मोबाइलफोन आधुनिक जीवन-शैली की अनिवार्यता बन गया है जबकि वैज्ञानिक परीक्षण इसके निरन्तर उपयोग के दुष्परिणामों की ओर इंगित कर रहे हैं। परीक्षणों से पता चला है कि इनसे निकलने वाली अल्प शक्ति एवं तीव्रता की माइक्रोवेव किरणों से मस्तिष्क में ट्यूमर, कैंसर, हार्टअटैक, अल्जीमर्स बीमारी (जिसमें हाथ-पैर कांपते हैं तथा दिमाग और शरीर का समन्वय बिगड़ जाता है), श्रवण तंत्रिका नष्ट होने, सिरदर्द, थकान, याददाश्त कमजोर होना तथा अनिद्रा ऐसे रोग होते हैं। जो लोग सेलफोन को अपने कमर की बेल्ट में रखते हैं, उनके वीर्य में शुक्राणुओं की कमी होने का आसान खतरा है तथा उनके पुंसत्व का कारण हो सकता है। अभी हाल में आई एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार मोबाइल फोन से निरन्तर उत्सर्जित होने वाले रेडिएशन से मानव की मूलभूत सेलों में डी०एन०ए० का ह्रास होता है जिससे उसकी पहचान तथा अस्तित्व तक खत्म हो सकती है। इन वैज्ञानिक नतीजों ने सनसनी ही नहीं फैलायी है बल्कि एक दुष्चिन्ता को भी जन्म दिया है।
वैसे इन वैज्ञानिक परीक्षणों के उक्त वर्णित प्रारम्भिक अनुमानों तथा आशंकाओं की निर्णायक पुष्टि अभी शेष है क्योंकि ऐसे फोनों का इस्तेमाल शुरू हुये अभी कम समय ही बीता है तथा मानव स्वास्थ्य पर इनके हानिकारक प्रभाव को जांचने-परखने के लिये पर्याप्त समय की आवश्यकता है। लेकिन एक के बाद एक आये ताबड़तोड़ निष्कर्षों ने बहुतों की नींद उड़ा दी है। इंग्लैण्ड में एक महिला ने मोबाइल फोन बनाने वाली एक कम्पनी पर मुआवजे के लिये मुकदमा दायर किया है जिसमें उसने आरोप लगाया है कि मोबाइल के इस्तेमाल से उसको ब्रेन ट्यूमर हो गया है, जिसके इलाज के लिये उसे काफी धनराशि खर्च करनी पड़ी है। महिला का कथन है कि मोबाइल फोन बेचते हुये कम्पनी ने किसी भी प्रकार की सावधानी बरतने की हिदायत नहीं दी थी तथा फोन से उत्सर्जित होने वाली किरणों तथा रेडिएशन के बारे में कोई सूचना नहीं थी। महिला का कहना है कि यदि उसे समय रहते सचेत किया गया होता तो उससे सिर्फ मोबाइल बनाने वाली कम्पनी का दोष नहीं है तथा, इंटरनेट/सैटेलाइट के द्वारा दी जाने वाली टेलीफोनिक सेवा के कारण ही वह सेलफोन कार्य करता है।
मोबाइल फोन से होने वाली क्षति के लिये दायर इस मुकदमे से गत शताब्दी के साठ के दशक में अमेरिका में सिगरेट तथा तम्बाकू के प्रयोग से होने वाले रोगों के विरुद्ध व्यक्तियों तथा स्वयं-सेवी संगठनों द्वारा दायर उन सैकड़ों मुकदमों की याद ताजा कर दी है जो इसके निर्माताओं के विरुद्ध मुआवजे के लिये दायर किये गये थे। वादकर्ताओं का कथन था कि इनसे प्राप्त होने वाले राजस्व के कारण सरकार भी कोई कदम नहीं उठाती। अपना व्यावसायिक हित साधने वाले उत्पादक इसके हानिकारक तत्वों को छिपाते तथा दबाते हैं तथा ऐसे लोक-लुभावन विज्ञापन देते हैं जिससे नये लोग विशेषकर युवा पीढ़ी इनकी तरफ आकर्षित होती है। वादकर्ताओं का यह भी कहना था कि इसमें चिकित्सा व्यवसाय से जुड़े व्यक्तियों के भी स्वार्थ निहित हैं क्योंकि बाद में वे ही इलाज करते हैं। और तो और मीडिया तथा अखबारों को भी नहीं बख्शा गया तथा आरोप लगाया गया था कि विज्ञापन पाने के लालच में वे भी इसके हानिकारक दुष्परिणामों का प्रचार-प्रसार नहीं कर रहे हैं। इन्हीं मुकदमों के परिणाम स्वरूप वैधानिक चेतावनी लिखने, सार्वजनिक स्थानों पर प्रयोग की मनाही करने तथा अल्पवय के बच्चों को बीड़ी-सिगरेट आदि तम्बाकू उत्पाद न बेचने के कानून पारित व लागू किये गये। तदनन्तर इसका अनुसरण भारत में भी हुआ है।
