Monday, 6 July 2026

वृत्तिक, व्यावसायिक रिश्ते के द्वन्द्व

अभी हाल में उच्चतम न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण निर्णय में अभिनिर्धारित किया है कि उपेक्षा, असावधानी या निर्णय की त्रुटि के लिये चिकित्सकों पर आपराधिक दायित्व नहीं बनता है तथा वृत्तिक लापरवाही के एवज में उनसे केवल मुआवजा ही पाया जा सकता है। सिवाशीष करीम अरबब नामक एक व्यक्ति की नाक के आपरेशन के दौरान हुयी मृत्यु को गंभीर चिकित्सकीय असावधानी के कारण हुई मौत आरोपित करने वाले मुकदमें का फैसला सुनाते हुये न्यायमूर्ति-द्वय वाई०के० सभरवाल तथा डी० एम० धर्माधिकारी की खण्ड-पीठ ने आपरेशन में संलग्न दो शल्य चिकित्सकों के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करते हुये अभिनिश्चित किया है कि चिकित्सक के विरुद्ध आपराधिक दायित्व सिद्ध करने के लिये ऐसे सबूत दिये जाने चाहिए जिससे 'घोर तथा जानबूझकर की गयी लापरवाही' सिद्ध हो सके। कानून का सामान्य ज्ञान रखने वाले के लिये इसका अर्थ है कि किसी डाक्टर के विरुद्ध आपराधिक दायित्व को सिद्ध करने के लिये 'दुराशय' (मेन्सिरिया) सिद्ध करना होगा तथा अदालत के सामने साक्ष्य देना होगा कि चिकित्सक ने किस गलत इरादे से उसके मरीज के प्रति वृत्तिक उपेक्षा की है। सामान्यतः यह सिद्ध करना सम्भव ही नहीं होगा क्योंकि एक सामान्य ज्ञान व बुद्धि वाला व्यक्ति दुराशय रखने वाले डॉक्टर के पास इलाज के लिये नहीं जायेगा।
ज्ञातव्य है कि उक्त नामित रोगी की नाक में एक छोटी सी विकृति थी जिसे दूर करवाने के लिये उसने दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में एक प्लास्टिक सर्जन से आपरेशन करवाने के लिये करार किया था। गत 18 अप्रैल 1994 को आपरेशन करते वक्त रोगी की बेहोशी की हालत में उसकी नाक में एक सूई चुभोई गयी जिसके कारण उसे भयंकर रक्त स्राव हुआ जो नाक के जरिये श्वसन तंत्रिका में भर गया तथा श्वास अवरुद्ध होने के कारण हार्ट फेल हो गया। रोगी के परिजनों ने पुलिस में रिपोर्ट लिखाई तथा शव का पोस्ट-मार्टम किया गया जिससे डाक्टर की लापरवाही का तथ्य उजागर हुआ। इसके बाद ही सम्बन्धित डॉक्टरों के विरुद्ध आपराधिक दायित्व का मुकदमा चला, लेकिन अंतिम अपीलीय न्यायालय अर्थात् उच्चतम न्यायालय ने चिकित्सकों को बरी कर दिया। इस निर्णय पर जहाँ चिकित्सकों तथा उनके परिसंघों ने खुशी का इजहार किया है वहीं उपभोक्ता संगठनों, स्वयं-सेवी समूहों तथा आम नागरिकों ने सहमी सी प्रतिक्रिया व्यक्त की है तथा डाक्टरों के बेलगाम हो जाने के खतरे के प्रति चिन्ता जताई है।

