Monday, 6 July 2026

नकारात्मक मताधिकार की पहल'उपरोक्त में कोई नहीं' के निहितार्थ

 गत दिनों एक जनहित याचिका द्वारा उच्चतम न्यायालय से गुजारिश की गयी है कि वह निर्वाचन आयोग को निर्देश जारी करे कि लोकसभा तथा विधानसभा के चुनावों के मत-पत्र (वोटिंग मशीन) में एक कालम 'उपरोक्त में कोई नहीं' का भी रखा जाय, जिससे मतदाता यदि किसी भी उल्लिखित उम्मीदवार को उपयुक्त न समझे तो अपने मत को अभिव्यक्त कर सके। उच्चतम न्यायालय ने केन्द्र सरकार तथा निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी कर उनकी प्रतिक्रिया चाही है तथा यह भी अपेक्षा की है कि जिन देशों में ऐसी प्रणाली प्रचलित है, वहाँ के अनुभवों के विषय में भी जानकारी दी जाय। वर्तमान मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने स्वयं कुछ दिन पूर्व नकारात्मक वोटिंग प्रणाली लागू करने का सुझाव दिया था। इस प्रणाली को लागू करने के लिए कानून में संशोधन करना होगा, अतः उच्चतम न्यायालय भी केवल अपनी अनुशंसा ही दे सकेगा।

ज्ञातव्य है कि वर्तमान में प्रचलित मताधिकार प्रणाली के अन्तर्गत मत-पत्र (अब वोटिंग मशीन) पर उन उम्मीदवारों के नाम तथा चुनाव-चिह्न होते हैं जो उस सीट पर प्रत्याशी होते हैं। मतदाता को उनमें से एक के सामने मोहर लगानी होती है या बटन दबाना होता है। यदि वह दो या अधिक पर मोहर लगाता है या किसी को वोट नहीं देता है तो उसका मत-पत्र अवैध घोषित कर दिया जाता है। वोटिंग मशीन प्रयुक्त होने के बाद से अवैध वोटों की संख्या में कमी आ गयी है। यदि नकारात्मक मतदान की अनुमति हुयी तो मतदाता को लड़ने वाले प्रत्याशियों की अनुपयुक्तता बताने का अवसर मिलेगा तथा यदि बहुमत में ऐसे वोट पड़े तो दुबारा चुनाव प्रक्रिया प्रारम्भ करनी पड़ेगी तथा राजनैतिक दलों को नये उम्मीदवार खड़े करने पड़ेंगे। जिन देशों में यह प्रणाली लागू है वहाँ भी नियम है कि यदि 'निगेटिव' वोटों की संख्या जीतने वाले को मिले वोटों से अधिक है, तब भी दुबारा प्रक्रिया प्रारम्भ की जाती है। इस प्रणाली के लागू होने से राजनैतिक दलों में सतर्कता बढ़ेगी तथा अपनी साख को कायम रखने के लिए साफ-सुथरी छवि वाले लोगों को टिकट देना अनिवार्य हो जायेगा। निश्चित तौर पर यह एक स्वागत योग्य कदम होगा।
भारतीय संविधान अधिनियमित होने के बाद चौदह आम चुनाव हो चुके हैं तथा देश में बहु-दलीय प्रणाली का प्रजातंत्र है। प्रारम्भ में देश सेवा का व्रत लिये तथा स्वतंत्रता संग्राम के तपे-तपाये नेता राजनीति में थे लेकिन धीरे-धीरे इसमें अपराधी तथा न्यस्त स्वार्थ के तत्वों की घुसपैठ हो गयी। प्रायः सभी दलों में माफिया, भ्रष्टाचारी तथा सार्वजनिक धन-सम्पत्ति पर ऐश करने वाले लोग अपनी पहुँच बना चुके हैं तथा त्यागी, दल की नीतियों में आस्था रखने वाले तथा लोगों को नेतृत्व देने की क्षमता रखने वाले हाशिये पर चले गये हैं। चुनाव हेतु समर्पित कार्यकर्ताओं की बजाय अधिक बोली लगाने वाले लोगों को टिकट दिये जा रहे हैं तथा टिकट आवंटन का मुख्य आधार प्रत्याशी की जीतने की क्षमता हो गया है। अभी तक धर्म, जाति, क्षेत्र, भाषा, स्थानीयता आदि के नाम पर वोट माँगे जाते थे, अब बाहुबल तथा धनबल के सहारे चुनावों का 'प्रबंधन' होता है। एक सामान्य मतदाता दिग्भ्रमित है तथा 'साँपनाथ' या 'नागनाथ' में एक को चुनना उसकी नियति हो चुकी है। कोई आश्चर्य नहीं कि बहुत से मतदाता सिर्फ इसलिये वोट डालने नहीं जाते क्योंकि वे मैदान में लड़ रहे उम्मीदवारों में किसी को भी अपना प्रतिनिधि नहीं चुनना चाहते। कई बार मत-पत्रों पर संश लिखकट अपनी कुंठा और लाचारी का इजहार किया भी जाता है तथा वह मीडिया के द्वारा प्रचारित और प्रसारित होता है लेकिन मत-पत्र तो अवैध हो ही जाता है। नकारात्मक मतदान की अनुमति होने से ऐसी इच्छा को भी वैधानिकता, सम्मान तथा मान्यता प्राप्त होगी।
संविधान के लागू होने के समय ही सार्वभौमिक बालिग मताधिकार प्रदान करना संविधान निर्माताओं की परिपक्व बुद्धि का परिणाम थी। जनतंत्र का मुख्य आधार सभी नागरिकों का कानून के समक्ष समता का अधिकार होता है। जनतंत्र अपने शासकों को चुनने के लिये आनुवंशिकता को मान्यता नहीं देता तथा सम्प्रभु जनता चुनाव द्वारा अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करती है। चुनाव जनतंत्र की कुंजी है, तथा एक सभ्य राष्ट्र की जागरूकता का प्रतिबिम्ब है। पिछले कई आम चुनावों से जो तस्वीर उभर कर आई है वह निराशाजनक है। वोट डालने के अर्ह लोगों का पंजीकरण नहीं होता तथा बहुधा लोगों के नाम वोटर लिस्ट में नहीं मिलते। जिनके नाम होते भी हैं, उनमें आधे लोग मतदान स्थल तक नहीं जाते। यदि यह मान भी लिया जाय कि चुनाव स्वतंत्र तथा निष्पक्ष होते हैं तथा बूथ कैप्चरिंग, बोगस वोटिंग तथा दूसरों के नाम पर कोई अन्य वोट नहीं डालता, फिर भी जीतने वाला अभ्यर्थी पड़े हुये वोटों का अल्पमत ही पाता है। इसके अलावा मतदाताओं को प्रत्याशी चुनने का अधिकार नहीं होता क्योंकि वे राजनैतिक दलों द्वारा थोपे जाते हैं। देश के प्रायः सत्तर करोड़ मतदाताओं में अधिकांश निरक्षर, गरीब तथा पिछड़े हैं तथा जनतंत्र में अपनी स्थिति से अनभिज्ञ हैं।
भारतीय चुनाव प्रणाली में सुधार की पड़ताल और अनुशंसा के लिये गोस्वामी समिति (1990); इन्द्रजीत गुप्ता समिति (1998) तथा हाल में नियुक्त वेंकट चलैया आयोग (2000) ने सिफारिशें की हैं जिन्हें अमली जामा पहनाना अभी शेष है। पिछले तथा वर्तमान चुनाव आयुक्त भी समय-समय पर सुझाव देते रहते हैं लेकिन स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। आज स्थिति यह आ गयी है कि जेल की चहार दीवारी के अंदर से चुनाव लड़े व जीते जा रहे हैं तथा बाहुबलियों के संसदीय क्षेत्र के मतदाता टी०वी० कैमरे के सामने कुछ भी विपरीत बोलने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं। द्वि-दलीय प्रणाली विकसित करने, पार्टियों के भीतर आंतरिक जनतंत्र मजबूत करने तथा अन्यथा कारणों से चुनाव लड़ने वालों पर रोक लगाने के प्रयास बेमानी सिद्ध हो चुके हैं। चुनाव से आम आदमी का मोह भंग हो चुका है तथा वह इसी स्थिति को अपनी नियति मान बैठा है।
गत वर्ष उच्चतम न्यायालय ने चुनाव आयोग को निर्देश जारी कर यह आवश्यक कराया था कि चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार अपनी चल-अचल सम्पत्ति, शैक्षिक योग्यता तथा न्यायालयों में अपने खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमों का ब्यौरा सार्वजनिक करे। पिछले चुनावों में दी गयी इन सूचनाओं के आधार पर इनकमटैक्स विभाग सक्रिय हुआ है तथा आय एवं सम्पत्ति पर टैक्स आदि के लिये नोटिसें जारी हुयी हैं। बिहार, झारखण्ड, हरियाणा में आसन्न चुनावों से ठीक पहले उन प्रत्याशियों को धर दबोचा गया जिनके विरुद्ध हत्या, अपहरण, डकैती आदि जघन्य अपराध के मुकदमें दर्ज हैं।
भारतीय जनतंत्र के त्यौहार समझे जाने वाले इन चुनावों में हिंसा, धनबल तथा बाहुबल का नंगा नाच हो रहा है तथा मतदाताओं की उदासीनता बढ़ रही है, ऐसे में नकारात्मक मतदान कितना सहायक होगा, यह अन्तिम रूप से नहीं कहा जा सकता। कई बार गाँव-मोहल्ले के अति उत्साही मतदाता चेतावनी लिखवाकर टांग देते हैं तथा चुनाव का बहिष्कार करते हैं जिससे प्रत्याशियों को सबक मिले। लेकिन इसके भी उत्साह जनक परिणाम नहीं आये हैं। एक स्वस्थ जनतंत्र की स्थापना के लिये नागरिकों की सहभागिता अत्यन्त महत्वपूर्ण है। उन्हें यह विश्वास होना चाहिए कि उनके मतपत्र में व्यवस्था बदल देने की शक्ति है तथा उनकी सामूहिक शक्ति के आगे अनुचित साधन अपनाने वाले लोग बौने और कमजोर हैं। दरअसल समय आ गया है कि मतदान अनिवार्य किया जाय तथा जीतने वाले उम्मीदवार के लिये बहुमत पाना अपरिहार्य हो। सभी राजनैतिक दलों को इसके लिये सहमत होना पड़ेगा। जब तक मतदान का प्रतिशत नहीं बढ़ता, नकारात्मक मतदान केवल कुछ की इच्छा की अभिव्यक्ति बनकर रह जायेगा तथा बेअसर होगा।

 
 

उर्दू-विश्वविद्यालय की स्थापना के लिये कानून

 राज्य मंत्रिमंडल के एक निर्णय के अनुसार रामपुर जनपद में "उत्तर प्रदेश मौलाना मुहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय" की स्थापना के लिये अध्यादेश प्रख्यापित किया जायेगा। विश्वविद्यालय का उद्देश्य "छात्रों को उर्दू, अरबी और फारसी भाषा के शिक्षण एवं अनुसंधान द्वारा उन्नत ज्ञान, प्रज्ञा एवं समझ प्रदान करना होगा"। ज्ञातव्य है कि पिछले ही दिनों उक्त वर्णित नाम से एक विधेयक विधान-सभा में लाया गया था। प्रदेश के राज्यपाल ने इस विधेयक की उस धारा के प्रति आपत्ति जताई थी जिसमें एक वर्तमान कबीना मंत्री को प्रस्तावित विश्वविद्यालय का प्रति-कुलाधिपति बनाने का प्राविधान किया गया है। स्मरण रहे, राज्यपाल को संविधान के अनुच्छेद 175 के अन्तर्गत सदन या सदनों में अभिभाषण का और उनको संदेश भेजने का अधिकार है तथा जिस सदन को कोई संदेश इस प्रकार भेजा गया है, वह सदन उस संदेश पर सुविधाजनक विचार करने के लिये अपेक्षित है। विधान-सभा अध्यक्ष को भेजे अपने संदेश में राज्यपाल ने विधेयक के आपत्तिजनक अंशों पर विशेषतः विचार करने के लिये अनुरोध किया था।