नब्बे के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में 'पेजर' सेवा प्रकाश में आई थी जिसमें सिर्फ दो कोई संदेश भेजा जा सकता था। उस समय यह एकाएक स्टेटस सिम्बल बन गया था तथा लोग पतलून की बेल्ट में इसे बांधे रहते थे। लेकिन शीघ्र ही इनकी जगह मोबाइल फोन ने ले ली जिसमें संदेश भेजने के साथ-साथ धारक से बात करना भी सम्भव है। इसके अत्यधिक खर्चीला होने के कारण आरम्भिक दौर में इसके प्रयोग करने वाले कम थे किन्तु शीघ्र ही यह इतना लोकप्रिय हो गया है कि टैक्सी-ड्राइवर, प्लम्बर, बढ़ई, गैस डिलीवरी मैन सरीखे लोग भी इसका इस्तेमाल करने लगे हैं। अब यह स्टेटस सिम्बल से अधिक आवश्यकता की वस्तु बन गया है तथा निजी खिलाड़ियों के बाजार में आने तथा उनमें गला-काट प्रतिस्पर्धा बढ़ने से इनकी सेवायें सस्ती तथा आम आदमी की पहुँच के भीतर होती जा रही हैं। रिलायंस यह सेवा एक 'पोस्टकार्ड' से भी कम कीमत अर्थात् चालीस पैसे प्रतिमिनट की दर से दे रही है। लोकल और लम्बी दूरी की कालों की दर में भी उत्तरोत्तर कमी की गयी है।
मोबाइल फोनों की लोकप्रियता बढ़ने से इसके उपकरण निर्माण करने वाली कम्पनियां भी उत्साहित हैं तथा इनकी कीमतों में भी भारी गिरावट देखने को मिली है। नित नये आते फोन उपकरणों में एक से बढ़कर एक सुविधायें दी जा रही हैं। यही नहीं, अब इन सेलफोनों के द्वारा संदेश प्रेषण (एस०एम०एस०) तथा बातचीत ही नहीं बल्कि इनमें फिट वेब कैमरों के द्वारा चित्रों का आदान-प्रदान (एम०एम०एस०) सम्भव हो चला है। इन फोन सेटों की मेमोरी क्षमता अधिक होने के कारण चित्रों, संदेशों तथा वार्तालाप को स्टोर तथा इंटरनेट के माध्यम से प्रचारित-प्रसारित भी किया जा सकता है। अभी थोड़े ही दिन पूर्व दिल्ली के एक पब्लिक स्कूल में अल्पवय के छात्र-छात्रा के आपत्तिजनक अवस्था में लिये गये चित्र वेबसाइट पर उपलब्ध थे। इस घटना से शिक्षक, अभिभावक, विद्यार्थी तथा समाज के प्रबुद्ध लोग सकते की स्थिति में हैं। सम्बन्धित वेबसाइट के मालिक की गिरफ्तारी पर अमेरिकी दूतावास ने आपत्ति जताई थी तथा साइबर कानून के शास्त्रियों ने इस विषय में खामियों की ओर ध्यान आकर्षित किया है। फिल्म अभिनेत्री करीना कपूर तथा शाहिद कपूर के उत्तेजक अंतरंग चित्रों को भी ऐसे ही सेलफोन के बैककैमरा से उतारा गया था तथा बाद में टी०वी० चैनल पर प्रसारित किया गया।
