्कालीन आवेग चुक जाता है। बाद में पर्याप्त साक्ष्य न होने के कारण मामले न्यायालय से छूट जाते हैं और आरोपी अपने को दूध का धुला साबित कर ले जाते हैं। अपवादों को छोड़कर अभी तक कोई बड़ी मछली भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के चंगुल में नहीं फंस सकी है।

न्यायिक पुनर्विलोकन तथा संसदीय नियंत्रण के अपर्याप्त सिद्ध होने, प्रशासन के अधिकारों के प्रवर्धन में अधिक पारदर्शिता लाने, नागरिकों के सूचना प्राप्त करने के मौलिक अधिकारों को अमली जामा पहनाने तथा एक उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिये एक ऐसी संस्था की आवश्यकता है, जो प्रत्यक्ष तथा निष्पक्ष हो, जांच की कार्यवाहियां वैयक्तिक तथा औपचारिक प्रकृति की हों, कार्यवाहियां न्यायिक हस्तक्षेप से परे हों तथा उसे अपने कार्यों को पूरा करने में अधिक से अधिक स्वायत्तता तथा स्वतंत्रता हो। इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिये केन्द्र में लोकपाल तथा राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति की अनुशंसा हुयी थी।
सन् 1998 में जिस लोकपाल विधेयक को पेश किया गया था उसमें एक त्रिस्तरीय संस्था के गठन का प्राविधान था। इसके अध्यक्ष तथा दो सदस्यों के लिये क्रमशः भारत का मुख्य न्यायाधीश तथा उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश या उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश होना अर्हता रखी गयी थी। इनका कार्यकाल पांच वर्ष था तथा इन्हें एक सामान्य सिविल न्यायालय की शक्ति दी गयी थी। इस विधेयक में 33 खण्ड हैं और यह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के हेतु दिये गये समस्त परिवादों को सम्मिलित करता है। लोकपाल लोककृत्यकारी वह है जो संघ में प्रधानमंत्री, राज्यमंत्री, उपमंत्री का पद धारित करता है अथवा कर चुका है। इस प्रकार यह विधेयक बहुत ही संकुचित प्रकार के मामलों में एक सीमित दायरे वाले प्राधिकारियों के लिये लागू होगा। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, उच्चतम न्यायपालिका के न्यायाधीशों आदि संवैधानिक पदाधिकारियों पर इसका अधिकार क्षेत्र नहीं रखा गया है।
लोकपाल शिकायतों की जांच करता है तथा अपनी सिफारिश प्रधानमंत्री को देगा जो उस पर कार्यवाही करने के लिये स्वतंत्र होगा। प्रधानमंत्री की स्थिति में उसके विरुद्ध कार्यवाही करने का अधिकार अंततोगत्वा लोकसभा के ऊपर छोड़ दिया गया है, क्योंकि वह लोकसभा के प्रति जिम्मेदार होता है। लोकपाल की सिफारिशें अनुशांसात्मक होती हैं, तथा उन पर कार्यवाही करना या न करना प्रधानमंत्री के विवेकाधिकार में होता है।

भारतीय संविधान में राष्ट्रपति नाममात्र का शासक है। उपराष्ट्रपति राज्य-सभा का सभापति होता है तथा राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उसके पद पर कार्यवाहक के रूप में कार्य करता है। राष्ट्रपति के रूप में वह मंत्रिपरिषद की सलाह से बाध्य होता है। प्रधानमंत्री पर सरकार चलाने का दायित्व होता है तथा वह अपने अधीनस्थ मंत्रियों पर लगाम रखता है। वह अपने पार्टी, लोकसभा तथा भारत की जनता के प्रति जवाबदेह होता है, अतः उससे भ्रष्ट आचरण की अपेक्षा नहीं है। लेकिन जहाँ ऐसे भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ कार्यवाही करने का प्रश्न है - हमारे देश में पिछले दिनों घटित घटनायें कुछ और ही कहानी कहती हैं। पिछली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन सरकार के कुछ मंत्रियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामले आये जो गम्भीर थे तथा पर्याप्त साक्ष्य भी थे। सम्बन्धित मंत्री ने क्षोभ में आकर त्याग-पत्र भी दिया लेकिन शीघ्र ही वापस मंत्रिमण्डल में ले लिए गये। वर्तमान संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन में भी ऐसे मंत्री हैं जिनके विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामले चल रहे हैं। गठबन्धन की राजनीति में ऐसे तत्वों को मंत्रिपद देने के अपने कारण तथा विवशतायें हैं। जिस मोल-भाव तथा जोड़-तोड़ से सरकारें बन रही हैं उसमें भ्रष्टाचारियों को मंत्री बनाना हमारी नियति बन गया है। ऐसे तत्व प्रत्येक राजनीतिक दल में हैं तथा इनके विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य भी हैं लेकिन इन्हें फिर-फिर मंत्रिमण्डल में जगह देना मजबूरी है। ऐसे लोगों के विरुद्ध लोकपाल अपनी अनुशंसा देगा लेकिन प्रधानमंत्री के पास ऐसी फाइल को अलमारी में बंद रखने के सिवाय कोई चारा नहीं होगा तथा लोकपाल की संस्था 'कागजी शेर' बन कर रह जायेगी। अपने विरुद्ध लोकपाल द्वारा की गयी किसी टिप्पणी पर सम्बन्धित मंत्री उल्टे लोकपाल पर राजनीति से प्रेरित होकर कार्य करने का आरोप लगायेगे।

थोड़े दिनों पूर्व उच्चतम न्यायालय के एक न्यायाधीश के विरुद्ध सरकारी धन के दुरुपयोग को लेकर महाभियोग चलाया गया था लेकिन लोकसभा में वोटिंग के समय सांसद उत्तर-दक्षिण के नाम पर बंट गये तथा प्रस्ताव गिर गया। लगभग उसी समय उच्चतम न्यायालय में हवाला कांड की सुनवाई हो रही थी। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने भरी अदालत में कहा कि उनको इस मामले को न बढ़ाने के लिए धमकियाँ दी जा रही हैं तथा धमकी देने वाला अदालत में मौजूद है। लेकिन उन्होंने उसका नाम बताने से इंकार कर दिया। प्रश्न यह है कि यदि भारत के मुख्य न्यायाधीश को धमकियाँ दी जा सकती हैं तथा वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है फिर एक सामान्य नागरिक की हैसियत ही क्या है ?

कौटिल्य ने कहा था कि समुद्र में रहने वाली मछली कितना पानी पीती है और कितना निकालती है, वह कोई नहीं जान सकता। इसी प्रकार लोक-कोष पर कब्जा जमाये अधिकारी कितना इधर-उधर करते हैं, यह जानना आसान नहीं है। भारतीय राजनीति आंकठ भ्रष्टाचार में डूबी हुयी है तथा नेता-नौकरशाही-अपराधी की तिकड़ी बड़ी बेशर्मी से जनता के धन का दोहन कर रही है। इनको काबू में करने के लिए सतर्क, जानकार तथा उच्च मानव मूल्यों की पोषक जनता को आगे आना होगा तथा अपने धन की रक्षा स्वयं करने के लिए दृढ़ संकल्पित होना पड़ेगा। 

लोकपाल विधेयक पर छद्म विवाद

 संसद के आगामी शीतकालीन अधिवेशन में पेश किये जाने वाला लोकपाल विधेयक एक बार पुनः ठंडे बस्ते में डाल दिया गया लगता है। तत्विषयक मंत्रिमण्डल की बैठक में जब इसे औपचारिक स्वीकृति देने के लिये विचारार्थ रखा गया तो दो मंत्रियों की अनुपस्थिति का बहाना बनाकर इसे आगे के लिये टाल दिया गया। कहा गया चूँकि इस विधेयक की परिधि में प्रधानमंत्री को शामिल किया जाना है तथा प्रधानमंत्री के दागी सिद्ध होने पर सम्पूर्ण मंत्रिमण्डल को 'सामूहिक उत्तरदायित्व' के अनुसार त्याग-पत्र देना आवश्यक होगा अतः इसको अन्तिम रूप देने के लिये प्रत्येक मंत्री का बैठक में मौजूद रहना अपरिहार्य है। विधेयक को संसद के विचारार्थ प्रस्तुत करने के लिये इसके अन्य प्रावधानों पर अभी और तथा गहन पड़ताल करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। यह विडम्बना ही है कि विधेयक को संसद में जाने से रोकने में एक ऐसे मंत्री की प्रमुख भूमिका बताई जा रही है जो स्वयं कथित भ्रष्ट आचरण के कारण कुख्यात हैं तथा उन्हें अपने विरुद्ध लगे आरोपों से क्लीन चिट पाना शेष है।