राज्यपाल की आपत्ति तथा इस पर उपजे राजनीतिक विवाद को दृष्टिगत रखते हुये प्रदेश सरकार ने विधेयक वापस ले लिया, क्योंकि उसे शंका थी कि वह इसे उस रूप में पारित नहीं करा पायेगी। इस बीच मुख्य विरोधी दल ने प्रस्तावित विश्वविद्यालय के गठन का ही विरोध किया तथा इसे वोट की राजनीति से प्रेरित करार दिया। सरकार के एक सहयोगी दल ने गठन के औचित्य पर तो प्रश्न नहीं किया लेकिन सक्रिय राजनीतिज्ञ को विश्वविद्यालय का आजीवन प्रति-कुलाधिपति बनाने पर एतराज दर्ज कराया है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि उ० प्र० राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 के अन्तर्गत केवल सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय में वाराणसी के महाराजा विभूति नारायण सिंह को आजीवन प्रति-कुलाधिपति बनाये जाने का प्रावधान रहा है। इसके अलावा किसी अन्य विश्वविद्यालय में प्रति-कुलाधिपति का पद सृजित नहीं है। ज्ञातव्य है कि राज्य विश्वविद्यालयों में राज्यपाल पदेन कुलाधिपति होता है तथा वास्तविक कार्यपालिका शक्ति कुलपति के पास रहती है। प्रति-कुलाधिपति की शक्तियाँ उक्त अधिनियम तथा उसके परिनियमों में निर्धारित किया जाना शेष है। फिलहाल कुलाधिपति की अनुपस्थिति में उसे सभा के अधिवेशनों तथा दीक्षान्त समारोह में सभापतित्व का अधिकार ही दिया गया है।
शिक्षा, जिसमें उच्चतर शिक्षा शामिल है, संविधान की समवर्ती सूची का विषय है तथा इस पर केन्द्र तथा राज्यों को कानून बनाने का अधिकार है। उच्चतर शिक्षा या अनुसंधान संस्थाओं में तथा वैज्ञानिक और तकनीकी संस्थाओं में मानकों का समन्वय और अवधारण केन्द्र सूची का विषय है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग इसी के अन्तर्गत गठित किया गया है जो विभिन्न केन्द्रीय तथा राज्यीय विश्वविद्यालयों पर नियंत्रण और नियमन करता है। विश्वविद्यालयों की स्थापना विशिष्ट अधिनियमों को पारित कर की जाती है तथा इन पर केन्द्र तथा, यथा स्थिति, राज्यों का नियंत्रण रहता है। पाठ्यक्रम निर्धारण तथा तत्विषयक पाठन-पाठन के क्षेत्र में इन्हें स्वायत्तता रहती है। ज्ञातव्य है कि केन्द्रीय सरकार के अधिनियमों द्वारा महात्मा गाँधी अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय तथा मौलाना अबुल कलाम आजाद उर्दू विश्वविद्यालय या संस्थान स्थापित किये जा चुके हैं। संस्कृत तथा कई क्षेत्रीय भाषाओं के उन्नयन के लिये भी विश्वविद्यालयों या संस्थान स्थापित है जिन्हें मानित विश्वविद्यालय का दर्जा दिया गया है।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 123 तथा 213 में क्रमशः राष्ट्रपति तथा राज्यपाल को अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्राप्त है। दोनों अनुच्छेदों की भाषा एक सी है तथा इसे विधि निर्माण की 'आपात् शक्ति' कहा जाता है। इस आपात् विधायी शक्ति का उपयोग उस समय किया जाता है जब विधान-मण्डल सत्र में न हो तथा ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो जायें जिसके अन्तर्गत तुरन्त कार्यवाही अपरिहार्य हो। विधान-मण्डल द्वारा निर्मित विधि को अधिनियम का नाम दिया जाता है तो राज्यपाल द्वारा निर्मित इस विधि को अध्यादेश का। बल एवं प्रभाव की दृष्टि से इन दोनों में कोई अन्तर नहीं होता है। अध्यादेश जब तक प्रर्वतन में रहता है, तब तक वही बल एवं प्रभाव होता है जो अधिनियम का होता है। संविधान के अनुच्छेद 13(3)(क) में अध्यादेश को 'विधि' शब्द में सम्मिलित माना गया है। सामान्य अधिनियम तथा अध्यादेश में यदि कोई अन्तर है तो वह कालावधि का है। अध्यादेश को निश्चित समयावधि के भीतर विधानमण्डल से पारित कराना आवश्यक है, नहीं तो वह प्रभावी नहीं रहता है। इसी प्रकार का उपबन्ध भारत शासन अधिनियम,1935 की धारा 72 में भी था जो गवर्नर-जनरल को अध्यादेश प्रख्यापित करने की शक्ति प्रदान करता था। संविधान सभा में डॉ० अम्बेडकर ने अचानक उत्पन्न हुयी स्थिति से निपटने के लिये कार्यपालिका को ऐसी विधायन की शक्ति से श्री-सम्पन्न करना आवश्यक बतलाया था। राष्ट्रपति तथा राज्यपाल की अध्यादेश निर्गत करने की शक्ति पर नियंत्रण के लिये शर्तें संविधान में ही वर्णित कर दी गयी हैं।
लोकतांत्रिक देश के कार्यपालिका प्रमुख से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपनी इस शक्ति का प्रयोग जनहित एवं देशहित में करें। सामान्यतः अध्यादेश मंत्रिपरिषद की सलाह पर प्रख्यापित किया जाता है तथा न्यायालय राज्यपाल के समाधान के कारणों की पर्याप्तता की जांच नहीं कर सकता है। राज्यपाल उन्हीं विषयों या मदों पर अध्यादेश जारी कर सकता है जिस पर राज्य को विधान अधिनियमित करने की शक्ति है। जिन विषयों पर राष्ट्रपति के अनुमोदन की अपरिहार्यता है या जिन पर राज्यपाल अनुमोदन लेना आवश्यक समझे, वहाँ अध्यादेश प्रख्यापन से पूर्व तत्सम्बन्धी औपचारिकता का निर्वहन अनिवार्य है।
डी.सी. वाधवा बनाम बिहार राज्य (1987) में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया था कि अध्यादेश प्रख्यापन केवल उसी दशा में किया जाना चाहिये जब विधान-मंडल के सदन सत्र में न हों तथा विधान अत्यन्त अपरिहार्य हो। विधायन का दायित्व विधायिका को सौंपा गया है तथा उसका अतिलंघन कर अध्यादेश के द्वारा कानून बनाना या उसे बनाये रखना संविधान के शब्दों तथा आत्मा के साथ 'कपट' है। इस मुकदमें में उच्चतम न्यायालय के समक्ष यह सिद्ध कर दिया गया था कि बिहार राज्य में अनेकों अध्यादेश बारह से पन्द्रह वर्ष तक बार-बार लागू किये जाते रहे तथा उनको अधिनियम में बदलने का प्रयास ही नहीं किया गया।
बैंक राष्ट्रीयकरण को चुनौती देने वाली याचिका (1970) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया था कि राष्ट्रपति के समाधान की वास्तविकता को न्यायालय में सम्भवतः इस आधार पर चुनौती दी जा सकती है कि वह असद्भावनापूर्ण था। असद्भावनापूर्ण में वे प्रकरण आ जायेंगे जिसमें विधायिका में बहस करने से बचने, विधेयक पर मत-विभाजन में हार की आशंका होने अथवा अन्य कोई अन्यथा कारण से विधान मंडल में जाने से गुरेज करना सम्मिलित है। किसी अध्यादेश की सांविधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर विचार करते हुये न्यायालय इस बात से संतुष्ट होना चाहेगी कि आक्षेपित अध्यादेश को तुरंत जारी करने की अपरिहार्यता थी, तथा वह किसी अन्यथा उद्देश्य से नहीं जारी किया गया। 1984 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने उत्तर-प्रदेश के राज्यपाल द्वारा जारी किये गये उ० प्र० राजभाषा अधिनियम (संशोधन) तृतीय अध्यादेश (उर्दू अध्यादेश) को इसी आधार पर असंवैधानिक घोषित कर दिया था कि अनुच्छेद 213 में राज्यपाल के समाधान की शर्तें पूरी नहीं होतीं। न्यायालय का कहना था कि अध्यादेश जारी करने के समय तुरन्त कार्यवाही के लिये बाधित करने वाली परिस्थितियां होनी चाहिए। न्यायालय का कथन था कि विधान-मण्डल द्वारा सदनों के सत्र में न होने के कारण विधि बनाना सम्भव न हो, तभी अध्यादेश निर्गत किया जाना चाहिए।
किसी भी विश्वविद्यालय की स्थापना रातों-रात नहीं की जा सकती। उसे बनने तथा अपनी पहचान बनाने में वर्षों लगते हैं। वैसे भी इस प्रस्तावित विश्वविद्यालय के लिये अभी भूमि अर्जन तथा उस पर भवन बनाने आदि का कार्य होना प्रारम्भ नहीं हुआ है। विश्वविद्यालय की प्रथम नियमावली तथा प्रथम अध्यादेश भी प्रस्तावित विधेयक के साथ नहीं संलग्न किये गये हैं। विधेयक की धारा एक के अनुसार यह ऐसे दिनांक को प्रवृत्त होगा जिसे राज्य सरकार गजट में अधिसूचना द्वारा नियत करेगी। इन तथ्यों के बावजूद अध्यादेश को निर्गत कराने में इतनी जल्दबाजी तथा हड़बड़ी किसी अन्यथा उद्देश्य की ओर ही इंगित कर रही है।
उत्तर-प्रदेश मौलाना मुहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय विधेयक, 2004 विधान सभा के गत् सत्र में लाया गया था लेकिन राज्यपाल द्वारा अनुच्छेद 175 के अन्तर्गत एक व्यक्ति विशेष को आजीवन प्रति-कुलाधिपति बनाये जाने के प्रावधान पर अपनी आपत्ति की तथा माननीय विधायकों को संदेश दिया कि विधेयक के गुणागुण पर विचार करते समय इस पर भी विचार करें। इस विधेयक को वापस लेकर फिर उसी प्रारूप में एक अध्यादेश के रूप में प्रख्यापित कराने का निर्णय एक स्वस्थ जनतांत्रिक परम्परा नहीं है तथा संविधान व राज्यपाल की संस्था के प्रति असमान का परिचायक है।
जनता पार्टी शासन काल में उस दिन की संसद की बैठक उठने के बाद बड़े मूल्य के करेंसी नोटों के विमुद्रीकरण का अध्यादेश जारी किया गया था। इसकी सांविधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका में कहा गया था कि इस अध्यादेश को सदन से पारित कराने में महज 12-14 घंटे लगते तथा तब तक इंतजार किया जाना चाहिए था। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने इस तर्क को अस्वीकारते हुये निर्धारित किया था कि ऐसी परिस्थितियां हो सकती हैं जिससे इतनी देर भी घातक हो जाये। क्योंकि जैसे ही लोगों को पता चलता कि विमुद्रीकरण होने जा रहा है वैसे ही वे अपना "काला धन" इधर-उधर कर देते तथा अध्यादेश अपने उद्देश्य की पूर्ति में असफल हो जाता। लेकिन यह तर्क विश्वविद्यालय की स्थापना करने वाले कानून पर लागू नहीं किया जा सकता। बेहतर हो यदि विधानसभा के नियमित सत्र में राज्यपाल के संदेश पर विचार-विनिमय के उपरान्त ही ऐसा विधेयक पारित कराया जाय जिससे जन-प्रतिनिधियों व जनतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास व आस्था दिखलाई पड़ती रहे।

