Wednesday, 1 July 2026

कानून का मखौल उड़ाती जातीय पंचायतें

 पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने राज्य की झज्जर जिले की असंधा ग्राम की एक जातीय पंचायत के उस आदेश के अमल पर रोक लगा दी है जिसके द्वारा वहाँ विवाहित दम्पत्ति के रूप में रह रहे रामपाल तथा सोनिया के तथाकथित सगोत्र विवाह को मान्यता देने से मना कर दिया था तथा यह फतवा दिया था कि वे 'भाई-बहन' की तरह रहें। पंचायत के इस अवैध आदेश से सकते की स्थिति में पहुँचे गये रामपाल ने तो तलाकनामे पर हस्ताक्षर भी कर दिये थे तथा सोनिया को बहन मानकर 'शगुन' के तौर पर दस रुपये देने की पेशकश की थी लेकिन सोनिया ने पंचायत के फैसले को मानने से इंकार कर दिया। सोनिया के साथ उसकी ननद सहित ससुराल के लोग तथा नारीवादी संगठन एकजुट हो गये तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रमुखता पाने के बाद विवाह को अवैध ठहराने वाले फतवे की तीखी आलोचना हुयी।

ज्ञातव्य है कि रामपाल का डेढ़ वर्ष पूर्व विवाह हुआ था तथा वर्तमान में सोनिया तीन माह की गर्भवती है। पंचायत का कथन था कि रामपाल का गोत्र 'दहिया' है तथा सोनिया 'राठी' गोत्र की है जिनमें विवाह वर्जित है क्योंकि दोनों में 'भाई-चारा' है। सोनिया की तरफ से पंचायत के समक्ष बताया गया कि वह वास्तव में 'हुड्डा' गोत्र की है जो सगोत्र की परिधि में नहीं आता है। लेकिन पंचायत ने इस तथ्य को नकारते हुए उनके विवाह को अवैध घोषित कर उन्हें 'भाई-बहन' के रूप में रहने का फरमान जारी कर दिया। गनीमत रही कि सोनिया ने पंचायत के फैसले के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया बल्कि उसके विरुद्ध संघर्ष करते रहने का एलान किया। सोनिया ने आरोप लगाया है कि उसके ससुराल वालों की सम्पत्ति हथियाने के इरादे से गाँव के असरदार लोगों ने एक साजिश की तहत उनके विवाह को अवैध घोषित करवाया है। उच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश पारित होने से पंचायत के निर्णय के प्रवर्तन पर फिलहाल रोक तो लग गयी है लेकिन कानून का मखौल उड़ाने वाले निर्णयों को प्रतिबन्धित करने के लिए प्रभावी कदम की आवश्यकता पर एक बार पुनः बहस छिड़ गयी है।
हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत वैध-विवाह की शर्तों में सगोत्र विवाह को अवैध, शून्य या शून्यकरणीय नहीं माना गया है। अधिनियम के अन्तर्गत 'सपिण्ड' तथा 'प्रतिबन्धित दाय' में पड़ने वाले स्त्री-पुरुष के मध्य विवाह अमान्य होता है। सपिण्ड में वे रिश्ते आते हैं जो हिन्दू विधि के अनुसार मृतक के लिए पिण्डदान करने के अधिकारी होते हैं यथा दादा, ताऊ, चाचा आदि के बच्चे। प्रतिबन्धित दाय के अन्तर्गत मातृ-पक्ष से बंधे हुये रिश्ते भी आते हैं। उदाहरणार्थ ममेरे, मौसेरे भाई-बहन आदि। इनके मध्य विवाह वर्जित है लेकिन यदि उनके यहाँ प्रथा हो तो ऐसे विवाह को भी मान्यता देने का प्राविधान है। कई हिन्दुओं में मामा-भांजी के मध्य विवाह की परिपाटी है। इन रिश्तों के बच्चों के बीच कभी-कभार सेक्स-सम्बन्ध हो जाते हैं, जिनका खुलासा होने पर दोनों पक्ष के माता-पिता बच्चों का विवाह कर देने में ही भलाई समझते हैं। ऐसे विवाह भी विधि सम्मत होते हैं।
सगोत्रियों के मध्य विवाह पर रोक के पीछे कोई ठोस कारण नहीं है। दरअसल, एक ऋषि के यहाँ शिक्षा पाये शिष्यों को सगोत्र (सः गोष्ठ) माना जाता था तथा उनके मध्य भाई का रिश्ता माना जाता था। यहीं उनके बच्चों के मध्य भी प्रचलित था अतः उनके मध्य विवाह वर्जित रहा है। सपिण्ड तथा प्रतिबन्धित दाय के रिश्तों में वैज्ञानिक कारणों से विवाह हतोत्साहित किया जाता है क्योंकि ऐसे दम्पत्ति की संतानें कमजोर तथा अल्पजीवी होती हैं। लेकिन जहाँ तक कानून का प्रश्न है, वह इस प्रकार के विवाहों को भी कतिपय स्थितियों में मान्यता देता है।
रामपाल तथा सोनिया के तथाकथित सगोत्र विवाह के अटठारह महीने के बाद और वह भी जब पत्नी गर्भवती है, तब विवाह को रद्द करना तथा उन्हें भाई-बहन के रूप में जीवन-यापन करने का आदेश देना विधि के विरुद्ध तो है ही, सामान्य नैतिकता के सिद्धान्तों, जीवन मूल्यों, तथा परिवार की संस्था के प्रति घोर अवमानना का परिचायक है। पंचायत के बुजुर्ग सदस्यों ने इस बात पर विचार ही नहीं किया कि ऐसे 'भाई-बहन के संसर्ग से उत्पन्न जातक को समाज में कलंकित होने का दंश आजीवन झेलना पड़ेगा। ऐसे जातक से तो अवैध या नाजायज संतान की प्रास्थिति अच्छी होगी। ऐसा मानने का पर्याप्त कारण है कि जातीय पंचायत का यह निर्णय या तो जैसा सोनिया ने आरोप लगाया है, किसी अन्यथा उद्देश्य से लिया गया है, अथवा पंच-लोग गंभीर मानसिक रोगी हो गये हैं।
झज्जर की पंचायत द्वारा लिए गये उक्त निर्णय से पहले भी कई अन्य जातीय पंचायतों द्वारा इससे मिलते-जुलते विधि विरुद्ध निर्णय लिये गये हैं। तथाकथित ऊंची तथा नीची जाति के लड़के-लड़कियों के मध्य प्रेम तथा विवाह को मान्यता न देकर उनको गांव-घर से बाहर करने तथा कई बार उनकी हत्या तक करने के फरमानों के समाचार अक्सर पढ़ने को मिलते हैं। अभी हाल मे मुजफ्फरनगर के गाँव की पंचायत द्वारा एक बलात्कारी से उसी लड़की का विवाह कराने का फरमान जारी कर दिया गया हालांकि व्यथित लड़की तथा उसके घर वाले उस कापुरुष से विवाह करने के बहुत खिलाफ थे। 
रामपाल तथा सोनिया के उक्त प्रकरण से थोड़े ही दिन पूर्व आरिफ-गुड़िया-तौफीक के विवाह तथा गर्भ में पल रहे आठ माह के बच्चे को लेकर मुल्ला-मौलवियों की पंचायत ने अलग-अलग तथा परस्पर-विरोधी फतवे दिये थे। ज्ञातव्य है कि गुड़िया का विवाह भारतीय सेना के जवान आरिफ के साथ हुआ था। युद्ध भूमि में आरिफ लापता हो गया तथा भारतीय सेना ने उसे 'भगोड़ा' घोषित कर दिया था। आरिफ के आने की सम्भावना क्षीण होने पर गुड़िया का विवाह एक स्कूटर मैकेनिक तौफीक के साथ हो गया। वह तौफीक के बच्चे को गर्भ में आठ माह से पाल रही थी कि खबर आई कि आरिफ पाकिस्तान की जेल में बन्द है तथा शीघ्र ही छूट कर वापस अपने घर आ गया। आरिफ तथा तौफीक के बीच गेंद बनी गुड़िया तथा उसके पेट में पल रहे बच्चे को लेकर जिस प्रकार के फतवे विभिन्न मुस्लिम विचार-धारा के धर्मगुरुओं ने दिये है उससे स्थिति और अधिक उलझ गयी है तथा उस अजन्मे बच्चे की स्थिति पर चारों ओर से शंकायें की जा रही हैं।
अभी हाल ही में एक जाति विशेष की पंचायत द्वारा उन पुरुषों तथा महिलाओं को 'सम्मानित' कर अभिनन्दन किया गया जिनके आठ या उससे अधिक बच्चे हैं। राष्ट्रीय जनसंख्या नीति तथा उन पर बने कानूनों की खिल्ली उड़ाते हुए यह कार्यक्रम अल्पसंख्यकों के लिए प्रतिगामी संदेश ही देते हैं।
भारतीय संविधान में किसी पंचायत के अधिकार क्षेत्र में पति-पत्नी को भाई-बहन घोषित करना शामिल नहीं है। अतः हाईकोर्ट ने उस पर रोक लगा दी तथा मीडिया में प्रमुखता पाने के कारण रामपाल तथा सोनिया ने फिलहाल राहत की साँस ली होगी। इन जातीय पंचायतों का कोई वैधानिक अधिकार भी नहीं है लेकिन जाति में बेदखल कर दिये जाने के डर से भीरु लोग इनके निर्णय को आत्मसात् करने के लिए मजबूर होते हैं, तथा अधिकांश मामलों में इनका निर्णय अन्तिम और बाध्यकारी हो जाता है। वैसे हरियाणा, पंजाब, तथा पश्चिमी उत्तर-प्रदेश आदि क्षेत्र में गाँव की पंचायत तथा जातीय पंचायतें पर्याय के रूप में उभरी हैं क्योंकि वही व्यक्ति दोनों के कर्त्ताधर्त्ता होते हैं। स्थानीय दबंग लोगों के इशारे पर चलने वाली इन पंचायतों पर पुलिस तथा प्रशासन की पकड़ नहीं हो पाती तथा राजनीतिज्ञों एवं विधायकों का समर्थन होने के कारण इनका आतंकराज कायम रहता है। समय आ गया है कि ऐसी पंचायतों के गठन पर कानूनन रोक लगायी जाय तथा विधि विरुद्ध फरमानों को अपराध घोषित कर उनके लिए दण्ड की व्यवस्था की जाय। धार्मिक मामलों में कठमुल्लापन पर रोक के लिए त्वरित प्रयास अपरिहार्य हैं जिसमें समान नागरिक संहिता का परित होना शामिल है।

