ब्रिटिश बालिका हन्ना फोस्टर के बलात्कार तथा हत्या के आरोप में गिरफ्तार मनिन्दर सिंह कोहली की पहचान डी०एन०ए० परीक्षण द्वारा की गयी। ज्ञातव्य है कि कोहली ने यह अपराध गतवर्ष इंग्लैण्ड में किया था तथा पुलिस को चकमा देकर भारत भाग आया और सुदूरवर्ती कालिम्पोंग जिले में बदले नाम से रह रहा था। उसने अपना चेहरा-मोहरा बदल रखा था तथा स्थानीय लड़की से विवाह रचा लिया था। स्व० हन्ना फोस्टर के माता-पिता ने भारत आकर उनको तस्वीर प्रसारित की और बड़ी धनराशि इनाम में घोषित की। गिरफ्तार किये जाने पर उसने ना-नुकुर की लेकिन अन्ततः डी०एन०ए० परीक्षण के आधार पर उसकी पहचान सिद्ध हुयी।
उत्तरांचल के एक मंत्री श्री हरक चन्द्र रावत के विरुद्ध असाप नाम की एक नवयुवती जेनी ने यह आरोप लगाया था कि रावत ने उसके साथ कई बार शारीरिक सम्बन्ध स्थापित किये, फलस्वरूप वह गर्भवती हुयी तथा वह उस अनब्याही माँ के बच्चे का पिता है। पक्ष-विपक्ष के आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच रावत को मंत्रीपद से इस्तीफा देने के लिये विवश होना पड़ा। लेकिन डी०एन०ए० परीक्षण से स्पष्ट हो गया कि वह आरोप बेबुनियाद है। बाद में उस युवती ने भी यह आरोप वापस ले लिया। श्री हरक चन्द्र रावत को तो आरोपों से निजात मिल गयी लेकिन उत्तर प्रदेश के बहुचर्चित मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में एक निर्णायक मोड़ तब आया जब मृतक के गर्भ में पल रहे भ्रूण का डी०एन०ए० टेस्ट कराया गया तथा यह सिद्ध हो गया कि इस अभागे तथा अजन्मे बच्चे का पिता एक विधायक है जिसके मृतक से नाजायज सम्बन्ध थे। इन विधायक को मंत्री पद से हटना पड़ा तथा कई दिनों तक जेल में रहना पड़ा।
गत दिनों दिल्ली के बगिया रेस्टोरेंट के तन्दूर में नैना साहनी को मार डालने के आरोप में सुशील शर्मा को फांसी की सजा सुनाई गयी है। सुशील शर्मा पर आरोप था कि उसने नैना की हत्या कर उसकी लाश तन्दूर में मक्खन डाल-डाल कर जलाने का प्रयास किया था। नैना का प्रायः पूरा शरीर भस्म हो चुका था। केवल एक अधजली टांग बची थी। इसी के डी०एन०ए० टेस्ट से यह स्थापित किया जा सका कि वह शरीर नैना का था तथा इसी परीक्षण के परिप्रेक्ष्य में सुशील शर्मा के विरुद्ध हत्या करने तथा उसका सबूत मिटाने का आरोप सिद्ध किया जा सका जिसकी परिणति उसे फांसी की सजा देने में हुयी। एक आई०ए०एस० के पुत्र नितीश कटारा की हत्या की पुष्टि भी डी०एन०ए० टेस्ट द्वारा हुयी क्योंकि हत्यारों ने उसकी लाश इतनी क्षत-विक्षत कर दी थी उसकी पहचान नहीं हो रही थी। स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के हत्यारों, धानू तथा शिवरासन, की भी डी०एन०ए० परीक्षण द्वारा पहचान की गयी थी।
अभी हाल में हैदराबाद के अस्पताल में एक नवजात लड़के की जगह लड़की देने के विवाद में डी०एन०ए० टेस्ट कराकर माँ को उसका असली शिशु दिलवाया गया जिसकी मीडिया में पर्याप्त चर्चा हुयी थी। महान क्रांतिकारी तथा देशभक्त सुभाष चन्द्र बोस की रहस्यमय परिस्थितियों में हुयी मृत्यु की जांच कर रहे आयोग ने तथाकथित गुमनामी बाबा के डी०एन०ए० टेस्ट के बाद घोषित किया कि बाबा जी सुभाष चन्द्र बोस नहीं थे।