 

राज्यपाल पद: वैधानिकता एवं सांविधानिक मर्यादा के अंतर्द्वन्द

 गत दिनों केन्द्रीय सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा चार राज्यों के राज्यपालों को बर्खास्त कर उनकी जगह नयी नियुक्तियां करने पर खासा विवाद उत्पन्न हुआ है। इस पर जहाँ विपक्षी पार्टियों ने राज्यपाल पद की गरिमा न्यून करने, संघीय संविधान में राज्यों की स्वायत्तता क्षीण करने, एक 'खतरनाक परम्परा' डालने तथा अपने राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति में बाधक कुछ व्यक्तियों को बलि का बकरा बनाने जैसे आरोप लगाये हैं। वहीं सत्तापक्ष की ओर से विचारधारा से तारतम्य न होने, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ जैसे कट्टरवादी संगठन से जुड़ा होने तथा संविधान प्रदत्त अधिकार के अन्तर्गत ही कार्यवाही करने की सफाई पेश की गयी है। सन् 1977 तथा बाद में कई बार सत्ता परिवर्तनों के कारण तत्कालीन केन्द्रीय सरकारों द्वारा काँगेसी राज्यपालों को पदच्युत करने की नजीरें भी पेश की गयी हैं तथा अपने कृत्य के पक्ष में उच्चतम न्यायालय के कई निर्णयों का हवाला देते हुये राज्यपालों को हटाने के अधिकार का औचित्य सिद्ध किया गया है। इन आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच भाजपा सांसद श्री बी०पी० सिंहल ने राष्ट्रपति की इस कार्यवाही की सांविधानिकता को उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका द्वारा चुनौती दी है। इस रिट याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने कोई स्थगन आदेश तो नहीं पारित किया लेकिन इसे विचारार्थ स्वीकार करते हुये केन्द्र तथा सम्बन्धित पक्षों को नोटिस जारी कर मामले की सुनवाई के लिये तारीख तय कर दी है।

ज्ञातव्य है कि गत मई में केन्द्र में सत्ता परिवर्तन के बाद ही भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन द्वारा नियुक्त राज्यपालों पर स्वयं पद छोड़ने की अपेक्षा व्यक्त की जा रही थी। अन्त में केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने स्पष्ट शब्दों में इनसे इस्तीफा देने की मांग की और जब इसका पालन नहीं हुआ तो उसकी तार्किक परिणति बर्खास्तगी में हुयी। वैसे तो प्रायः सभी राज्यों में राजग द्वारा नियुक्त राज्यपाल कार्यरत हैं लेकिन फिलहाल आर०एस०एस० की पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को ही हटाया गया है तथा राजस्थान के राज्यपाल श्री मदन लाल खुराना ऐसों को नहीं छुआ गया है जो भाजपा के टिकट पर विधायक, सांसद, तथा मुख्यमंत्री तक रह चुके हैं। इसके पीछे मंतव्य यही सिद्ध किया जाने का प्रयास है कि विरोधी राजनैतिक दलों से कोई दुराव नहीं है। जबकि संघ परिवार की ओर से आरोप किया गया है कि आर०एस०एस० कोई प्रतिबन्धित संगठन नहीं है तथा इसका सदस्य होना गैरकानूनी नहीं है।
भारत राज्यों का संघ है। राज्य इसकी अविभाज्य इकाईयाँ हैं। राज्य संघ से कभी अलग नहीं हो सकते। राजनैतिक एवं प्रशासनिक दृष्टि से यहाँ केन्द्र और राज्य में दोहरी शासन व्यवस्था है। देश का अध्यक्ष राष्ट्रपति होता है जिसमें कार्यपालिका की समस्त शक्तियाँ निहित होती हैं। राज्यों में उसी प्रकार राज्यपाल है। अंतर इतना है कि जहाँ राष्ट्रपति का निर्वाचन होता है वही राज्यपाल की नियुक्ति की जाती है। संविधान के अनुच्छेद 155 के अनुसार उसकी राष्ट्रपति का निर्वाचन होता है वही राज्यपाल की नियुक्ति की जाती है। राष्ट्रपति कार्यभार ग्रहण की तारीख से पांच वर्ष तक पद पर रहता है तथा इससे पूर्व संविधान के अतिक्रमण के लिये अनुच्छेद 61 में विहित प्रक्रिया द्वारा 'महाभियोग' लगाकर हटाया जा सकता है। वहीं राज्यपाल, राष्ट्रपति के 'प्रसाद पर्यन्त' पद धारण करता है। इसका तात्पर्य यह है कि वह अपने पद पर तभी तक रह सकता है, जब तक कि केन्द्रीय कार्यपालिका का विश्वास उसे प्राप्त हो।
संविधान सभा में कुछ सदस्यों ने यह प्रस्ताव किया था कि राज्यपाल राज्य की जनता द्वारा निर्वाचित होना चाहिए, जैसा कि संयुक्त राज्य अमेरिका में होता है। कुछ ने यह सुझाव दिया कि राज्यपाल राज्य के विधानमंडल द्वारा निर्वाचित होना चाहिए। परन्तु अन्त में संविधान-निर्माताओं ने कनाडियन पद्धति को अपनाते हुये यह उपबन्ध किया कि राज्यपाल की नियुक्ति की जाय। इसका मुख्य उद्देश्य केन्द्र को अधिक शक्तिशाली बनाना था। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि स्वतंत्रता से पूर्व भी प्रांतों में गवर्नर की नियुक्ति ब्रिटिश ताज द्वारा होती थी तथा वे राजा के प्रति सीधे जवाबदेह होते थे।
राज्यपाल का संविधान के अन्तर्गत बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। वह सम्बन्धित राज्य का राज्याधिपति होता है और साथ ही केन्द्र के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है। संसदीय प्रणाली का सामान्य नियम यही है कि राज्यपाल को मन्त्रिपरिषद की मंत्रणा के अनुसार ही कार्य करना चाहिए, अपने विवेक से नहीं। परन्तु अनुच्छेद 164 में यह स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है कि कतिपय मामलों में राज्यपाल से अपेक्षा की गयी है कि वह स्वविवेक से कार्य करें, मन्त्रिपरिषद की राय से नहीं। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि यदि कोई प्रश्न उठता है कि कोई विषय ऐसा है या नहीं जिसके सम्बन्ध में राज्यपाल से अपेक्षित है कि वह स्वविवेक से कार्य करे तो अनुच्छेद 163(2) के अनुसार राज्यपाल का स्वविवेक से किया हुआ विनिश्चय अन्तिम होगा तथा राज्यपाल द्वारा की गयी किसी बात की मान्यता पर इस कारण से कोई आपत्ति नहीं की जा सकती कि उसे स्व-विवेक से कार्य करना या नहीं करना चाहिए था। इन कार्यों में मुख्यमंत्री तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति, मन्त्रि-परिषद को पद-च्युत करना, विधान-सभा का विघटन, राष्ट्रपति के विचारार्थ विधेयकों को रक्षित करना आदि शामिल हैं। इसके अतिरिक्त केन्द्र के प्रतिनिधि की हैसियत से उस पर यह दायित्व है कि वह केन्द्रीय सरकार को राज्य की सभी बातों से अवगत कराये जिससे कि केन्द्र अनुच्छेद 355 के अन्तर्गत अपना कर्त्तव्य निभा सके। जब कभी वह समझता है कि राज्य में सांविधानिक तंत्र विफल हो गया है तो इसकी सूचना राष्ट्रपति को देता है जो अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत उद्घोषणा जारी कर सकता है। इसके अलावा राज्यपाल राज्य विधान मंडल के कानूनों पर भी ध्यान रखता है और किसी भी विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ रक्षित कर सकता है। इस प्रकार संघ सरकार के लिये राज्यपाल के कृत्य अत्यन्त महत्वपूर्ण होते हैं - विशेष रूप से जब केंद्र और राज्य की सरकारें एक ही दल या गठबन्धन की न हों।
उक्त सांविधानिक प्रावधानों से स्पष्ट है कि राज्यपाल पद पर आसीन व्यक्ति से देश और केंद्रीय सरकार को कई अपेक्षायें हैं। संविधान में राज्यपाल की पदावधि पांच वर्ष के लिये निर्धारित है तथा यह भी प्राविधानित है कि वह इस पद पर तब तक बना रहेगा जब कि इसके उत्तराधिकारी की नियुक्ति नहीं हो जाती। संविधान में राष्ट्रपति, उच्चतम तथा उच्च न्यायालयों के न्यायमूर्तियों, लोकसभा आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्यों तथा निर्वाचन आयोग के सदस्यों आदि के हटाये जाने की प्रक्रिया विहित की गयी है। केन्द्र तथा राज्य सरकार के कर्मचारियों की पदच्युति तथा पदावनति से सम्बन्धित प्रक्रिया का भी अनुच्छेद 311 में उल्लेख है लेकिन राज्यपाल के विषय में संविधान मूक है। इसीलिये कतिपय राजनेता यह कह रहे हैं कि राज्यपालों को इनकी पदावधि पूर्ण होने से पूर्व केवल 'संविधान के अतिक्रमण' के आधार पर ही हटाया जा सकता है और वह भी संसद के दोनों सदनों का अनुमोदन प्राप्त करके। इनको हटाने से पूर्व नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों के अनुसार सुनवाई का एक अवसर तो प्रत्येक दशा में दिया जाना चाहिए।
राज्यपाल की संवैधानिक स्थिति को जानने के लिये हरगोविन्द वर्मा बनाम रघुकुल तिलक (1979) का वाद विशेष उल्लेखनीय है जो उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णीत हुआ था। इस वाद में श्री रघुकुल तिलक के राजस्थान के राज्यपाल नियुक्त किये जाने को इस आधार पर चुनौती दी गयी थी कि इससे पूर्व वे राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्य रह चुके थे तथा अनुच्छेद 319 के अन्तर्गत भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन किसी भी नियोजन के लिये अपात्र थे। इस वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया था कि राज्यपाल का पद संवैधानिक है तथा यह केंद्रीय या राज्य सरकार के अधीन "नियोजन" नहीं है। न्यायालय का कहना था कि न्यायमूर्तियों या अन्य स्वायत्तशासी संस्थाओं के सदस्यों की भांति राज्यपाल भी सांविधानिक पद ग्रहण करते हैं तथा एक बार शपथ ग्रहण करने के बाद उन पर 'मालिक-नौकर' के सिद्धान्त लागू नहीं होते। उच्चतम न्यायालय ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि राष्ट्रपति की भांति राज्यपाल भी अपना पद ग्रहण करने से पूर्व अपने कृत्यों का श्रद्धापूर्वक निर्वहन करने तथा अपनी पूरी योग्यता से संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण करने तथा सम्बन्धित राज्य की जनता की सेवा और कल्याण में निरत रहने की शपथ लेते हैं। ऐसे पदधारी व्यक्ति को कैसे हटाया जाय इस पर तो न्यायालय ने कोई मत व्यक्त नहीं किया लेकिन आम सिविल सेवकों पर लागू होने वाले सेवा-विधिशास्त्र से इन्हें पृथक कर दिया। इस विवेचन से स्पष्ट है कि पांच वर्षों की कार्यविधि से पूर्व हटाने की स्थिति में सुनवाई का युक्ति-युक्त अवसर देने की अनिवार्यता नहीं है। 
जनतांत्रिक शासन पद्धति में सरकार या राष्ट्राध्यक्ष बदलने की स्थिति में उसे अपनी विचारधारा के व्यक्तियों को मंत्री तथा उच्च अधिशासी पदों पर नियुक्त करने की परिपाटी रही है। संयुक्त राज्य अमेरिका में तो नये राष्ट्रपति का चुनाव नवम्बर में समाप्त हो जाता है तथा वह अगली जनवरी के तीसरे सप्ताह में कार्यभार ग्रहण करता है। इस बीच के समय में वह अपनी पार्टी तथा विचारधारा के लोगों की लिस्ट बनाने में लगाता है जिन्हें उच्च संवैधानिक तथा प्रशासकीय पदों पर नियुक्त करना है। वहाँ यह भी परिपाटी है कि राष्ट्रपति के बदलने के साथ ही उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति अपने पदों से स्वतः इस्तीफा दे देते हैं। भारत में ऐसी परिपाटी विकसित नहीं हो पायी है। अतः सरकारों को ऐसे अप्रिय कदम उठाने के लिये विवश होना पड़ता है।
राज्यपाल का पद केंद्र और राज्यों के बीच टकरावत तथा विवाद का पद बनता जा रहा है। इस पद पर सक्रिय राजनीतिज्ञों को अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये नियुक्त करने की परम्परा स्वस्थ नहीं कही जा सकती। ऐसे व्यक्तियों को ही हटाने की जरूरत महसूस की जाती है। सरकारिया कमीशन ने राज्यपालों की नियुक्त में सम्बन्धित राज्य के मुख्यमंत्री की सहमति के लिये अनुशंसा की थी लेकिन समय से पूर्व होते लोकसभा के चुनाव तथा दल-बदल कर बनती-बिगड़ती राज्य सरकारों के कारण उत्पन्न होती राजनैतिक स्थिति में राज्यपाल के दायित्वों तथा सत्ता परिवर्तन के साथ स्वयंमेव पद-त्यागने के विषय में कुछ नहीं कहा।
संविधान सभा में हुयी बहस तथा इस पद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के अवलोकन से स्पष्ट है कि राज्यपाल, राष्ट्रपति के 'प्रसाद पर्यन्त' पद धारण करता है तथा वह तभी तक इस पद पर रह सकता है जब तक केन्द्रीय सरकार का वरद् हस्त प्राप्त है। एक बार नियुक्त होने के बाद उसे इस पद पर अधिकार के साथ-साथ सांविधिक मर्यादाओं तथा दायित्वों का भी निर्वहन करना पड़ता है तथा इसका तकाजा है कि केन्द्र में सत्ता परिवर्तन के साथ वह स्वयं पद छोड़ने की पहल करे जिससे उसे हटाने की स्थिति न आये। लोकसभा का कार्यकाल यदि निश्चित हो जाये तथा इन पदों पर गैर-राजनैतिक व्यक्तियों की नियुक्तियाँ होने लगें तब भी इन अप्रिय स्थितियों से बचा जा सकता है।


