गत दिनों एक जनहित याचिका द्वारा उच्चतम न्यायालय से गुजारिश की गयी है कि वह निर्वाचन आयोग को निर्देश जारी करे कि लोकसभा तथा विधानसभा के चुनावों के मत-पत्र (वोटिंग मशीन) में एक कालम 'उपरोक्त में कोई नहीं' का भी रखा जाय, जिससे मतदाता यदि किसी भी उल्लिखित उम्मीदवार को उपयुक्त न समझे तो अपने मत को अभिव्यक्त कर सके। उच्चतम न्यायालय ने केन्द्र सरकार तथा निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी कर उनकी प्रतिक्रिया चाही है तथा यह भी अपेक्षा की है कि जिन देशों में ऐसी प्रणाली प्रचलित है, वहाँ के अनुभवों के विषय में भी जानकारी दी जाय। वर्तमान मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने स्वयं कुछ दिन पूर्व नकारात्मक वोटिंग प्रणाली लागू करने का सुझाव दिया था। इस प्रणाली को लागू करने के लिए कानून में संशोधन करना होगा, अतः उच्चतम न्यायालय भी केवल अपनी अनुशंसा ही दे सकेगा।
विधि चर्चा
Monday, 6 July 2026
नकारात्मक मताधिकार की पहल'उपरोक्त में कोई नहीं' के निहितार्थ
उर्दू-विश्वविद्यालय की स्थापना के लिये कानून
राज्य मंत्रिमंडल के एक निर्णय के अनुसार रामपुर जनपद में "उत्तर प्रदेश मौलाना मुहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय" की स्थापना के लिये अध्यादेश प्रख्यापित किया जायेगा। विश्वविद्यालय का उद्देश्य "छात्रों को उर्दू, अरबी और फारसी भाषा के शिक्षण एवं अनुसंधान द्वारा उन्नत ज्ञान, प्रज्ञा एवं समझ प्रदान करना होगा"। ज्ञातव्य है कि पिछले ही दिनों उक्त वर्णित नाम से एक विधेयक विधान-सभा में लाया गया था। प्रदेश के राज्यपाल ने इस विधेयक की उस धारा के प्रति आपत्ति जताई थी जिसमें एक वर्तमान कबीना मंत्री को प्रस्तावित विश्वविद्यालय का प्रति-कुलाधिपति बनाने का प्राविधान किया गया है। स्मरण रहे, राज्यपाल को संविधान के अनुच्छेद 175 के अन्तर्गत सदन या सदनों में अभिभाषण का और उनको संदेश भेजने का अधिकार है तथा जिस सदन को कोई संदेश इस प्रकार भेजा गया है, वह सदन उस संदेश पर सुविधाजनक विचार करने के लिये अपेक्षित है। विधान-सभा अध्यक्ष को भेजे अपने संदेश में राज्यपाल ने विधेयक के आपत्तिजनक अंशों पर विशेषतः विचार करने के लिये अनुरोध किया था।
राज्यपाल पद: वैधानिकता एवं सांविधानिक मर्यादा के अंतर्द्वन्द
गत दिनों केन्द्रीय सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा चार राज्यों के राज्यपालों को बर्खास्त कर उनकी जगह नयी नियुक्तियां करने पर खासा विवाद उत्पन्न हुआ है। इस पर जहाँ विपक्षी पार्टियों ने राज्यपाल पद की गरिमा न्यून करने, संघीय संविधान में राज्यों की स्वायत्तता क्षीण करने, एक 'खतरनाक परम्परा' डालने तथा अपने राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति में बाधक कुछ व्यक्तियों को बलि का बकरा बनाने जैसे आरोप लगाये हैं। वहीं सत्तापक्ष की ओर से विचारधारा से तारतम्य न होने, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ जैसे कट्टरवादी संगठन से जुड़ा होने तथा संविधान प्रदत्त अधिकार के अन्तर्गत ही कार्यवाही करने की सफाई पेश की गयी है। सन् 1977 तथा बाद में कई बार सत्ता परिवर्तनों के कारण तत्कालीन केन्द्रीय सरकारों द्वारा काँगेसी राज्यपालों को पदच्युत करने की नजीरें भी पेश की गयी हैं तथा अपने कृत्य के पक्ष में उच्चतम न्यायालय के कई निर्णयों का हवाला देते हुये राज्यपालों को हटाने के अधिकार का औचित्य सिद्ध किया गया है। इन आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच भाजपा सांसद श्री बी०पी० सिंहल ने राष्ट्रपति की इस कार्यवाही की सांविधानिकता को उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका द्वारा चुनौती दी है। इस रिट याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने कोई स्थगन आदेश तो नहीं पारित किया लेकिन इसे विचारार्थ स्वीकार करते हुये केन्द्र तथा सम्बन्धित पक्षों को नोटिस जारी कर मामले की सुनवाई के लिये तारीख तय कर दी है।