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में वैज्ञानिकों ने यह स्थापित कर दिया था कि मानव-रक्त में कुछ गुण ऐसे हैं जो आनुवंशिक तौर पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाते हैं तथा किसी जातक का ब्लड-ग्रुप उसके माता-पिता के रक्त-वर्ग से निश्चित किया जा सकता है। तदनन्तर इनको डाई ऑक्सी न्यूक्लिक एसिड (डी०एन०ए०) मानव रीलो न्यूक्लिक एसिड (आर०एन०ए०) में विभाजित किया गया। परीक्षणों से सिद्ध हुआ कि डी०एन०ए० मानव जाति के वे आधार-भूत तथा मूल गुण-सूत्र हैं जो प्रत्येक व्यक्ति में अलग तथा विशिष्ट होते हैं। पुरुषीय गुणसूत्र उसके शुक्राणुओं में होते हैं तथा स्त्री गुणसूत्र उसके अण्डाणुओं में विद्यमान रहते हैं। पुरुष-स्त्री के सम्मिलन में इनका निषेचन होता है तथा भ्रूण का उदय होता है जो विकसित होकर जातक के रूप में जन्म लेता है। प्रत्येक जातक में उसके माता-पिता के गुणसूत्र आवश्यक रूप से होते हैं और वैज्ञानिक प्रगति के साथ अब इनका परीक्षण सम्भव ही नहीं बल्कि आम हो गया है। मानव शरीर के किसी भी अंग या अवयव, यथा: बाल, ऊतक, रक्त, वीर्य, बलगम, पसीना आदि कहीं से भी इन्हें प्राप्त किया जा सकता है तथा दूसरे से मिलान कर यह जाना जा सकता है कि जातक किसका पुत्र-पुत्री है या जातक के माता-पिता कौन हैं। यही नहीं डी०एन०ए० परीक्षण से जातक का लिंग, आयु तथा प्रजाति भी निर्धारित की जा सकती है।
डी०एन०ए० परीक्षण पितृत्व के निर्धारण, क्षत-विक्षत शव की पहचान तथा बच्चे बदलने की स्थिति में माता-पिता को निश्चित करने के लिये किया जाता है। इसकी आवश्यकता सम्पत्ति में हिस्सेदारी, गुजारा-भत्ता पाने तथा बच्चे की वैधता-अवैधता जानने के लिये तथा उसे सिद्ध करने में पड़ती है। ओलम्पिक आदि प्रतियोगिताओं में इनका परीक्षण आयु, लिंग तथा राष्ट्रीयता तक जानने में किया जाता है तथा यह परीक्षण इतने प्रामाणिक हैं कि इनमें गलती की सम्भावना तीन अरब में एक की है। अपराध-शास्त्र में इसका प्रयोग बढ़ता ही जा रहा है। बलात्कार से पीड़ित स्त्री की योनि या उसके कपड़ों पर पड़े वीर्य की बूंदों से अपराधी का पता लगाया जाता है। इसी प्रकार हत्या में प्रयुक्त हथियार तथा हत्यारे के कपड़ों पर पाये गये मृतक के खून के छींटों से यह जाना जा सकता है कि हत्यारा कौन है। आपराधिक तथा दीवानी दोनों क्षेत्रों में इन परीक्षणों का उपयोग दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। भारत में हैदराबाद (आंध्र प्रदेश) में इसकी एक लैबोरेट्री है जहाँ यह परीक्षण होता है। अब ऐसी ही लैबोरेट्री देश के अन्य हिस्सों में तथा प्राइवेट सेक्टर में भी खुल रही हैं।
भारतीय कानूनों में डी०एन०ए० परीक्षण कराने को विवश करने के लिये प्रावधान नहीं है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 एक वैध विवाह के दौरान हुये जन्म को उसके जायज होने का अंतिम साक्ष्य प्रमाणित करती है। यह धारा अंग्रेजी कानून पर आधारित है जिसके अनुसार विवाह के 280 दिनों के भीतर जन्में जातक को उसी पुरुष-स्त्री का बच्चा माना जाता है, जब तक की यह सिद्ध न कर दिया जाय कि उन दिनों जब कि गर्भ स्थापना हुयी थी, दोनों एक दूसरे की पहुँच से बाहर थे तथा उनमें संभोग की कोई सम्भावना नहीं थी। संतान की वैधता को विशेष सुरक्षा देने वाली यह धारा इस सिद्धान्त पर आधारित है कि वही पिता है जिसके लिए विवाह संस्था इंगित करती है। दीवानी प्रक्रिया संहिता में न्यायालय अपने अन्तर्निहित अधिकारों का प्रयोग करते हुये ऐसे परीक्षण के लिये अनुमति दे सकती है। दण्ड प्रक्रिया संहिता में भी किसी निर्णय पर पहुँचने के लिये ऐसे साक्ष्य पर विचार किया जा सकता है। इंग्लैण्ड में फैमिली लॉ रिफार्म एक्ट 1987 की धारा 23 में वैज्ञानिक परीक्षण तथा रक्त परीक्षण की छूट दी गयी है तथा अमेरिका में भी इनका उपयोग काफी प्रचलित है। भूतपूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन तथा उनकी प्रेमिका मोनिका लेविंस्की के मध्य शारीरिक सम्बन्धों को मोनिका के अंडर गारमेंट पर पाये गये क्लिंटन के वीर्य के धब्बों से सिद्ध किया गया था। मोनिका ने उन मधुर क्षणों की याद बनाये रखने के लिये अण्डरवियर सुरक्षित रखा हुआ था।