अभी थोड़े ही दिन पूर्व उत्तरांचल में सम्पन्न प्रदेश लोकायुक्तों के अधिवेशन में बोलते हुए राष्ट्रपति डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम तथा प्रधानमंत्री डॉ० मनमोहन सिंह ने राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री तक को लोकपाल के दायरे में लाने का सुझाव दिया था। इसके विपरीत उपराष्ट्रपति श्री भैरों सिंह शेखावत, पूर्व प्रधानमंत्री श्री वी०पी० सिंह तथा कई अन्य नेता इन संवैधानिक पदधारियों को लोकपाल की परिधि से दूर ही रखने की वकालत कर रहे हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान में राष्ट्रपति को व्यवस्थापिका का नाममात्र का मुखिया मनोनीत किया गया है तथा शासन का उत्तरादायित्व प्रधानमंत्री तथा उसकी मंत्रिपरिषद पर है। संविधान के अनुच्छेद 361 के अन्तर्गत राष्ट्रपति तथा राज्यपालों को उनके कार्यकाल के दौरान पद की शक्तियों के प्रयोग और कर्तव्यों के पालन के लिये न्यायिक उत्तरदायित्व से छूट प्रदान की गयी है। उपराष्ट्रपति साधारणतया राज्य सभा का सभापति होता है तथा राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में ही उसका दायित्व निर्वहन करता है। अतः इनको तो लोकपाल के दायरे में लाना सम्भव ही नहीं होगा। लेकिन बोफोर्स, सेंट किट्स, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड तथा स्विस बैंकों में धन जमा कराने के प्रकरणों में तत्कालीन प्रधानमंत्रियों के नाम उछलने के कारण पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वयं प्रधानमंत्री पद को भी लोकपाल की परिधि में लाने का प्रावधान करवाया था जिसका आम जनता ने स्वागत भी किया था। अब जब वर्तमान प्रधानमंत्री भी इस पद को लोकपाल विधेयक से आच्छादित करना चाहते हैं फिर इस पर किसी बहस की गुंजाइश नजर नहीं आती तथा प्रधानमंत्री को शामिल करने को लेकर विधेयक को ही लोकसभा से दूर रखने की कवायद किसी अन्यथा उद्देश्य की ओर इंगित करती प्रतीत हो रही है।
ज्ञातव्य है कि सन् 1961 में प्रशासनिक सुधार आयोग तथा तत्कालीन अटार्नी जनरल श्री एम०सी० सीतलवाड द्वारा अनुमोदित लोकपाल तथा लोक आयुक्त विधेयक 1969 में ही लोकसभा में पारित हो गया था लेकिन यह राज्यसभा से पारित हो पाता, इससे पूर्व लोकसभा का विघटन हो गया था, सांविधानिक उपबन्धों के अनुसार, यह विधेयक भी निरस्त हो गया। तब से लेकर आज तक विभिन्न केन्द्रीय सरकारों ने इसमें कतिपय संशोधनों के साथ आठ बार संसद के समक्ष अनुमोदनार्थ रखा है लेकिन किसी न किसी कारण यह अभी तक कानून का रूप नहीं ले सका है। प्रारम्भ में इस विधेयक के अन्तर्गत लोकसेवकों के भ्रष्ट आचरण के अलावा पक्षपात, पद का दुरुपयोग, प्रमाद, अक्षमता, अनैतिकता, मनमानापन तथा विलम्ब आदि के आधार शामिल थे तथा लोकसेवकों में केन्द्रीय तथा राज्य के मंत्रियों, सचिवों तथा अन्य समकक्ष अधिकारियों को शामिल किया गया था जिनपर कार्यपालिका के विवेकाधीन कार्यों को करने का उत्तरदायित्व रहता है। लेकिन इस बीच इसके क्षेत्रों को सीमित और संकुचित कर दिया गया तथा सन् 2001 में प्रस्तावित लोकपाल विधेयक के अधिकारक्षेत्र में केवल केन्द्रीय मंत्रिमण्डल के पूर्व तथा वर्तमान सदस्यों को ही रखा गया है। सांसदों तक को इसकी परिधि से बाहर कर दिया गया है।
शासन सत्ता के उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों के आचरण पर अंकुश के लिये भारतीय दण्ड संहिता, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम तथा जांच आयोग अधिनियम आदि कानून हैं तथा इनके आदेशों के प्रर्वतन के लिये सामान्य पुलिस तंत्र के अलावा केन्द्रीय सतर्कता आयोग तथा गुप्तचर एजेंसियां कार्यरत हैं। लेकिन एक आम नागरिक के लिये इनमें गति पैदा करना आसान नहीं है। अखबारों, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चैनलों आदि में जब मामला उछलता है तो सरकारें हरकत में आती हैं तथा जांचें बैठायी जाती हैं। लेकिन इन जांचों को राजनीति या विद्वेष से प्रेरित कहकर स्थिति को धुंधा-धुंधा करने के प्रयास होते हैं। इनमें इतनी देर भी होती है कि तत्कालीन आवेग चुक जाता है तथा आरोपी बेदाग हो स्वच्छन्द विचरण करते रहते हैं। कुछेक प्रकरणों को छोड़कर अभी तक कोई बड़ी मछली भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के चंगुल में नहीं फंसी है। हालांकि तलाशियों में करोड़ों रुपये नकद तथा अकूत सम्पत्ति के प्रमाण मिले हैं।
न्यायिक पुनर्विलोकन तथा संसदीय नियंत्रण के अपर्याप्त सिद्ध होने, प्रशासन के अधिकारों में अधिक पारदर्शिता लाने, नागरिकों के सूचना प्राप्त करने के मौलिक अधिकारों को अमली जामा पहनाने तथा एक उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिये एक ऐसी संस्था की आवश्यकता है, जो प्रत्यक्ष तथा निष्पक्ष हो, जांच की कार्यवाहियां वैयक्तिक तथा औपचारिक प्रकृति की हों, कार्यवाहियां न्यायिक हस्तक्षेप से परे हों तथा उसे अपने कार्यों को पूरा करने में अधिक से अधिक स्वायत्तता तथा स्वतंत्रता हो। इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिये केन्द्र में लोकपाल तथा राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति की अनुशंसा हुयी थी। उड़ीसा, महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश तथा उत्तरांचल समेत कई राज्यों में लोकायुक्त की अधिनियमों के अन्तर्गत लोकायुक्त कार्यरत है लेकिन केन्द्र में इसकी व्यवस्था अभी की जानी है। लोकायुक्त की परिधि में मुख्यमंत्री को छोड़कर राज्य मंत्रिमण्डल के सभी कोटि के पूर्व तथा वर्तमान मंत्री, सरकार में सचिव तथा समकक्ष स्तर के पदाधिकारी, लोकनिगमों के अध्यक्ष तथा सदस्यगण, विश्वविद्यालयों के कुलपति एवं महत्त्वपूर्ण पदाधिकारियों को आच्छादित किया गया है जिनके विरुद्ध जनमानस को शिकायतें हो सकती हैं।
सन् 2001 में जिस लोकपाल विधेयक को प्रस्तावित किया गया था उसमें एक त्रि-स्तरीय संस्था के गठन का प्राविधान था। इसके अध्यक्ष तथा दो सदस्यों के लिये क्रमशः भारत का मुख्य न्यायाधीश तथा उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश अथवा उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश होना अर्हता रखी गयी है। इनका कार्यकाल पांच वर्ष तथा इन्हें एक सामान्य सिविल न्यायालय की शक्ति दी गयी थी। इस विधेयक में 33 खण्ड हैं और यह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के हेतु दिये गये समस्त परिवादों को सम्मिलित करता है। लोकपाल किसी भी लोककृत्यकारी के सम्बन्ध में किसी अभिकथन या आरोप की जांच करने की अधिकारिता रखता है। लोकपाल के समक्षवाद दायर करने की समयावधि पांच वर्ष है तथा जांच करते समय वह किसी को भी गवाही के लिये बुला सकता है या दस्तावेज मंगा सकता है। इसे अपनी अवमानना के लिये दण्ड देने की भी शक्ति है। लोकपाल शिकायतों की जांच करता है तथा अपनी सिफारिशें प्रधानमंत्री को देता है जो उसपर समुचित कार्यवाही करने के लिये स्वतंत्र होगा। प्रधानमंत्री की स्थिति में उसके खिलाफ कार्यवाही करने का अधिकार अंततोगत्वा लोकसभा के ऊपर छोड़ दिया गया है, क्योंकि वह लोकसभा के प्रति जवाबदेह होता है। लोकपाल की सिफारिशें अनुशांसात्मक होती हैं तथा उन पर कार्यवाही करना या न करना प्रधानमंत्री के विवेकाधिकार में होता है।
आज की वर्तमान परिस्थितियों में लोकपाल की प्रासंगिकता पर ही प्रश्न किये जा रहे हैं कि क्या उसके द्वारा चिह्नित व्यक्तियों को मंत्रिमण्डल से हटा कर उनके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही कर पाना सम्भव होगा? हमारे देश में पिछले दिनों घटित घटनायें कुछ और ही कहानी कहती हैं। पिछली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन सरकार के घटक दलों के नेताओं के खिलाफ 'तहलका' मचा तथा गुप्त कैमरे के सामने रिश्वत लेते हुये पकड़े गये। एक मंत्री ने आवेग में आकर त्याग-पत्र भी दे दिया लेकिन शीघ्र ही वापस मंत्रिमण्डल में ले लिये गये। विरोध पक्ष ने लोकसभा में उनका बहिष्कार जारी रखा। वर्तमान संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन में भी कई मंत्रियों को 'दागी' कहते हुये विरोध पक्ष द्वारा सदन का बहिष्कार किया गया। गठबन्धन की राजनीति में ऐसे तत्वों को मंत्रिपद देने के अपने कारण तथा विवशतायें हैं। जिस मोल-भाव तथा जोड़-तोड़ से सरकारें बन रही हैं उसमें भ्रष्टाचारियों को मंत्री बनाना हमारी नियति बन गयी है। ऐसे तत्व प्रत्येक राजनीतिक दल में हैं तथा इनके विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य भी हैं लेकिन इन्हें फिर-फिर मंत्रिमण्डल में जगह देना मजबूरी है। ऐसे लोगों के खिलाफ लोकपाल अपनी अनुशंसा देगा लेकिन प्रधानमंत्री के पास ऐसी फाइल को अलमारी में बंद रखने के अलावा कोई चारा नहीं होगा तथा लोकपाल की संस्था 'कागजी शेर' और 'सफेद हाथी' बन कर रह जायेगी।
भारतीय राजनीति आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हुयी है तथा नेता-नौकरशाह-माफिया की तिकड़ी बड़ी बेशर्मी से जनता के धन का दोहन कर रही है। अभी हाल में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार हम भ्रष्टतम देशों की अगली पंक्ति में स्थान बना चुके हैं तथा इसको रोकने के सारे प्रयास विफल रहे हैं। ऐसे में लोकपाल विधेयक की उपादेयता संदेहास्पद है तथा इसकी परिधि को लेकर छिड़ी बहस बेमानी है।