 तेरह नवम्बर 1995 को इन्डियन मेडिकल कौंसिल बनाम वी०पी० शान्ता के मुकदमें में निर्णय देते हुये न्यायमूर्ति-त्रयी; कुलदीप सिंह, एस०सी० अग्रवाल तथा बी०एल०हंसारिया की एक पीठ ने चिकित्सकों द्वारा फीस या प्रतिफल लेकर दी जाने वाली मेडिकल सेवाओं को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत आच्छादित करार दिया था। न्यायालय का कहना था कि चिकित्सकीय उपेक्षा या असावधानी के कारण हुयी क्षति के मुआवजे के लिये अधिनियम के अन्तर्गत परिवाद प्रस्तुत किया जा सकता है। भारतीय विधिक इतिहास में मील का पत्थर माने जाने वाले इस निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने चिकित्सकों की सर्वोच्च संस्था इन्डियन मेडिकल कौंसिल की यह दलील ठुकरा दी थी कि डॉक्टर-मरीज का रिश्ता व्यावसायिक है तथा इसे आम सेवाओं के अन्तर्गत व्याख्यायित नहीं किया जाना चाहिए। कौंसिल की यह दलील भी ठुकरा दी गयी थी कि उनके यहाँ दोषी डॉक्टर के खिलाफ शिकायत की जा सकती है तथा वह डॉक्टरों पर अनुशासनेतर कार्यवाही के लिये शक्तियुक्त है। न्यायालय का कहना था कि जब फीस या प्रतिफल लेकर चिकित्सकीय सेवायें दी जाती है तो यह सेवा प्रदाता का कर्त्तव्य है कि वह समुचित सेवायें प्रदान करें तथा उसमें 'कमी' के कारण होने वाली क्षति की क्षतिपूर्ति के लिये तैयार रहे। घोर लापरवाही के लिये आपराधिक दायित्व के विषय में सीधे तो कुछ नहीं कहा गया लेकिन डॉक्टरों से यह अपेक्षा अवश्य की गयी थी कि वे ईलाज करते समय सतर्क रहे तथा लोगों के जीवन को बचाने के लिये अपने ज्ञान, कौशल तथा अनुभव का युक्तियुक्त इस्तेमाल करें।

तत्समय सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय पर डॉक्टरों द्वारा तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की गयी थी तथा यह आशंका व्यक्त की गयी थी कि इस निर्णय से चिकित्सक प्रतिरंक्षात्मक उपाय उठाने को मजबूर होंगे जिससे यह सेवायें काफी महंगी हो जायेगी। कहा गया था कि इन उपायों में, डॉक्टर किसी दायित्व से बचने के लिये, साधारण सी बीमारी में भी विभिन्न पैथोलोजी जांचें; एक्सरे, सी.टी. स्कैन, एम.आर.आई. आदि करवायेंगे तथा आपरेशन से पूर्व हृदय तथा मस्तिष्क आदि के विशेषज्ञों से राय लेना नहीं भूलेंगे तथा इनकी फीस रोगी से ही वसूली जायेगी। इसमें कोई शक नहीं कि यह आशंका निर्मूल सिद्ध नहीं हुयी और मेडिकल सेवायें काफी महंगी हो गयी। डॉक्टरों ने अपने को दायित्व से बचाने के लिये कई नये हथकण्डे अपनाये तथा वृत्तिक जोखिम बीमा कराना भी प्रारम्भ कर दिया।

"वैद्यो नारायणों हरिः" अर्थात वैद्य ही नारायण हरि (भगवान) है, की मानसिकता वाले हमारे इस समाज में चिकित्सकों के प्रति अगाध श्रद्धा तथा सम्मान रहा है। विधिक परिप्रेक्ष्य में भी चिकित्सक तथा रोगी के सम्बन्ध को वैश्वासिक (विश्वास पर आधारित) रिश्ता माना गया है। विधि की अपेक्षा है कि चिकित्सक अपने ज्ञान, कौशल तथा अनुभव का उपयोग बिना किसी भेद-भाव तथा लालच के रोगी को चंगा करने में करेंगे। इस वृत्ति में पदार्पण से पूर्व प्रत्येक चिकित्सक "हिप्पो क्रैटिक शपथ" लेकर ईश्वर को साक्षी मान कर रोगी की सेवा का व्रत लेते हैं तथा प्रार्थना करते हैं कि उन्हें मानवता की सेवा में सतत तल्लीन रहने के लिये शक्ति व सामर्थ्य प्रदान करें। मेडिकल नीतिशास्त्र के अनुरूप प्रत्येक रोगी को यह अधिकार है कि उसे पूरी सूचना दी जाय, इसकी सहमति प्राप्त की जाय तथा उसे स्वास्थ्य सम्बन्धी शिक्षा दी जाय। डॉक्टरों से भी अपेक्षित है कि वे अपना विज्ञापन न करें; अपनी वृत्तिक सेवाओं के लिये ही शुल्क लें तथा कोई रिबेट या कमीशन न प्राप्त करें तथा कोई गोपनीय उपचार न करें। इन वृत्तिक नीतिशास्त्र का कितना पालन हो रहा है- सर्वविदित है। मेडिकल कौंसिल ने अपनी स्थापना के प्रायः पचास वर्षों में एक भी डॉक्टर के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की है।

