राज्य मंत्रिमंडल के एक निर्णय के अनुसार रामपुर जनपद में "उत्तर प्रदेश मौलाना मुहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय" की स्थापना के लिये अध्यादेश प्रख्यापित किया जायेगा। विश्वविद्यालय का उद्देश्य "छात्रों को उर्दू, अरबी और फारसी भाषा के शिक्षण एवं अनुसंधान द्वारा उन्नत ज्ञान, प्रज्ञा एवं समझ प्रदान करना होगा"। ज्ञातव्य है कि पिछले ही दिनों उक्त वर्णित नाम से एक विधेयक विधान-सभा में लाया गया था। प्रदेश के राज्यपाल ने इस विधेयक की उस धारा के प्रति आपत्ति जताई थी जिसमें एक वर्तमान कबीना मंत्री को प्रस्तावित विश्वविद्यालय का प्रति-कुलाधिपति बनाने का प्राविधान किया गया है। स्मरण रहे, राज्यपाल को संविधान के अनुच्छेद 175 के अन्तर्गत सदन या सदनों में अभिभाषण का और उनको संदेश भेजने का अधिकार है तथा जिस सदन को कोई संदेश इस प्रकार भेजा गया है, वह सदन उस संदेश पर सुविधाजनक विचार करने के लिये अपेक्षित है। विधान-सभा अध्यक्ष को भेजे अपने संदेश में राज्यपाल ने विधेयक के आपत्तिजनक अंशों पर विशेषतः विचार करने के लिये अनुरोध किया था।
Monday, 6 July 2026
उर्दू-विश्वविद्यालय की स्थापना के लिये कानून
राज्यपाल की आपत्ति तथा इस पर उपजे राजनीतिक विवाद को दृष्टिगत रखते हुये प्रदेश सरकार ने विधेयक वापस ले लिया, क्योंकि उसे शंका थी कि वह इसे उस रूप में पारित नहीं करा पायेगी। इस बीच मुख्य विरोधी दल ने प्रस्तावित विश्वविद्यालय के गठन का ही विरोध किया तथा इसे वोट की राजनीति से प्रेरित करार दिया। सरकार के एक सहयोगी दल ने गठन के औचित्य पर तो प्रश्न नहीं किया लेकिन सक्रिय राजनीतिज्ञ को विश्वविद्यालय का आजीवन प्रति-कुलाधिपति बनाने पर एतराज दर्ज कराया है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि उ० प्र० राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 के अन्तर्गत केवल सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में वाराणसी के महाराजा विभूति नारायण सिंह को आजीवन प्रति-कुलाधिपति बनाये जाने का प्रावधान रहा है। इसके अलावा किसी अन्य विश्वविद्यालय में प्रति-कुलाधिपति का पद सृजित नहीं है। ज्ञातव्य है कि राज्य विश्वविद्यालयों में राज्यपाल पदेन कुलाधिपति होता है तथा वास्तविक कार्यपालिका शक्ति कुलपति के पास रहती है। प्रति-कुलाधिपति की शक्तियाँ उक्त अधिनियम तथा उसके परिनियमों में निर्धारित किया जाना शेष है। फिलहाल कुलाधिपति की अनुपस्थिति में उसे सभा के अधिवेशनों तथा दीक्षान्त समारोह में सभापतित्व का अधिकार ही दिया गया है।
शिक्षा, जिसमें उच्चतर शिक्षा शामिल है, संविधान की समवर्ती सूची का विषय है तथा इस पर केन्द्र तथा राज्यों को कानून बनाने का अधिकार है। उच्चतर शिक्षा या अनुसंधान संस्थाओं में तथा वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थाओं में मानकों का समन्वय और अवधारण केन्द्र सूची का विषय है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग इसी के अन्तर्गत गठित किया गया है जो विभिन्न केन्द्रीय तथा राज्यीय विश्वविद्यालयों पर नियंत्रण और नियमन करता है। विश्वविद्यालयों की स्थापना विशिष्ट अधिनियमों को पारित कर की जाती है तथा इन पर केन्द्र तथा, यथा स्थिति, राज्यों का नियंत्रण रहता है। पाठ्यक्रम निर्धारण तथा तत्विषयक पाठन-पाठन के क्षेत्र में इन्हें स्वायत्तता रहती है। ज्ञातव्य है कि केन्द्रीय सरकार के अधिनियमों द्वारा महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय तथा मौलाना अबुल कलाम आजाद उर्दू विश्वविद्यालय या संस्थान स्थापित किये जा चुके हैं। संस्कृत तथा कई क्षेत्रीय भाषाओं के उन्नयन के लिये भी विश्वविद्यालयों या संस्थान स्थापित है जिन्हें मानित विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया है।