राज्यपाल पद: सांविधानिक मर्यादा एवं राजनीतिक मर्यादा के अन्तर्द्वन्द्व

 स्वतंत्र भारत के संविधान में राज्यपाल का पद ब्रिटिश 'राज' का एकमात्र अवशेष है। सन् 1858 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी से भारत की सार्वभौमिकता अपने पक्ष में स्थानान्तरित करते हुये इस नव-उपनिवेश के शासन के लिये गवर्नर-जनरल की नियुक्ति सम्राट के अधिपत्र द्वारा होनी प्रारम्भ हुयी। इनका कार्य मुगल सम्राट शाहआलम से प्राप्त दीवानी की वसूली तक सीमित था। तदनन्तर प्रशासनिक कार्यों के लिये बनाये जाने वाले प्रान्तों में 'गवर्नर' की नियुक्ति पहले तो सीधे सम्राट द्वारा होने की परम्परा रही लेकिन भारत सरकार अधिनियम, 1935 के पारित होते-होते इनके नियुक्ति अधिकारी वायसराय हो गये। ब्रिटिश 'राज' में गवर्नर की प्रतिबद्धता केवल 'ताज' के प्रति थी तथा वह सम्बन्धित प्रांत की कार्यपालिका का न सिर्फ निर्द्वन्द्व व सर्वोच्च मुखिया था बल्कि राजस्व का रखवाला तथा विधायिनी पर अभिभावी प्रभाव रखने वाला अत्यन्त ताकतवर अधिकारी था। इन पदों पर वरिष्ठ नौकरशाह या राज परिवार अथवा उनसे खून का रिश्ता रखने वाले अति विशिष्ट व्यक्तियों की ही नियुक्ति की जाती थी। सामान्य प्रशासन के अलावा उच्च शिक्षा की दिशा-दशा को निर्धारित, नियमित और नियमित करने तथा उस पर प्रभावी अंकुश रखने के लिये उसे राज्य विश्वविद्यालयों का पदेन कुलाधिपति भी नियुक्त किया गया। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि भारत में प्रथम विश्वविद्यालय की स्थापना से पूर्व ही इंग्लैण्ड में वहाँ के विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता स्थापित हो चुकी थी तथा उन पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं था, लेकिन भारत के विश्वविद्यालयों पर गवर्नर का प्रभावी, अभिभावी तथा अन्तिम नियंत्रण था। अपने उपनिवेश को अक्षुण्ण रखने के लिये तथा राज्य प्रशासन की प्रत्येक महत्त्वपूर्ण इकाई पर गिद्ध-दृष्टि तथा लगाम कसे रहने के लिये गवर्नर से अच्छा भला कौन हो सकता था!

