कोलकाता की एक स्कूल छात्रा हेतल पारेख के साथ बलात्कार कर उसकी हत्या करने के दोषी धनंजय चटर्जी की आसन्न फांसी राष्ट्रपति के हस्तक्षेप से रोक दी गयी है। मानव संवेदना से वशीभूत राष्ट्रपति भवन ने केन्द्रीय गृह-मंत्रालय से अनुरोध किया कि धनंजय की क्षमादान याचिका पर पुनर्विचार किया जाय। राष्ट्रपति की इस इच्छा पर कार्यवाही करते हुये उच्चतम न्यायालय ने फांसी के कार्यान्वयन पर फिलहाल रोक लगाने का आदेश पारित कर दिया।
ज्ञातव्य है कि हेतल पारेख जिस कालोनी में रहती थी, धनंजय उसमें लिफ्ट चलाने का कार्य करता था। वह अक्सर हेतल को छेड़ता रहता था जिसकी शिकायत पर धनंजय को फटकार भी लगाई गयी थी। लेकिन 1989 में एक दिन मौका देखकर हेतल के साथ उसने बलात्कार किया तथा शोर मचाने पर हत्या कर दी। धनंजय को फांसी की सजा दी गयी जो उच्चतम न्यायालय तक बरकरार रही। संविधान के अनुच्छेद 72 के अन्तर्गत की गयी दया की याचिका भी ठुकरा दी गयी लेकिन अंत में जब फांसी देने की सभी तैयारियां पूरी हो गयी तो राष्ट्रपति तथा उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद फिलहाल इसके कार्यान्वयन पर रोक लगा दी गयी है। अपुष्ट समाचारों के अनुसार धनंजय की क्षमादान याचिका को निरस्त करने की अनुशंसा के साथ गृह मंत्रालय द्वारा राष्ट्रपति को अंतिम निर्णय के लिये भेजा जा चुका है।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि आसन्न फांसी से सिहरे हुये धनंजय के परिवार वाले आमरण-अनशन पर चले गये थे तथा धमकी दे रहे थे कि फांसी होने की दशा में वे सब भी मृत्यु का आलिंगन करेंगे। उधर पश्चिम-बंगाल की सरकार ने आधिकारिक तौर पर धनंजय के प्रति दया न दिखाने का आग्रह किया है। उधर हेतल पारेख के स्कूल की प्राचार्या, शिक्षिकायें तथा छात्रायें समवेत स्वर से अपराधी को फांसी देने के पक्ष में हैं। ब्रिटेन ने सरकारी तौर पर तथा कई राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये फांसी की सजा ही समाप्त करने का सुझाव दिया है।
वैसे तो बलात्कार तथा हत्या के सैकड़ों प्रकरण निर्णीत हुये हैं तथा उन पर जनमानस की रोष और आक्रोश भरी प्रतिक्रिया देखने-सुनने को मिली है लेकिन हेतल पारेख के साथ घटित जघन्य अपराध पर अस्सी के दशक में दिल्ली की एक स्कूल छात्रा गीता चोपड़ा की हत्या का मामला मनोमस्तिष्क में कौंध जाता है। एक सैन्य अधिकारी के वे दोनों बच्चे स्कूल जाने के लिये सामने से गुजरती हुयी एक कार से लिफ्ट मांग बैठे और कार में सवार कुख्यात अपराधी रंगा-बिल्ला ने कार में ही गीता के साथ बलात्कार किया तथा प्रतिरोध करने पर भाई-बहन को मौत के घाट उतार दिया। बाद में दोनों को फांसी की सजा दी गयी। उनके द्वारा प्रस्तुत की गयी क्षमादान की याचिका राष्ट्रपति द्वारा निरस्त कर दी गयी तथा उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रपति के क्षमादान सम्बन्धी अधिकारों तथा दायित्वों पर अन्वेषण करने से यह कहकर इंकार कर दिया था कि इस बर्बर तथा लोमहर्षक कांड की सजा सिर्फ फांसी ही हो सकती है तथा अपराधी किसी भी प्रकार से दया के पात्र नहीं है।
पचास के दशक के उत्तरार्द्ध में नेवी के कप्तान नानावती द्वारा अपनी पत्नी के प्रेमी की हत्या में प्राप्त आजीवन कारावास की सजा को क्षमा करने के प्रकरण से प्रकाश में आये इस राष्ट्रपतीय अधिकार पर चर्चा होती रही है। स्व० इन्दिरा गाँधी के कथित हत्यारों को पर्याप्त सबूत के अभाव में भी मृत्युदण्ड दिये जाने पर सवाल खड़े किये गये थे तथा क्षमादान याचिका को साधिकार पाने के लिये उच्चतम न्यायालय में असफल प्रयास किये गये थे। वहीं अभी हाल में स्वर्गीय राजीव गाँधी की हत्या में शामिल नलिनी को उसके अबोध बच्चे की परवरिश करने देने के लिये श्रीमती सोनिया गाँधी ने स्वयं राष्ट्रपति से उसे क्षमादान देने की गुजारिश की है। आस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स को उनके दो बच्चों के साथ जिन्दा जलाकर मार डालने के दिल दहला देने वाले अपराध में फांसी की सजा पाये कुख्यात दारा सिंह के प्रति दया दिखलाते हुये स्टेन्स की पत्नी ने भी क्षमा करने की अपील की है।
