Sunday, 5 July 2026

राज्यपाल पद: सांविधानिक मर्यादा एवं राजनीतिक मर्यादा के अन्तर्द्वन्द्व

 स्वतंत्र भारत के संविधान में राज्यपाल का पद ब्रिटिश 'राज' का एकमात्र अवशेष है। सन् 1858 में ईस्ट इण्डिया कम्पनी से भारत की सार्वभौमिकता अपने पक्ष में स्थानान्तरित करते हुये इस नव-उपनिवेश के शासन के लिये गवर्नर-जनरल की नियुक्ति सम्राट के अधिपत्र द्वारा होनी प्रारम्भ हुयी। इनका कार्य मुगल सम्राट शाहआलम से प्राप्त दीवानी की वसूली तक सीमित था। तदनन्तर प्रशासनिक कार्यों के लिये बनाये जाने वाले प्रान्तों में 'गवर्नर' की नियुक्ति पहले तो सीधे सम्राट द्वारा होने की परम्परा रही लेकिन भारत सरकार अधिनियम, 1935 के पारित होते-होते इनके नियुक्ति अधिकारी वायसराय हो गये। ब्रिटिश 'राज' में गवर्नर की प्रतिबद्धता केवल 'ताज' के प्रति थी तथा वह सम्बन्धित प्रांत की कार्यपालिका का न सिर्फ निर्द्वन्द्व व सर्वोच्च मुखिया था बल्कि राजस्व का रखवाला तथा विधायिनी पर अभिभावी प्रभाव रखने वाला अत्यन्त ताकतवर अधिकारी था। इन पदों पर वरिष्ठ नौकरशाह या राज परिवार अथवा उनसे खून का रिश्ता रखने वाले अति विशिष्ट व्यक्तियों की ही नियुक्ति की जाती थी। सामान्य प्रशासन के अलावा उच्च शिक्षा की दिशा-दशा को निर्धारित, नियमित और नियमित करने तथा उस पर प्रभावी अंकुश रखने के लिये उसे राज्य विश्वविद्यालयों का पदेन कुलाधिपति भी नियुक्त किया गया। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि भारत में प्रथम विश्वविद्यालय की स्थापना से पूर्व ही इंग्लैण्ड में वहाँ के विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता स्थापित हो चुकी थी तथा उन पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं था, लेकिन भारत के विश्वविद्यालयों पर गवर्नर का प्रभावी, अभिभावी तथा अन्तिम नियंत्रण था। अपने उपनिवेश को अक्षुण्ण रखने के लिये तथा राज्य प्रशासन की प्रत्येक महत्त्वपूर्ण इकाई पर गिद्ध-दृष्टि तथा लगाम कसे रहने के लिये गवर्नर से अच्छा भला कौन हो सकता था!

ब्रिटिश ताज की रक्षा में अहर्निश जुटे प्रान्तों के यह गवर्नर बड़े मनमानेपन से तथा कुटिलतापूर्वक शासन चलाते थे। इनके सामने विधायिका तथा न्यायपालिका के बड़े अधिकारी भी असहाय तथा बेबस थे। विभिन्न भारत शासन अधिनियमों में इन्हें विधानसभा के द्वारा पारित कानूनों पर वीटो इस्तेमाल करने की शक्ति थी तथा राजस्व एवं टैक्स की वसूली बड़ी बेरहमी तथा बर्बरता से करवाते थे। इसमें इनका स्थानीय जमींदार साथ देते थे जिन्हें 'राय साहब', 'राय बहादुर' आदि की उपाधियों से विभूषित किया जाता था। तत्समय के जमींदारों तथा अधिकारियों से रिश्वत में मिले अवैध धन लेकर जब वे वापस इंग्लैण्ड जाते थे तो जिस ऐशो-आराम का प्रदर्शन करते थे, उसकी अनुगूँज ब्रिटिश पार्लियामेंट तथा प्रेस में होती थी। इनको 'नवाब' कहा जाता था तथा हेय दृष्टि से देखा जाता था। ऐसी संस्था को स्वतंत्र भारत में पल्लवित-पुष्पित न होने देने के लिये संविधान सभा में काफी बहस हुयी तथा इस पद के औचित्य को ही प्रश्नगत किया गया था। सुझाव दिया गया था कि केन्द्र में न सही, प्रान्तों में गवर्नर का चुनाव जनता द्वारा प्रत्यक्ष मतदान से हो लेकिन मुख्यमंत्री व गवर्नर के रूप में दो समानान्तर सत्ता-केन्द्र बनने की आशंका से यह प्रस्ताव नामंजूर कर दिया गया। अन्ततः कनाडा के आदर्श को अंगीकार करते हुये इनकी राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गयी।