ब्रिटिश ताज की रक्षा में अहर्निश जुटे प्रान्तों के यह गवर्नर बड़े मनमानेपन से तथा कुटिलतापूर्वक शासन चलाते थे। इनके सामने विधायिका तथा न्यायपालिका के बड़े अधिकारी भी असहाय तथा बेबस थे। विभिन्न भारत शासन अधिनियमों में इन्हें विधानसभा के द्वारा पारित कानूनों पर वीटो इस्तेमाल करने की शक्ति थी तथा राजस्व एवं टैक्स की वसूली बड़ी बेरहमी तथा बर्बरता से करवाते थे। इसमें इनका स्थानीय जमींदार साथ देते थे जिन्हें 'राय साहब', 'राय बहादुर' आदि की उपाधियों से विभूषित किया जाता था। तत्समय के जमींदारों तथा अधिकारियों से रिश्वत में मिले अवैध धन लेकर जब वे वापस इंग्लैण्ड जाते थे तो जिस ऐशो-आराम का प्रदर्शन करते थे, उसकी अनुगूँज ब्रिटिश पार्लियामेंट तथा प्रेस में होती थी। इनको 'नवाब' कहा जाता था तथा हेय दृष्टि से देखा जाता था। ऐसी संस्था को स्वतंत्र भारत में पल्लवित-पुष्पित न होने देने के लिये संविधान सभा में काफी बहस हुयी तथा इस पद के औचित्य को ही प्रश्नगत किया गया था। सुझाव दिया गया था कि केन्द्र में न सही, प्रान्तों में गवर्नर का चुनाव जनता द्वारा प्रत्यक्ष मतदान से हो लेकिन मुख्यमंत्री व गवर्नर के रूप में दो समानान्तर सत्ता-केन्द्र बनने की आशंका से यह प्रस्ताव नामंजूर कर दिया गया। अन्ततः कनाडा के आदर्श को अंगीकार करते हुये इनकी राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गयी।
संविधान के लागू होने के प्रारम्भिक वर्षों में राज्यपाल की संस्था को लेकर कोई उल्लेखनीय विवाद नहीं हुआ। केन्द्र तथा राज्यों में एक ही पार्टी की सरकारें थीं अतः उसकी गुंजाइश भी कम थी। इन पदों पर दूसरे प्रदेश के अवकाश प्राप्त राजनीतिज्ञ, नौकरशाह तथा विश्वविद्यालयों के कुलपति रहे व्यक्तियों को नियुक्त किया गया। राज्यपालों को राज्य विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति भी बनाये रखा गया। इनके मुख्यकार्यों में दीक्षांत समारोहों सहित राज्य के अन्य कार्यक्रमों में अध्यक्षता करना तथा सत्रारम्भ में विधानसभा में औपचारिक अभिभाषण देना शामिल था। सरकारी कार्यों में वे मुख्यमंत्री तथा मंत्रिपरिषद की सलाह और सहायता से बंधे हुये थे तथा यदि किसी मामले पर असहमति होती भी थी तो वह राजभवन की चार दीवारों तक ही सीमित रह जाती थी। चूँकि राज्यपाल दूसरे राज्य से आते थे तथा अधिकतर एकेडमिक होते थे अतः जनमानस में इनके प्रति सम्मान बना रहा।
केन्द्र तथा राज्यों में एक दल का एकाधिकार समाप्त होने, दोनों जगह अलग-अलग दलों की सरकार बनने, संसद तथा प्रान्तीय विधानसभा की अवधि के समय का तारतम्य टूटने, राज्य की विरोधी पक्ष की सरकार को परेशान करने तथा दल-बदल करके उसकी सरकार गिराने आदि के राजनीतिक कारणों से राज्यपाल पद पर काबिज व्यक्ति प्रमुखता पाने लगे तथा इन पर अपवादों को छोड़कर सक्रिय राजनीतिज्ञों की नियुक्ति होने लगी। राज्यों में राष्ट्रपति शासन के दौरान तो राज्यपालों को, अपने ब्रिटिश राज के संस्करणों से भी अधिक शक्ति प्राप्त हो जाती है, अतः धीरे-धीरे इनमें पद, प्रास्थिति तथा प्रतिष्ठा के लिये लिप्सा बढ़ती गयी तथा शक्ति का प्रदर्शन भी खुले आम तथा निर्लज्जता से होने लगा।
भारत में प्रत्येक राज्य में कार्यपालिका अध्यक्ष राज्यपाल है। साधारणतः प्रत्येक राज्य में एक राज्यपाल होता है किन्तु अनुच्छेद 153 के परंतुक के अधीन एक ही व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जा सकता है। राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होती है तथा इसके सभी कार्य राज्यपाल के नाम से किये जाते हैं। राज्यपाल, कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग या तो स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से करता है। अनुच्छेद 156 के अनुसार राज्यपाल, राष्ट्रपति के 'प्रसाद पर्यन्त' पद धारण करता है तथा पद ग्रहण करने की तारीख से पांच वर्ष तक कार्यरत रहता है। लेकिन इसी अनुच्छेद के परंतुक के अनुसार राज्यपाल, अपने पद की अवधि समाप्त हो जाने पर भी, तब तक पद धारण करता रहेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी पद धारण नहीं कर लेता है। किसी राज्यपाल को एक से अधिक राज्यों का भार दिया जा सकता है तथा वह समयावधि से पूर्व इस्तीफा दे सकता है तथा उसे हटाया जा सकता है। लेकिन इस हेतु राष्ट्रपति की भांति महाभियोग का प्राविधान नहीं है। राज्यपाल को हटाने से पूर्व उसे 'सुनवाई का अवसर' दिये जाने की भी अपरिहार्यता नहीं है। सन् 1989 में केन्द्र में सत्ता परिवर्तन के बाद राज्यपालों के सामूहिक रूप से इस्तीफे मांगे गये थे। राज्यपालों का एक राज्य से दूसरे राज्य में तबादला भी किया जा सकता है तथा ऐसे राज्यपाल अपने कार्यकाल की शेष अवधि ही नयी जगह पर बितायेंगे। इधर हाल के वर्षों में असहज राज्यपालों के साथ ऐसे अप्रिय कदम उठाये गये हैं।