सांविधानिक शक्ति विभाजन और संसद की सम्प्रभुता

झारखण्ड राज्य में अल्पमत वाले गठबन्धन को सरकार बनाने का न्योता देने तथा अपना बहुमत सिद्ध करने के लिये मुनासिब से ज्यादा समय देने के राज्यपाल के निर्णय के खिलाफ उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेश के विरुद्ध लोकसभा में तीखी प्रतिक्रिया हुयी। एन०डी०ए० के नेता अर्जुन मुण्डा (अब मुख्यमंत्री) के द्वारा दायर की गयी याचिका में आरोप लगाया गया था कि राज्यपाल ने अपने संवैधानिक विवेकाधिकार का उपयोग सद्भावनापूर्वक नहीं किया तथा केन्द्र की यू०पी०ए० सरकार के घटकों को तुष्ट करने की नीयत से बहुमत वाले गठबन्धन के दावे को जानबूझकर तथा मनमाने तरीके से नजरअंदाज किया। उच्चतम न्यायालय ने सभी सम्बन्धित पक्षों को सुनने के बाद 11 मार्च को विधान सभा की बैठक आहूत कर बहुमत का फैसला उसी के पटल पर कराने का आदेश दिया। विधायकों पर जोर-जबरदस्ती करने तथा उनकी खरीद-फरोख्त करने के आरोप को दृष्टिगत रखते हुये यह भी आदेश दिया गया कि राज्य के मुख्यसचिव तथा डी०जी०पी० सदन की कार्यवाही पर निगाह रखें जिसकी वीडियोग्राफी की जाय तथा इस सारी कार्यवाही से न्यायालय को सूचित भी किया जाय।

इस आदेश के पारित होने के दूसरे ही दिन संसद के दोनों सदनों में भारी हंगामा हुआ तथा एन०डी०ए० को छोड़कर प्रायः सभी ने न्यायालय के इस आदेश की कटु आलोचना की एवं इसे विधायिका के कार्यक्षेत्र में खुला हस्तक्षेप करार दिया। लोकसभा के अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी ने तो इसकी संसद की सम्प्रभुता को चुनौती के रूप में पेश किया तथा केन्द्र सरकार से यह अपील की कि संविधान के अनुच्छेद 143 के सलाहकारी क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत उच्चतम न्यायालय से ही उसकी राय मांगी जाय कि भारतीय संविधान में लागू शक्ति परीक्षण के सिद्धान्त के अनुसार कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका की परिधियां क्या हैं तथा संसद की प्रभुसत्ता में न्यायपालिका की दखलंदाजी कितनी अनुमत है। इस बैठक में उपस्थित दलों की सर्वसम्मत राय थी कि संसदीय कार्यवाही को डी०जी०पी० तथा मुख्य सचिव की निगरानी में कराना विधायिका की स्वायत्तता तथा गरिमा के प्रतिकूल है तथा कार्यवाही की वीडियो ग्राफी को गवाही के तौर पर सुप्रीम कोर्ट में पेश करने का आदेश अवाछिंत ही नहीं अनावश्यक है। झारखण्ड में विधान सभा की कार्यवाही पर न्यायपालिका की नजर का विरोध करने वालों का कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 122 तथा 212 के अन्तर्गत क्रमशः संसद तथा विधान मंडलों की कार्यवाहियों की विधि मान्यता की प्रक्रिया की किसी अनियमितत्ता के विषय में न्यायालय की अधिकारिता वर्जित है, संसद में क्रिया या कार्य संचालन का विनियमन करने की अथवा व्यवस्था बनाये रखने की शक्तियां सदन में ही निहित हैं तथा उस पर न्यायालय सहित कोई भी बाहरी हस्तक्षेप असंवैधानिक है। कतिपय सदस्यों का यह मानना है कि भारतीय संविधान में संसद सर्वोच्च है तथा उस पर कोई भी अंकुश या जवाबदेही अमान्य है अतः किसी का भी हस्तक्षेप सदन की अवमानना तथा उसे प्राप्त विशेषाधिकारों का हनन है।

महान फ्रांसीसी विधिशास्त्री तथा संविधानविद् मान्टेस्क्यू ने प्रजातंत्र के सुचारु संचालन के लिये शक्ति पृथक्करण का सिद्धान्त प्रतिपादित किया था। इसके अनुसार सरकार के तीनों अंगों, यथा विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका में स्पष्ट विभाजक रेखा होनी चाहिए तथा किसी को दूसरे के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। मान्टेस्क्यू के अनुसार यदि शक्ति विभाजन को कठोरता से लागू नहीं किया गया तो शक्ति का मनमाना प्रयोग होगा तथा जनता में त्राहि-त्राहि मच जायेगी। शक्ति पृथक्करण के इस सिद्धान्त को अमेरिकी संविधान में आदर्श रूप से प्रतिष्ठित किया गया है तथा वहाँ के लिखित संविधान में कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका की शक्तियां क्रमशः राष्ट्रपति, काँग्रेस तथा सर्वोच्च न्यायालय में इस प्रकार विभाजित हैं कि उनमें आपस में टकराव न हो। इसके विपरीत इंगलैंड में संसद सर्वोच्च है। वहाँ का प्रधानमंत्री संसद के निचले सदन का नेता होता है जिसे कार्यपालिका के मुखिया के कार्य करने की अपरिहार्यता होती है। वहाँ का सर्वोच्च न्यायालय कोई और नहीं बल्कि हाउस आफ लार्ड्स (उच्च सदन) की जुडीशियल कमेटी होती है। वहाँ अलिखित संविधान है तथा संसद कोई भी कानून पारित करने में या सांविधानिक विधि में परिवर्तन करने में पूर्णतः सक्षम है। हालांकि भारत में अमेरिका की तरह लिखित संविधान है लेकिन हमने ब्रितानी संसदीय प्रणाली अपनायी है जिसके कारण शक्ति पृथक्करण का सिद्धान्त कड़ाई से लागू नहीं हो पाया है। भारत में भी व्यावहारिक रूप में कार्यपालिका तथा विधायिका के मध्य विभाजक रेखा नहीं है। हाँ, न्यायपालिका को स्वायत्त तथा स्वतंत्र अवश्य बनाया गया है जिससे नागरिकों के मूल अधिकारों, मानवाधिकारों तथा केन्द्र और राज्यों के मध्य विवादों का निपटारा हो सके। लेकिन जहाँ अनुच्छेद 122 तथा 212 में संसद तथा विधानमंडलों की कार्यवाहियों में उन्हें खुदमुख्तारी दी गयी है तथा अनु० 105 एवं 194 में सांसदों तथा विधायकों एवं उनकी समितियों को शक्तियां, उन्मुक्तियां तथा विशेषाधिकार प्रदान किये गये हैं वहीं अनु० 129 में उच्चतम न्यायालय को अभिलेख न्यायालय का दर्जा दिया गया है, अनुच्छेद 131 में संविधान के संघीय स्वरूप की रक्षार्थ आरम्भिक अधिकारिता दी गयी है, अनुच्छेद 141 में इसके निर्णय देश में सभी पर बाध्यकारी बनाये गये हैं तथा अनुच्छेद 142 के अन्तर्गत किसी वाद या विषय में 'पूर्णन्याय' करने के लिये डिक्री या आदेश पारित करने की अधिकारिता है। इसके निर्णयों को भारत के सम्पूर्ण राज्य क्षेत्र में प्रर्वतन सुनिश्चित किया गया है। संविधान सभा में स्थिति स्पष्ट करते हुये बाबा साहब अम्बेडकर ने कहा था कि भारत में वस्तुतः संविधान सर्वोपरि है, कानून का शासन है तथा  विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका संविधान से उद्भूत है जो इनका नियामक तथा नियंता है। देश की सम्प्रभुता सरकार के किसी अंग विशेष में नहीं बल्कि 'भारत के लोगों' में बसती है।

