कोलकाता की चौदह वर्षीय स्कूल छात्रा हेतल पारिख के साथ दिसम्बर 1989 में बलात्कार तथा हत्या करने के दोषी धनंजय चटर्जी की क्षमादान याचिका खारिज किये जाने के बाद उसे अन्ततः चौदह अगस्त 2004 को फांसी दे दी गयी। ज्ञातव्य है कि धनंजय एक लिफ्टमैन था तथा कालोनी में रहने वाली उक्त हेतल पारिख के साथ छेड़-छाड़ करता था। मना करने पर उसने न सिर्फ उस बच्ची के साथ बलात्कार किया बल्कि भेद खुल जाने के डर से हत्या कर दी। पश्चिम बंगाल के अलीपुर की निचली अदालत ने उसे अप्रैल 1991 में फांसी की सजा सुनाई जो कोलकाता हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट द्वारा बहाल रही। उसकी फांसी की तिथि 25 फरवरी 1994 नियत की गयी थी लेकिन राष्ट्रपति के समक्ष प्राण-दान की याचिका लम्बित होने के कारण वह टाल दी गयी। इस याचिका के खारिज होने के बावजूद उनकी फांसी कतिपय कारणों से टलती रही प्रायः दस वर्ष बाद इस वर्ष पच्चीस जून को जब फांसी देने की तैयारी की जा रही थी, तभी राष्ट्रपति भवन के एक संदेश द्वारा जीवन-दान की आशा की किरण जागी तथा उच्चतम न्यायालय ने फांसी पर राष्ट्रपति के निर्णय तक रोक लगा दी, लेकिन अन्ततः उसकी पत्नी पूर्णिमा द्वारा दायर क्षमादान याचिका खारिज हो गयी। अंतिम दिनों धनंजय तथा इसके परिवार वालों को प्रेस तथा मीडिया का पर्याप्त कवरेज मिला तथा क्षमादान याचिका खारिज किये जाने की मांग को लेकर उसने बुड्ढे माता-पिता, पत्नी तथा बच्चों ने व्यथित होकर खाना-पीना छोड़ दिया भी दिया। यही नहीं, परिवार वालों ने इसके मृत शरीर को लेने से इंकार कर दिया। इसी के कारण धनंजय की अपनी आंखें दान करने की अंतिम इच्छा भी पूरी नहीं हो सकी।
Monday, 6 July 2026
राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति पर उठे यक्ष प्रश्न!
कानून का मखौल उड़ाती जातीय पंचायतें
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने राज्य की झज्जर जिले की असंधा ग्राम की एक जातीय पंचायत के उस आदेश के अमल पर रोक लगा दी है जिसके द्वारा वहाँ विवाहित दम्पत्ति के रूप में रह रहे रामपाल तथा सोनिया के तथाकथित सगोत्र विवाह को मान्यता देने से मना कर दिया था तथा यह फतवा दिया था कि वे 'भाई-बहन' की तरह रहें। पंचायत के इस अवैध आदेश से सकते की स्थिति में पहुँचे गये रामपाल ने तो तलाकनामे पर हस्ताक्षर भी कर दिये थे तथा सोनिया को बहन मानकर 'शगुन' के तौर पर दस रुपये देने की पेशकश की थी लेकिन सोनिया ने पंचायत के फैसले को मानने से इंकार कर दिया। सोनिया के साथ उसकी ननद सहित ससुराल के लोग तथा नारीवादी संगठन एकजुट हो गये तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रमुखता पाने के बाद विवाह को अवैध ठहराने वाले फतवे की तीखी आलोचना हुयी।
Sunday, 5 July 2026
लोकपाल विधेयक की परिधि और प्रासंगिकता
शासन सत्ता के उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों के आचरण पर अंकुश के लिये भारतीय दण्ड संहिता, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम तथा जांच आयोग अधिनियम आदि कानून हैं तथा इनके प्रर्वतन के लिये पुलिस तंत्र के अलावा केंद्रीय सतर्कता आयोग तथा विभिन्न गुप्तचर एजेंसियां कार्यरत हैं। लेकिन एक आम नागरिक के लिए इनमें गति पैदा करना आसान नहीं है। अखबारों, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चैनलों आदि में जब मामला उछलता है तो सरकारें हरकत में आती हैं तथा जांचें बैठायी जाती हैं। लेकिन इन जांचों को राजनीति से प्रेरित कह कर स्थिति को धुंधा-धुंधा करने के प्रयास होते हैं, इनमें इतनी देर भी होती है कि तत्कालीन आवेग चुक जाता है। बाद में पर्याप्त साक्ष्य न होने के कारण मामले न्यायालय से छूट जाते हैं और आरोपी अपने को दूध का धुला साबित कर ले जाते हैं। अपवादों को छोड़कर अभी तक कोई बड़ी मछली भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के चंगुल में नहीं फंस सकी है।