मोबाइल फोन के बेजा इस्तेमाल की प्रतिध्वनि उच्चतम न्यायालय तक में सुनाई पड़ी है जब यह बतलाया गया कि उत्तर प्रदेश, बिहार तथा महाराष्ट्र आदि राज्यों की जेलों में निरुद्ध माफिया इन्हीं फोनों के जरिये अपराध करा रहे हैं। मोबाइल फोन के द्वारा रंगदारी टैक्स वसूलने, अपहरण कराके फिरौती मांगने तथा न देने पर हत्या कराने तथा अपने गुर्गों को टेंडर-ठेका दिलाने आदि के किस्से आम हो चुके हैं। न्यायालयों के स्पष्ट आदेश के बावजूद जेलों में इनका प्रयोग रोका नहीं जा सका है। इन आपराधिक गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए जेल के बाहर 'जामर' लगाने की पेशकश की गयी है। ज्ञातव्य है कि जामर प्रणाली से मोबाइल फोनों को निष्क्रिय किया जा सकता है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री आदि अति सुरक्षा प्राप्त हस्तियों के काफिले में भी यह प्रणाली उपयोग की जाती है। चलती गाड़ी, कार, हवाई जहाज आदि में मोबाइल फोन के प्रयोग पर रोक लगायी गयी है। 'राष्ट्रगान' गाते समय या किसी विशिष्ट व्यक्ति के बोलते समय इनके उपयोग पर पाबन्दी है। इसी प्रकार पेट्रोल पम्पों तथा गैस गोदामों में भी इनके प्रयोग से निकलने वाली माइक्रोवेव से आग लगने का खतरा रहता है। कुछ वर्षों पूर्व मोबाइल फोन के द्वारा केन्द्र सरकार के बजट प्रस्तावों के लीक होने की खबर ने तहलका मचाया था। मेडिकल, इंजीनियरिंग तथा प्रबन्धन की प्रवेश परीक्षाओं में इन्हीं फोनों के द्वारा प्रश्नों के उत्तर पाने की खबरें रोज ही सुर्खियों में आती है जिनके कारण इनके उपयोग पर सख्त रोक लगायी गयी है लेकिन सुगम, सुलभ और सस्ती होने के कारण इनकी लोकप्रियता बढ़ती ही जा रही है।
मोबाइल सेवा के बढ़ते दुरुपयोग से आम नागरिकों के एकान्तता के अधिकार पर हमला हो रहा है तथा राज्य की सुरक्षा तथा कानून-व्यवस्था को गम्भीर खतरा है। इनके प्रयोग से स्वास्थ्य पर होने वाले संधातिक दुष्परिणामों ने अब इनके औचित्य पर ही सवाल खड़ा कर दिया है, लेकिन वर्तमान कानून में इसको नियंत्रित करने के लिये उपयुक्त प्रावधान नहीं है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम जीवन और सम्पत्ति के लिये परिसंकटमय माल एवं सेवाओं के विपणन के विरुद्ध संरक्षण का अधिकार देता है। इस अधिनियम के उद्देश्यों में उपभोक्ता की सुरक्षा तथा सूचित किये जाने का अधिकार शामिल है। निर्माताओं तथा सरकार से भी यह अपेक्षित है कि वे उपभोक्ता को शिक्षित करें तथा केवल अपने आर्थिक हितों के लिये जनसाधारण के स्वास्थ्य से खिलवाड़ न करें।
मोबाइलफोन में दोषी सिर्फ सेट निर्माता ही नहीं है बल्कि टेलीफोन सेवायें देने वाली कम्पनियां भी शामिल हैं क्योंकि एक के बिना दूसरी काम ही नहीं कर सकती। भारत संचार निगम एक सरकारी उपक्रम है तथा सारे देश में इसका व्यापक जाल है जिसके द्वारा बेतार प्रणाली से यह सुविधा शुल्क लेकर दी जा रही है। दायित्व निर्धारण में इन सब बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। समय आ गया है कि मोबाइलफोन के उपयोग के दुष्परिणामों से लोगों को अवगत कराया जाय तथा प्रयोग को हतोत्साहित किया जाय। प्राथमिक टेलीफोन अर्थात् लैण्ड-लाइन उपकरण प्रणाली को सस्ता किया जाय तथा प्रोत्साहन हो जिससे समस्या लाइलाज होने से पहले ही ठीक कर ली जाय। इन उपकरणों पर इसके सम्भावित दुष्परिणामों की चेतावनी प्रकाशित करना तथा इनके विज्ञापनों पर रोक लगाना, इस दिशा में पहला कदम हो सकता है।
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