संविधान के लागू होने के प्रारम्भिक वर्षों में राज्यपाल की संस्था को लेकर कोई उल्लेखनीय विवाद नहीं हुआ। केन्द्र तथा राज्यों में एक ही पार्टी की सरकारें थीं अतः उसकी गुंजाइश भी कम थी। इन पदों पर दूसरे प्रदेश के अवकाश प्राप्त राजनीतिज्ञ, नौकरशाह तथा विश्वविद्यालयों के कुलपति रहे व्यक्तियों को नियुक्त किया गया। राज्यपालों को राज्य विश्वविद्यालयों का कुलाधिपति भी बनाये रखा गया। इनके मुख्यकार्यों में दीक्षांत समारोहों सहित राज्य के अन्य कार्यक्रमों में अध्यक्षता करना तथा सत्रारम्भ में विधानसभा में औपचारिक अभिभाषण देना शामिल था। सरकारी कार्यों में वे मुख्यमंत्री तथा मंत्रिपरिषद की सलाह और सहायता से बंधे हुये थे तथा यदि किसी मामले पर असहमति होती भी थी तो वह राजभवन की चार दीवारों तक ही सीमित रह जाती थी। चूँकि राज्यपाल दूसरे राज्य से आते थे तथा अधिकतर एकेडमिक होते थे अतः जनमानस में इनके प्रति सम्मान बना रहा।
केन्द्र तथा राज्यों में एक दल का एकाधिकार समाप्त होने, दोनों जगह अलग-अलग दलों की सरकार बनने, संसद तथा प्रान्तीय विधानसभा की अवधि के समय का तारतम्य टूटने, राज्य की विरोधी पक्ष की सरकार को परेशान करने तथा दल-बदल करके उसकी सरकार गिराने आदि के राजनीतिक कारणों से राज्यपाल पद पर काबिज व्यक्ति प्रमुखता पाने लगे तथा इन पर अपवादों को छोड़कर सक्रिय राजनीतिज्ञों की नियुक्ति होने लगी। राज्यों में राष्ट्रपति शासन के दौरान तो राज्यपालों को, अपने ब्रिटिश राज के संस्करणों से भी अधिक शक्ति प्राप्त हो जाती है, अतः धीरे-धीरे इनमें पद, प्रास्थिति तथा प्रतिष्ठा के लिये लिप्सा बढ़ती गयी तथा शक्ति का प्रदर्शन भी खुले आम तथा निर्लज्जता से होने लगा।
भारत में प्रत्येक राज्य में कार्यपालिका अध्यक्ष राज्यपाल है। साधारणतः प्रत्येक राज्य में एक राज्यपाल होता है किन्तु अनुच्छेद 153 के परंतुक के अधीन एक ही व्यक्ति को दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल नियुक्त किया जा सकता है। राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होती है तथा इसके सभी कार्य राज्यपाल के नाम से किये जाते हैं। राज्यपाल, कार्यपालिका शक्ति का प्रयोग या तो स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से करता है। अनुच्छेद 156 के अनुसार राज्यपाल, राष्ट्रपति के 'प्रसाद पर्यन्त' पद धारण करता है तथा पद ग्रहण करने की तारीख से पांच वर्ष तक कार्यरत रहता है। लेकिन इसी अनुच्छेद के परंतुक के अनुसार राज्यपाल, अपने पद की अवधि समाप्त हो जाने पर भी, तब तक पद धारण करता रहेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी पद धारण नहीं कर लेता है। किसी राज्यपाल को एक से अधिक राज्यों का भार दिया जा सकता है तथा वह समयावधि से पूर्व इस्तीफा दे सकता है तथा उसे हटाया जा सकता है। लेकिन इस हेतु राष्ट्रपति की भांति महाभियोग का प्राविधान नहीं है। राज्यपाल को हटाने से पूर्व उसे 'सुनवाई का अवसर' दिये जाने की भी अपरिहार्यता नहीं है। सन् 1989 में केन्द्र में सत्ता परिवर्तन के बाद राज्यपालों के सामूहिक रूप से इस्तीफे मांगे गये थे। राज्यपालों का एक राज्य से दूसरे राज्य में तबादला भी किया जा सकता है तथा ऐसे राज्यपाल अपने कार्यकाल की शेष अवधि ही नयी जगह पर बितायेंगे। इधर हाल के वर्षों में असहज राज्यपालों के साथ ऐसे अप्रिय कदम उठाये गये हैं।