 

डी०एन०ए० परीक्षण तथा कानून

    ब्रिटिश बालिका हन्ना फोस्टर के बलात्कार तथा हत्या के आरोप में गिरफ्तार मनिन्दर सिंह कोहली की पहचान डी०एन०ए० परीक्षण द्वारा की गयी। ज्ञातव्य है कि कोहली ने यह अपराध गतवर्ष इंग्लैण्ड में किया था तथा पुलिस को चकमा देकर भारत भाग आया और सुदूरवर्ती कालिम्पोंग जिले में बदले नाम से रह रहा था। उसने अपना चेहरा-मोहरा बदल रखा था तथा स्थानीय लड़की से विवाह रचा लिया था। स्व० हन्ना फोस्टर के माता-पिता ने भारत आकर उनको तस्वीर प्रसारित की और बड़ी धनराशि इनाम में घोषित की। गिरफ्तार किये जाने पर उसने ना-नुकुर की लेकिन अन्ततः डी०एन०ए० परीक्षण के आधार पर उसकी पहचान सिद्ध हुयी।

उत्तरांचल के एक मंत्री श्री हरक चन्द्र रावत के विरुद्ध असाप नाम की एक नवयुवती जेनी ने यह आरोप लगाया था कि रावत ने उसके साथ कई बार शारीरिक सम्बन्ध स्थापित किये, फलस्वरूप वह गर्भवती हुयी तथा वह उस अनब्याही माँ के बच्चे का पिता है। पक्ष-विपक्ष के आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच रावत को मंत्रीपद से इस्तीफा देने के लिये विवश होना पड़ा। लेकिन डी०एन०ए० परीक्षण से स्पष्ट हो गया कि वह आरोप बेबुनियाद है। बाद में उस युवती ने भी यह आरोप वापस ले लिया। श्री हरक चन्द्र रावत को तो आरोपों से निजात मिल गयी लेकिन उत्तर प्रदेश के बहुचर्चित मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में एक निर्णायक मोड़ तब आया जब मृतक के गर्भ में पल रहे भ्रूण का डी०एन०ए० टेस्ट कराया गया तथा यह सिद्ध हो गया कि इस अभागे तथा अजन्मे बच्चे का पिता एक विधायक है जिसके मृतक से नाजायज सम्बन्ध थे। इन विधायक को मंत्री पद से हटना पड़ा तथा कई दिनों तक जेल में रहना पड़ा।
गत दिनों दिल्ली के बगिया रेस्टोरेंट के तन्दूर में नैना साहनी को मार डालने के आरोप में सुशील शर्मा को फांसी की सजा सुनाई गयी है। सुशील शर्मा पर आरोप था कि उसने नैना की हत्या कर उसकी लाश तन्दूर में मक्खन डाल-डाल कर जलाने का प्रयास किया था। नैना का प्रायः पूरा शरीर भस्म हो चुका था। केवल एक अधजली टांग बची थी। इसी के डी०एन०ए० टेस्ट से यह स्थापित किया जा सका कि वह शरीर नैना का था तथा इसी परीक्षण के परिप्रेक्ष्य में सुशील शर्मा के विरुद्ध हत्या करने तथा उसका सबूत मिटाने का आरोप सिद्ध किया जा सका जिसकी परिणति उसे फांसी की सजा देने में हुयी। एक आई०ए०एस० के पुत्र नितीश कटारा की हत्या की पुष्टि भी डी०एन०ए० टेस्ट द्वारा हुयी क्योंकि हत्यारों ने उसकी लाश इतनी क्षत-विक्षत कर दी थी उसकी पहचान नहीं हो रही थी। स्वर्गीय प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के हत्यारों, धानू तथा शिवरासन, की भी डी०एन०ए० परीक्षण द्वारा पहचान की गयी थी।
अभी हाल में हैदराबाद के अस्पताल में एक नवजात लड़के की जगह लड़की देने के विवाद में डी०एन०ए० टेस्ट कराकर माँ को उसका असली शिशु दिलवाया गया जिसकी मीडिया में पर्याप्त चर्चा हुयी थी। महान क्रांतिकारी तथा देशभक्त सुभाष चन्द्र बोस की रहस्यमय परिस्थितियों में हुयी मृत्यु की जांच कर रहे आयोग ने तथाकथित गुमनामी बाबा के डी०एन०ए० टेस्ट के बाद घोषित किया कि बाबा जी सुभाष चन्द्र बोस नहीं थे।

बीसवीं शताब्दी के प्रारम्भ में वैज्ञानिकों ने यह स्थापित कर दिया था कि मानव-रक्त में कुछ गुण ऐसे हैं जो आनुवंशिक तौर पर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में जाते हैं तथा किसी जातक का ब्लड-ग्रुप उसके माता-पिता के रक्त-वर्ग से निश्चित किया जा सकता है। तदनन्तर इनको डाई ऑक्सी न्यूक्लिक एसिड (डी०एन०ए०) मानव रीलो न्यूक्लिक एसिड (आर०एन०ए०) में विभाजित किया गया। परीक्षणों से सिद्ध हुआ कि डी०एन०ए० मानव जाति के वे आधार-भूत तथा मूल गुण-सूत्र हैं जो प्रत्येक व्यक्ति में अलग तथा विशिष्ट होते हैं। पुरुषीय गुणसूत्र उसके शुक्राणुओं में होते हैं तथा स्त्री गुणसूत्र उसके अण्डाणुओं में विद्यमान रहते हैं। पुरुष-स्त्री के सम्मिलन में इनका निषेचन होता है तथा भ्रूण का उदय होता है जो विकसित होकर जातक के रूप में जन्म लेता है। प्रत्येक जातक में उसके माता-पिता के गुणसूत्र आवश्यक रूप से होते हैं और वैज्ञानिक प्रगति के साथ अब इनका  परीक्षण सम्भव ही नहीं बल्कि आम हो गया है। मानव शरीर के किसी भी अंग या अवयव, यथा: बाल, ऊतक, रक्त, वीर्य, बलगम, पसीना आदि कहीं से भी इन्हें प्राप्त किया जा सकता है तथा दूसरे से मिलान कर यह जाना जा सकता है कि जातक किसका पुत्र-पुत्री है या जातक के माता-पिता कौन हैं। यही नहीं डी०एन०ए० परीक्षण से जातक का लिंग, आयु तथा प्रजाति भी निर्धारित की जा सकती है।