संविधान का अनुच्छेद 72, राष्ट्रपति को किसी अपराध के लिये सिद्ध दोष ठहराये गये किसी व्यक्ति के दण्ड को क्षमा, उसका प्रविशम्बन, विराम या परिहार करने की अथवा दण्डादेश के निलम्बन, परिहार या लघुकरण की शक्ति प्रदान करता है। राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति सेना न्यायालय द्वारा दिये गये दण्डादेश, उन सभी मामलों में जिसमें दण्डादेश, मृत्युदण्ड है तथा उन मामलों में दिये गये दण्डादेश तक विस्तारित है जो संघ की कार्यपालिका क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत आते हैं। इसी प्रकार अनुच्छेद 161 राज्यपाल को भी कतिपय मामलों में क्षमादान की सीमित शक्ति प्रदान करता है। इंग्लैण्ड में सम्राट की यह शक्ति पुरातन काल से चली आ रही है जो उसके सम्प्रभु होने से प्राप्त है। अमेरिका में राष्ट्रपति को उसकी कार्यपालिका शक्ति के अन्तर्गत क्षमादान की शक्ति प्राप्त है। प्रायः प्रत्येक देश के सांविधानिक प्रमुख को ऐसी शक्ति प्राप्त होती है।
क्षमा का अर्थ मुआफी से है। किसी व्यक्ति को किसी अपराध के दण्ड से मुक्ति प्रदान करना क्षमादान कहा जाता है। क्षमादान का प्रभाव यह होता है कि जिस व्यक्ति को क्षमादान दिया गया है वह उस स्थिति में हो जाता है जैसा कि वह अपराध करने से पहले था और ऐसा माना जाता है कि जैसे उसने कभी भी अपराध किया ही न हो। क्षमादान समस्त नियोग्यताओं को समाप्त कर देता है। प्रविशम्बन से तात्पर्य विधि द्वारा विहित दण्ड के अस्थायी स्थगन से है। विनिश्चत दण्ड का आरम्भ होने का समय आगे बढ़ाना प्रविशम्बन कहा जाता है। परिहार से तात्पर्य बिना दण्ड की प्रकृति बदले उसकी मात्रा को घटाने से है, जैसे, आठ वर्ष के कारावास को 6 वर्ष के कारावास में बदलना परिहार है। जबकि लघुकरण से तात्पर्य दण्ड की प्रकृति को परिवर्तित करने से है। जैसे मृत्युदण्ड को आजीवन कारावास में परिवर्तित करना लघुकरण है। क्षमादान आदि शक्ति का प्रयोग परीक्षण से पूर्व अथवा परीक्षण के बाद अथवा परीक्षण के दौरान किया जा सकता है।
राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति न्यायिक शक्ति से भिन्न है। राष्ट्रपति द्वारा क्षमादान का अर्थ न्यायिक आदेश को संशोधित, परिवर्तित या उपान्तरित करना नहीं है। क्षमादान की व्यवस्था सांविधानिक योजना का ही अंग है। राष्ट्रपति की यह शक्ति मुख्य रूप से मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित है। कई बार कोई व्यक्ति आवेश, भावावेश अथवा अपरिहार्य परिस्थितियों में कोई अपराध कारित कर बैठता है तब राष्ट्रपति उस व्यक्ति की स्थिति, भावनाओं, परिस्थितियों, समाज पर उसके प्रभाव आदि को ध्यान में रखते हुये यदि अपनी क्षमादान शक्ति का प्रयोग करता है, तो यह मानवीय दृष्टिकोण ही है।
कई मामलों में अनुच्छेद 72 के अधीन राष्ट्रपति की शक्ति के प्रयोग के अधिकार के बारे में प्रश्न उठाये गये हैं, मारूराम बनाम भारत संघ (1980) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह अभि० निर्धारित किया है कि किसी भी सांविधानिक शक्ति का प्रयोग मनमाना नहीं किया जाना चाहिए। लोक शक्ति का प्रयोग जो किसी उच्च मंच में निहित है, न्यायसंगत रूप से किया जाना चाहिए। यदि किसी मामले में क्षमा, लघुकरण या परिहार करने की शक्ति का प्रयोग अयुक्त, असंगत, विभेदकारी या असद्भावनावूर्क बातों के आधार पर किया जाता है तो न्यायालय मामले की जांच कर सकते हैं और आवश्यक होने पर हस्तक्षेप भी कर सकते हैं।