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 123 तथा 213 में क्रमशः राष्ट्रपति तथा राज्यपाल को अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्राप्त है। दोनों अनुच्छेदों की भाषा एक सी है तथा इसे विधि निर्माण की 'आपात् शक्ति' कहा जाता है। इस आपात् विधायी शक्ति का उपयोग उस समय किया जाता है जब विधान-मण्डल सत्र में न हो तथा ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जायें जिसके अन्तर्गत तुरन्त कार्यवाही अपरिहार्य हो। विधान-मण्डल द्वारा निर्मित विधि को अधिनियम का नाम दिया जाता है तो राज्यपाल द्वारा निर्मित इस विधि को अध्यादेश का। बल एवं प्रभाव की दृष्टि से इन दोनों में कोई अन्तर नहीं होता है। अध्यादेश जब तक प्रर्वतन में रहता है, तब तक वही बल एवं प्रभाव होता है जो अधिनियम का होता है। संविधान के अनुच्छेद 13(3)(क) में अध्यादेश को 'विधि' शब्द में सम्मिलित माना गया है। सामान्य अधिनियम तथा अध्यादेश में यदि कोई अन्तर है तो वह कालावधि का है। अध्यादेश को निश्चित समयावधि के भीतर विधानमण्डल से पारित कराना आवश्यक है, नहीं तो वह प्रभावी नहीं रहता है। इसी प्रकार का उपबन्ध भारत शासन अधिनियम,1935 की धारा 72 में भी था जो गवर्नर-जनरल को अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्रदान करता था। संविधान सभा में डॉ० अम्बेडकर ने अचानक उत्पन्न हुयी स्थिति से निपटने के लिये कार्यपालिका को ऐसी विधायन की शक्ति से श्री-सम्पन्न करना आवश्यक बतलाया था। राष्ट्रपति तथा राज्यपाल की अध्यादेश निर्गत करने की शक्ति पर नियंत्रण के लिये शर्तें संविधान में ही वर्णित कर दी गयी हैं।
लोकतांत्रिक देश के कार्यपालिका प्रमुख से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी इस शक्ति का प्रयोग जनहित एवं देशहित में करें। सामान्यतः अध्यादेश मंत्रिपरिषद की सलाह पर प्रख्यापित किया जाता है तथा न्यायालय राज्यपाल के समाधान के कारणों की पर्याप्तता की जांच नहीं कर सकता है। राज्यपाल उन्हीं विषयों या मदों पर अध्यादेश जारी कर सकता है जिस पर राज्य को विधान अधिनियमित करने की शक्ति है। जिन विषयों पर राष्ट्रपति के अनुमोदन की अपरिहार्यता है या जिन पर राज्यपाल अनुमोदन लेना आवश्यक समझे, वहाँ अध्यादेश प्रख्यापन से पूर्व तत्सम्बन्धी औपचारिकता का निर्वहन अनिवार्य है।
डी.सी. वाधवा बनाम बिहार राज्य (1987) में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया था कि अध्यादेश प्रख्यापन केवल उसी दशा में किया जाना चाहिये जब विधान-मंडल के सदन सत्र में न हों तथा विधान अत्यन्त अपरिहार्य हो। विधायन का दायित्व विधायिका को सौंपा गया है तथा उसका अतिलंघन कर अध्यादेश के द्वारा कानून बनाना या उसे बनाये रखना संविधान के शब्दों तथा आत्मा के साथ 'कपट' है। इस मुकदमें में उच्चतम न्यायालय के समक्ष यह सिद्ध कर दिया गया था कि बिहार राज्य में अनेकों अध्यादेश बारह से पन्द्रह वर्ष तक बार-बार लागू किये जाते रहे तथा उनको अधिनियम में बदलने का प्रयास ही नहीं किया गया।