डी०एन०ए० परीक्षण पितृत्व के निर्धारण, क्षत-विक्षत शव की पहचान तथा बच्चे बदलने की स्थिति में माता-पिता को निश्चित करने के लिये किया जाता है। इसकी आवश्यकता सम्पत्ति में हिस्सेदारी, गुजारा-भत्ता पाने तथा बच्चे की वैधता-अवैधता जानने के लिये तथा उसे सिद्ध करने में पड़ती है। ओलम्पिक आदि प्रतियोगिताओं में इनका परीक्षण आयु, लिंग तथा राष्ट्रीयता तक जानने में किया जाता है तथा यह परीक्षण इतने प्रामाणिक हैं कि इनमें गलती की सम्भावना तीन अरब में एक की है। अपराध-शास्त्र में इसका प्रयोग बढ़ता ही जा रहा है। बलात्कार से पीड़ित स्त्री की योनि या उसके कपड़ों पर पड़े वीर्य की बूंदों से अपराधी का पता लगाया जाता है। इसी प्रकार हत्या में प्रयुक्त हथियार तथा हत्यारे के कपड़ों पर पाये गये मृतक के खून के छींटों से यह जाना जा सकता है कि हत्यारा कौन है। आपराधिक तथा दीवानी दोनों क्षेत्रों में इन परीक्षणों का उपयोग दिनों दिन बढ़ता जा रहा है। भारत में हैदराबाद (आंध्र प्रदेश) में इसकी एक लैबोरेट्री है जहाँ यह परीक्षण होता है। अब ऐसी ही लैबोरेट्री देश के अन्य हिस्सों में तथा प्राइवेट सेक्टर में भी खुल रही हैं।
भारतीय कानूनों में डी०एन०ए० परीक्षण कराने को विवश करने के लिये प्रावधान नहीं है। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 एक वैध विवाह के दौरान हुये जन्म को उसके जायज होने का अंतिम साक्ष्य प्रमाणित करती है। यह धारा अंग्रेजी कानून पर आधारित है जिसके अनुसार विवाह के 280 दिनों के भीतर जन्में जातक को उसी पुरुष-स्त्री का बच्चा माना जाता है, जब तक की यह सिद्ध न कर दिया जाय कि उन दिनों जब कि गर्भ स्थापना हुयी थी, दोनों एक दूसरे की पहुँच से बाहर थे तथा उनमें संभोग की कोई सम्भावना नहीं थी। संतान की वैधता को विशेष सुरक्षा देने वाली यह धारा इस सिद्धान्त पर आधारित है कि वही पिता है जिसके लिए विवाह संस्था इंगित करती है। दीवानी प्रक्रिया संहिता में न्यायालय अपने अन्तर्निहित अधिकारों का प्रयोग करते हुये ऐसे परीक्षण के लिये अनुमति दे सकती है। दण्ड प्रक्रिया संहिता में भी किसी निर्णय पर पहुँचने के लिये ऐसे साक्ष्य पर विचार किया जा सकता है। इंग्लैण्ड में फैमिली लॉ रिफार्म एक्ट 1987 की धारा 23 में वैज्ञानिक परीक्षण तथा रक्त परीक्षण की छूट दी गयी है तथा अमेरिका में भी इनका उपयोग काफी प्रचलित है। भूतपूर्व राष्ट्रपति बिल क्लिंटन तथा उनकी प्रेमिका मोनिका लेविंस्की के मध्य शारीरिक सम्बन्धों को मोनिका के अंडर गारमेंट पर पाये गये क्लिंटन के वीर्य के धब्बों से सिद्ध किया गया था। मोनिका ने उन मधुर क्षणों की याद बनाये रखने के लिये अण्डरवियर सुरक्षित रखा हुआ था।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 20 (3) के अनुसार किसी अपराध के लिये अभियुक्त किसी व्यक्ति के स्वयं अपने विरुद्ध साक्षी होने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता। यह कॉमन लॉ का सिद्धान्त है कि प्रत्येक अभियुक्त को निर्दोष माना जाता है जब तक कि इसके विपरीत सिद्ध न कर दिया जाय। अभियोजन करने वाले पर दोष सिद्ध करने का भार होता है और अभियुक्त को अपने को अपराध में फंसाने वाला कथन देने के लिये बाध्य नहीं किया जा सकता है। आपराधिक तथा सिविल मामलों में डी०एन०ए० टेस्ट की प्रार्थना इसी आधार पर सुनी तथा निर्णीत की जाती है। किसी का रक्त परीक्षण उसकी सहमति से ही कराया जा सकता है क्योंकि यह उसकी एकान्तता तथा व्यक्तिगत स्वातन्त्र्य के अधिकार के विपरीत जा सकता है। ऐसे परीक्षण से उसकी मानहानि हो सकती है तथा जीवन भर के लिए एक आरोप ढोना पड़ सकता है। मानवाधिकारों के यूरोपीय अभिसमय की धारा 8 के अन्तर्गत प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तिगत तथा पारिवारिक अधिकारों को सम्मान देने का प्रावधान है तथा मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत भारत का विधानमंडल भी इसके विपरीत कानून बनाने में अक्षम है। यहाँ यह स्मरण रखना समीचीन होगा कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 उस समय लिखी गयी थी जब आधुनिक विज्ञान विकसित नहीं था तथा डी०एन०ए० या आर०एन०ए० परीक्षण कल्पनातीत थे। यह माना जाता है कि यह परीक्षण वैज्ञानिक तौर पर अत्यन्त प्रामाणिक हैं, फिर भी धारा 112 की अंतिमता अपनी जगह है क्योंकि वैज्ञानिक सत्यता से परे सामाजिक तथा वैयक्तिक पहलू भी अपनी जगह अत्यन्त मूल्यवान हैं।
वर्णित सांविधानिक शक्ति तथा साक्ष्य अधिनियम के प्रावधानों के शब्द तथा आत्मा के मध्य संतुलन करके ही परीक्षण के लिये अनुमति देती है। इस सिलसिले में कान्ती देवी बनाम पोशीराम (ए०आई०आर० 2001 एस०सी० 2276) का वाद उल्लेखनीय है जिसमें न्यायालय ने संतान के पितृत्व परीक्षण के लिये डी०एन०ए० टेस्ट कराने के पति की मांग खारिज कर दी थी। इस वाद में पक्षों का विवाह 1975 में हुआ था तथा प्रायः 15 वर्षों तक वे निस्तान रहे। इस बीच उनके बीच मन-मुटाव हुआ तथा मुकदमेबाजी भी चल रही थी। 1989 में पत्नी ने एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया तथा जन्म, मृत्यु तथा विवाह पंजीकरण अधिनियम के अन्तर्गत इसके जन्म का प्रमाण-पत्र भी प्राप्त कर लिया। बाद में इस पत्नी ने अपने तथा बच्चे की ओर से गुजारे भत्ते के लिये न्यायालय में आवेदन किया। पति की ओर से पितृत्व से इंकार किया गया तथा उसने स्वयं को डी०एन०ए० टेस्ट के लिये प्रस्तुत किया। लेकिन न्यायालय ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के अन्तर्गत निर्धारित किया कि वह पति ही इस बच्चे का पिता है, क्योंकि उनके मध्य विवाह चल रहा था तथा वह यह सिद्ध करने में असफल रहा कि गर्भ स्थापना के समय उनके बीच शारीरिक सम्बन्ध सम्भव नहीं था। न्यायालय का कहना था कि जातक के पितृत्व निर्धारण के लिये यही तथ्य पर्याप्त है कि बच्चे के जन्म से 280 दिन पूर्व से वे विवाहित थे। अन्यथा सिद्ध कराने के लिये यह आवश्यक है कि न केवल यह सिद्ध किया जाय कि पति की पहुँच पत्नी के पास नहीं थी, बल्कि यह भी सिद्ध किया जाये कि पत्नी की पहुँच पति के पास नहीं थी। न्यायालय का कहना था कि यदि एक वैध विवाह बन्धन के दौरान हुये जातक के पितृत्व परीक्षण की अनुमति दी गयी और उस परीक्षण से अन्यथा परिणाम आया तो यह उस जातक के एकान्तता के मौलिक अधिकार का हनन होगा तथा उस पर नाजायज संतान होने तथा उसकी माँ के सतीत्व पर जीवन भर का दाग होगा जो उसकी पढ़ाई, भरण-पोषण, सम्पत्ति में हिस्सेदारी सहित अनुच्छेद 21 के अन्तर्गत जीने के मौलिक अधिकार पर अतिक्रमण होगा।
लेकिन यदि डी०एन०ए० परीक्षण से ऐसे दुष्परिणाम निकलने की सम्भावना न हो तो इसके लिये अनुमति दी जा सकती है। एक वैवाहिक विवाद में पति ने जारता (अडल्ट्री) के आधार पर विवाह-विच्छेद के लिये आवेदन किया तथा आरोप लगाया कि उसकी पत्नी एक अन्य व्यक्ति के गर्भ से गर्भवती हुयी थी। इससकल इस पत्नी का अपरिपक्व भ्रूण स्खलित (मिसकैरेज) हो गया था तथा आल इण्डिया मेडिकल सांइसेज़ के अस्पताल में उसका वह भ्रूण वैज्ञानिक परीक्षण के लिये सुरक्षित रखा गया था जिससे यह जाना जा सके कि ऐसा क्यों हुआ? पति ने अदालत से यह गुजारिश की कि इस भ्रूण का डी०एन०ए० परीक्षण कर यह पता किया जाय कि इसका पिता कौन व्यक्ति है? पत्नी की तरफ से अपने बचाव में स्वयं के तथा इस मृत-भ्रूण के एकान्तता के मौलिक अधिकार की दुहाई देकर इसका विरोध किया गया। लेकिन अदालत ने इसके परीक्षण की अनुमति प्रदान की क्योंकि इस भ्रूण से किसी की मानहानि होने की गुंजाइश ही नहीं थी तथा जारता के आरोप को इसके द्वारा सिद्ध किया जा सकता था। अभी हाल में केरल उच्च न्यायालय द्वारा निर्णीत हजीरा बीबी बनाम शर्मीला पी इकबाल (ए०आई०आर०-2004 केरल 240) में पिता की मृत्यु के उपरान्त उसकी सम्पत्ति में हिस्सेदारी के लिये मुकदमा दायर किया जिसमें विचारणीय विषय यह था कि कथित पुत्री मृतक की असली संतान थी या गोद ली हुयी। इस मामले में न्यायालय ने डी०एन०ए० परीक्षण के लिये इजाजत दे दी।
एक तरफ एकान्तता तथा जीवन जीने का मौलिक अधिकार है तथा दूसरी तरफ न्याय पर पहुँचने के लिये आधुनिक वैज्ञानिक विधाओं के इस्तेमाल का लोभ है। इनके बीच में सामंजस्य आसान नहीं है, क्योंकि एक बार जाज संतान का दाग लगने या स्त्री के सतीत्व पर लगे आरोप को केवल अदालती निर्णय द्वारा समाप्त नहीं किया जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि इंग्लैण्ड तथा अमेरिका की भांति भारत में भी उन्मुक्तता से इसकी अनुमति दी जाय तथा कानून में संशोधन करके ऐसे व्यक्ति को उत्तरदायी ठहराया जाय जिसके कारण विवाद उत्पन्न हुआ।

इधर अमेरिका तथा कई अन्य यूरोपीय देशों में जाने वाले विदेशियों के रक्त-परीक्षण की अनिवार्यता की गयी है। यह एक खतरनाक शुरुआत है क्योंकि ऐसे परीक्षण के दुरुपयोग की भी पर्याप्त सम्भावनाएँ हैं। अतः डी०एन०ए० परीक्षण पर एक अन्तर्राष्ट्रीय कानून की प्रबल आवश्यकता है तथा तात्कालिक कदम की दरकार है। 

राष्ट्रपति की क्षमादान-शक्ति के सांविधानिक पहलू

 कोलकाता की एक स्कूल छात्रा हेतल पारेख के साथ बलात्कार कर उसकी हत्या करने के दोषी धनंजय चटर्जी की आसन्न फांसी राष्ट्रपति के हस्तक्षेप से रोक दी गयी है। मानव संवेदना से वशीभूत राष्ट्रपति भवन ने केन्द्रीय गृह-मंत्रालय से अनुरोध किया कि धनंजय की क्षमादान याचिका पर पुनर्विचार किया जाय। राष्ट्रपति की इस इच्छा पर कार्यवाही करते हुये उच्चतम न्यायालय ने फांसी के कार्यान्वयन पर फिलहाल रोक लगाने का आदेश पारित कर दिया।