राष्ट्रपति की क्षमादान आदि की शक्ति पर न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति से सम्बन्धित एक अन्य महत्त्वपूर्ण मुकदमा कृष्णा गाउंड बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1976) निर्णीत हुआ है। इसमें दो व्यक्तियों को कई हत्याओं के आरोप में फांसी की सजा दी गयी थी। अभियुक्तों का कहना था कि मृतकों से उनकी कोई निजी दुश्मनी नहीं थी तथा सामाजिक न्याय के सिद्धान्तों को लागू करने के लिए उन्होंने अमीर लोगों की हत्यायें की थीं। यह अपराध राजनैतिक अतः उनकी क्षमादान की याचिका को इसी परिप्रेक्ष्य में निर्णीत किया जाना चाहिए। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने दुश्मनी के अन्तर्गत की गयी हत्या तथा राजनैतिक हत्या के फर्क को मानने से इंकार कर दिया तथा स्थापित किया कि फांसी की सजा विरलतम प्रकरणों में ही दी जाती है अतः अनुच्छेद 72 के अन्तर्गत विचार करते हुये किसी अन्यथा परिप्रेक्ष्य पर दृष्टिपात की अपरिहार्यता नहीं है। न्यायालय का कहना था कि ऐतिहासिक रूप से यह एक सम्प्रभु की शक्ति है, राजनैतिक रूप से एक अवशिष्ट शक्ति है तथा मानवतावादी दृष्टिकोण से यह-वह अव्यक्त न्याय है जो वर्तमान न्याय प्रणाली से ऊपर उठकर समाज के कल्याण के लिये कार्य करती है।
अनुच्छेद 72 द्वारा राष्ट्रपति को प्रदत्त शक्तियों पर केहर सिंह बनाम भारत संघ (1989) का वाद भी महत्त्वपूर्ण है। इसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के मामले में मृत्यु-दण्ड पाये अभियुक्त केहर सिंह की तरफ से उनके पुत्र ने राष्ट्रपति को अनुच्छेद 72 के अन्तर्गत अपनी शक्तियों का प्रयोग करने तथा उसे क्षमादान देने की प्रार्थना की थी। उसका कहना था कि केहर सिंह निर्दोष था और उसे मृत्यु-दण्ड देना गलत था। उसका यह भी कहना था कि उसकी याचिका पर विचार करते समय राष्ट्रपति उसे व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर प्रदान करें। लेकिन यह प्रार्थना अस्वीकार कर दी गयी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि क्षमा आदि की शक्ति जनता की है और जनता ने इसे देश के उच्चत्तम अधिकारी अर्थात् राष्ट्रपति को सौंप दिया है। राष्ट्रपति इस शक्ति का प्रयोग मन्त्रिपरिषद की सलाह पर करेगा और सलाह उस पर बाध्यकारी होगी। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्रपति मौखिक सुनवाई देने के लिये बाध्य नहीं है तथा याचिका की सुनवाई के तरीके का निर्धारण राष्ट्रपति के विवेकाधिकार में आता है।
भारतीय विधिक इतिहास में राजा नंद कुमार परीक्षण एक महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर है जिसमें तत्कालीन गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स के खिलाफ बोलने की हिम्मत करने वाले बंगाल के अति प्रतिभाशाली जमींदार नंद कुमार को एक छोटा सा ऋण न चुका पाने के आरोप में फांसी की सजा दे दी गयी थी। इतिहास में इसे राजा नंद कुमार की "न्यायिक हत्या" माना जाता है। थोड़े समय पूर्व अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान के भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री जुल्फिकार अली भुट्टो को एक व्यक्ति की हत्या के प्रयास के षड्यंत्र में शामिल होने के आरोप में फांसी की सजा दे दी गयी थी तथा तत्कालीन राष्ट्रपति जियाउलहक ने इंटरनेशनल एमनेस्टी सहित दुनिया भर से पहुंची क्षमादान की अपीलों को नजरअंदाज कर भुट्टो को शहीद बना दिया था। दरअसल क्षमादान की शक्ति का प्रयोग इस प्रकार है कथित अपराधियों को मुक्त करने के लिये किया जाना अभीष्ट है।
राष्ट्रपति द्वारा क्षमादान एक अनुग्रह है। क्षमादान करना या न करना पूर्णरूप से राष्ट्रपति के विवेकाधीन है। कोई भी व्यक्ति अधिकार के रूप में या जनता की सहानुभूति प्राप्त कर इसके लिये हठ नहीं कर सकता। संविधान में जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार है। लेकिन प्रत्येक नागरिक के इस अधिकार की रक्षा हो सके इसके लिये उन तत्वों से मुक्ति पाना आवश्यक है जो समाज के लिये खतरनाक साबित हुये हैं।
No comments:
Post a Comment