संविधान, केन्द्र को राज्यों में राज्यपालों की नियुक्ति में अनिबन्धित शक्ति देता है तथा राज्यपाल पद पर नियुक्ति हेतु पैंतीस वर्ष आयु का भारतीय नागरिक होना ही एकमात्र अर्हता है। राज्यपाल के पद की शर्तों में उसके द्वारा अन्य कोई लाभ का पद धारण न करना तथा संसद या किसी भी राज्य के विधान मण्डल का सदस्य न होना शामिल है। उसका वेतन तथा परिलब्धियां संसदीय विधि द्वारा निर्धारित होती हैं तथा उन्हें उसकी पदावधि के दौरान कम नहीं किया जा सकता है। वैसे तो राज्यपाल को राज्य में वही स्थान प्राप्त, कहा जाता है जो केन्द्र में राष्ट्रपति को है लेकिन सांविधानिक योजना के तहत वस्तुतः राज्यपाल को उतनी शक्तियां नहीं हैं जितनी राष्ट्रपति को है। उसकी कार्यपालिका शक्ति का विस्तार उन विषयों तक है जिनके सम्बन्ध में इस राज्य के विधान मण्डल को विधि बनाने की शक्ति है। साधारणतः राज्यपाल को सहायता और सलाह देने के लिये एक मंत्रिपरिषद होती है, जिसका प्रधान मुख्यमंत्री होता है तथा वह उसकी सलाह के अनुसार ही कार्य करता है। लेकिन उसकी बाध्यता उतनी व वैसी नहीं है जैसी अनुच्छेद 74 के अन्तर्गत राष्ट्रपति की है। केन्द्र में बिना मंत्रिपरिषद की सलाह के राष्ट्रपति कोई कार्य नहीं कर सकता। राज्यों में अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत बिना मंत्रिमण्डल के प्रशासन सम्भव है। राज्यपाल मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है, अध्यादेशों तथा विधेयकों पर अपनी सहमति देता है अथवा राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित करता है तथा संविधान के विभिन्न प्रावधानों के अन्तर्गत कई अन्य वैवेधिक कार्य करता है। अनुच्छेद 163 (2) के अनुसार यदि कोई प्रश्न उठता है कि कोई विषय ऐसा है या नहीं जिसके सम्बन्ध में इस संविधान द्वारा या इसके अधीन राज्यपाल से यह अपेक्षित है कि वह अपने विवेकानुसार कार्य करे तो राज्यपाल का अपने विवेकानुसार किया गया  विनिश्चय अंतिम होगा और उसके द्वारा की गयी किसी बात की विधिमान्यता इस आधार पर प्रश्नगत नहीं की जायेगी कि उसे अपने विवेकानुसार कार्य करना चाहिए था या नहीं।
जहाँ राष्ट्रपति, संसद तथा राज्य विधान मण्डलों में जनता के प्रतिनिधियों द्वारा चुना जाता है, अर्थात् अप्रत्यक्ष रूप से जनता ही के द्वारा चुना जाता है, वहाँ राज्यपाल को राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अपने अधिपत्र द्वारा नियुक्त करता है और राज्यपाल अपना पद भी राष्ट्रपति के प्रसाद पर्यन्त ही धारण करता है। इस दृष्टि से राज्यपाल केन्द्र का एक प्राधिकारी होता है। उसकी यह स्थिति संविधान की इस स्कीम के अनुकूल है जिसके अनुसार राज्य स्वतंत्र या स्वात्तापूर्ण इकाईयां न होकर, केन्द्र के पर्यवेक्षण और नियंत्रण में काम करने वाली प्रशासनिक इकाईयां हैं जिनकी सरकारों के संविधान के अनुकूल आचरण और संचालन का दायित्व अन्ततः केन्द्र पर है। इस प्रकार राज्यपाल के कर्त्तव्यों और शक्तियों के दो श्रोत हो जाते हैं। एक ओर तो वह राष्ट्रपति की भाँति, राज्य में विधानमण्डल का अभिन्न अंग होता है तथा कार्यपालिका शक्ति का औपचारिक स्वामी होता है, वहीं दूसरी ओर वह राज्य में केन्द्र द्वारा नियुक्त किया गया और केन्द्र के "प्रसाद पर्यन्त" पदाढ़ रहने वाला एक विशिष्ट अधिकारी होता है। उसकी यह दूसरी भूमिका महत्त्वपूर्ण है जो उसे उसके ब्रिटिश संस्करण के समान शक्ति देती है। यदि उसका यह मत हो कि राज्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गयी है जिसमें राज्य का शासन संविधान के उपबन्धों के अधीन नहीं चलाया जा सकता तो उसका कर्त्तव्य होता है कि वह राष्ट्रपति को इस आशय की रिपोर्ट करे। उसकी ऐसी रिपोर्ट के फलस्वरूप राज्य में राष्ट्रपति शासन घोषित किया जा सकता है।