संसदीय कार्यवाही में स्वेच्छाचार, विशेषाधिकार को लेकर न्यायालयी क्षेत्राधिकार को कई बार प्रश्नगत किया गया है। आपात स्थिति के दौरान जब शासक दल सहित कई सांसद नजरबन्द थे तब संविधान में संशोधन किया गया तथा प्रधानमंत्री के चुनाव को अदालती कार्यवाही से अलग कर दिया गया था। लोक प्रतिनिधित्व कानून में भी संशोधन किया गया था। इन कानूनों को इस आधार पर चुनौती दी गयी थी कि संसद ठीक तरह से गठित नहीं है अतः उसके द्वारा पारित कानून विधिमान्य नहीं है। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने इस आधार को खारिज कर दिया था। केशव सिंह के बहु प्रचारित विवाद में अनुच्छेद 143 के अन्तर्गत किये गये सन्दर्भ का उत्तर देते हुये भी उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि भारत में शक्ति पृथक्करण का सिद्धान्त कड़ाई से लागू नहीं होता है लेकिन तीनों अंगों की सीमायें स्पष्ट हैं तथा यदि वे सद्भावनावूर्ण एवं प्रजातंत्र की भावना से काम करें तो उनमें टकराव की गुंजाइश ही नहीं है। नरसिंहराव सरकार को विश्वास मत दिलाने के लिये कतिपय सांसदों द्वारा कथित रूप से रिश्वत लेकर वोट देने के प्रश्न पर भी उच्चतम न्यायालय का मत था कि सदन के अंदर की कार्यवाहियों को न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जा सकता।
लेकिन यहाँ पर जम्मू कश्मीर विधान सभा के सदस्य श्री भीम सिंह का वाद भी उल्लेखनीय है जिसमें उन्होंने उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपनी अवैध गिरफ्तारी को यह कहते हुये चुनौती दी थी कि व्यवस्थापिका ने उन्हें सदन की कार्यवाही में भाग लेने से विरत करने के लिये नजरबन्द किया है। न्यायालय ने न सिर्फ उनकी बन्दी-प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार की बल्कि असद्भावनापूर्ण निरोध तथा मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिये मुआवजा भी दिलवाया था।

इंग्लैंड की संसद ने अपनी कार्यवाही को स्वयं संचालित करने का अधिकार इसलिये विकसित किया था क्योंकि तत्कालीन राजा इन प्रतिनिधियों को तरह-तरह से प्रताड़ित और परेशान करता था। भारत में तथा वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इस प्रकार का कोई खतरा नहीं है तथा कानून के शासन का दम भरने वाली शासन व्यवस्था में कोई भी व्यक्ति या संस्था कानून तथा संविधान से ऊपर नहीं है। इन परिस्थितियों में विधायिका तथा न्यायपालिका में सम्प्रभुता का विवाद अनौचित्यपूर्ण ही नहीं बल्कि दुर्भाग्यपूर्ण है। आगामी 20 मार्च को राज्य विधान मण्डलों के पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में इस विषय पर विचार स्वायत योग्य होगा लेकिन इस प्रकरण को विधायिका बनाम न्यायपालिका बनाने से जनमानस में गलत संदेश जायेगा।

लोकपाल विधेयक की परिधि और प्रासंगिकता

संसद के आगामी शीतकालीन अधिवेशन में लोकपाल विधेयक को एक बार पुनः पेश किये जाने की कवायद के साथ ही अन्यों के अतिरिक्त राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के क्षेत्राधिकार की परिधि में लाने को लेकर एक नयी बहस छिड़ गयी है। जहाँ वर्तमान राष्ट्रपति डा० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम तथा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इन संवैधानिक पद-धारियों को प्रस्तावित कानून से आच्छादित करने को उचित करार दिया है, वहीं वर्तमान उपराष्ट्रपति श्री भैरोंसिंह शेखावत तथा पूर्व प्रधानमंत्री श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह समेत कतिपय नेताओं ने इस ऊंचे पद को कानून के क्षेत्राधिकार से बाहर ही रखने की वकालत की है। ज्ञातव्य है कि लोकपाल विधेयक पहली बार 1969 में पेश किया गया था लेकिन पारित न हो सका। तब से लेकर 1998 तक विभिन्न सरकारों ने कतिपय संशोधनों के साथ इसे आठ बार लोकसभा में पेश किया लेकिन अभी तक सम्बन्धित कानून मरीचिका ही साबित हुआ है। प्रस्तावित कानून पर नवी बहस के साथ ही वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इसकी प्रासंगिकता तथा उपादेयता पर भी शंका जाहिर की जा रही है।
बीसवीं शताब्दी में लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना के साथ सरकारी कृत्यों में अभूतपूर्व वृद्धि हुयी है। सामाजिक सेवाओं तथा अर्थव्यवस्था के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु प्रजातांत्रिक सरकारों द्वारा नागरिकों के दैनंदिनी जीवन के प्रायः प्रत्येक पहलू में हस्तक्षेप होने लगा है। ऐसे हस्तक्षेप में वे कार्य भी आते हैं जो कार्यपालिका के विवेकाधीन होते है तथा जिनमें भ्रष्टाचार, पक्षपात, प्रमाद, अक्षमता, अनैतिकता, मनमानापन तथा विलम्ब की पर्याप्त गुंजाइश होती है। प्रशासन तथा व्यवस्थापिका पर नजर रखने के लिये 'प्रहरी', 'परिवाद अधिकारी' अथवा 'प्रशासन का संसदीय कमिश्नर' के नामों से प्रचलित 'अम्बुड्समैन' की संस्था की शुरुआत 1809 में सर्वप्रथम स्वीडन में हुयी थी। फिनलैण्ड, डेनमार्क, तथा नार्वे, ऐसे स्कैंण्डिनेवियन देशों से पल्लवित-पुष्पित होती यह संस्था न्यूजीलैण्ड, अल्जीरिया, मारीशस, गुयाना, कनाडा तथा इंग्लैण्ड सहित, अन्यान्य प्रजातांत्रिक देशों में अपना स्थान बना चुकी है। भूतपूर्व अटार्नी जनरल एम०सी० सीतलवाड ने साठ के दशक के प्रारम्भ में अपने यहाँ भी 'अम्बुड्समैन' की तर्ज पर केन्द्र में 'लोकपाल' तथा राज्यों में 'लोकायुक्त' की संस्थायें गठित करने का सुझाव दिया था। उड़ीसा, महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश तथा उत्तरांचल समेत कई राज्यों में लोकायुक्त कार्यरत है लेकिन केन्द्र ने इसकी व्यवस्था अभी की जानी है।
शासन सत्ता के उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों के आचरण पर अंकुश के लिये भारतीय दण्ड संहिता, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम तथा जांच आयोग अधिनियम आदि कानून हैं तथा इनके प्रर्वतन के लिये पुलिस तंत्र के अलावा केंद्रीय सतर्कता आयोग तथा विभिन्न गुप्तचर एजेंसियां कार्यरत हैं। लेकिन एक आम नागरिक के लिए इनमें गति पैदा करना आसान नहीं है। अखबारों, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चैनलों आदि में जब मामला उछलता है तो सरकारें हरकत में आती हैं तथा जांचें बैठायी जाती हैं। लेकिन इन जांचों को राजनीति से प्रेरित कह कर स्थिति को धुंधा-धुंधा करने के प्रयास होते हैं, इनमें इतनी देर भी होती है कि तत्कालीन आवेग चुक जाता है। बाद में पर्याप्त साक्ष्य न होने के कारण मामले न्यायालय से छूट जाते हैं और आरोपी अपने को दूध का धुला साबित कर ले जाते हैं। अपवादों को छोड़कर अभी तक कोई बड़ी मछली भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के चंगुल में नहीं फंस सकी है।
न्यायिक पुनर्विलोकन तथा संसदीय नियंत्रण के अपर्याप्त सिद्ध होने, प्रशासन के अधिकारों के प्रवर्धन में अधिक पारदर्शिता लाने, नागरिकों के सूचना प्राप्त करने के मौलिक अधिकारों को अमली जामा पहनाने तथा एक उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिये एक ऐसी संस्था की आवश्यकता है, जो प्रत्यक्ष तथा निष्पक्ष हो, जांच की कार्यवाहियां वैयक्तिक तथा औपचारिक प्रकृति की हों, कार्यवाहियां न्यायिक हस्तक्षेप से परे हों तथा उसे अपने कार्यों को पूरा करने में अधिक से अधिक स्वायत्तता तथा स्वतंत्रता हो। इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिये केन्द्र में लोकपाल तथा राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति की अनुशंसा हुयी थी।
सन् 1998 में जिस लोकपाल विधेयक को पेश किया गया था उसमें एक त्रिस्तरीय संस्था के गठन का प्राविधान था। इसके अध्यक्ष तथा दो सदस्यों के लिये क्रमशः भारत का मुख्य न्यायाधीश तथा उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश या उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश होना अर्हता रखी गयी थी। इनका कार्यकाल पांच वर्ष था तथा इन्हें एक सामान्य सिविल न्यायालय की शक्ति दी गयी थी। इस विधेयक में 33 खण्ड हैं और यह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के हेतु दिये गये समस्त परिवादों को सम्मिलित करता है। लोकपाल लोकाभिमुखकारी वह है जो संघ में प्रधानमंत्री, उपमंत्री का पद धारित करता है अथवा कर चुका है। इस प्रकार यह विधेयक बहुत ही संकुचित प्रकार के मामलों में एक सीमित दायरे वाले प्राधिकारियों के लिये लागू होगा। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, उच्चतम न्यायपालिका के न्यायाधीशों आदि संवैधानिक पदाधिकारियों पर इसका अधिकार क्षेत्र नहीं रखा गया है।
लोकपाल शिकायतों की जांच करता है तथा अपनी सिफारिश प्रधानमंत्री को देगा जो उस पर कार्यवाही करने के लिये स्वतंत्र होगा। प्रधानमंत्री की स्थिति में उसके विरुद्ध कार्यवाही करने का अधिकार अंततोगत्वा लोकसभा के ऊपर छोड़ दिया गया है, क्योंकि वह लोकसभा के प्रति जिम्मेदार होता है। लोकपाल की सिफारिशें अनुशांसात्मक होती हैं, तथा उन पर कार्यवाही करना या न करना प्रधानमंत्री के विवेकाधिकार में होता है।
भारतीय संविधान में राष्ट्रपति नाममात्र का शासक है। उपराष्ट्रपति राज्य-सभा का सभापति होता है तथा राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उसके पद पर कार्यवाहक के रूप में कार्य करता है। राष्ट्रपति के रूप में वह मंत्रिपरिषद की सलाह से बाध्य होता है। प्रधानमंत्री पर सरकार चलाने का दायित्व होता है तथा वह अपने अधीनस्थ मंत्रियों पर लगाम रखता है। वह अपने पार्टी, लोकसभा तथा भारत की जनता के प्रति जवाबदेह होता है, अतः उससे भ्रष्ट आचरण की अपेक्षा नहीं है। लेकिन जहाँ ऐसे भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ कार्यवाही करने का प्रश्न है - हमारे देश में पिछले दिनों घटित घटनायें कुछ और ही कहानी कहती हैं। पिछली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन सरकार के कुछ मंत्रियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामले आये जो गम्भीर थे तथा पर्याप्त साक्ष्य भी थे। सम्बन्धित मंत्री ने क्षोभ में आकर त्याग-पत्र भी दिया लेकिन शीघ्र ही वापस मंत्रिमण्डल में ले लिए गये। वर्तमान संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन में भी ऐसे मंत्री हैं जिनके विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामले चल रहे हैं। गठबन्धन की राजनीति में ऐसे तत्वों को मंत्रिपद देने के अपने कारण तथा विवशतायें हैं। जिस मोल-भाव तथा जोड़-तोड़ से सरकारें बन रही हैं उसमें भ्रष्टाचारियों को मंत्री बनाना हमारी नियति बन गया है। ऐसे तत्व प्रत्येक राजनीतिक दल में हैं तथा इनके विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य भी हैं लेकिन इन्हें फिर-फिर मंत्रिमण्डल में जगह देना मजबूरी है। ऐसे लोगों के विरुद्ध लोकपाल अपनी अनुशंसा देगा लेकिन प्रधानमंत्री के पास ऐसी फाइल को अलमारी में बंद रखने के सिवाय कोई चारा नहीं होगा तथा लोकपाल की संस्था 'कागजी शेर' बन कर रह जायेगी। अपने विरुद्ध लोकपाल द्वारा की गयी किसी टिप्पणी पर सम्बन्धित मंत्री उल्टे लोकपाल पर राजनीति से प्रेरित होकर कार्य करने का आरोप लगायेगा।
थोड़े दिनों पूर्व उच्चतम न्यायालय के एक न्यायाधीश के विरुद्ध सरकारी धन के दुरुपयोग को लेकर महाभियोग चलाया गया था लेकिन लोकसभा में वोटिंग के समय सांसद उत्तर-दक्षिण के नाम पर बंट गये तथा प्रस्ताव गिर गया। लगभग उसी समय उच्चतम न्यायालय ने हवाला कांड की सुनवाई हो रही थी। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने भरी अदालत में कहा कि उनको इस मामले को न बढ़ाने के लिए धमकियाँ दी जा रही हैं तथा धमकी देने वाला अदालत में मौजूद है। लेकिन उन्होंने उसका नाम बताने से इंकार कर दिया। प्रश्न यह है कि यदि भारत के मुख्य न्यायाधीश को धमकियाँ दी जा सकती हैं तथा वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है फिर एक सामान्य नागरिक की हैसियत ही क्या है?
कौटिल्य ने कहा था कि समुद्र में रहने वाली मछली कितना पानी पीती है और कितना निकालती है, वह कोई नहीं जान सकता। इसी प्रकार लोक-कोष पर कब्जा जमाये अधिकारी कितना इधर-उधर करते हैं, यह जानना आसान नहीं है। भारतीय राजनीति आंकठ भ्रष्टाचार में डूबी हुयी है तथा नेता-नौकरशाही-अपराधी की तिकड़ी बड़ी बेशर्मी से जनता के धन का दोहन कर रही है। इनको काबू में करने के लिए सतर्क, जानकार तथा उच्च मानव मूल्यों की पोषक जनता को आगे आना होगा तथा अपने धन की रक्षा स्वयं करने के लिए दृढ़ संकल्पित होना पड़ेगा।