डी०एन०ए० परीक्षण तथा कानून
ब्रिटिश बालिका हन्ना फोस्टर के बलात्कार तथा हत्या के आरोप में गिरफ्तार मनिन्दर सिंह कोहली की पहचान डी०एन०ए० परीक्षण द्वारा की गयी। ज्ञातव्य है कि कोहली ने यह अपराध गतवर्ष इंग्लैण्ड में किया था तथा पुलिस को चकमा देकर भारत भाग आया और सुदूरवर्ती कालिम्पोंग जिले में बदले नाम से रह रहा था। उसने अपना चेहरा-मोहरा बदल रखा था तथा स्थानीय लड़की से विवाह रचा लिया था। स्व० हन्ना फोस्टर के माता-पिता ने भारत आकर उनको तस्वीर प्रसारित की और बड़ी धनराशि इनाम में घोषित की। गिरफ्तार किये जाने पर उसने ना-नुकुर की लेकिन अन्ततः डी०एन०ए० परीक्षण के आधार पर उसकी पहचान सिद्ध हुयी।
बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में वैज्ञानिकों ने यह स्थापित कर दिया था कि मानव-रक्त में कुछ गुण ऐसे हैं जो आनुवंशिक तौर पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाते हैं तथा किसी जातक का ब्लड-ग्रुप उसके माता-पिता के रक्त-वर्ग से निश्चित किया जा सकता है। तदनन्तर इनको डाई ऑक्सी न्यूक्लिक एसिड (डी०एन०ए०) मानव रीलो न्यूक्लिक एसिड (आर०एन०ए०) में विभाजित किया गया। परीक्षणों से सिद्ध हुआ कि डी०एन०ए० मानव जाति के वे आधार-भूत तथा मूल गुण-सूत्र हैं जो प्रत्येक व्यक्ति में अलग तथा विशिष्ट होते हैं। पुरुषीय गुणसूत्र उसके शुक्राणुओं में होते हैं तथा स्त्री गुणसूत्र उसके अण्डाणुओं में विद्यमान रहते हैं। पुरुष-स्त्री के सम्मिलन में इनका निषेचन होता है तथा भ्रूण का उदय होता है जो विकसित होकर जातक के रूप में जन्म लेता है। प्रत्येक जातक में उसके माता-पिता के गुणसूत्र आवश्यक रूप से होते हैं और वैज्ञानिक प्रगति के साथ अब इनका परीक्षण सम्भव ही नहीं बल्कि आम हो गया है। मानव शरीर के किसी भी अंग या अवयव, यथा: बाल, ऊतक, रक्त, वीर्य, बलगम, पसीना आदि कहीं से भी इन्हें प्राप्त किया जा सकता है तथा दूसरे से मिलान कर यह जाना जा सकता है कि जातक किसका पुत्र-पुत्री है या जातक के माता-पिता कौन हैं। यही नहीं डी०एन०ए० परीक्षण से जातक का लिंग, आयु तथा प्रजाति भी निर्धारित की जा सकती है।
इधर अमेरिका तथा कई अन्य यूरोपीय देशों में जाने वाले विदेशियों के रक्त-परीक्षण की अनिवार्यता की गयी है। यह एक खतरनाक शुरुआत है क्योंकि ऐसे परीक्षण के दुरुपयोग की भी पर्याप्त सम्भावनाएँ हैं। अतः डी०एन०ए० परीक्षण पर एक अन्तर्राष्ट्रीय कानून की प्रबल आवश्यकता है तथा तात्कालिक कदम की दरकार है।
राष्ट्रपति की क्षमादान-शक्ति के सांविधानिक पहलू
कोलकाता की एक स्कूल छात्रा हेतल पारेख के साथ बलात्कार कर उसकी हत्या करने के दोषी धनंजय चटर्जी की आसन्न फांसी राष्ट्रपति के हस्तक्षेप से रोक दी गयी है। मानव संवेदना से वशीभूत राष्ट्रपति भवन ने केन्द्रीय गृह-मंत्रालय से अनुरोध किया कि धनंजय की क्षमादान याचिका पर पुनर्विचार किया जाय। राष्ट्रपति की इस इच्छा पर कार्यवाही करते हुये उच्चतम न्यायालय ने फांसी के कार्यान्वयन पर फिलहाल रोक लगाने का आदेश पारित कर दिया।
राष्ट्रीय हितों के विपरीत हैं राज्यों के जल-युद्ध