असावधानी, उपेक्षा, जानबूझकर की गयी लापरवाही तथा आपराधिक असावधानी आदि स्थितियों में डिग्री का अन्तर है। इसकी विभाजक रेखा अत्यन्त झीनी तथा धुंधली है। कब असावधानी उपेक्षा हो जाती है तथा कब इसे जानबूझकर की गयी लापरवाही की श्रेणी में रखा जाय- यह प्रत्येक केस के तथ्यों से ही निश्चित किया जा सकता है। इसमें निर्णय लेने वाले की मनःस्थिति तथा परिस्थिति भी महत्वपूर्ण है। भुक्त भोगी, आरोपित डॉक्टर तथा न्यायपीठि के दृष्टिकोण अलग-अलग होते हैं अतः प्रतिक्रिया भी भिन्न होगी।
हरजोत अहलूवालिया बनाम स्प्रिंग मीडोज हास्पिटल (2000) के मुकदमें में एक शिशु को टाइफाइड बुखार के लिये बिना टेस्ट किये जेंटामाइसिन का हाई-पावर इंजेक्शन नर्स के द्वारा चढ़ा दिया गया जिससे बच्चे का मस्तिष्क क्षतिग्रस्त हो गया। अब वह बच्चा जिंदा तो रहेगा लेकिन उसकी ज्ञानेन्द्रियां काम नहीं करेंगी, वह न देख पायेगा, न सुन पायेगा, न बोल पायेगा तथा सारी जिन्दगी वह दूसरों के सहारे रहने को अभिशप्त हो गया। उच्चतम न्यायालय ने इसे घोर लापरवाही माना तथा भारी रकम प्रतिकर के रूप में दिलाई। लेकिन ऐसे केस में किसी माँ-बाप के कुलदीपक के लिये क्या कोई भी रकम प्रतिकर हो सकती है? एम० जीवा बनाम आर. ललिता (1994) के प्रकरण में गर्भवती स्त्री को जब प्रसव-वेदना प्रारम्भ हुयी तो कोई चिकित्सक मौजूद नहीं था। उसे असीम रक्तस्राव हुआ तथा वहाँ कार्यरत एक मिडवाइफ ने स्थिति संभालने में असमर्थता व्यक्त करते हुये दूसरे अस्पताल ले जाने के लिये कहा। अन्ततः वह बच्चा मर गया इसे वृत्तिक उपेक्षा माना गया। इसी प्रकार रामानन्द नायकर बनाम सालगांवकर मेडिकल रिसर्च सेंटर (1993) के वाद में शल्य क्रिया के दौरान मरीज के पेट में "गाज टावेल" का छूटना उपेक्षा पूर्ण कृत्य माना गया। बीमार आंख की बजाय स्वस्थ आंख को निकालना, मोतियाबिन्द आपरेशन के लिये लगे शिविर में दसियों मरीजों को गलत दवाई के कारण अंधा बनाने, बन्ध्याकरण आपरेशन के बावजूद गर्भवती होने, आसन्न प्रस्वा को अस्पताल में भर्ती न करने, आपरेशन के बाद सावधानी न बरतने से गैंगरीन हो जाने आदि के हजारों प्रकरण उपभोक्ता तथा सामान्य अदालतों द्वारा निर्णीत हुये हैं या निर्णय की बात जोह रहे हैं। लेकिन यदि लोगों से इन पर मत लिया जाय तो कई इनके लिये मुआवजे की बजाय सम्बन्धित डॉक्टरों को जेल भेजे जाने के पक्ष में अपनी राय देंगे। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि अदालतों में कुल का दशांश भी नहीं पहुँचता है क्योंकि सामान्यतः लोग अपने स्वजन की क्षति को भाग्योदोष मान, मन मसोस कर रह जाते हैं।
इधर हाल के वर्षों में डाक्टरी पेशे में व्यावसायिकता हावी हो गयी है। मानव-मूल्यों तथा समाज की सेवा के उच्चादर्श हाशिये पर चले गये हैं तथा ऐन-केन-प्रकारेण धन कमाने की लिप्सा बढ़ गयी है। वृत्तिक नीतिशास्त्र पर व्यावसायिकता का आवरण चढ़ गया है तथा इनके द्वारा डॉक्टरों को अपना धर्म पालन करने के लिये विवश नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के सद्य निर्णय पर जश्न मनाने की बजाय आत्मांवेषण कर वृत्तिक नीति-शास्त्र के पालन तथा वैश्वासिक रिश्ते को अक्षुण्ण रखने के लिये तत्पर रहने का समय सामने है।

 

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