भारतीय संविधान में राष्ट्रपति नाममात्र का शासक है। उपराष्ट्रपति राज्य-सभा का सभापति होता है तथा राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उसके पद पर कार्यवाहक के रूप में कार्य करता है। राष्ट्रपति के रूप में वह मंत्रिपरिषद की सलाह से बाध्य होता है। प्रधानमंत्री पर सरकार चलाने का दायित्व होता है तथा वह अपने अधीनस्थ मंत्रियों पर लगाम रखता है। वह अपने पार्टी, लोकसभा तथा भारत की जनता के प्रति जवाबदेह होता है, अतः उससे भ्रष्ट आचरण की अपेक्षा नहीं है। लेकिन जहाँ ऐसे भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ कार्यवाही करने का प्रश्न है - हमारे देश में पिछले दिनों घटित घटनायें कुछ और ही कहानी कहती हैं। पिछली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन सरकार के कुछ मंत्रियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामले आये जो गम्भीर थे तथा पर्याप्त साक्ष्य भी थे। सम्बन्धित मंत्री ने क्षोभ में आकर त्याग-पत्र भी दिया लेकिन शीघ्र ही वापस मंत्रिमण्डल में ले लिए गये। वर्तमान संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन में भी ऐसे मंत्री हैं जिनके विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामले चल रहे हैं। गठबन्धन की राजनीति में ऐसे तत्वों को मंत्रिपद देने के अपने कारण तथा विवशतायें हैं। जिस मोल-भाव तथा जोड़-तोड़ से सरकारें बन रही हैं उसमें भ्रष्टाचारियों को मंत्री बनाना हमारी नियति बन गया है। ऐसे तत्व प्रत्येक राजनीतिक दल में हैं तथा इनके विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य भी हैं लेकिन इन्हें फिर-फिर मंत्रिमण्डल में जगह देना मजबूरी है। ऐसे लोगों के विरुद्ध लोकपाल अपनी अनुशंसा देगा लेकिन प्रधानमंत्री के पास ऐसी फाइल को अलमारी में बंद रखने के सिवाय कोई चारा नहीं होगा तथा लोकपाल की संस्था 'कागजी शेर' बन कर रह जायेगी। अपने विरुद्ध लोकपाल द्वारा की गयी किसी टिप्पणी पर सम्बन्धित मंत्री उल्टे लोकपाल पर राजनीति से प्रेरित होकर कार्य करने का आरोप लगायेगे।
कौटिल्य ने कहा था कि समुद्र में रहने वाली मछली कितना पानी पीती है और कितना निकालती है, वह कोई नहीं जान सकता। इसी प्रकार लोक-कोष पर कब्जा जमाये अधिकारी कितना इधर-उधर करते हैं, यह जानना आसान नहीं है। भारतीय राजनीति आंकठ भ्रष्टाचार में डूबी हुयी है तथा नेता-नौकरशाही-अपराधी की तिकड़ी बड़ी बेशर्मी से जनता के धन का दोहन कर रही है। इनको काबू में करने के लिए सतर्क, जानकार तथा उच्च मानव मूल्यों की पोषक जनता को आगे आना होगा तथा अपने धन की रक्षा स्वयं करने के लिए दृढ़ संकल्पित होना पड़ेगा।
लोकपाल विधेयक पर छद्म विवाद
संसद के आगामी शीतकालीन अधिवेशन में पेश किये जाने वाला लोकपाल विधेयक एक बार पुनः ठंडे बस्ते में डाल दिया गया लगता है। तत्विषयक मंत्रिमण्डल की बैठक में जब इसे औपचारिक स्वीकृति देने के लिये विचारार्थ रखा गया तो दो मंत्रियों की अनुपस्थिति का बहाना बनाकर इसे आगे के लिये टाल दिया गया। कहा गया चूँकि इस विधेयक की परिधि में प्रधानमंत्री को शामिल किया जाना है तथा प्रधानमंत्री के दागी सिद्ध होने पर सम्पूर्ण मंत्रिमण्डल को 'सामूहिक उत्तरदायित्व' के अनुसार त्याग-पत्र देना आवश्यक होगा अतः इसको अन्तिम रूप देने के लिये प्रत्येक मंत्री का बैठक में मौजूद रहना अपरिहार्य है। विधेयक को संसद के विचारार्थ प्रस्तुत करने के लिये इसके अन्य प्रावधानों पर अभी और तथा गहन पड़ताल करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। यह विडम्बना ही है कि विधेयक को संसद में जाने से रोकने में एक ऐसे मंत्री की प्रमुख भूमिका बताई जा रही है जो स्वयं कथित भ्रष्ट आचरण के कारण कुख्यात हैं तथा उन्हें अपने विरुद्ध लगे आरोपों से क्लीन चिट पाना शेष है।