संविधान, केन्द्र को राज्यों में राज्यपालों की नियुक्ति में अनिबन्धित शक्ति देता है तथा राज्यपाल पद पर नियुक्ति हेतु पैंतीस वर्ष आयु का भारतीय नागरिक होना ही एकमात्र अर्हता है। राज्यपाल के पद की शर्तों में उसके द्वारा अन्य कोई लाभ का पद धारण न करना तथा संसद या किसी भी राज्य के विधान मण्डल का सदस्य न होना शामिल है। उसका वेतन तथा परिलब्धियां संसदीय विधि द्वारा निर्धारित होती हैं तथा उन्हें उसकी पदावधि के दौरान कम नहीं किया जा सकता है। वैसे तो राज्यपाल को राज्य में वही स्थान प्राप्त, कहा जाता है जो केन्द्र में राष्ट्रपति को है लेकिन सांविधानिक योजना के तहत वस्तुतः राज्यपाल को उतनी शक्तियां नहीं हैं जितनी राष्ट्रपति को है। उसकी कार्यपालिका शक्ति का विस्तार उन विषयों तक है जिनके सम्बन्ध में इस राज्य के विधान मण्डल को विधि बनाने की शक्ति है। साधारणतः राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिये एक मंत्रिपरिषद होती है, जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होता है तथा वह उसकी सलाह के अनुसार ही कार्य करता है। लेकिन उसकी बाध्यता उतनी व वैसी नहीं है जैसी अनुच्छेद 74 के अन्तर्गत राष्ट्रपति की है। केन्द्र में बिना मंत्रिपरिषद की सलाह के राष्ट्रपति कोई कार्य नहीं कर सकता। राज्यों में अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत बिना मंत्रिमण्डल के प्रशासन सम्भव है। राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है, अध्यादेशों तथा विधेयकों पर अपनी सहमति देता है अथवा राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित करता है तथा संविधान के विभिन्न प्रावधानों के अन्तर्गत कई अन्य वैवेधिक कार्य करता है। अनुच्छेद 163 (2) के अनुसार यदि कोई प्रश्न उठता है कि कोई विषय ऐसा है या नहीं जिसके सम्बन्ध में इस संविधान द्वारा या इसके अधीन राज्यपाल से यह अपेक्षित है कि वह अपने विवेकानुसार कार्य करे तो राज्यपाल का अपने विवेकानुसार किया गया  विनिश्चय अंतिम होगा और उसके द्वारा की गयी किसी बात की विधिमान्यता इस आधार पर प्रश्नगत नहीं की जायेगी कि उसे अपने विवेकानुसार कार्य करना चाहिए था या नहीं।
जहाँ राष्ट्रपति, संसद तथा राज्य विधान मण्डलों में जनता के प्रतिनिधियों द्वारा चुना जाता है, अर्थात् अप्रत्यक्ष रूप से जनता ही के द्वारा चुना जाता है, वहाँ राज्यपाल को राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अपने अधिपत्र द्वारा नियुक्त करता है और राज्यपाल अपना पद भी राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यन्त ही धारण करता है। इस दृष्टि से राज्यपाल केन्द्र का एक प्राधिकारी होता है। उसकी यह स्थिति संविधान की इस स्कीम के अनुकूल है जिसके अनुसार राज्य स्वतंत्र या स्वात्तापूर्ण इकाईयां न होकर, केन्द्र के पर्यवेक्षण और नियंत्रण में काम करने वाली प्रशासनिक इकाईयां हैं जिनकी सरकारों के संविधान के अनुकूल आचरण और संचालन का दायित्व अन्ततः केन्द्र पर है। इस प्रकार राज्यपाल के कर्त्तव्यों और शक्तियों के दो श्रोत हो जाते हैं। एक ओर तो वह राष्ट्रपति की भाँति, राज्य में विधानमण्डल का अभिन्न अंग होता है तथा कार्यपालिका शक्ति का औपचारिक स्वामी होता है, वहीं दूसरी ओर वह राज्य में केन्द्र द्वारा नियुक्त किया गया और केन्द्र के "प्रसाद पर्यन्त" पदाढ़ रहने वाला एक विशिष्ट अधिकारी होता है। उसकी यह दूसरी भूमिका महत्त्वपूर्ण है जो उसे उसके ब्रिटिश संस्करण के समान शक्ति देती है। यदि उसका यह मत हो कि राज्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है जिसमें राज्य का शासन संविधान के उपबन्धों के अधीन नहीं चलाया जा सकता तो उसका कर्त्तव्य होता है कि वह राष्ट्रपति को इस आशय की रिपोर्ट करे। उसकी ऐसी रिपोर्ट के फलस्वरूप राज्य में राष्ट्रपति शासन घोषित किया जा सकता है।
राम जवाया बनाम पंजाब राज्य (ए.आई.आर. 1955 एस.सी. 549) में उच्चतम न्यायालय ने घोषित किया था कि राज्यपाल अपने राज्य में कार्यपालिका प्रमुख की स्थिति रखता है लेकिन वस्तुतः सरकार चलाने का दायित्व मंत्रिपरिषद् को ही होता है। तदनन्तर, शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (ए.आई.आर 1974 एस.सी. 2194) में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उन क्षेत्रों में जहाँ राज्यपाल को विवेकाधिकार है, को छोड़कर अन्य क्षेत्रों में वह मंत्रिपरिषद् की सलाह तथा सहायता से कार्य करने के लिये अपेक्षित है। बयालिसवें संविधान संशोधन विधेयक द्वारा राष्ट्रपति को अपनी मंत्रिपरिषद् की सलाह पर कार्य करने को बाध्य कर दिया गया लेकिन राज्यपाल के लिये ऐसा उपबन्ध नहीं किया गया।
राज्यपाल की प्रास्थिति, शक्तियां तथा भूमिका पर हरगोविन्द पन्त बनाम रघुकुल तिलक (ए.आई.आर. 1979 एस.सी. 1109) का वाद उल्लेखनीय है। इस प्रकरण में राजस्थान राज्यपाल पद पर श्री रघुकुल तिलक की नियुक्ति को इस आधार पर चुनौती दी गयी थी कि इससे पूर्व वे राजस्थान लोक सेवा आयोग के सदस्य रह चुके थे। अनुच्छेद 319, आयोग के सदस्यों द्वारा ऐसे सदस्य न रहने पर संघ  या राज्य के अधीन किसी भी नियोजन को प्रतिबन्धित करता है। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश श्री वाई० वी० चन्द्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यों की एक संविधान पीठ ने श्री तिलक की नियुक्ति को वैध ठहराते हुये अभिनिर्धारित किया था कि राज्यपाल का पद सांविधानिक है, उसकी नियुक्ति केन्द्र या राज्य के अधीन नियोजन नहीं है तथा उसकी नियुक्ति इसलिये की जाती है कि वह देखे कि सम्बन्धित राज्य सरकार सांविधानिक उपबंधों के अनुसार चल रही है या नहीं। न्यायालय का कहना था कि इसी कारण उसे कार्यपालिका का अध्यक्ष, विधायिका का अभिन्न अंग तथा विवेकविकारों व विशेषाधिकारों के साथ कुछ सम्प्रभुता सम्बन्धी कार्य भी दिये गये हैं। यहाँ पर रोचक तथ्य यह है कि विवादों से परिपूर्ण श्री तिलक का कार्यकाल बीच में ही समाप्त कर दिया गया तथा सूर्यनारायण बनाम भारत संघ (ए.आई.आर. 1982 राज. 1) के वाद में राजस्थान उच्च न्यायालय ने उनकी बर्खास्तगी को विधि-मान्य ठहराया था।