 

दो बच्चों से अधिक पर चुनावी अयोग्यता का कानून- पर-उपदेश कुशल बहुतेरे

 केन्द्रीय सरकार ने अन्ततः उन्यासीवें संविधान संशोधन विधेयक को वापस लेने का फैसला कर लिया है। यह विधेयक 1992 में लाया गया था तथा राज्य-सभा में लम्बित था। 1995 में यह मानव संसाधन विकास मंत्रालय की प्रवर समिति को संदर्भित किया गया था। इस विधेयक में यह व्यवस्था थी कि संसद तथा राज्य विधान-मंडलों में वही लोग सदस्यता के लिये पात्र होंगे जिनके अधिकतम दो जीवित बच्चे हैं। सन् 1992 में जब यह विधेयक लाया गया था तो इसका कई राजनीतिक दलों द्वारा पुरजोर विरोध हुआ था तथा तत्कालीन सरकार को इसे प्रवर समिति को भेजने पर मजबूर होना पड़ा था जिससे कि मीडिया तथा न्यायालयों की नजरों से बच सके। उल्लेखनीय है कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों में अधिकांश ऐसे होते हैं जो इस कानून के बन जाने से अयोग्य हो जायेंगे, अतः ऐसे विधेयक का भ्रूण-स्खलन तो प्रस्वावित था। आम नागरिकों से परिवार नियोजन अपनाने की सलाह देने वाले हमारे जनप्रतिनिधि स्वयं इसके प्रति कितना गम्भीर और ईमानदार हैं, इसको जानने के लिये अब किसी और प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।