राम जवाया बनाम पंजाब राज्य (ए.आई.आर. 1955 एस.सी. 549) में उच्चतम न्यायालय ने घोषित किया था कि राज्यपाल अपने राज्य में कार्यपालिका प्रमुख की स्थिति रखता है लेकिन वस्तुतः सरकार चलाने का दायित्व मंत्रिपरिषद् को ही होता है। तदनन्तर, शमशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (ए.आई.आर 1974 एस.सी. 2194) में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया कि उन क्षेत्रों में जहाँ राज्यपाल को विवेकाधिकार है, को छोड़कर अन्य क्षेत्रों में वह मंत्रिपरिषद् की सलाह तथा सहायता से कार्य करने के लिये अपेक्षित है। बयालिसवें संविधान संशोधन विधेयक द्वारा राष्ट्रपति को अपनी मंत्रिपरिषद् की सलाह पर कार्य करने को बाध्य कर दिया गया लेकिन राज्यपाल के लिये ऐसा उपबन्ध नहीं किया गया।
राज्यपाल की प्रास्थिति, शक्तियां तथा भूमिका पर हरगोविन्द पन्त बनाम रघुकुल तिलक (ए.आई.आर. 1979 एस.सी. 1109) का वाद उल्लेखनीय है। इस प्रकरण में राजस्थान राज्यपाल पद पर श्री रघुकुल तिलक की नियुक्ति को इस आधार पर चुनौती दी गयी थी कि इससे पूर्व वे राजस्थान लोक सेवा आयोग के सदस्य रह चुके थे। अनुच्छेद 319, आयोग के सदस्यों द्वारा ऐसे सदस्य न रहने पर संघ  या राज्य के अधीन किसी भी नियोजन को प्रतिबन्धित करता है। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश श्री वाई० वी० चन्द्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यों की एक संविधान पीठ ने श्री तिलक की नियुक्ति को वैध ठहराते हुये अभिनिर्धारित किया था कि राज्यपाल का पद सांविधानिक है, उसकी नियुक्ति केन्द्र या राज्य के अधीन नियोजन नहीं है तथा उसकी नियुक्ति इसलिये की जाती है कि वह देखे कि सम्बन्धित राज्य सरकार सांविधानिक उपबंधों के अनुसार चल रही है या नहीं। न्यायालय का कहना था कि इसी कारण उसे कार्यपालिका का अध्यक्ष, विधायिका का अभिन्न अंग तथा विवेकविकारों व विशेषाधिकारों के साथ कुछ सम्प्रभुता सम्बन्धी कार्य भी दिये गये हैं। यहाँ पर रोचक तथ्य यह है कि विवादों से परिपूर्ण श्री तिलक का कार्यकाल बीच में ही समाप्त कर दिया गया तथा सूर्यनारायण बनाम भारत संघ (ए.आई.आर. 1982 राज. 1) के वाद में राजस्थान उच्च न्यायालय ने उनकी बर्खास्तगी को विधि-मान्य ठहराया था।
राज्यपालों द्वारा मुख्यमंत्री नियुक्त करने या उसकी सलाह मानकर विधान सभा भंग करने ऐसे विवेकाधिकार पर कई विवादों में न्यायिक पुनर्विलोकन हुआ है। 21 फरवरी 1998 की मध्य रात्रि में उत्तर-प्रदेश में श्री कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली सरकार को तत्कालीन राज्यपाल श्री रमेश भंडारी ने बर्खास्त कर दिया तथा श्री जगदम्बिका पाल को मुख्यमंत्री की शपथ दिला दी। सब कुछ आनन-फानन में किया गया। उच्चतम न्यायालय ने आदेश दिया कि विधान सभा का विशेष सत्र बुलाकर इन दोनों के बहुमत का परीक्षण किया जाय। श्री कल्याण सिंह द्वारा बहुमत सिद्ध करने पर श्री भंडारी को पद छोड़ना पड़ा। तमिलनाडु में गत विधानसभा चुनावों में अन्नाद्रमुक को भारी विजय पर सुश्री जयललिता दल की नेता चुनी गयीं हालांकि वे सदन की सदस्या होने की अर्हता नहीं रखती थीं। थोड़े ही दिन पूर्व, भ्रष्टाचार के मामले में अपराधी सिद्ध होने के कारण वे चुनाव लड़ने के लिये अयोग्य हो चुकी थीं। इसके बावजूद तमिलनाडु की राज्यपाल न्यायमूर्ति (अवकाश प्राप्त) फातिमा बीवी ने उन्हें मुख्यमंत्री की शपथ दिला दी। बी.आर. कपूर बनाम तमिलनाडु राज्य, (2001) 7 एस.सी.सी. 23 के वाद में उच्चतम न्यायालय ने राज्यपाल के इस कदम को अवैध ठहराया। इससे क्षुब्ध होकर अन्ततः राज्यपाल ने इस्तीफा दे दिया। 1992 में नागालैण्ड के राज्यपाल श्री एम. एम. थामस को भी अल्पमत मुख्यमंत्री की सलाह पर सदन भंग करने तथा उन्हें कार्यवाहक बनाये रखने के कारण बर्खास्त किया गया था। उदाहरण अभी और भी हैं।