बैंक राष्ट्रीयकरण को चुनौती देने वाली याचिका (1970) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया था कि राष्ट्रपति के समाधान की वास्तविकता को न्यायालय में सम्भवतः इस आधार पर चुनौती दी जा सकती है कि वह असद्भावनापूर्ण था। असद्भावनापूर्ण में वे प्रकरण आ जायेंगे जिसमें विधायिका में बहस करने से बचने, विधेयक पर मत-विभाजन में हार की आशंका होने अथवा अन्य कोई अन्यथा कारण से विधान मंडल में जाने से गुरेज करना सम्मिलित है। किसी अध्यादेश की सांविधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करते हुये न्यायालय इस बात से संतुष्ट होना चाहेगी कि आक्षेपित अध्यादेश को तुरंत जारी करने की अपरिहार्यता थी, तथा वह किसी अन्यथा उद्देश्य से नहीं जारी किया गया। 1984 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर-प्रदेश के राज्यपाल द्वारा जारी किये गये उ० प्र० राजभाषा अधिनियम (संशोधन) तृतीय अध्यादेश (उर्दू अध्यादेश) को इसी आधार पर असंवैधानिक घोषित कर दिया था कि अनुच्छेद 213 में राज्यपाल के समाधान की शर्तें पूरी नहीं होतीं। न्यायालय का कहना था कि अध्यादेश जारी करने के समय तुरन्त कार्यवाही के लिये बाधित करने वाली परिस्थितियां होनी चाहिए। न्यायालय का कथन था कि विधान-मण्डल द्वारा सदनों के सत्र में न होने के कारण विधि बनाना सम्भव न हो, तभी अध्यादेश निर्गत किया जाना चाहिए।
किसी भी विश्वविद्यालय की स्थापना रातों-रात नहीं की जा सकती। उसे बनने तथा अपनी पहचान बनाने में वर्षों लगते हैं। वैसे भी इस प्रस्तावित विश्वविद्यालय के लिये अभी भूमि अर्जन तथा उस पर भवन बनाने आदि का कार्य होना प्रारम्भ नहीं हुआ है। विश्वविद्यालय की प्रथम नियमावली तथा प्रथम अध्यादेश भी प्रस्तावित विधेयक के साथ नहीं संलग्न किये गये हैं। विधेयक की धारा एक के अनुसार यह ऐसे दिनांक को प्रवृत्त होगा जिसे राज्य सरकार गजट में अधिसूचना द्वारा नियत करेगी। इन तथ्यों के बावजूद अध्यादेश को निर्गत कराने में इतनी जल्दबाजी तथा हड़बड़ी किसी अन्यथा उद्देश्य की ओर ही इंगित कर रही है।
उत्तर-प्रदेश मौलाना मुहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय विधेयक, 2004 विधान सभा के गत् सत्र में लाया गया था लेकिन राज्यपाल द्वारा अनुच्छेद 175 के अन्तर्गत एक व्यक्ति विशेष को आजीवन प्रति-कुलाधिपति बनाये जाने के प्रावधान पर अपनी आपत्ति की तथा माननीय विधायकों को संदेश दिया कि विधेयक के गुणागुण पर विचार करते समय इस पर भी विचार करें। इस विधेयक को वापस लेकर फिर उसी प्रारूप में एक अध्यादेश के रूप में प्रख्यापित कराने का निर्णय एक स्वस्थ जनतांत्रिक परम्परा नहीं है तथा संविधान व राज्यपाल की संस्था के प्रति असमान का परिचायक है।
जनता पार्टी शासन काल में उस दिन की संसद की बैठक उठने के बाद बड़े मूल्य के करेंसी नोटों के विमुद्रीकरण का अध्यादेश जारी किया गया था। इसकी सांविधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका में कहा गया था कि इस अध्यादेश को सदन से पारित कराने में महज 12-14 घंटे लगते तथा तब तक इंतजार किया जाना चाहिए था। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकारते हुये निर्धारित किया था कि ऐसी परिस्थितियां हो सकती हैं जिससे इतनी देर भी घातक हो जाये। क्योंकि जैसे ही लोगों को पता चलता कि विमुद्रीकरण होने जा रहा है वैसे ही वे अपना "काला धन" इधर-उधर कर देते तथा अध्यादेश अपने उद्देश्य की पूर्ति में असफल हो जाता। लेकिन यह तर्क विश्वविद्यालय की स्थापना करने वाले कानून पर लागू नहीं किया जा सकता। बेहतर हो यदि विधानसभा के नियमित सत्र में राज्यपाल के संदेश पर विचार-विनिमय के उपरान्त ही ऐसा विधेयक पारित कराया जाय जिससे जन-प्रतिनिधियों व जनतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास व आस्था दिखलाई पड़ती रहे।
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