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20 (3) के अनुसार किसी अपराध के लिये अभियुक्त किसी व्यक्ति के स्वयं अपने विरुद्ध साक्षी होने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता। यह कॉमन लॉ का सिद्धान्त है कि प्रत्येक अभियुक्त को निर्दोष माना जाता है जब तक कि इसके विपरीत सिद्ध न कर दिया जाय। अभियोजन करने वाले पर दोष सिद्ध करने का भार होता है और अभियुक्त को अपने को अपराध में फंसाने वाला कथन देने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता है। आपराधिक तथा सिविल मामलों में डी०एन०ए० टेस्ट की प्रार्थना इसी आधार पर सुनी तथा निर्णीत की जाती है। किसी का रक्त परीक्षण उसकी सहमति से ही कराया जा सकता है क्योंकि यह उसकी एकान्तता तथा व्यक्तिगत स्वातन्त्र्य के अधिकार के विपरीत जा सकता है। ऐसे परीक्षण से उसकी मानहानि हो सकती है तथा जीवन भर के लिए एक आरोप ढोना पड़ सकता है। मानवाधिकारों के यूरोपीय अभिसमय की धारा 8 के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तिगत तथा पारिवारिक अधिकारों को सम्मान देने का प्रावधान है तथा मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत भारत का विधानमंडल भी इसके विपरीत कानून बनाने में अक्षम है। यहाँ यह स्मरण रखना समीचीन होगा कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 उस समय लिखी गयी थी जब आधुनिक विज्ञान विकसित नहीं था तथा डी०एन०ए० या आर०एन०ए० परीक्षण कल्पनातीत थे। यह माना जाता है कि यह परीक्षण वैज्ञानिक तौर पर अत्यन्त प्रामाणिक हैं, फिर भी धारा 112 की अंतिमता अपनी जगह है क्योंकि वैज्ञानिक सत्यता से परे सामाजिक तथा वैयक्तिक पहलू भी अपनी जगह अत्यन्त मूल्यवान हैं।
वर्णित सांविधानिक शक्ति तथा साक्ष्य अधिनियम के प्रावधानों के शब्द तथा आत्मा के मध्य संतुलन करके ही परीक्षण के लिये अनुमति देती है। इस सिलसिले में कान्ती देवी बनाम पोशीराम (ए०आई०आर० 2001 एस०सी० 2276) का वाद उल्लेखनीय है जिसमें न्यायालय ने संतान के पितृत्व परीक्षण के लिये डी०एन०ए० टेस्ट कराने के पति की मांग खारिज कर दी थी। इस वाद में पक्षों का विवाह 1975 में हुआ था तथा प्रायः 15 वर्षों तक वे निस्तान रहे। इस बीच उनके बीच मन-मुटाव हुआ तथा मुकदमेबाजी भी चल रही थी। 1989 में पत्नी ने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया तथा जन्म, मृत्यु तथा विवाह पंजीकरण अधिनियम के अन्तर्गत इसके जन्म का प्रमाण-पत्र भी प्राप्त कर लिया। बाद में इस पत्नी ने अपने तथा बच्चे की ओर से गुजारे भत्ते के लिये न्यायालय में आवेदन किया। पति की ओर से पितृत्व से इंकार किया गया तथा उसने स्वयं को डी०एन०ए० टेस्ट के लिये प्रस्तुत किया। लेकिन न्यायालय ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के अन्तर्गत निर्धारित किया कि वह पति ही इस बच्चे का पिता है, क्योंकि उनके मध्य विवाह चल रहा