ज्ञातव्य है कि सतलज-यमुना नदियों को जोड़ने के लिये नहर बनवाने को लेकर दिल्ली, हरियाणा तथा पंजाब में एक समझौता हुआ था। लेकिन पंजाब ने अपने हिस्से की यह लिंक नहर बनवाने से यह कह कर इंकार कर दिया कि इससे पंजाब का पानी दूसरे राज्यों में चला जायेगा जब कि वहाँ कृषि कार्यों, सिंचाई तथा बिजली के लिये पानी की भारी किल्लत है। थोड़े समय पूर्व हरियाणा सरकार ने उच्चतम न्यायालय में रिट याचिका दायर कर पंजाब राज्य या केन्द्रीय सरकार को लिंक नहर बनाने के लिये आदेश देने की मांग की थी। न्यायालय ने इस प्रार्थना को स्वीकार भी कर लिया तथा केन्द्र से यह अपेक्षा की कि वह पंजाब के हिस्से की नहर पूरी करने में मदद करे। इससे पहले कि कोई प्रभावी कदम उठाया जाता, पंजाब विधान-सभा ने उक्त विधेयक पारित कर अपने को किसी भी दायित्व से अलग कर लिया।
वृत्तिक, व्यावसायिक रिश्ते के द्वन्द्व
तेरह नवम्बर 1995 को इन्डियन मेडिकल कौंसिल बनाम वी०पी० शान्ता के मुकदमें में निर्णय देते हुये न्यायमूर्ति-त्रयी; कुलदीप सिंह, एस०सी० अग्रवाल तथा बी०एल०हंसारिया की एक पीठ ने चिकित्सकों द्वारा फीस या प्रतिफल लेकर दी जाने वाली मेडिकल सेवाओं को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत आच्छादित करार दिया था। न्यायालय का कहना था कि चिकित्सकीय उपेक्षा या असावधानी के कारण हुयी क्षति के मुआवजे के लिये अधिनियम के अन्तर्गत परिवाद प्रस्तुत किया जा सकता है। भारतीय विधिक इतिहास में मील का पत्थर माने जाने वाले इस निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने चिकित्सकों की सर्वोच्च संस्था इन्डियन मेडिकल कौंसिल की यह दलील ठुकरा दी थी कि डॉक्टर-मरीज का रिश्ता व्यावसायिक है तथा इसे आम सेवाओं के अन्तर्गत व्याख्यायित नहीं किया जाना चाहिए। कौंसिल की यह दलील भी ठुकरा दी गयी थी कि उनके यहाँ दोषी डॉक्टर के खिलाफ शिकायत की जा सकती है तथा वह डॉक्टरों पर अनुशासनेतर कार्यवाही के लिये शक्तियुक्त है। न्यायालय का कहना था कि जब फीस या प्रतिफल लेकर चिकित्सकीय सेवायें दी जाती है तो यह सेवा प्रदाता का कर्त्तव्य है कि वह समुचित सेवायें प्रदान करें तथा उसमें 'कमी' के कारण होने वाली क्षति की क्षतिपूर्ति के लिये तैयार रहे। घोर लापरवाही के लिये आपराधिक दायित्व के विषय में सीधे तो कुछ नहीं कहा गया लेकिन डॉक्टरों से यह अपेक्षा अवश्य की गयी थी कि वे ईलाज करते समय सतर्क रहे तथा लोगों के जीवन को बचाने के लिये अपने ज्ञान, कौशल तथा अनुभव का युक्तियुक्त इस्तेमाल करें।
"वैद्यो नारायणों हरिः" अर्थात वैद्य ही नारायण हरि (भगवान) है, की मानसिकता वाले हमारे इस समाज में चिकित्सकों के प्रति अगाध श्रद्धा तथा सम्मान रहा है। विधिक परिप्रेक्ष्य में भी चिकित्सक तथा रोगी के सम्बन्ध को वैश्वासिक (विश्वास पर आधारित) रिश्ता माना गया है। विधि की अपेक्षा है कि चिकित्सक अपने ज्ञान, कौशल तथा अनुभव का उपयोग बिना किसी भेद-भाव तथा लालच के रोगी को चंगा करने में करेंगे। इस वृत्ति में पदार्पण से पूर्व प्रत्येक चिकित्सक "हिप्पो क्रैटिक शपथ" लेकर ईश्वर को साक्षी मान कर रोगी की सेवा का व्रत लेते हैं तथा प्रार्थना करते हैं कि उन्हें मानवता की सेवा में सतत तल्लीन रहने के लिये शक्ति व सामर्थ्य प्रदान करें। मेडिकल नीतिशास्त्र के अनुरूप प्रत्येक रोगी को यह अधिकार है कि उसे पूरी सूचना दी जाय, इसकी सहमति प्राप्त की जाय तथा उसे स्वास्थ्य सम्बन्धी शिक्षा दी जाय। डॉक्टरों से भी अपेक्षित है कि वे अपना विज्ञापन न करें; अपनी वृत्तिक सेवाओं के लिये ही शुल्क लें तथा कोई रिबेट या कमीशन न प्राप्त करें तथा कोई गोपनीय उपचार न करें। इन वृत्तिक नीतिशास्त्र का कितना पालन हो रहा है- सर्वविदित है। मेडिकल कौंसिल ने अपनी स्थापना के प्रायः पचास वर्षों में एक भी डॉक्टर के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की है।