ज्ञातव्य है कि हेतल पारेख जिस कालोनी में रहती थी, धनंजय उसमें लिफ्ट चलाने का कार्य करता था। वह अक्सर हेतल को छेड़ता रहता था जिसकी शिकायत पर धनंजय को फटकार भी लगाई गयी थी। लेकिन 1989 में एक दिन मौका देखकर हेतल के साथ उसने बलात्कार किया तथा शोर मचाने पर हत्या कर दी। धनंजय को फांसी की सजा दी गयी जो उच्चतम न्यायालय तक बरकरार रही। संविधान के अनुच्छेद 72 के अन्तर्गत की गयी दया की याचिका भी ठुकरा दी गयी लेकिन अंत में जब फांसी देने की सभी तैयारियां पूरी हो गयी तो राष्ट्रपति तथा उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद फिलहाल इसके कार्यान्वयन पर रोक लगा दी गयी है। अपुष्ट समाचारों के अनुसार धनंजय की क्षमादान याचिका को निरस्त करने की अनुशंसा के साथ गृह मंत्रालय द्वारा राष्ट्रपति को अंतिम निर्णय के लिये भेजा जा चुका है।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि आसन्न फांसी से सिहरे हुये धनंजय के परिवार वाले आमरण-अनशन पर चले गये थे तथा धमकी दे रहे थे कि फांसी होने की दशा में वे सब भी मृत्यु का आलिंगन करेंगे। उधर पश्चिम-बंगाल की सरकार ने आधिकारिक तौर पर धनंजय के प्रति दया न दिखाने का आग्रह किया है। उधर हेतल पारेख के स्कूल की प्राचार्या, शिक्षिकायें तथा छात्रायें समवेत स्वर से अपराधी को फांसी देने के पक्ष में हैं। ब्रिटेन ने सरकारी तौर पर तथा कई राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुये फांसी की सजा ही समाप्त करने का सुझाव दिया है।
वैसे तो बलात्कार तथा हत्या के सैकड़ों प्रकरण निर्णीत हुये हैं तथा उन पर जनमानस की रोष और आक्रोश भरी प्रतिक्रिया देखने-सुनने को मिली है लेकिन हेतल पारेख के साथ घटित जघन्य अपराध पर अस्सी के दशक में दिल्ली की एक स्कूल छात्रा गीता चोपड़ा की हत्या का मामला मनोमस्तिष्क में कौंध जाता है। एक सैन्य अधिकारी के वे दोनों बच्चे स्कूल जाने के लिये सामने से गुजरती हुयी एक कार से लिफ्ट मांग बैठे और कार में सवार कुख्यात  अपराधी रंगा-बिल्ला ने कार में ही गीता के साथ बलात्कार किया तथा प्रतिरोध करने पर भाई-बहन को मौत के घाट उतार दिया। बाद में दोनों को फांसी की सजा दी गयी। उनके द्वारा प्रस्तुत की गयी क्षमादान की याचिका राष्ट्रपति द्वारा निरस्त कर दी गयी तथा उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रपति के क्षमादान सम्बन्धी अधिकारों तथा दायित्वों पर अन्वेषण करने से यह कहकर इंकार कर दिया था कि इस बर्बर तथा लोमहर्षक कांड की सजा सिर्फ फांसी ही हो सकती है तथा अपराधी किसी भी प्रकार से दया के पात्र नहीं है।
पचास के दशक के उत्तरार्द्ध में नेवी के कप्तान नानावती द्वारा अपनी पत्नी के प्रेमी की हत्या में प्राप्त आजीवन कारावास की सजा को क्षमा करने के प्रकरण से प्रकाश में आये इस राष्ट्रपतीय अधिकार पर चर्चा होती रही है। स्व० इन्दिरा गाँधी के कथित हत्यारों को पर्याप्त सबूत के अभाव में भी मृत्युदण्ड दिये जाने पर सवाल खड़े किये गये थे तथा क्षमादान याचिका को साधिकार पाने के लिये उच्चतम न्यायालय में असफल प्रयास किये गये थे। वहीं अभी हाल में स्वर्गीय राजीव गाँधी की हत्या में शामिल नलिनी को उसके अबोध बच्चे की परवरिश करने देने के लिये श्रीमती सोनिया गाँधी ने स्वयं राष्ट्रपति से उसे क्षमादान देने की गुजारिश की है। आस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स को उनके दो बच्चों के साथ जिन्दा जलाकर मार डालने के दिल दहला देने वाले अपराध में फांसी की सजा पाये कुख्यात दारा सिंह के प्रति दया दिखलाते हुये स्टेन्स की पत्नी ने भी क्षमा करने की अपील की है।
संविधान का अनुच्छेद 72, राष्ट्रपति को किसी अपराध के लिये सिद्ध दोष ठहराये गये किसी व्यक्ति के दण्ड को क्षमा, उसका प्रविशम्बन, विराम या परिहार करने की अथवा दण्डादेश के निलम्बन, परिहार या लघुकरण की शक्ति प्रदान करता है। राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति सेना न्यायालय द्वारा दिये गये दण्डादेश, उन सभी मामलों में जिसमें दण्डादेश, मृत्युदण्ड है तथा उन मामलों में दिये गये दण्डादेश तक विस्तारित है जो संघ की कार्यपालिका क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत आते हैं। इसी प्रकार अनुच्छेद 161 राज्यपाल को भी कतिपय मामलों में क्षमादान की सीमित शक्ति प्रदान करता है। इंग्लैण्ड में सम्राट की यह शक्ति पुरातन काल से चली आ रही है जो उसके सम्प्रभु होने से प्राप्त है। अमेरिका में राष्ट्रपति को उसकी कार्यपालिका शक्ति के अन्तर्गत क्षमादान की शक्ति प्राप्त है। प्रायः प्रत्येक देश के सांविधानिक प्रमुख को ऐसी शक्ति प्राप्त होती है।
क्षमा का अर्थ मुआफी से है। किसी व्यक्ति को किसी अपराध के दण्ड से मुक्ति प्रदान करना क्षमादान कहा जाता है। क्षमादान का प्रभाव यह होता है कि जिस व्यक्ति को क्षमादान दिया गया है वह उस स्थिति में हो जाता है जैसा कि वह अपराध करने से पहले था और ऐसा माना जाता है कि जैसे उसने कभी भी अपराध किया ही न हो। क्षमादान समस्त नियोग्यताओं को समाप्त कर देता है। प्रविशम्बन से तात्पर्य विधि द्वारा विहित दण्ड के अस्थायी स्थगन से है। विनिश्चत दण्ड का आरम्भ होने का समय आगे बढ़ाना प्रविशम्बन कहा जाता  है। परिहार से तात्पर्य बिना दण्ड की प्रकृति बदले उसकी मात्रा को घटाने से है, जैसे, आठ वर्ष के कारावास को 6 वर्ष के कारावास में बदलना परिहार है। जबकि लघुकरण से तात्पर्य दण्ड की प्रकृति को परिवर्तित करने से है। जैसे मृत्युदण्ड को आजीवन कारावास में परिवर्तित करना लघुकरण है। क्षमादान आदि शक्ति का प्रयोग परीक्षण से पूर्व अथवा परीक्षण के बाद अथवा परीक्षण के दौरान किया जा सकता है।
राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति न्यायिक शक्ति से भिन्न है। राष्ट्रपति द्वारा क्षमादान का अर्थ न्यायिक आदेश को संशोधित, परिवर्तित या उपान्तरित करना नहीं है। क्षमादान की व्यवस्था सांविधानिक योजना का ही अंग है। राष्ट्रपति की यह शक्ति मुख्य रूप से मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित है। कई बार कोई व्यक्ति आवेश, भावावेश अथवा अपरिहार्य परिस्थितियों में कोई अपराध कारित कर बैठता है तब राष्ट्रपति उस व्यक्ति की स्थिति, भावनाओं, परिस्थितियों, समाज पर उसके प्रभाव आदि को ध्यान में रखते हुये यदि अपनी क्षमादान शक्ति का प्रयोग करता है, तो यह मानवीय दृष्टिकोण ही है।
कई मामलों में अनुच्छेद 72 के अधीन राष्ट्रपति की शक्ति के प्रयोग के अधिकार के बारे में प्रश्न उठाये गये हैं, मारूराम बनाम भारत संघ (1980) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने यह अभि० निर्धारित किया है कि किसी भी सांविधानिक शक्ति का प्रयोग मनमाना नहीं किया जाना चाहिए। लोक शक्ति का प्रयोग जो किसी उच्च मंच में निहित है, न्यायसंगत रूप से किया जाना चाहिए। यदि किसी मामले में क्षमा, लघुकरण या परिहार करने की शक्ति का प्रयोग अयुक्त, असंगत, विभेदकारी या असद्भावनावूर्क बातों के आधार पर किया जाता है तो न्यायालय मामले की जांच कर सकते हैं और आवश्यक होने पर हस्तक्षेप भी कर सकते हैं।
राष्ट्रपति की क्षमादान आदि की शक्ति पर न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति से सम्बन्धित एक अन्य महत्त्वपूर्ण मुकदमा कृष्णा गाउंड बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1976) निर्णीत हुआ है। इसमें दो व्यक्तियों को कई हत्याओं के आरोप में फांसी की सजा दी गयी थी। अभियुक्तों का कहना था कि मृतकों से उनकी कोई निजी दुश्मनी नहीं थी तथा सामाजिक न्याय के सिद्धान्तों को लागू करने के लिए उन्होंने अमीर लोगों की हत्यायें की थीं। यह अपराध राजनैतिक अतः उनकी क्षमादान की याचिका को इसी परिप्रेक्ष्य में निर्णीत किया जाना चाहिए। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने दुश्मनी के अन्तर्गत की गयी हत्या तथा राजनैतिक हत्या के फर्क को मानने से इंकार कर दिया तथा स्थापित किया कि फांसी की सजा विरलतम प्रकरणों में ही दी जाती है अतः अनुच्छेद 72 के अन्तर्गत विचार करते हुये किसी अन्यथा परिप्रेक्ष्य पर दृष्टिपात की अपरिहार्यता नहीं है। न्यायालय का कहना था कि ऐतिहासिक रूप से यह एक सम्प्रभु की शक्ति है, राजनैतिक रूप से एक अवशिष्ट शक्ति है तथा मानवतावादी दृष्टिकोण से यह-वह अव्यक्त न्याय है जो वर्तमान न्याय प्रणाली से ऊपर उठकर समाज के कल्याण के लिये कार्य करती है।
अनुच्छेद 72 द्वारा राष्ट्रपति को प्रदत्त शक्तियों पर केहर सिंह बनाम भारत संघ (1989) का वाद भी महत्त्वपूर्ण है। इसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या के मामले में मृत्यु-दण्ड पाये अभियुक्त केहर सिंह की तरफ से उनके पुत्र ने राष्ट्रपति को अनुच्छेद 72 के अन्तर्गत अपनी शक्तियों का प्रयोग करने तथा उसे क्षमादान देने की प्रार्थना की थी। उसका कहना था कि केहर सिंह निर्दोष था और उसे मृत्यु-दण्ड देना गलत था। उसका यह भी कहना था कि उसकी याचिका पर विचार करते समय राष्ट्रपति उसे व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर प्रदान करें। लेकिन यह प्रार्थना अस्वीकार कर दी गयी। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि क्षमा आदि की शक्ति जनता की है और जनता ने इसे देश के उच्चत्तम अधिकारी अर्थात् राष्ट्रपति को सौंप दिया है। राष्ट्रपति इस शक्ति का प्रयोग मन्त्रिपरिषद की सलाह पर करेगा और सलाह उस पर बाध्यकारी होगी। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्रपति मौखिक सुनवाई देने के लिये बाध्य नहीं है तथा याचिका की सुनवाई के तरीके का निर्धारण राष्ट्रपति के विवेकाधिकार में आता है।
भारतीय विधिक इतिहास में राजा नंद कुमार परीक्षण एक महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर है जिसमें तत्कालीन गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स के खिलाफ बोलने की हिम्मत करने वाले बंगाल के अति प्रतिभाशाली जमींदार नंद कुमार को एक छोटा सा ऋण न चुका पाने के आरोप में फांसी की सजा दे दी गयी थी। इतिहास में इसे राजा नंद कुमार की "न्यायिक हत्या" माना जाता है। थोड़े समय पूर्व अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान के भूतपूर्व प्रधानमंत्री श्री जुल्फिकार अली भुट्टो को एक व्यक्ति की हत्या के प्रयास के षड्यंत्र में शामिल होने के आरोप में फांसी की सजा दे दी गयी थी तथा तत्कालीन राष्ट्रपति जियाउलहक ने इंटरनेशनल एमनेस्टी सहित दुनिया भर से पहुंची क्षमादान की अपीलों को नजरअंदाज कर भुट्टो को शहीद बना दिया था। दरअसल क्षमादान की शक्ति का प्रयोग इस प्रकार है कथित अपराधियों को मुक्त करने के लिये किया जाना अभीष्ट है।
राष्ट्रपति द्वारा क्षमादान एक अनुग्रह है। क्षमादान करना या न करना पूर्णरूप से राष्ट्रपति के विवेकाधीन है। कोई भी व्यक्ति अधिकार के रूप में या जनता की सहानुभूति प्राप्त कर इसके लिये हठ नहीं कर सकता। संविधान में जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार है। लेकिन प्रत्येक नागरिक के इस अधिकार की रक्षा हो सके इसके लिये उन तत्वों से मुक्ति पाना आवश्यक है जो समाज के लिये खतरनाक साबित हुये हैं।