संविधान के चौहत्तरवें तथा चौहत्तरवें संशोधन अधिनियमों के द्वारा विभिन्न स्वायत्तशासी तथा स्थानीय संस्थाओं के संवैधानिक दर्जा दिया गया था तथा राज्यों को छूट दी गयी थी कि वे इन चुनावों हेतु उम्मीदवारों की पात्रता तथा आरक्षण आदि से सम्बन्धित विधि बनायें। हरियाणा, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र तथा गौआ आदि कई राज्यों ने अपने यहाँ परिवार नियोजन कार्यक्रमों को कठोरता से लागू किया है जिनमें अन्यों के अतिरिक्त यह भी व्यवस्था है कि नगर-पालिका तथा जिला परिषद जैसी स्वायत्तशासी संस्थाओं में ऐसे व्यक्तियों को चुनाव लड़ने के लिये अपात्र कर दिया है जिनके दो से अधिक जीवत बच्चे हैं।
इस सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णीत जावेद बनाम हरियाणा राज्य (2003) का वाद विशेष रूप से उल्लेखनीय है जिसमें हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 की उस धारा की संवैधानिकत्ता को चुनौती दी गयी जिसके अनुसार ऐसा कोई भी व्यक्ति पंचायती राज संस्थाओं की सदस्यता के लिये अपात्र होगा जिसके दो से अधिक संतानें जीवित हैं। न्यायालय में तर्क दिया गया कि यह धारा समता (अनु० 14), धर्म की स्वतंत्रता (अनु० 25), तथा प्राण एवं दैहिक स्वंतत्रता (अनु० 21) के अधिकार का उल्लंघन करती है जो संविधान के भाग 3 में वर्णित मौलिक अधिकार हैं। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने इस चुनौती को अमान्य करते हुये निर्धारित किया कि यह कानून मानव गरिमा के प्रतिकूल नहीं है। न्यायालय का कहना था कि इस प्रतिबन्ध का मुख्य उद्देश्य बढ़ती हुयी जनसंख्या को नियंत्रित करना तथा परिवार कल्याण के लक्ष्य को प्राप्त करना है। यह लोकतांत्रिक समाज की संरचना व देश के आर्थिक विकास के लिये आवश्यक है। राज्य की नीति के निदेशक तत्वों को मूर्त्त रूप प्रदान करने के लिये जनसंख्या पर प्रतिबन्ध लगाया जाना आवश्यक है।
मुस्लिम याचिका कर्ताओं द्वारा अपने वैयक्तिक विधि की दुहाई देकर यह भी तर्क दिया गया कि उनका पंथ परिवार नियोजन के लिये अनुमति नहीं देता, लेकिन न्यायालय ने इसे अमान्य करते हुये निर्धारित किया कि वैयक्तिक विधियाँ मौलिक अधिकार नहीं हैं तथा अनुच्छेद 25 अन्तःकरण की और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने तथा प्रचार करने की स्वतंत्रता ही प्रदान करता है। यह मौलिक अधिकार होते हुये भी लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के लिये लगाये जा सकने वाले निर्बन्धनों के अधीन है। न्यायालय ने इस तथ्य की ओर भी इंगित किया कि पवित्र कुरान में चार विवाह करने तथा प्रत्येक पत्नी से बच्चे पैदा करने की अपरिहार्यता नहीं है तथा परिवार नियोजन की मनाही नहीं है।
न्यायालय ने यह माना कि दो बच्चों से अधिक होने से सम्बन्धित व्यक्ति की पंच/सरपंच पद पर कार्य करने की क्षमता पर प्रत्यक्षतः कोई असर नहीं पड़ता लेकिन यह प्रावधान 'हाइड्रोजन बम' से भी अधिक खतरनाक 'जनसंख्या विस्फोट' को सीमित करने के उद्देश्य से बनाया गया है, अतः संविधान के शब्दों तथा आत्मा के अनुरूप है। जहाँ तक राज्य विधान-मण्डलों एवं संसद के चुनाव हेतु तौर-पृथक अपात्रता न होने का तर्क था, न्यायालय ने अपेक्षा व्यक्त की थी कि निस्सन्देह इस नियम को राष्ट्रीय स्तर पर लागू किये जाने की आवश्यकता है। प्रस्तावित संविधान विधेयक की वापस लेकर केन्द्र सरकार ने देश के प्रबुद्ध वर्ग की आशाओं पर ही तुषारापात नहीं किया वरन् उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित कानून का मखौल उड़ाया है।
जन-संख्या नियंत्रण सतत भारत की शीर्ष प्राथमिकताओं में रहा है तथा इसके लिये प्रथम पंचवर्षीय योजना से लेकर आज तक विभिन्न योजनायें केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा संचालित की गयी हैं। केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार नियोजन मंत्रालय का कहना है कि राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के अनुसार सन् 2010 तक जन्मदर 2.1 तक सीमित करने का लक्ष्य प्राप्त करना है जिससे सन् 2045 तक जनसंख्या की वृद्धि दर को सीमित किया जा सके। इसके लिये अनेक प्रोत्साहनों तथा हतोत्साहनों की योजनायें लागू की गयी हैं। दो बच्चों के बाद स्थाई बन्ध्याकरण कराने वाले दम्पत्तियों को नकद वेतन वृद्धि, प्रोत्साहन भत्ता, ग्रीन कार्ड आदि की सुविधायें देना शामिल हैं वहीं यह भी प्राविधानित किया गया है कि किसी स्त्री कर्मकार को पूरे सेवाकाल में अधिकतम दो बार प्रसूति अवकाश देय होगा तथा इनमें कम से कम तीन वर्ष का अंतर होना चाहिए।
बच्चे ईश्वर की देन हैं, देश का भविष्य हैं तथा प्रत्येक दम्पत्ति की आशाओं-आकांक्षाओं की प्रतिमूर्त्ति हैं। संविधान में भी स्त्री के मातृत्व का अधिकार एक मूल अधिकार के रूप में सृजित है। राज्य नीति निर्देशक तत्वों में काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता का उपबन्ध करने, पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने के उपबन्ध हैं। वैसे भी प्रत्येक स्त्री के जीवन की पूर्णता माँ बनने में है तथा सभ्यता के विकास क्रम में स्त्रियों को इसीलिये पूज्य और वंदनीय माना गया है। एयर इण्डिया बनाम नरगिस मिर्जा (1981) के वाद में उच्चतम न्यायालय ने विमान परिचारिकाओं से सम्बन्धित एयर इण्डिया के उस विनियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया था जिसके अन्तर्गत सेवा में आने के तीन वर्ष के भीतर तथा इसी मध्य गर्भ-धारण करने पर सेवा निवृत्ति का प्रावधान था। न्यायालय ने इसे मनमाना तथा सभ्य समाज की अवधारणा के विरुद्ध करार दिया था। उसका कहना था कि भारतीय स्त्रीत्व का यह अपमान होगा यदि उसे विवाह तथा मातृत्व के सुख से हतोत्साहित किया जाय। इसी विनिश्चय के आधार पर बाद में उच्चतम न्यायालय ने उन स्त्री कर्मकारों को भी मातृत्व-अवकाश का अधिकारी करार दिया जो अस्थाई, तदर्थ या नित्य-मजदूरी के आधार पर कार्यरत हैं। जहाँ मातृत्व के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया है वहीं राष्ट्र की आर्थिक, सामाजिक तथा राजनैतिक प्रगति के लिये परिवार नियोजन हेतु उठाये गये कदमों को भी वैध करार दिया गया है। नरगिस मिर्जा के उक्त वर्णित वाद में भी उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि यदि विमान परिचारिकाओं का तीसरा बच्चा होने के बाद सेवा-निवृत्त किये जाने का प्रावधान होता तो वह युक्ति संगत होता।
दो बच्चे के सिद्धान्त को कठोरता से लागू करने की मांग कतिपय क्षेत्रों में की जा रही है। कहा जा रहा है कि सरकारी तथा अर्ध-सरकारी क्षेत्र की नौकरियों, विभिन्न योजनाओं के तहत दी जाने वाली सुविधाओं तथा जनतांत्रिक संस्थाओं के विभिन्न पदों पर चयनित होने के लिये दो बच्चों की शर्त अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। इसके लिये शीर्ष स्थानों पर बैठे लोगों को पहल करनी होगी जिससे अन्यों को अनुसरण करने की प्रेरणा प्राप्त हो। सलाह तो यहाँ तक दी जाती है कि वोट देने का अधिकार उन्हीं तक सीमित कर दिया जाना चाहिए जो परिवार नियोजन की राष्ट्रीय नीति के पालनकर्ता हैं। संविधान के भाग 4 (क) के अन्तर्गत भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्त्तव्य है कि वह संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों तथा संस्थाओं का आदर करे, ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध है; तथा व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करें जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुये उपलब्धि की नयी ऊँचाइयों को प्राप्त कर सके। इसको पूरा करने के लिये जनसंख्या नियंत्रण पहली शर्त है। प्रस्तावित संविधान संशोधन विधेयक को वापस लेकर जनप्रतिनिधियों ने अपने को कानून से ऊपर तथा 'पर उपदेश कुशल बहुतेरे' की उक्ति चरितार्थ की है जिससे उनके प्रति सम्मान में कमी आयेगी।

महिला कर्मियों के सांविधानिक तथा कानूनी अधिकार

 भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39 में राज्य द्वारा अनुसरणीय कुछ नीति तत्वों में उपबन्धित है कि राज्य अपनी नीति का, विशिष्टतया, इस प्रकार संचालन करेगा कि सुनिश्चित रूप से पुरुष और स्त्री सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो; पुरुषों एवं स्त्रियों दोनों का समान कार्य के लिये समान वेतन हो तथा इन कर्मकारों के स्वास्थ्य और शक्ति का तथा बालकों की सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग न हो एवं आर्थिक आवश्यकता से विवश होकर नागरिकों को ऐसे रोजगारों में न जाना पड़े जो उनकी आयु या शक्ति के अनुकूल न हो। इसी प्रकार अनुच्छेद 42 काम की न्याय संगत और मानवोचित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता के लिये उपबन्ध करने का निर्देश देता है। अनुच्छेद 43 स्त्री एवं पुरुष कर्मकारों के लिये निर्वाह मजदूरी आदि की व्यवस्था करने का निर्देश देता है क्योंकि राष्ट्र के आर्थिक विकास में भागीदार स्त्री-पुरुष श्रमिकों की गरिमा एवं उनके व्यक्तित्व को बनाये रखने के लिये उन्हें निर्वाह योग्य मजदूरी दिया जाना तथा उन्हें सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना अपरिहार्य है। अभी हाल में जोड़े गये अनुच्छेद 43-क के अनुसार उद्योगों के प्रबन्ध में स्त्री-पुरुष कर्मकारों की भागीदारी सुनिश्चित करने का राज्य को निर्देश है।

राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के अनुपालन में संघ तथा राज्य सरकारों ने विभिन्न अधिनियम पारित किये हैं जिन्हें स्त्री-पुरुष कर्मियों की कार्यदशा सुधारने का प्रयास किया गया है। इनमें प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम; मजदूरी संदाय अधिनियम; न्यूनतम मजदूरी अधिनियम; बोनस संदाय अधिनियम; तथा कारखाना अधिनियम आदि प्रमुख हैं। कुछ अधिनियम स्त्री-पुरुष कर्मकारों के मध्य बराबरी लाने के इरादे से पारित किये गये जिनमें समान पारिश्रमिक अधिनियम प्रमुख है प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम केवल स्त्री कर्मकारों की विशिष्ट लैंगिक स्थिति के कारण उपबन्ध बनाने के लिये पारित किया गया है।
स्त्री की शारीरिक संरचना और मातृत्व-कृत्यों का पालन जीवन-निर्वाह के लिये उसे अलाभ की स्थिति में रखते हैं तथा उसकी शारीरिक भलाई, लोकहित और सावधानी का विषय हो जाती है, ताकि उसके परिवार की क्षमता और उत्साह का परिरक्षण किया जा सके। इस कारण स्त्रियों के पक्ष में विशेष उपबन्ध आवश्यक है। विधायिका ने इन वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर स्त्री कर्मकारों के कार्य के घण्टे, स्वास्थ्य व सुरक्षा हेतु उपबन्ध तथा शिशु-गृह आदि की व्यवस्था से सम्बन्धित विधि पारित की है जो विभिन्न अधिनियमों से परिलक्षित होती है।
स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा काम के घंटे:-
कारखाना अधिनियम में कर्मकारों के स्वास्थ्य, सुरक्षा, कल्याण, काम के घंटे तथा अल्पवयस्कों को नियोजित करने के लिये कानून बनाये गये हैं। इन नियमों में महिलाओं के लिये अलग से व्यवस्था की गयी है। धारा 19 में पुरुष और स्त्री कर्मकारों के लिये अलग-अलग टायलेट बनाने का प्रावधान है। धारा 27, रुई धुनाई के स्थानों के समीप स्त्रियों और बालकों को नियोजित किये जाने पर रोक लगाती है। धारा 34 के अनुसार किसी व्यक्ति को किसी कारखाने में इतना अधिक भार उठाने, ढोने या हिलाने के काम में नियोजित नहीं किया जायेगा कि जिसके द्वारा उसे क्षति कारित होने की सम्भावना हो जाय। यही धारा राज्य सरकार को ऐसे नियम बनाने के लिये प्राधिकृत करती है जिनमें महिलाओं व बच्चों के लिये अधिकतम भार विहित कर दिया जाय।
कारखाना अधिनियम के अध्याय 5 में कर्मकारों के कल्याण के लिये उपबन्ध है तथा धारा 42 पुरुष और महिला कर्मकारों के लिये पृथक और समुचित धुलाई की सुविधायें प्रदान करने की व्यवस्था करता है। इसमें प्रकार कपड़ों को इकट्ठा करने और सुखाने के सम्बन्ध में सुविधायें मुहैया करने, विश्राम के समय में बैठने की जगह प्रदान करने, प्राथमिक चिकित्सा उपकरण रखने, कैन्टीन, शरण-गृह, विश्राम-गृह आदि व्यवस्था करने के आदेशात्मक उपबन्ध हैं।
कई कारखानों में ऐसी स्त्रियां नियोजित होती हैं जिनके गोद खेलते बच्चे होते हैं। स्त्रियां ऐसे बच्चों को अपने साथ लाती हैं जिन्हें शिशु-गृहों के अभाव में इधर-उधर खेलने के लिये छोड़ दिया जाता है। मिलों में ये बच्चे आवारा की बड़बड़ाहट और चलती मशीनों के खतरे और धूल से लदे हुये वातावरण के शिकार बनते हैं। अतः धारा 48 ऐसे कारखानों में, जिसमें साधारणतः 30 या इससे अधिक स्त्रियां नियोजित हैं, छः वर्ष से कम आयु के बच्चों के उपयोग के लिये उपयुक्त कमरा या कमरे उपलब्ध करने का प्रावधान करता है जिसे सार्वजनिक शिशु-गृह में तब्दील किया जा सके। ऐसे शिशु-गृहों में समुचित स्थान प्रदान किया जायेगा, इन्हें पर्याप्त रूप से प्रकाश और हवा से युक्त रखा जायेगा तथा ऐसा गृह, बालकों एवं शिशुओं की देखभाल के कार्य में प्रशिक्षित, महिला के प्रभार के अन्तर्गत रखा जायेगा। इस सम्बन्ध में राज्य सरकार को यह भी शक्ति दी गयी है कि वह नियमावली बनाकर ऐसे शिशु-गृहों के लिये स्थान नियत करने और उन गृहों के निर्माण, उनमें उपलब्ध स्थान, फर्नीचर और योग्य साज-सज्जा के मानक स्थिर करे। ऐसे कारखानों में महिला कर्मकारों के शिशुओं की देख-रेख के लिये अन्य अतिरिक्त सुविधायें प्रदान करने, धुलाई के लिये समुचित सुविधायें और स्त्रियों के वस्त्र बदलने के सम्बन्ध में उचित व्यवस्था करने; ऐसे शिशुओं के लिये निःशुल्क दूध या नाश्ता या दोनों के लिये व्यवस्था कारखाने में ही करने तथा आवश्यक अन्तरालों पर ऐसे बच्चों की माताओं को उन्हें अपना दूध पिलाने की सुविधा देने की व्यवस्था करने का आदेशात्मक उपबन्ध करता है।
इसी अधिनियम के अध्याय 6 में वयस्कों के काम के घंटों के सम्बन्ध में विशद विवेचन है कि इनसे अधिकतम कितने घंटे काम लिया जा सकता है तथा ओवर-टाइम लेने पर मजदूरी की दर क्या होगी। श्रम विषयक रायल कमीशन ने अपने प्रतिवेदन में यह संकेत किया था कि स्त्रियों के लिये पुरुषों की अपेक्षा काम के घंटों की अधिकतम सीमा कम निर्धारित करनी चाहिये क्योंकि स्त्रियों को किसी भी घरेलू काम भी करने पड़ते हैं। अतः धारा 66 यह प्राविधानित करती है कि स्त्रियों को कारखाने में 6 बजे प्रातः से 7 बजे सायं तक की अवधि के उपरान्त की अवधि में काम करने की न तो अपेक्षा की जायेगी और न ही आज्ञा दी जायेगी। लेकिन राज्य सरकार को कतिपय परिस्थितियों में इसमें ढील देने की अनुमति है जैसे मत्स्य-उपचार या मत्सय-कैनिंग के कारोबार में जहाँ कि कथित निर्बंधनों की सीमा से बाहर की अवधियों में काम करना आवश्यक हो ताकि कच्चे माल की बिगड़ने या क्षतिग्रस्त होने से बचाया जा सके। लेकिन यह छूट सिर्फ एक सीमा तक दी जा सकती है तथा महिलाओं को 10 बजे रात्रि से 5 बजे प्रातः तक के नियोजन से मुक्त रखना आवश्यक है। इस प्रसंग में ओमान वूमेन बनाम ए०सी०टी० लिमिटेड (1991) का वाद उल्लेखनीय है जिसमें कर्मचारियों को नियमित रूप से आत्मसात्करण हेतु ली जा रही आन्तरिक परीक्षा में महिला कर्मकारों को शामिल किये जाने से इस कारण मना कर दिया गया कि वे स्त्रियां थीं तथा कारखाने की रात समेत सभी पालियों में काम करने में अक्षम थीं। लिंगभेद के आधार पर महिलाओं को परीक्षा से वंचित किया जाना संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 15 का उल्लंघन करार देते हुये केरल उच्च न्यायालय ने निर्धारित किया कि स्त्रियां केवल रात दस बजे से प्रातः 5 बजे तक ही उपलब्ध नहीं हैं, बाकी पालियों में वे पुरुषों के साथ काम करने में सक्षम हैं अतः उनके परीक्षा में बैठने का अधिकार है।
मातृत्व एवं प्रसूति अवकाश:-
कारखाना अधिनियम की धारा 79 मजदूरी सहित वार्षिक छुट्टी की गणना में किसी स्त्री कर्मकार द्वारा ली गयी बारह सप्ताह से अधिक की प्रसूति छुट्टी का आकलन करने का प्रावधान करती है। अध्याय 9 की धारा 87 में राज्य सरकार को यह शक्ति दी गयी है कि खतरनाक या जोखिम भरी क्रियाओं वाले कारखानों में स्त्रियों तथा बच्चों के नियोजन पर रोक लगा सकती है।
मातृत्व प्रत्येक स्त्री का पवित्र अधिकार तथा ईश्वर द्वारा दिया गया दायित्व है जिसकी पूर्ति करते हुए वह स्वयं को धन्य मानती है। प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम, 1961 शिशु-प्रसव से पूर्व और उसके बाद की कुछ अवधि में स्त्रियों के नियोजन को विनियमित करने के उद्देश्य से बनाया गया है। इसका उद्देश्य महिला कर्मकारों को सामाजिक न्याय प्रदान करना है। उच्चतम न्यायालय ने अपने विनिश्चयों में कहा है कि इस अधिनियम के उपबन्धों का निर्वचन करने में न्यायालय को उदारवादी नियम का पालन करना चाहिए जिससे कि न केवल महिला कर्मकारों का भरण-पोषण हो सके बल्कि वे अपनी क्षीण शक्ति को पुनः प्राप्त कर सकें, शिशुओं का पालन-पोषण हो सके तथा अपनी पूर्व कार्य क्षमता को बनाये भी रख सकें।
प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम की धारा-4 के अनुसार उद्योग में नियोजित प्रत्येक महिला को प्रसव तथा गर्भपात के लिये सब मिलाकर 12 सप्ताह का विश्राम पाने का वैधानिक अधिकार प्राप्त है। कई राज्यों में तथा कई सेवाओं में प्रसूति अवकाश बढ़ाकर 135 दिन कर दिया गया है। इस अधिकार को प्रदान करना नियोजक के लिये बन्धनकारी है क्योंकि यह प्रावधान आदेशात्मक है। अधिकारों को प्रदान न करने पर उसे दण्डित किया जा सकता है। कोई भी नियोजक जानबूझकर ऐसी महिला को काम पर नहीं लगायेगा जिसे 6 सप्ताह के अंदर ही बच्चे को जन्म देने की सम्भावना है।
इसी से जुड़ा हुआ दूसरा अधिकार है कि प्रसव से 6 सप्ताह की छुट्टी पर जाने के एक माह पूर्व यदि वह स्वामी से लिखित प्रार्थना करती है कि उससे अधिक और भारी काम न लिया जाये जिससे उसको तथा होने वाले बच्चे पर कुप्रभाव का डर या स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ने की सम्भावना है तो नियोजक उसकी प्रार्थना पर कार्य करते तथा उसे श्रम साध्य कार्य न देने के लिये अपेक्षित है।