था तथा वह यह सिद्ध करने में असफल रहा कि गर्भ स्थापना के समय उनके बीच शारीरिक सम्बन्ध सम्भव नहीं था। न्यायालय का कहना था कि जातक के पितृत्व निर्धारण के लिये यही तथ्य पर्याप्त है कि बच्चे के जन्म से 280 दिन पूर्व से वे विवाहित थे। अन्यथा सिद्ध कराने के लिये यह आवश्यक है कि न केवल यह सिद्ध किया जाय कि पति की पहुँच पत्नी के पास नहीं थी, बल्कि यह भी सिद्ध किया जाये कि पत्नी की पहुँच पति के पास नहीं थी। न्यायालय का कहना था कि यदि एक वैध विवाह बन्धन के दौरान हुये जातक के पितृत्व परीक्षण की अनुमति दी गयी और उस परीक्षण से अन्यथा परिणाम आया तो यह उस जातक के एकान्तता के मौलिक अधिकार का हनन होगा तथा उस पर नाजायज संतान होने तथा उसकी माँ के सतीत्व पर जीवन भर का दाग होगा जो उसकी पढ़ाई, भरण-पोषण, सम्पत्ति में हिस्सेदारी सहित अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत जीने के मौलिक अधिकार पर अतिक्रमण होगा।
लेकिन यदि डी०एन०ए० परीक्षण से ऐसे दुष्परिणाम निकलने की सम्भावना न हो तो इसके लिये अनुमति दी जा सकती है। एक वैवाहिक विवाद में पति ने जारता (अडल्ट्री) के आधार पर विवाह-विच्छेद के लिये आवेदन किया तथा आरोप लगाया कि उसकी पत्नी एक अन्य व्यक्ति के गर्भ से गर्भवती हुयी थी। इससकल इस पत्नी का अपरिपक्व भ्रूण स्खलित (मिसकैरेज) हो गया था तथा आल इण्डिया मेडिकल सांइसेज़ के अस्पताल में उसका वह भ्रूण वैज्ञानिक परीक्षण के लिये सुरक्षित रखा गया था जिससे यह जाना जा सके कि ऐसा क्यों हुआ? पति ने अदालत से यह गुजारिश की कि इस भ्रूण का डी०एन०ए० परीक्षण कर यह पता किया जाय कि इसका पिता कौन व्यक्ति है? पत्नी की तरफ से अपने बचाव में स्वयं के तथा इस मृत-भ्रूण के एकान्तता के मौलिक अधिकार की दुहाई देकर इसका विरोध किया गया। लेकिन अदालत ने इसके परीक्षण की अनुमति प्रदान की क्योंकि इस भ्रूण से किसी की मानहानि होने की गुंजाइश ही नहीं थी तथा जारता के आरोप को इसके द्वारा सिद्ध किया जा सकता था। अभी हाल में केरल उच्च न्यायालय द्वारा निर्णीत हजीरा बीबी बनाम शर्मीला पी इकबाल (ए०आई०आर०-2004 केरल 240) में पिता की मृत्यु के उपरान्त उसकी सम्पत्ति में हिस्सेदारी के लिये मुकदमा दायर किया जिसमें विचारणीय विषय यह था कि कथित पुत्री मृतक की असली संतान थी या गोद ली हुयी। इस मामले में न्यायालय ने डी०एन०ए० परीक्षण के लिये इजाजत दे दी।
एक तरफ एकान्तता तथा जीवन जीने का मौलिक अधिकार है तथा दूसरी तरफ न्याय पर पहुँचने के लिये आधुनिक वैज्ञानिक विधाओं के इस्तेमाल का लोभ है। इनके बीच में सामंजस्य आसान नहीं है, क्योंकि एक बार जाज संतान का दाग लगने या स्त्री के सतीत्व पर लगे आरोप को केवल अदालती निर्णय द्वारा समाप्त नहीं किया जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि इंग्लैण्ड तथा अमेरिका की भांति भारत में भी उन्मुक्तता से इसकी अनुमति दी जाय तथा कानून में संशोधन करके ऐसे व्यक्ति को उत्तरदायी ठहराया जाय जिसके कारण विवाद उत्पन्न हुआ।
इधर अमेरिका तथा कई अन्य यूरोपीय देशों में जाने वाले विदेशियों के रक्त-परीक्षण की अनिवार्यता की गयी है। यह एक खतरनाक शुरुआत है क्योंकि ऐसे परीक्षण के दुरुपयोग की भी पर्याप्त सम्भावनाएँ हैं। अतः डी०एन०ए० परीक्षण पर एक अन्तर्राष्ट्रीय कानून की प्रबल आवश्यकता है तथा तात्कालिक कदम की दरकार है।
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