राज्यपाल तथा मंत्रिपरिषद् के आपसी सम्बन्ध तथा उसके विवेकाधिकार के कार्यान्वयन पर उच्चतम न्यायालय का अभी थोड़े दिन पूर्व आया फैसला और भी महत्वपूर्ण है। इस निर्णय में यह अभिनिर्धारित किया गया है कि राज्यपाल भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम के अन्तर्गत किसी मंत्री के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति 'स्वविवेक' से दे सकते हैं तथा इस हेतु उन्हें मंत्रिमण्डल की सहायता और सलाह की दरकार नहीं है। न्यायमूर्ति एम० संतोष हेगड़े की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने दूरगामी प्रभाव वाले इस निर्णय में मत व्यक्त किया है कि प्रामाणिक तथ्य एवं विशिष्ट परिस्थितियों में यदि राज्यपाल स्व-विवेक से कार्य नहीं कर पाये तो यह विधि के शासन की विफलता होगी। मध्य-प्रदेश के दो मंत्रियों के खिलाफ लोकायुक्त ने प्रथम-दृष्ट्या मामला मानता पाया था तथा राज्यपाल से अनुरोध किया था कि दण्ड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के अन्तर्गत उनके खिलाफ अभियोजन के लिये अनुमति दें, जिसे राज्यपाल ने मान लिया था। लेकिन उच्च न्यायालय ने इसे अविधिमान्य ठहराया था। उच्चतम न्यायालय ने अपने स्वागत योग्य निर्णय में राज्यपाल के कदम के वैध ही नहीं बल्कि उचित ठहराया, उसकी सांविधानिक स्थिति स्पष्ट की तथा राज्य प्रशासन में उसकी महती भूमिका रेखांकित की है।
प्रशासनिक सुधार आयोग, सरकारिया कमीशन तथा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन द्वारा नियुक्त वेंकटचलैया आयोग आदि ने राज्यपाल के पद को इसी रूप में बनाये रखने की सिफारिश की है लेकिन उसकी नियुक्ति में पारदर्शिता एवं स्थिरता लाने, गैर-राजनीतिक व्यक्ति को चुनने तथा सम्बन्धित राज्य सरकार से परामर्श करने की अपेक्षायें व्यक्त की हैं। यदि लोकसभा तथा राज्य विधान-सभाओं के कार्यकाल पाँच वर्ष स्थिर हो जायें तथा इनके चुनाव एक साथ हों, फिर राज्यपालों की नियुक्ति-पदच्युति के विवाद नहीं होंगे तथा अप्रिय प्रसंगों से मुक्ति मिलेगी।
राज्यपाल के पद को सांविधानिक करार देने, तत्विषयक सांविधानिक दायित्व निर्वहन करने की अपेक्षा करने, लेकिन, राष्ट्रपति के 'प्रसाद पर्यन्त' ही पद पर बने रहने के न्यायालयी निर्णय तथा प्रावधान परस्पर विरोधी प्रतीत होते हैं। निवेदित है कि यदि राजनीतिक शुचिता, नैतिकता, संविधान की सर्वोपरिता, विधि का शासन तथा जनतांत्रिक मानक-मूल्यों का आदर्श पालन किया जाय तो यह आभासी विरोधाभास, स्वतः विलुप्त हो जायेगा तथा राज्यपाल का पद 'सहकारी संघवाद' का अनन्य सेतु सिद्ध होगा। प्रत्येक राज्यपाल अपना पद ग्रहण करने से पहले "अपनी पूरी योग्यता से संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण करने तथा श्रद्धापूर्वक और पूरी निष्ठा से उस राज्य की जनता की सेवा और कल्याण में निरत" रहने की शपथ लेता है, अतः क्षुद्र और संकीर्ण राजनीतिक हितों की परवाह किये बिना उसे संविधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रमाणित करते रहने का अवसर दिया जाना चाहिए।

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