मातृत्व लाभ के आकलन विधि पर प्रकाश डालते हुये कहा गया है कि सप्ताह में बिना मजदूरी वाली छुट्टियां भी सम्मिलित होगी। 6 सप्ताह की अवधि में, आने वाले रविवार तथा अन्य अवैतनिक अवकाश सम्मिलित माने जायेंगे। यदि वह स्त्री प्रसव-कार्य के पूर्व ही मर जाती है तो उसकी मृत्यु के दिन तक का मातृत्व लाभ देय होगा। यदि स्त्री बच्चे को जन्म देने के बाद मर जाती है और बच्चा जीवित रहता है तो प्रसव के 6 सप्ताह का मातृत्व-लाभ देय होगा। लेकिन यदि जच्चा-बच्चा दोनों ही काल-कवलित हो जाते हैं तो उनके जीवित रहने के अन्तिम दिन तक का लाभ दिया जायेगा। यदि माता की मृत्यु के समय नवजात शिशु जीवित है और मां के मरने के बाद मरता है तो जितने दिन वह जीवित रहा उस समय तक का मातृत्व-लाभ स्त्री के नामित व्यक्ति या उसके वैधानिक उत्तराधिकारी को देना होगा। मातृत्व-लाभ देने का उत्तरदायित्व नियोजक का होता है। यदि वह मातृत्व-लाभ बोनस अनुचित ढंग से रोकता है तो दोषसिद्ध किया जा सकता है तथा दण्ड का भागीदार हो सकता है। बी०शाह बनाम प्रिसाइडिंग लेबर कोर्ट, कोयम्बटूर (1977) के मामले में उच्चतम न्यायालय में यह मत व्यक्त किया है कि अनु० 42 में अभिव्यक्त निर्देशों की बहुत उपयोगिता है तथा यह अनुच्छेद महिला कार्यमियों को अपने नवजात शिशु की देख-रेख, कार्यकमी के रूप में अपनी कार्यकुशलता का पोषण, अपनी कार्य क्षमता व उत्पादन शक्ति का पुनः संग्रह करने का अवसर प्राप्त करने की नीति प्रस्तुत करता है।
सी०बी० मुथम्मा बनाम भारत संघ (1979) में उच्चतम न्यायालय ने उस नियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया जिसमें यह प्रतिबन्ध था कि यदि कोई स्त्री कर्मचारी विवाह करना चाहती है तो पहले सरकार से लिखित अनुज्ञा प्राप्त करे और यदि सरकार का समाधान हो जाय कि वैवाहिक जिम्मेदारियों के कारण सेवा में विघ्न होगा तो उसे इस्तीफा देना होगा। ऐसे ही दूसरे नियम के अनुसार किसी विवाहित स्त्री को सेवा में नियुक्ति का अधिकार नहीं होगा। न्यायालय ने कहा कि यदि स्त्रियों के मामले में पारिवारिक जिम्मेदारियों से सेवा में विघ्न हो सकता है तो पुरुषों के मामले में भी उतना ही विघ्न हो सकता है।
इसी प्रकार एयर इण्डिया बनाम नरगिस मिर्जा (1981) के मुकदमें में एयर इण्डिया कार्पोरेशन के विनियम में यह उपबन्ध था कि एयर होस्टेस चार साल के अंदर विवाह करने या प्रथम गर्भावस्था (जो भी पहले हो) पर सेवा मुक्त कर दी जायेगी। उच्चतम न्यायालय ने चार वर्ष विवाह न करने का प्रतिबन्ध उचित ठहराया, पर इस शर्त को पूरा करने के बाद प्रथम गर्भावस्था पर सेवामुक्ति करने की शर्त अवैध घोषित की।
समान कार्य के लिये समान वेतन:-
यद्यपि समान कार्य के लिये समान वेतन का सिद्धान्त संविधान के भाग-3 में दिये गये मौलिक अधिकारों में नहीं दिया गया है, लेकिन भाग-4 के अनुच्छेद 39 (ड.) में राज्य की नीति के निदेशक तत्व के रूप में यह उपबन्ध है कि पुरुषों और स्त्रियों दोनों का समान कार्य के लिये समान वेतन हो। उच्चतम न्यायालय ने डी०एस० नकारा बनाम भारत संघ (1983) में कहा है कि यदि अनुच्छेद 14 व 16 का निर्वचन उद्देशिका और अनुच्छेद 39 (ड.) को ध्यान में रखकर किया जाय तो समान कार्य के लिये समान वेतन का सिद्धान्त इन प्रावधानों से स्वतः सिद्ध है।
इस सिद्धान्त को अमली जामा पहनाने के लिये समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 पारित किया गया। यह अधिनियम पुरुष और स्त्री कर्मकारों के समान पारिश्रमिक का भुगतान करने और नियोजन में लिंग के आधार पर स्त्रियों के विरुद्ध विभेद किये जाने का निवारण करने और उससे सम्बन्धित विषयों पर उपबन्ध के लिये अधिनियमित किया गया है। एक ही काम या समान प्रकृति के काम से आशय उस काम से है जिसमें काम करने की दशायें व अपेक्षित कौशल, प्रयत्न तथा उत्तरदायित्व में अंतर नहीं है।
अधिनियम की धारा 4 पुरुष और स्त्री कर्मकारों को एक ही काम या समान प्रकृति के काम के लिये समान वेतन करने के लिये नियोजक को कर्त्तव्यबद्ध करती है जबकि धारा 5 एक ही काम या समान प्रकृति के काम के लिये भर्ती, प्रोन्नति, प्रशिक्षण या स्थानान्तरण आदि में स्त्रियों के विरुद्ध किसी विभेद को प्रतिषिद्ध करती है। विभेद करने वाले पर शास्ति अधिरोपित किया गया है।
नियोजन के दौरान यौन शोषण के विरुद्ध उपचार:-
कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन शोषण को रोकने की मांग कतिपय नारी संगठनों द्वारा की जाती रही है। दिल्ली डोमेस्टिक वर्किंग विमेंस फोरम बनाम भारत संघ (1995) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने श्रमजीवी महिलाओं के साथ बढ़ते हुये यौन अपराधों के प्रति गम्भीर चिंता व्यक्त करते हुये इन मामलों के शीघ्र परीक्षण, उन्हें प्रतिकर प्रदान करने तथा उनके पुनर्वास के लिये विस्तृत मार्ग दर्शक सिद्धान्तों को अधिक्विठित किया है।
विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997) के बहुचर्चित मामले में उच्चतम न्यायालय ने नियोजन के दौरान यौन शोषण के विरुद्ध यौन/लैंगिक समानता के मानव अधिकार के प्रभावशाली प्रवर्तन के लिये कानून बनाने की आवश्यकता रेखांकित की तथा अभिनिर्धारित किया कि जब तक ऐसा कानून पारित नहीं होता तब तक न्यायालय के मार्गदर्शक सिद्धान्तों को लागू किया जाय। उच्चतम न्यायालय के अनुसार 'यौन शोषण' के अन्तर्गत ऐसा प्रत्यक्ष व उलझन भरा अप्रसन्न व्यवहार शामिल है जिसमें शारीरिक सम्पर्क करना या उसके लिये आगे बढ़ना, यौन सम्बन्ध बनाने की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लालसा प्रकट करना, सेक्स से भरे हुए कथन कहना, कामोद्दीपक लेख या चित्र दिखाना तथा इसी प्रकार के कोई अन्य शारीरिक, मौखिक या अमौखिक यौन प्रकृति का कुत्सित व्यवहार अथवा कृत्य।
न्यायालय ने निर्धारित किया है कि यह नियोजक या कार्यस्थल पर जिम्मेदार व्यक्ति या संस्थान का दायित्व होगा कि वे यौन शोषण के कृत्यों के लिये सभी आवश्यक कदम लेते हुए निवारण, समझौते या अभियोजन के लिये प्रक्रिया की व्यवस्था करें। यौन शोषण को प्रतिबन्धित करने के लिये कार्यस्थल पर प्रत्येक नियोजक या इंचार्ज व्यक्ति चाहे पब्लिक सेक्टर में अथवा प्राइवेट सेक्टर में है, उसे इस समस्या से निजात पाने के लिये निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए;
(1) परिभाषित कार्यस्थल पर यौन शोषण निषेध को नोटिफाई, प्रकाशित तथा प्रचारित करना चाहिए। (2) पब्लिक सेक्टर संस्थाओं व सरकार के व्यवहार एवं अनुशासन से सम्बन्धित नियमों तथा उपनियमों में यौन शोषण निषेध शामिल किया जाना चाहिए तथा अपराधी के विरुद्ध उचित शास्ति के लिये नियम में व्यवस्था करें। (3) प्राइवेट नियोजकों द्वारा औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 के तहत  स्थायी आदेशों में उपर्युक्त निषेधों को शामिल करने के लिये कदम उठाये जाने चाहिए। (4) कार्य, आराम, स्वास्थ्य तथा सफाई आदि की उचित व्यवस्था होनी चाहिए ताकि स्त्रियों के विरुद्ध कार्यस्थल पर विपरीत तथा प्रतिकूल वातावरण न हो तथा किसी स्त्री को यह विश्वास करने का कोई आधार नहीं होना चाहिए कि वह नियोजन से सम्बन्धित अलाभप्रद स्थिति में है।
मार्ग दर्शक सिद्धान्तों में अन्तर्निहित है कि यौन शोषण से पीड़ित महिला को यह स्वेच्छा है कि वह या तो अपना स्थानान्तरण चाह सकती है या दोषी व्यक्ति को स्थानान्तरित करवा सकती है। प्रत्येक विभाग में किसी महिला की अध्यक्षता में शिकायत समिति का गठन किया जाना भी आवश्यक बनाया गया है जो आरोपी व्यक्ति के विरुद्ध जांच कर सके। इस तरह की समितियों में गैर सरकारी संगठनों को भी शामिल किया जाना चाहिए तथा शिकायत समिति की वार्षिक रिपोर्ट कृत कार्यवाही की सूचना के साथ सरकार को भेजीनी चाहिए। उच्चतम न्यायालय के इस दिशा निर्देश को अक्षशः स्वीकार कर इसे लागू करने के आदेश पारित कर दिये गये हैं। संसद ने राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990 द्वारा महिलाओं के लिये एक आयोग का गठन भी किया है। आयोग का प्रमुख कार्य महिलाओं को दी गयी सांविधानिक और विधिक सुरक्षाओं से सम्बन्धित विषयों का अध्ययन करना और मानीटर करना है।
भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों वाले अध्याय में स्त्रियों के लिये विशिष्ट व्यवस्था करने का प्रावधान है। अनुच्छेद 51, प्रत्येक नागरिक पर एक मौलिक दायित्व अधिरोपित करता है कि ऐसी प्रथाओं का परित्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हो। स्त्री कर्मकारों को दी गयी वैज्ञानिक सुरक्षा इसी दायित्व की सम्पूर्ति है।