राज्यपालों द्वारा मुख्यमंत्री नियुक्त करने या उसकी सलाह मानकर विधान सभा भंग करने ऐसे विवेकाधिकार पर कई विवादों में न्यायिक पुनर्विलोकन हुआ है। 21 फरवरी 1998 की मध्य रात्रि में उत्तर-प्रदेश में श्री कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली सरकार को तत्कालीन राज्यपाल श्री रमेश भंडारी ने बर्खास्त कर दिया तथा श्री जगदम्बिका पाल को मुख्यमंत्री की शपथ दिला दी। सब कुछ आनन-फानन में किया गया। उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया कि विधान सभा का विशेष सत्र बुलाकर इन दोनों के बहुमत का परीक्षण किया जाय। श्री कल्याण सिंह द्वारा बहुमत सिद्ध करने पर श्री भंडारी को पद छोड़ना पड़ा। तमिलनाडु में गत विधानसभा चुनावों में अन्नाद्रमुक को भारी विजय पर सुश्री जयललिता दल की नेता चुनी गयीं हालांकि वे सदन की सदस्या होने की अर्हता नहीं रखती थीं। थोड़े ही दिन पूर्व, भ्रष्टाचार के मामले में अपराधी सिद्ध होने के कारण वे चुनाव लड़ने के लिये अयोग्य हो चुकी थीं। इसके बावजूद तमिलनाडु की राज्यपाल न्यायमूर्ति (अवकाश प्राप्त) फातिमा बीवी ने उन्हें मुख्यमंत्री की शपथ दिला दी। बी.आर. कपूर बनाम तमिलनाडु राज्य, (2001) 7 एस.सी.सी. 23 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने राज्यपाल के इस कदम को अवैध ठहराया। इससे क्षुब्ध होकर अन्ततः राज्यपाल ने इस्तीफा दे दिया। 1992 में नागालैण्ड के राज्यपाल श्री एम. एम. थामस को भी अल्पमत मुख्यमंत्री की सलाह पर सदन भंग करने तथा उन्हें कार्यवाहक बनाये रखने के कारण बर्खास्त किया गया था। उदाहरण अभी और भी हैं।
राज्यपाल तथा मंत्रिपरिषद् के आपसी सम्बन्ध तथा उसके विवेकाधिकार के कार्यान्वयन पर उच्चतम न्यायालय का अभी थोड़े दिन पूर्व आया फैसला और भी महत्वपूर्ण है। इस निर्णय में यह अभिनिर्धारित किया गया है कि राज्यपाल भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के अन्तर्गत किसी मंत्री के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति 'स्वविवेक' से दे सकते हैं तथा इस हेतु उन्हें मंत्रिमण्डल की सहायता और सलाह की दरकार नहीं है। न्यायमूर्ति एम० संतोष हेगड़े की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने दूरगामी प्रभाव वाले इस निर्णय में मत व्यक्त किया है कि प्रामाणिक तथ्य एवं विशिष्ट परिस्थितियों में यदि राज्यपाल स्व-विवेक से कार्य नहीं कर पाये तो यह विधि के शासन की विफलता होगी। मध्य-प्रदेश के दो मंत्रियों के खिलाफ लोकायुक्त ने प्रथम-दृष्ट्या मामला मानता पाया था तथा राज्यपाल से अनुरोध किया था कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के अन्तर्गत उनके खिलाफ अभियोजन के लिये अनुमति दें, जिसे राज्यपाल ने मान लिया था। लेकिन उच्च न्यायालय ने इसे अविधिमान्य ठहराया था। उच्चतम न्यायालय ने अपने स्वागत योग्य निर्णय में राज्यपाल के कदम के वैध ही नहीं बल्कि उचित ठहराया, उसकी सांविधानिक स्थिति स्पष्ट की तथा राज्य प्रशासन में उसकी महती भूमिका रेखांकित की है।
प्रशासनिक सुधार आयोग, सरकारिया कमीशन तथा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन द्वारा नियुक्त वेंकटचलैया आयोग आदि ने राज्यपाल के पद को इसी रूप में बनाये रखने की सिफारिश की है लेकिन उसकी नियुक्ति में पारदर्शिता एवं स्थिरता लाने, गैर-राजनीतिक व्यक्ति को चुनने तथा सम्बन्धित राज्य सरकार से परामर्श करने की अपेक्षायें व्यक्त की हैं। यदि लोकसभा तथा राज्य विधान-सभाओं के कार्यकाल पाँच वर्ष स्थिर हो जायें तथा इनके चुनाव एक साथ हों, फिर राज्यपालों की नियुक्ति-पदच्युति के विवाद नहीं होंगे तथा अप्रिय प्रसंगों से मुक्ति मिलेगी।
राज्यपाल के पद को सांविधानिक करार देने, तत्विषयक सांविधानिक दायित्व निर्वहन करने की अपेक्षा करने, लेकिन, राष्ट्रपति के 'प्रसाद पर्यन्त' ही पद पर बने रहने के न्यायालयी निर्णय तथा प्रावधान परस्पर विरोधी प्रतीत होते हैं। निवेदित है कि यदि राजनीतिक शुचिता, नैतिकता, संविधान की सर्वोपरिता, विधि का शासन तथा जनतांत्रिक मानक-मूल्यों का आदर्श पालन किया जाय तो यह आभासी विरोधाभास, स्वतः विलुप्त हो जायेगा तथा राज्यपाल का पद 'सहकारी संघवाद' का अनन्य सेतु सिद्ध होगा। प्रत्येक राज्यपाल अपना पद ग्रहण करने से पहले "अपनी पूरी योग्यता से संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण करने तथा श्रद्धापूर्वक और पूरी निष्ठा से उस राज्य की जनता की सेवा और कल्याण में निरत" रहने की शपथ लेता है, अतः क्षुद्र और संकीर्ण राजनीतिक हितों की परवाह किये बिना उसे संविधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रमाणित करते रहने का अवसर दिया जाना चाहिए।