राष्ट्रीय हितों के विपरीत हैं राज्यों के जल-युद्ध

तमिलनाडु, कर्नाटक तथा पांडिचेरी के मध्य कावेरी नदी के जल के बंटवारे को लेकर खिंची तलवारें अभी अपनी चमक बिखेर ही रही थी कि पंजाब विधान-सभा ने सर्वसम्मति से पंजाब राज्यों के निरसन विधेयक, 2004 पारित कर रवी तथा बियास नदियों के जल को पड़ोसी राज्यों को देने सम्बन्धी करारों से अपने को अलग कर लिया। उसने ऐसी सभी संविदाओं से पल्ला झाड़ लिया है जिसके द्वारा इन नदियों के जल के बंटवारे को लेकर उस पर विधिक दायित्व थे। यह दोनों नदियां पंजाब से होकर जाती हैं तथा जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान तथा हिमाचल प्रदेश में प्रमुख जल स्रोत के रूप में उपयोगी हैं। सर्वसम्मति से पारित इस विवादास्पद विधेयक को राज्यपाल ने राष्ट्रपति के पास अनुमोदनार्थ भेज तथा राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 143 के अन्तर्गत मामला उच्चतम न्यायालय को उसकी सलाह के लिए भेज दिया। भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर०सी० लोहाटी ने स्वयं की अध्यक्षता में एक पांच-सदस्यीय संविधान-पीठ का गठन किया है तथा राष्ट्रपति के इस संदर्भ की सुनवाई के लिये स्वीकार कर लिया है।
राष्ट्रपति ने उच्चतम न्यायालय से आग्रह किया है कि वह पंजाब विधान-सभा द्वारा पारित उक्त विधेयक की सांविधानिकता का अन्वेषण करे तथा यह देखें कि क्या अंतर्राज्यिक जल विवाद अधिनियम, 1956 की धारा 14, पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 की धारा 78 तथा इसके अन्तर्गत निर्गत 24 मार्च 1976 के नोटिफिकेशन का अतिक्रमण तो नहीं हो रहा है। राष्ट्रपति ने यह भी जानना चाहा है कि प्रस्तावित अधिनियम द्वारा पूर्व में 31 दिसम्बर 1981 को लागू हुये रवी-बियास नदियों के पानी के बंटवारे से सम्बन्धित समझौते को समाप्त करने का अधिकार पंजाब विधान-सभा को है अथवा नहीं, तथा क्या ऐसा कानून पारित कर, राज्य अपने को दायित्वों से मुक्त कर सकता है।

ज्ञातव्य है कि सतलज-यमुना नदियों को जोड़ने के लिये नहर बनवाने को लेकर दिल्ली, हरियाणा तथा पंजाब में एक समझौता हुआ था। लेकिन पंजाब ने अपने हिस्से की यह लिंक नहर बनवाने से यह कह कर इंकार कर दिया कि इससे पंजाब का पानी दूसरे राज्यों में चला जायेगा जब कि वहाँ कृषि कार्यों, सिंचाई तथा बिजली के लिये पानी की भारी किल्लत है। थोड़े समय पूर्व हरियाणा सरकार ने उच्चतम न्यायालय में रिट याचिका दायर कर पंजाब राज्य या केन्द्रीय सरकार को लिंक नहर बनाने के लिये आदेश देने की मांग की थी। न्यायालय ने इस प्रार्थना को स्वीकार भी कर लिया तथा केन्द्र से यह अपेक्षा की कि वह पंजाब के हिस्से की नहर पूरी करने में मदद करे। इससे पहले कि कोई प्रभावी कदम उठाया जाता, पंजाब विधान-सभा ने उक्त विधेयक पारित कर अपने को किसी भी दायित्व से अलग कर लिया।

अन्तर्राज्यीय नदियों के पानी को लेकर सम्बन्धित राज्यों में विवाद पुराने हैं। सन् 1951 में कृष्णा नदी के पानी के बटवारे को लेकर तत्कालीन मद्रास, मैसूर, हैदराबाद तथा बम्बई राज्यों में विवाद हुआ था। लेकिन तब चूंकि केन्द्र तथा राज्यों में काँग्रेस की ही सरकारें थीं अतः दोस्ताना तरीके से हल निकाल लिया गया। साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में नर्मदा नदी के लिये महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश तथा गुजरात में विवाद हुआ तथा तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी के तमाम प्रयासों के बावजूद कोई सर्वमान्य हल नहीं निकल पाया। तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश तथा पांडिचेरी राज्यों के मध्य कावेरी जल विवाद अभी भी अनसुलझा पड़ा है।
भूमि तथा जल राज्यों के विषय हैं। संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची के सत्रहवें आइटम में जल अर्थात जल प्रदाय, सिंचाई और नहरें, जल-निकास और तटबन्ध, जल भंडारण और जल शक्ति के विषय में राज्यों को विधि बनाने की अधिकारिता है। जब कि केन्द्र सूची के छप्पनवें आइटम में अंतर्राज्यिक नदियों तथा नदी-दूनों के विनियमन तथा विकास से सम्बन्धित लोक हित में विधि बनाने की शक्ति संघ को दी गयी है। संविधान का अनुच्छेद 262 अन्तर्राज्यिक नदी या नदी-दूनों के या उसमें जल के प्रयोग, वितरण या नियंत्रण के सम्बन्ध में किसी विवाद या परिवाद को सुलझाने तथा न्याय निर्णयन के लिये उपबन्ध करने के लिये विधि बनाने के लिये संसद को अधिकृत करता है। इसी अनुच्छेद में यह भी प्राविधानित है कि इन विवादों को निपटने के लिये उच्चतम न्यायालय समेत किसी भी न्यायालय के अधिकार को समाप्त किया जा सकता है। न्यायालय का क्षेत्राधिकार प्रतिबन्धित होने के कारण इन पर पूर्व-निर्णय की नजीरें उपलब्ध नहीं है।
संसद ने इस सम्बन्ध में नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 तथा अन्तर्राज्यिक जल विवाद अधिनियम, 1956 पारित किये। पहले अधिनियम के अन्तर्गत नदी बोर्ड बनाये जाने थे लेकिन आज तक उन पर कार्यवाही नहीं हुयी तथा यह अधिनियम मृत प्राय है। दूसरे अधिनियम के अन्तर्गत समय-समय पर विशिष्ट विवादों को सुलझाने के लिये प्राधिकरण गठित किये गये। इनमें सम्बन्धित पक्षों के नुमाइंदे तथा जल विशेषज्ञ शामिल किये गये, लेकिन इनकी अनुशंसाये राजनीतिक आरोपों-प्रत्यारोपों का शिकार हुयीं तथा राज्यों ने इनको लागू करने में हीला-हवाली की। कावेरी जल विवाद पर बने प्राधिकरण के निर्णय को लागू कराने के लिये तमिलनाडु को उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा लेकिन कर्नाटक ने न्यायालय की अवमानना के खतरे के बावजूद पूरा पानी नहीं दिया। इन मामलों में राज्य का हर एक राजनीतिक दल एक ही स्वर से बोलता है क्योंकि उसको अलग-अलग पड़ने तथा चुनाव में खामियाजा भुगतने की तलवार लटकती दिखती है।
संविधान में राज्य की नीति के निर्देशक तत्वों के अनुच्छेद 39 में राज्य से अपेक्षित है कि वह अपनी नीति का इस प्रकार संचालन करे कि समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बंटा हो जिससे सामूहिक हित का सर्वोत्तम रूप से साधन हो तथा आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले जिससे धन और उत्पादन-साधनों का सर्वसाधारण के लिये अहितकारी संकेंद्रण न हो। संघीय संविधान में राज्य विशेष को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि जल तथा भूमि ऐसे प्राकृतिक संसाधनों का वह केवल अपने स्वार्थ के लिये दोहन करे। नदी का जल स्थिर नहीं है तथा सदा प्रवाहमान है। अतः कोई भी राज्य इस जल पर एकाधिकार का दावा नहीं कर सकता तथा न ही दूसरे राज्य में इसके आवागमन पर प्रतिबन्ध लगा सकता है। यह अंतर्राष्ट्रीय विधि का भी तकाजा है।
भारत में राज्यों का गठन भाषाई आधार पर तथा प्रशासनिक सुविधा के लिये किया गया है। स्वतंत्रता से पूर्व राज्य स्वतंत्र इकाई नहीं थे, अतः अपनी भूमि या जल पर उन्हें सम्प्रभुता नहीं प्राप्त है। भारत के प्राकृतिक तथा भौतिक संसाधनों पर भारत के लोगों का स्वामित्व है तथा इनके निर्बाध उपयोग का उन्हें हक है। राज्य सरकारों से यह अपेक्षित है कि वृहत्तर राष्ट्रीय हितों के लिये वे संकीर्ण क्षेत्रीय हितों को महत्त्व न दें तथा पानी ऐसे मूल जीवन-तत्व पर राजनीति करने से बाज आवें।

 