राज्यपाल पद: सांविधानिक मर्यादा एवं राजनीतिक मर्यादा के अन्तर्द्वन्द्व
स्वतंत्र भारत के संविधान में राज्यपाल का पद ब्रिटिश 'राज' का एकमात्र अवशेष है। सन् 1858 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी से भारत की सार्वभौमिकता अपने पक्ष में स्थानान्तरित करते हुये इस नव-उपनिवेश के शासन के लिये गवर्नर-जनरल की नियुक्ति सम्राट के अधिपत्र द्वारा होनी प्रारम्भ हुयी। इनका कार्य मुगल सम्राट शाहआलम से प्राप्त दीवानी की वसूली तक सीमित था। तदनन्तर प्रशासनिक कार्यों के लिये बनाये जाने वाले प्रान्तों में 'गवर्नर' की नियुक्ति पहले तो सीधे सम्राट द्वारा होने की परम्परा रही लेकिन भारत सरकार अधिनियम, 1935 के पारित होते-होते इनके नियुक्ति अधिकारी वायसराय हो गये। ब्रिटिश 'राज' में गवर्नर की प्रतिबद्धता केवल 'ताज' के प्रति थी तथा वह सम्बन्धित प्रांत की कार्यपालिका का न सिर्फ निर्द्वन्द्व व सर्वोच्च मुखिया था बल्कि राजस्व का रखवाला तथा विधायिनी पर अभिभावी प्रभाव रखने वाला अत्यन्त ताकतवर अधिकारी था। इन पदों पर वरिष्ठ नौकरशाह या राज परिवार अथवा उनसे खून का रिश्ता रखने वाले अति विशिष्ट व्यक्तियों की ही नियुक्ति की जाती थी। सामान्य प्रशासन के अलावा उच्च शिक्षा की दिशा-दशा को निर्धारित, नियमित और नियमित करने तथा उस पर प्रभावी अंकुश रखने के लिये उसे राज्य विश्वविद्यालयों का पदेन कुलाधिपति भी नियुक्त किया गया। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि भारत में प्रथम विश्वविद्यालय की स्थापना से पूर्व ही इंग्लैण्ड में वहाँ के विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता स्थापित हो चुकी थी तथा उन पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं था, लेकिन भारत के विश्वविद्यालयों पर गवर्नर का प्रभावी, अभिभावी तथा अन्तिम नियंत्रण था। अपने उपनिवेश को अक्षुण्ण रखने के लिये तथा राज्य प्रशासन की प्रत्येक महत्त्वपूर्ण इकाई पर गिद्ध-दृष्टि तथा लगाम कसे रहने के लिये गवर्नर से अच्छा भला कौन हो सकता था!
साम्प्रदायिकता के खिलाफ कानून की मुहिम
केन्द्रीय गृहमंत्री ने प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों के सम्मेलन में साम्प्रदायिकता के खिलाफ संहिताकृत कानून बनाने की सरकार की इच्छा दोहराई है। कानून-व्यवस्था के सुचारु संचालन के लिये पुलिस-तंत्र को आवश्यक कानूनी-अधिकार देकर स्थिति विशेष हेतु तैयार करने के लिये पैकेज-कानून की आवश्यकता बहुत दिनों से महसूस की जाती रही है। इस बीच साम्प्रदायिकता के खिलाफ एक समग्र-संहिता का मसविदा गृह मंत्रालय द्वारा विधि-मंत्रालय को भेजा जा चुका है तथा शीघ्र ही इसे परामर्श-पत्र के रूप में आम जनता से सुझाव के लिये प्रसारित किया जायेगा। अपेक्षा की जा रही है कि सम्बन्धित पक्षों से सुझाव और शिकायतें मिलने तथा प्रस्तावित कानून में अपेक्षित संशोधन करने के बाद इसे अधिनियमित किया जायेगा।
धर्म, नीति और कानून
जीवन की प्रत्याशा समाप्त होने पर गरिमा के साथ मृत्यु अंगीकार करने के कानून बनाने को लेकर जनमत विभाजित है। प्रायः प्रत्येक धर्म में जीवन की रक्षा हर एक मानव का पुनीत कर्त्तव्य माना गया है। मेडिकल सांइस में विकास के कारण पश्चिमी देशों में कई ऐसे लोगों ने अपनों को इस प्रत्याशा में शीतगृहों में सुरक्षित करा लिया है कि कभी न कभी उनकी बीमारी का इलाज निकल आयेगा। तब वे अपने को पुनर्जीवित करायेंगे तथा भरी-पूरी ज़िन्दगी जियेंगे। इसके लिये काफी बड़ी धनराशि दी जा रही है। उन्हें यह भी विश्वास है कि आने वाले समय में बुढ़ापे का भी समाधान मिल जायेगा तथा वे अपने धन-ऐश्वर्य के सहारे अनगिनत साल जीवित रहेंगे। उधर दूसरी तरफ, क्लोनिंग विधि के जरिये अपनी कलम लगाकर प्रतिरूप बनाने की सम्भावना से मानव जाति में अमरता प्राप्त करने की नई आकांक्षा प्रबल हुयी है।