साम्प्रदायिकता के खिलाफ कानून की मुहिम

 केन्द्रीय गृहमंत्री ने प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों के सम्मेलन में साम्प्रदायिकता के खिलाफ संहिताकृत कानून बनाने की सरकार की इच्छा दोहराई है। कानून-व्यवस्था के सुचारु संचालन के लिये पुलिस-तंत्र को आवश्यक कानूनी-अधिकार देकर स्थिति विशेष हेतु तैयार करने के लिये पैकेज-कानून की आवश्यकता बहुत दिनों से महसूस की जाती रही है। इस बीच साम्प्रदायिकता के खिलाफ एक समग्र-संहिता का मसविदा गृह मंत्रालय द्वारा विधि-मंत्रालय को भेजा जा चुका है तथा शीघ्र ही इसे परामर्श-पत्र के रूप में आम जनता से सुझाव के लिये प्रसारित किया जायेगा। अपेक्षा की जा रही है कि सम्बन्धित पक्षों से सुझाव और शिकायतें मिलने तथा प्रस्तावित कानून में अपेक्षित संशोधन करने के बाद इसे अधिनियमित किया जायेगा।

'कानून व्यवस्था' राज्य सूची का विषय है तथा साम्प्रदायिक दंगे होने पर स्थानीय पुलिस ही इस पर काबू पाने तथा सामान्य स्थिति बहाल करने का प्रयास करती रही है। लेकिन गत दशक में जिस प्रकार धार्मिकता को बढ़ावा मिला है तथा दंगों का फैलाव तेजी से हुआ है, उसे देखते हुये यह महसूस किया गया कि इस पर सारे देश के लिये एक सा कानून बनाया जाय तथा एक केन्द्रीय एजेंसी इसकी निगरानी करे। अभी तक राज्य सरकारें, सेना, केन्द्रीय रिजर्व पुलिस तथा अर्ध सैनिक बलों की मांग करती है तथा जातीय निपटने में असफल रहने पर केन्द्र पर दोषारोपण करती हैं। तर्क दिया जा रहा है कि यह धार्मिक तथा जातीय दंगे सिर्फ कानून-व्यवस्था का ही प्रश्न नहीं है बल्कि 'लोक-व्यवस्था' से सम्बन्धित है, अतः इसी परिप्रेक्ष्य में दृष्टिपात अपेक्षित है। ज्ञातव्य है कि 'लोक-व्यवस्था' संविधान की सातवीं अनुसूची की केन्द्र, राज्य तथा समवर्ती तीनों सूचियों में शामिल है तथा इस पर केन्द्र तथा राज्यों को कानून पारित करने का अधिकार है। इसी कारण अब केन्द्र इस पर कानून बनाने की पहल कर रहा है।
कतिपय राज्य, केन्द्र के इस कदम का यह कहकर अभी से विरोध कर रहे हैं कि साम्प्रदायिक वैमनस्य स्थानीय कारणों से होते हैं तथा इससे निपटने के लिये पर्याप्त कानून पहले से ही बने हुये हैं। अतः इस पर केन्द्रीय कानून बेमानी है और राज्य के क्षेत्र में अनावश्यक हस्तक्षेप है। संविधान के परिसंघीय ढांचे पर प्रहार तथा राज्यों के अधिकारों को न्यून करने की दिशा में बढ़ाया जा रहा कदम कहकर इसकी आलोचना हो रही है। वहीं दूसरी तरफ इस तरह के कानून की अपरिहार्यता के पक्षधरों का कहना है कि धार्मिक तथा जातीय फसादों में रेल, डाक, टेलीफोन आदि की सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाया जाता है तथा स्थानीय पुलिस प्रशासन के लोग भी दंगाईयों के एक तबके से मिलीभगत करके स्थिति को संभालने की बजाय उसे बिगाड़ने देते हैं, जिससे राजनीतिज्ञों को अपनी रोटियां सेकने का पर्याप्त अवसर मिलता है। ऐसे में त्वरित कार्यवाही ही नहीं बल्कि एक ऐसी एजेंसी की आवश्यकता है जो निर्णय तथा पक्षपात रहित होकर कार्यवाही करे। बाबरी विध्वंस के बाद बम्बई में हुये बम धमाकों, उससे उपजित जातीय दंगों तथा अभी हाल में गोधरा कांड के बाद गुजरात के कई इलाकों में फैले धार्मिक उन्माद को रोकने में सम्बन्धित राज्य सरकारों की भूमिका संदिग्ध रही है।
भारतीय संविधान में किसी भी मत को राजकीय धर्म मानने की व्यवस्था नहीं है। उद्देशिका में जिस विश्वास, धर्म, आस्था और उपासना की स्वतंत्रता का वचन दिया गया है, उसे अनुच्छेद 25 से 29 में धर्म की स्वतंत्रता से सम्बन्धित सभी नागरिकों के मूल अधिकार के रूप में समाविष्ट करके क्रियान्वित किया गया है। इन अधिकारों में अन्तःकरण तथा किसी धर्म को मानने की स्वतंत्रता; धार्मिक मामलों के प्रबन्ध की स्वतंत्रता; किसी धर्म विशेष की प्रोन्नति के लिये कर से स्वतंत्रता तथा अनिवार्य धार्मिक पूजा तथा प्रशिक्षण से स्वतंत्रता शामिल हैं। ये अधिकार प्रत्येक व्यक्ति के धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार देते हैं। उच्चतम न्यायालय ने एस०आर० बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) में कहा है कि यद्यपि 'पंथ-निरपेक्ष' शब्द उद्देशिका में बयालिसवें संशोधन द्वारा जोड़ा गया है तथापि यह हमारे संविधान दर्शन में अन्दर तक समाविष्ट थी। यही नहीं इस मामले में न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि पंथ-निरपेक्षता हमारे संविधान की आधारिक संरचना है तथा संविधान में संशोधन करके भी इसे समाप्त या न्यून नहीं किया जा सकता है।
गणेश उत्सव, दुर्गा मूर्ति विसर्जन तथा मोहर्रम के ताजिये के जुलूस के मार्ग आदि को लेकर दंगे भड़काये जाते हैं। दंगों के समय स्कूल-कॉलेज तथा बाजार आदि बंद रहते हैं, ट्रांसपोर्ट प्रभावित होता है, मरीजों तथा वादकारियों को परेशानी झेलनी पड़ती है तथा जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है जिससे भरपाई सम्भव नहीं होती है। इस उन्माद और जुनून में प्राइवेट तथा सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाया जाता है, औरतों तथा अबलाओं की इज्जत लूटी जाती है तथा लोगों को गाजर-मूली की तरह काटा और जिन्दा जलाया जाता है। कर्फ्यू तथा दफा 144 लगाने के बावजूद दंगाई निश्चित भाव से हिंसा का तांडव करते घूमते रहते हैं। और जब इन कांडों की जांच के लिये आयोग तथा अदालतें बैठती हैं तो फिर वह भी गवाही देने का साहस नहीं जुटा पाता जिसका सब कुछ लुट चुका होता है। गोधरा में बेस्ट बेकरी कांड की मुख्य गवाह जाहिरा शेख ने जिस प्रकार अपने बयान बदले हैं, इससे हमारी न्याय-व्यवस्था तथा उसके अलम्बरदारों के समक्ष एक साथ कई प्रश्न उत्तर के लिये मुँह बाये खड़े हो गये हैं।
दंगों और उसके दोषियों को कानून के सामने प्रस्तुत करने तथा उन्हें दण्ड दिलाने में विफलता, राज्य द्वारा उस महती दायित्व की अवहेलना, अवज्ञा तथा अवमानना है जो उसके वजूद की वजह है। कश्मीर में जातीय दंगों के समय लगाये गये कर्फ्यू में भी नागरिकों को पहुंचायी गयी सम्पत्ति की क्षति के मुआवजे के लिये प्रदेश सरकार को दायित्वाधीन अभिनिर्धारित करते हुये उच्चतम न्यायालय ने, थोड़े दिन पूर्व दिये गये अपने निर्णय में, नागरिकों की जान-माल की हिफाजत करने में असफल रहने पर अफसोस का इजहार किया था। इस प्रकरण में तो प्रतिकर दिला दिया गया लेकिन 1984 के सिक्ख दंगों में पीड़ित लोगों को अभी तक संतोषजनक आवंटन शेष है। इसी प्रकार कश्मीर घाटी से विस्थापित हुये पंडित दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं और अपनी जन्म-भूमि पर ही विदेशी हो गये हैं। गोधरा कांड में तो किसी मुआवजे की बात तक नहीं हो रही है।
साम्प्रदायिकता विरोधी कानून में जहाँ भारतीय दण्ड संहिता तथा दण्ड प्रक्रिया संहिता में संशोधन अपेक्षित है वहीं साक्ष्य अधिनियम में गवाहों की सुरक्षा की व्यवस्था अपरिहार्य है। दंगों में मारे गये तथा घायल लोगों को प्रतिकर तथा पुनर्वास के लिये युक्ति-युक्त धनराशि दी जानी चाहिए। उनकी बरबाद हुयी सम्पत्ति के लिये उचित प्रतिकर की व्यवस्था होनी अभिप्रेत है। दंगों में जान बचाकर भागे लोगों की भूमि, आवास तथा फैक्ट्री-दुकानों आदि की रक्षा की जिम्मेदारी सरकार की है तथा इसके असद्भावनापूर्ण अन्तरण पर रोक लगायी जानी चाहिए। उचित होगा कि इसके लिये विभिन्न धर्मावलम्बियों से युक्त फास्ट ट्रैक अदालत का गठन किया जाय जो नुकसान का आकलन फौरी तौर पर करे तथा तुरन्त मुआवजा दिलवाये। दंगे होने पर वहाँ आवश्यक रूप से न्यायिक जाँच कराई जाय तथा यह कार्य राज्यों में स्थापित मानवाधिकार आयोग या अल्पसंख्यक आयोग को सौंपा जाय। अनुच्छेद 17 में जिस प्रकार 'अस्पृश्यता' का अंत किया गया है और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध तथा दण्डनीय बनाया गया है, उसी प्रकार का उपबन्ध 'साम्प्रदायिकता' के लिये भी किया जाना चाहिए। इससे केवल सरकार ही नहीं बल्कि सामान्य भारतीयों को भी दायित्वाधीन किया जा सकेगा। बार-बार दंगे वाले क्षेत्रों को चिन्हित कर उन पर सामूहिक जुर्माना लगाया जा सकता है तथा इसके लिये अनुच्छेद 27 में संशोधन करके अपवाद का सृजन किया जाना अभीष्ट होगा। संविधान की उद्देशिका में धर्म, आस्था व उपासना की स्वतंत्रता के साथ व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिये भी दृढ़ संकल्प लिया गया था। दंगों से व्यक्ति की गरिमा क्षरित होती है तथा एकता और अखण्डता तार-तार होती दिखती है, अतः साम्प्रदायिक सौहार्द आज हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।