वृत्तिक, व्यावसायिक रिश्ते के द्वन्द्व

अभी हाल में उच्चतम न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण निर्णय में अभिनिर्धारित किया है कि उपेक्षा, असावधानी या निर्णय की त्रुटि के लिये चिकित्सकों पर आपराधिक दायित्व नहीं बनता है तथा वृत्तिक लापरवाही के एवज में उनसे केवल मुआवजा ही पाया जा सकता है। सिवाशीष करीम अरबब नामक एक व्यक्ति की नाक के आपरेशन के दौरान हुयी मृत्यु को गंभीर चिकित्सकीय असावधानी के कारण हुई मौत आरोपित करने वाले मुकदमें का फैसला सुनाते हुये न्यायमूर्ति-द्वय वाई०के० सभरवाल तथा डी० एम० धर्माधिकारी की खण्ड-पीठ ने आपरेशन में संलग्न दो शल्य चिकित्सकों के विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करते हुये अभिनिश्चित किया है कि चिकित्सक के विरुद्ध आपराधिक दायित्व सिद्ध करने के लिये ऐसे सबूत दिये जाने चाहिए जिससे 'घोर तथा जानबूझकर की गयी लापरवाही' सिद्ध हो सके। कानून का सामान्य ज्ञान रखने वाले के लिये इसका अर्थ है कि किसी डाक्टर के विरुद्ध आपराधिक दायित्व को सिद्ध करने के लिये 'दुराशय' (मेन्सिरिया) सिद्ध करना होगा तथा अदालत के सामने साक्ष्य देना होगा कि चिकित्सक ने किस गलत इरादे से उसके मरीज के प्रति वृत्तिक उपेक्षा की है। सामान्यतः यह सिद्ध करना सम्भव ही नहीं होगा क्योंकि एक सामान्य ज्ञान व बुद्धि वाला व्यक्ति दुराशय रखने वाले डॉक्टर के पास इलाज के लिये नहीं जायेगा।
ज्ञातव्य है कि उक्त नामित रोगी की नाक में एक छोटी सी विकृति थी जिसे दूर करवाने के लिये उसने दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में एक प्लास्टिक सर्जन से आपरेशन करवाने के लिये करार किया था। गत 18 अप्रैल 1994 को आपरेशन करते वक्त रोगी की बेहोशी की हालत में उसकी नाक में एक सूई चुभोई गयी जिसके कारण उसे भयंकर रक्त स्राव हुआ जो नाक के जरिये श्वसन तंत्रिका में भर गया तथा श्वास अवरुद्ध होने के कारण हार्ट फेल हो गया। रोगी के परिजनों ने पुलिस में रिपोर्ट लिखाई तथा शव का पोस्ट-मार्टम किया गया जिससे डाक्टर की लापरवाही का तथ्य उजागर हुआ। इसके बाद ही सम्बन्धित डॉक्टरों के विरुद्ध आपराधिक दायित्व का मुकदमा चला, लेकिन अंतिम अपीलीय न्यायालय अर्थात् उच्चतम न्यायालय ने चिकित्सकों को बरी कर दिया। इस निर्णय पर जहाँ चिकित्सकों तथा उनके परिसंघों ने खुशी का इजहार किया है वहीं उपभोक्ता संगठनों, स्वयं-सेवी समूहों तथा आम नागरिकों ने सहमी सी प्रतिक्रिया व्यक्त की है तथा डाक्टरों के बेलगाम हो जाने के खतरे के प्रति चिन्ता जताई है।

 तेरह नवम्बर 1995 को इन्डियन मेडिकल कौंसिल बनाम वी०पी० शान्ता के मुकदमें में निर्णय देते हुये न्यायमूर्ति-त्रयी; कुलदीप सिंह, एस०सी० अग्रवाल तथा बी०एल०हंसारिया की एक पीठ ने चिकित्सकों द्वारा फीस या प्रतिफल लेकर दी जाने वाली मेडिकल सेवाओं को उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अन्तर्गत आच्छादित करार दिया था। न्यायालय का कहना था कि चिकित्सकीय उपेक्षा या असावधानी के कारण हुयी क्षति के मुआवजे के लिये अधिनियम के अन्तर्गत परिवाद प्रस्तुत किया जा सकता है। भारतीय विधिक इतिहास में मील का पत्थर माने जाने वाले इस निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने चिकित्सकों की सर्वोच्च संस्था इन्डियन मेडिकल कौंसिल की यह दलील ठुकरा दी थी कि डॉक्टर-मरीज का रिश्ता व्यावसायिक है तथा इसे आम सेवाओं के अन्तर्गत व्याख्यायित नहीं किया जाना चाहिए। कौंसिल की यह दलील भी ठुकरा दी गयी थी कि उनके यहाँ दोषी डॉक्टर के खिलाफ शिकायत की जा सकती है तथा वह डॉक्टरों पर अनुशासनेतर कार्यवाही के लिये शक्तियुक्त है। न्यायालय का कहना था कि जब फीस या प्रतिफल लेकर चिकित्सकीय सेवायें दी जाती है तो यह सेवा प्रदाता का कर्त्तव्य है कि वह समुचित सेवायें प्रदान करें तथा उसमें 'कमी' के कारण होने वाली क्षति की क्षतिपूर्ति के लिये तैयार रहे। घोर लापरवाही के लिये आपराधिक दायित्व के विषय में सीधे तो कुछ नहीं कहा गया लेकिन डॉक्टरों से यह अपेक्षा अवश्य की गयी थी कि वे ईलाज करते समय सतर्क रहे तथा लोगों के जीवन को बचाने के लिये अपने ज्ञान, कौशल तथा अनुभव का युक्तियुक्त इस्तेमाल करें।

तत्समय सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय पर डॉक्टरों द्वारा तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की गयी थी तथा यह आशंका व्यक्त की गयी थी कि इस निर्णय से चिकित्सक प्रतिरंक्षात्मक उपाय उठाने को मजबूर होंगे जिससे यह सेवायें काफी महंगी हो जायेगी। कहा गया था कि इन उपायों में, डॉक्टर किसी दायित्व से बचने के लिये, साधारण सी बीमारी में भी विभिन्न पैथोलोजी जांचें; एक्सरे, सी.टी. स्कैन, एम.आर.आई. आदि करवायेंगे तथा आपरेशन से पूर्व हृदय तथा मस्तिष्क आदि के विशेषज्ञों से राय लेना नहीं भूलेंगे तथा इनकी फीस रोगी से ही वसूली जायेगी। इसमें कोई शक नहीं कि यह आशंका निर्मूल सिद्ध नहीं हुयी और मेडिकल सेवायें काफी महंगी हो गयी। डॉक्टरों ने अपने को दायित्व से बचाने के लिये कई नये हथकण्डे अपनाये तथा वृत्तिक जोखिम बीमा कराना भी प्रारम्भ कर दिया।

"वैद्यो नारायणों हरिः" अर्थात वैद्य ही नारायण हरि (भगवान) है, की मानसिकता वाले हमारे इस समाज में चिकित्सकों के प्रति अगाध श्रद्धा तथा सम्मान रहा है। विधिक परिप्रेक्ष्य में भी चिकित्सक तथा रोगी के सम्बन्ध को वैश्वासिक (विश्वास पर आधारित) रिश्ता माना गया है। विधि की अपेक्षा है कि चिकित्सक अपने ज्ञान, कौशल तथा अनुभव का उपयोग बिना किसी भेद-भाव तथा लालच के रोगी को चंगा करने में करेंगे। इस वृत्ति में पदार्पण से पूर्व प्रत्येक चिकित्सक "हिप्पो क्रैटिक शपथ" लेकर ईश्वर को साक्षी मान कर रोगी की सेवा का व्रत लेते हैं तथा प्रार्थना करते हैं कि उन्हें मानवता की सेवा में सतत तल्लीन रहने के लिये शक्ति व सामर्थ्य प्रदान करें। मेडिकल नीतिशास्त्र के अनुरूप प्रत्येक रोगी को यह अधिकार है कि उसे पूरी सूचना दी जाय, इसकी सहमति प्राप्त की जाय तथा उसे स्वास्थ्य सम्बन्धी शिक्षा दी जाय। डॉक्टरों से भी अपेक्षित है कि वे अपना विज्ञापन न करें; अपनी वृत्तिक सेवाओं के लिये ही शुल्क लें तथा कोई रिबेट या कमीशन न प्राप्त करें तथा कोई गोपनीय उपचार न करें। इन वृत्तिक नीतिशास्त्र का कितना पालन हो रहा है- सर्वविदित है। मेडिकल कौंसिल ने अपनी स्थापना के प्रायः पचास वर्षों में एक भी डॉक्टर के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं की है।

असावधानी, उपेक्षा, जानबूझकर की गयी लापरवाही तथा आपराधिक असावधानी आदि स्थितियों में डिग्री का अन्तर है। इसकी विभाजक रेखा अत्यन्त झीनी तथा धुंधली है। कब असावधानी उपेक्षा हो जाती है तथा कब इसे जानबूझकर की गयी लापरवाही की श्रेणी में रखा जाय- यह प्रत्येक केस के तथ्यों से ही निश्चित किया जा सकता है। इसमें निर्णय लेने वाले की मनःस्थिति तथा परिस्थिति भी महत्वपूर्ण है। भुक्त भोगी, आरोपित डॉक्टर तथा न्यायपीठि के दृष्टिकोण अलग-अलग होते हैं अतः प्रतिक्रिया भी भिन्न होगी।
हरजोत अहलूवालिया बनाम स्प्रिंग मीडोज हास्पिटल (2000) के मुकदमें में एक शिशु को टाइफाइड बुखार के लिये बिना टेस्ट किये जेंटामाइसिन का हाई-पावर इंजेक्शन नर्स के द्वारा चढ़ा दिया गया जिससे बच्चे का मस्तिष्क क्षतिग्रस्त हो गया। अब वह बच्चा जिंदा तो रहेगा लेकिन उसकी ज्ञानेन्द्रियां काम नहीं करेंगी, वह न देख पायेगा, न सुन पायेगा, न बोल पायेगा तथा सारी जिन्दगी वह दूसरों के सहारे रहने को अभिशप्त हो गया। उच्चतम न्यायालय ने इसे घोर लापरवाही माना तथा भारी रकम प्रतिकर के रूप में दिलाई। लेकिन ऐसे केस में किसी माँ-बाप के कुलदीपक के लिये क्या कोई भी रकम प्रतिकर हो सकती है? एम० जीवा बनाम आर. ललिता (1994) के प्रकरण में गर्भवती स्त्री को जब प्रसव-वेदना प्रारम्भ हुयी तो कोई चिकित्सक मौजूद नहीं था। उसे असीम रक्तस्राव हुआ तथा वहाँ कार्यरत एक मिडवाइफ ने स्थिति संभालने में असमर्थता व्यक्त करते हुये दूसरे अस्पताल ले जाने के लिये कहा। अन्ततः वह बच्चा मर गया इसे वृत्तिक उपेक्षा माना गया। इसी प्रकार रामानन्द नायकर बनाम सालगांवकर मेडिकल रिसर्च सेंटर (1993) के वाद में शल्य क्रिया के दौरान मरीज के पेट में "गाज टावेल" का छूटना उपेक्षा पूर्ण कृत्य माना गया। बीमार आंख की बजाय स्वस्थ आंख को निकालना, मोतियाबिन्द आपरेशन के लिये लगे शिविर में दसियों मरीजों को गलत दवाई के कारण अंधा बनाने, बन्ध्याकरण आपरेशन के बावजूद गर्भवती होने, आसन्न प्रस्वा को अस्पताल में भर्ती न करने, आपरेशन के बाद सावधानी न बरतने से गैंगरीन हो जाने आदि के हजारों प्रकरण उपभोक्ता तथा सामान्य अदालतों द्वारा निर्णीत हुये हैं या निर्णय की बात जोह रहे हैं। लेकिन यदि लोगों से इन पर मत लिया जाय तो कई इनके लिये मुआवजे की बजाय सम्बन्धित डॉक्टरों को जेल भेजे जाने के पक्ष में अपनी राय देंगे। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि अदालतों में कुल का दशांश भी नहीं पहुँचता है क्योंकि सामान्यतः लोग अपने स्वजन की क्षति को भाग्योदोष मान, मन मसोस कर रह जाते हैं।
इधर हाल के वर्षों में डाक्टरी पेशे में व्यावसायिकता हावी हो गयी है। मानव-मूल्यों तथा समाज की सेवा के उच्चादर्श हाशिये पर चले गये हैं तथा ऐन-केन-प्रकारेण धन कमाने की लिप्सा बढ़ गयी है। वृत्तिक नीतिशास्त्र पर व्यावसायिकता का आवरण चढ़ गया है तथा इनके द्वारा डॉक्टरों को अपना धर्म पालन करने के लिये विवश नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट के सद्य निर्णय पर जश्न मनाने की बजाय आत्मांवेषण कर वृत्तिक नीति-शास्त्र के पालन तथा वैश्वासिक रिश्ते को अक्षुण्ण रखने के लिये तत्पर रहने का समय सामने है।