धर्म, नीति और कानून


संयुक्त राज्य अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य की एकतालिस वर्षीया टेरी शियावो अन्ततः परलोकवासी हो गयी। वे पिछले पन्द्रह वर्षों से अधिक से मूर्च्छा में थी। सन् 1990 में शियावो का मस्तिष्क क्षतिग्रस्त हो गया था। खाने-पीने में कुछ गड़बड़ी होने के कारण हुये रसायनिक असंतुलन से उनके हृदय ने काम करना बन्द कर दिया। इसी के चलते मस्तिष्क इस प्रकार से क्षतिग्रस्त हुआ कि उसके वापस पूर्व में आने की सम्भावना नहीं रही। लेकिन पति तथा परिजनों की इच्छानुसार उन्हें ट्यूब के जरिये भोजन पहुँचाकर डाक्टरों ने इतने दिनों तक जीवित रखा।
मस्तिष्क मृत-प्राय होने के बावजूद विशेषज्ञ चिकित्सकों ने पूरा प्रयास किया कि उन्हें सामान्य जिंदगी लौटा दी जाय लेकिन यह सम्भव नही हो पाया। इस हालत में अभी वे और भी पड़ी रह सकती थीं। लेकिन उनके पति माइकल शियावो ने अस्पताल अधिकारियों तथा न्यायालय से गुहार की कि जब टेरी शियावो के जीवन लौटने की आशा नहीं हैं, फिर उन्हें गरिमा के साथ मृत्यु का आलिंगन करने दिया जाय तथा भोजन-नली हटा ली जाय जिसके सहारे वह चल रही थी। उनकी इस गुहार पर सकारात्मक प्रतिक्रिया हुयी तथा अदालत ने डाक्टरी राय सुनिश्चित कर भोजन नलिका हटाने की अनुमति दे दी। लेकिन इसी बीच टेरी शियावो के माता-पिता बाब तथा मेरी शिंडलर ने प्रति-अपील की कि उनकी बेटी की ट्यूब न हटाई जाय तथा उसे इस हाल में भी जिन्दा रखा जाय। परन्तु कानून के जानकारों ने विवाहिता के बारे में रजामंदी देने का अधिकार पति में सिद्ध किया तथा अदालतों ने इसी पर अपनी मोहर लगाई। ट्यूब हटाने के पन्द्रह दिनों के भीतर टेरी की स्वाभाविक मौत हो गयी।
टेरी शियावो के निधन से धर्म, नीति और कानून के जटिल प्रश्न पैदा हुये हैं, जिनमें प्राण तथा दैहिक स्वतंत्रता, मानवाधिकार व मानव गरिमा के साथ जीने-मरने का अधिकार तथा किसी के शरीर के विषय में निर्णय लेने के अधिकारों का द्वन्द्व सम्मिलित है। एक ओर ईसाई धर्म के गृहकेन्द्र वैटिकन सिटी के कार्डिनल (धर्माचार्य) ने कहा है कि टेरी शियावो की भोजन देने वाली नलिका हटाना वस्तुतः "हत्या" करना है तथा इच्छा या दया-मृत्यु का बहाना बनाकर सम्बन्धित लोग ईश्वर के समक्ष मानव-वध के अपराध की जवाबदेही से मुक्त नहीं हो पायेंगे। जीवन की अनन्तता में अटूट विश्वास रखने वाले कई संगठनों के कर्त्ता-धर्ता अन्तिम क्षणों तक अस्पताल के सामने 'जो कानूनी है, वह आवश्यक नहीं कि नैतिक हो' की तख्तियां लिये प्रदर्शन करते रहे। दूसरी ओर टेरी के माता-पिता का कहना है कि वे  अपनी बेटी की इस हाल में भी जिन्दगी बनी रहने देना चाहते थे, हो सकता है निकट भविष्य में इसका कोई इलाज निकल आता। वे इसके लिये खर्चा भी उठाने को तैयार थे। उनका कहना था कि उन्होंने टेरी को पैदा किया है तथा उसके बारे में निर्णय लेने का उनका भी अधिकार है। विवाह के बाद स्त्री का संरक्षकत्व पति में निहित होने के अधिकार को वह चुनौती नहीं देते लेकिन उनका कहना था कि 'मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है' तथा हम टेरी के पति को उसकी सेवा-सुश्रुषा के दारुण पक्ष से मुक्त कर सकने में सक्षम थे। अतः हमारी जिम्मेदारी पर टेरी को कृत्रिम विधि से भोजन देना जारी रखना था। लेकिन अदालतों ने उनकी दलील स्वीकार नहीं की और पति की इच्छानुसार नली हटा ली गयी।
टेरी शियावो की मरणासन्न स्थिति पर अन्तिम दिनों अमेरिका में उनकी स्थिति पर मीडिया का पर्याप्त फोकस रहा। वहाँ की संसद (कांग्रेस) ने विधेयक पारित किया कि ऐसे मरीज या उनके परिजनों को यह अधिकार नहीं होगा कि डॉक्टरों को इस बात के लिये बाध्य करें कि वे किसी की मृत्यु कारित करें। अमेरिकी इतिहास में ऐसे मौके कम आये हैं जब जनमत के दबाव में कांग्रेस की आपात बैठक की गयी है। इस बिल को कानूनी जामा पहनाने के लिये हस्ताक्षर करने हेतु प्रेसीडेंट बुश अपनी यात्रा अधबीच छोड़कर वाशिंगटन पहुँचे थे।
चिकित्सकीय नीतिशास्त्र में जहां किसी का जीवन बचाने के लिये अन्तिम क्षणों तक प्रयास करने का अनुदेश है वहीं यह भी नीति है कि मानव जीवन की गरिमा का विशेष ख्याल रखा जाय तथा प्राकृतिक नियमों के साथ छेड़छाड़ न की जाय। इन नीति वचनों में मरीज तथा उसके परिजनों को पूरी, सच-सच तथा प्रामाणिक जानकारी देने तथा विपरीत परिस्थिति में उनसे सहमति प्राप्त करने का उल्लेख भी है।
टेरी शियावो के निधन के तुरन्त बाद हुए एक घटनाक्रम का उल्लेख भी समीचीन है। टेरी की मृत्यु के दो-तीन दिन के भीतर ही कैथोलिक पंथ के सबसे बड़े धर्मागुरु पोप जॉन पाल (द्वितीय) का वैटिकन सिटी में स्वर्गवास हो गया। वे काफी अर्से से बीमार थे, लेकिन अन्तिम दिनों में अस्पताल छोड़कर घर आ गये थे। उनका मानना था कि जीवन का अन्त भी ईश्वरीय इच्छा है, अतः उससे जूझने के लिये कृत्रिम उपाय करना अधर्म है तथा सर्वशक्तिमान का निरादर है। भारत में भी यह परम्परा है। जैन मुनियों द्वारा अन्तिम समय में जीवित समाधि लेने या अन्न-जल त्यागने के समाचार अक्सर देखने सुनने को मिलते है। किसी लाइलाज बीमारी से ग्रसित मरीज को डाक्टर यह कह कर छुट्टी दे देते हैं कि उसे अपने परिजनों के बीच में ले जायें जहां वह शांति से अन्तिम सांस ले सके।



जीवन की प्रत्याशा समाप्त होने पर गरिमा के साथ मृत्यु अंगीकार करने के कानून बनाने को लेकर जनमत विभाजित है। प्रायः प्रत्येक धर्म में जीवन की रक्षा हर एक मानव का पुनीत कर्त्तव्य माना गया है। मेडिकल सांइस में विकास के कारण पश्चिमी देशों में कई ऐसे लोगों ने अपनों को इस प्रत्याशा में शीतगृहों में सुरक्षित करा लिया है कि कभी न कभी उनकी बीमारी का इलाज निकल आयेगा। तब वे अपने को पुनर्जीवित करायेंगे तथा भरी-पूरी ज़िन्दगी जियेंगे। इसके लिये काफी बड़ी धनराशि दी जा रही है। उन्हें यह भी विश्वास है कि आने वाले समय में बुढ़ापे का भी समाधान मिल जायेगा तथा वे अपने धन-ऐश्वर्य के सहारे अनगिनत साल जीवित रहेंगे। उधर दूसरी तरफ, क्लोनिंग विधि के जरिये अपनी कलम लगाकर प्रतिरूप बनाने की सम्भावना से मानव जाति में अमरता प्राप्त करने की नई आकांक्षा प्रबल हुयी है।

हमारे कानून प्रकृति के सिद्धान्तों के अनुसार बनाये गये हैं जिसमें मृत्यु एक निश्चितता है। सम्पत्ति के उत्तराधिकार में "शाश्वतता के विरुद्ध" सिद्धान्त प्रतिपादित है तथा यह प्राविधानित है कि किसी की सम्पत्ति को अनिश्चित काल तक बाधित नहीं रखा जा सकता है। मानव-सम्बन्धों पर भी यही नियम लागू होते हैं। जीवन को एनकेन-प्रकारेण बचाये रखने में नैतिकता तथा मानव-संवेदनशीलता एक पक्ष है, लेकिन उसका कानूनी पक्ष अनिश्चित तथा अतार्किक नहीं हो सकता। विवाह के पश्चात पति के जीवित होते हुये भी माता-पिता को संरक्षक बनाने के अपने दुष्परिणाम होंगे। शारीरिक तथा मानसिक रूप से अक्षम व्यक्ति के विषय में निर्णय लेने के अधिकार में भी विवलन कहीं का नहीं छोड़ेगा।
भारतीय मनीषा में ब्रह्मा-विष्णु-महेश जीवन के जनक, पालक तथा संहारक के रूप में प्रतिष्ठित, पूज्य और स्तुत्य हैं। इनमें जहां विष्णु की उपासना धन-धान्यादि एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये विभिन्न सुअवसरों पर की जाती है, वही महामृत्युंजय मंत्र : "त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्, उर्वारुक मिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्" का जाप इस कामना के साथ किया जाता है कि हमारा जीवन हृष्ट-पुष्ट तथा सुगन्धपूर्ण हो तथा परिपक्व होने पर हम इस संसार से उसी प्रकार मुक्त हो जांय जिस प्रकार ककड़ी स्वयंमेव अपनी लता से अलग हो जाती है। जीवन की अभिलाषा, प्रत्याशा और रक्षा का यही धर्म है, यही नीति है और यही कानून है।