संसद और न्यायपालिका में वर्चस्व प्रदर्शन अनपेक्षित

 संसद और न्यायपालिका में वर्चस्व प्रदर्शन अनपेक्षित 


लोकसभा के अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी ने संयत लेकिन सपाट टिप्पणी करते हुये मत व्यक्त किया है कि उच्चतम न्यायालय (या कोई अन्य न्यायालय) यह निर्देश नहीं दे सकता कि संसद किन मुद्दों पर चर्चा करें। उन्होंने यह भी दोहराया कि कोई भी अधिवक्ता (सरकारी या अन्य) न्यायालय को यह आश्वासन नहीं दे सकता कि संसद किसी विषय विशेष पर चर्चा करके निर्णय लेगी। पत्रकारों से बात करते हुये श्री चटर्जी ने उन समाचारों पर अपना विचार रखते हुये स्थिति स्पष्ट की जिनके अनुसार 'दागी' मंत्रियों के खिलाफ दायर की गयी जनहित याचिका को उच्चतम न्यायालय ने इस आधार पर खारिज कर दिया था कि संसद स्वयं इस विषय पर चर्चा करेगी। बताया जाता है कि प्रधानमंत्री ने यह सूचित किया है कि सरकार की तरफ से उच्चतम न्यायालय में इस प्रकार का आश्वासन देने के लिये किसी को भी अधिकृत नहीं किया गया है। श्री सोमनाथ चटर्जी को "सर्वोत्तम सांसद" होने के लिये सम्मानित किया जा चुका है तथा वह स्वयं प्रख्यात संविधान विद् तथा एडवोकेट हैं।
अभी थोड़े दिन पूर्व जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951 में संशोधन को लेकर विधायिका तथा न्यायपालिका में टकराव हो चुका है। पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने, तथा अपील होने पर उच्चतम न्यायालय ने यूनियन आफ इण्डिया बनाम असोसियेशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म (2002) के जनहित वाद का फैसला सुनाते हुये निर्वाचन आयोग को आदेश दिया था कि लोकसभा तथा राज्य विधान सभा का चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों से उनकी शैक्षिक योग्यता, चल-अचल सम्पत्ति तथा उनके खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमों का ब्योरे वाला शपथ-पत्र लिया जाय तथा उसे प्रचारित-प्रसारित किया जाय जिससे आम मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करने से पूर्व उम्मीदवारों के विषय में जानकारी प्राप्त कर सके। न्यायालय के इस आदेश पर तत्काल प्रतिक्रिया हुयी लेकिन जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधन करके यह व्यवस्था की गयी कि ऐसी जानकारी निर्वाचन आयोग को नहीं बल्कि चुनाव जीतने के बाद संसद या विधान मंडल के अधिष्ठाता को दी जाय। कानून के द्वारा यह भी प्राविधानित किया गया कि स्पीकर के अलावा यह सूचना अन्य किसी को भी न दी जाय। इस संशोधन को चुनौती देने वाली एक और जनहित याचिका को स्वीकारते हुये उच्चतम न्यायालय ने पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टी बनाम भारत संघ (2003) के वाद में इस नियम को असंवैधानिक करार देते हुये सम्प्रेक्षण किया कि न्यायालय द्वारा प्रतिपादित कानून को बदलने की शक्ति संसद में नहीं है तथा उसके द्वारा अभिनिर्धारित विधि निर्वाचन आयोग तथा सरकार के सभी अवयवों पर बाध्यकारी है। स्वाभाविकतः यह निर्णय माननीय सांसदों  को रास नहीं आया लेकिन अवमानना तथा टकराव से बचने के लिये विरोधी स्वर मुखरित नहीं हो पाये।
न्यायपालिका तथा संसद के बीच लाग-डाट कोई नई बात नहीं है। दरअसल, ब्रितानी संसद की तर्ज पर संसद अपने को सम्प्रभु मानती आयी है तथा अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों के आधार पर भारतीय न्यायपालिका अपने को सर्वोच्च मानती रही है। इन दोनों के मध्य टकराव का सूत्रपात संविधान के लागू होते ही सन् 1950 में प्रारम्भ हो गया था जब न्यायालयों ने जमींदारी विनाश कानूनों को इस आधार पर असंवैधानिक करार दिया कि जमींदारी 'सम्पत्ति' थी, संविधान में इसको मौलिक अधिकार का दर्जा प्राप्त था तथा संसद उसको खत्म करने में अक्षम थी। प्रतिक्रिया स्वरूप संविधान में संशोधन किया गया तथा यह प्राविधानित किया गया कि "मुआवजा" देकर सम्पत्ति का अर्जन किया जा सकता है। तदनन्तर सम्पत्ति के अधिकार तथा मुआवजे की रकम को लेकर न्यायपालिका तथा संसद के अधिकारों में तनातनी और बढ़ी तथा भूतपूर्व राजाओं को दिये जाने वाले प्रिवी पर्स, बैंक राष्ट्रीयकरण तथा भूतपूर्व आई०सी०एस० अफसरों को मिलने वाले विशेषाधिकारों को समाप्त करने के लिये संविधान में कई संशोधन किये गये तथा सम्पत्ति का मौलिक अधिकार ही समाप्त कर दिया गया। इसकी परिणति 1973 में उच्चतम न्यायालय के तीन जजों के अतिलंघन में हुयी तथा "प्रतिबद्ध" न्यायपालिका की आवश्यकता रेखांकित की गयी। सम्भवतः इसी कारण 1975 के आपातकाल में नागरिक स्वतंत्रता को सीमित करने को वैधता प्रदान करने वाला निर्णय आया था जिसकी आज भी आलोचना होती है।
न्यायपालिका तथा विधायिका के मध्य टकराव का अप्रतिम उदाहरण 1965 में उत्तर प्रदेश में केशव सिंह के प्रकरण में सतह पर आया था जब अपनी कथित अवमानना के लिये विधान-सभा ने इस नाम के एक सोशलिस्ट कार्यकर्ता को जेल भेज दिया था। लेकिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक खण्डपीठ ने उसकी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को स्वीकार करते हुये उसे छोड़ने का आदेश पारित किया था। न्यायालय के इस आदेश से कुपित होकर विधान-सभा ने अपनी इस कथित अवमानना के लिये सम्बन्धित न्यायाधीशों को गिरफ्तार करने का प्रस्ताव पारित कर दिया था। स्थिति नाजुक हो जाने पर राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 143 के अन्तर्गत उच्चतम न्यायालय से 'सलाह' मांगी थी तथा मामला ठंडा कर दिया गया था। संसदीय विशेषाधिकारों तथा उन्मुक्तियों को लेकर कहा सुनी यदा-कदा होती रहती है। थोड़े समय पूर्व नागालैण्ड विधान-सभा के स्पीकर ने उच्चतम न्यायालय के आदेश पर उसके समक्ष उपस्थित होने से इंकार कर दिया था तथा बाद में केन्द्रीय गृह सचिव के द्वारा उन्हें बुलवाया गया था। हाल ही में तमिलनाडु विधान-सभा द्वारा 'हिन्दू' के सम्पादक समेत कुछ पत्रकारों के विरुद्ध मर्यादा हनन के आधार पर जेल भेजने के आदेश पर न्यायालयी रोक लगाये जाने पर सम्बन्धित सरकार द्वारा विधायिका की सम्प्रभुता तथा सर्वोच्चता की पुनः दुहाई दी गयी थी। दल-बदल कानून के अन्तर्गत प्राप्त अधिकारों के प्रवर्तन में स्पीकर अपने को सर्वोच्च मानते हैं तथा न्यायालय के क्षेत्राधिकार को पूरी तरह नकारा जाता है।
संसद द्वारा पारित कानूनों को असंवैधानिक करार देने की बढ़ती प्रवृत्ति, लम्बित मुकदमों के द्वारा कार्यपालिका तथा विधायिका के कामों पर गिद्ध-दृष्टि रखने; भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने तथा जनतांत्रिक मूल्यों, परिपाटियों तथा संस्थाओं को सुरक्षा-संरक्षा आदि के लिये पारित विभिन्न आदेश विधायिका तथा कार्यपालिका के गले नहीं उतरते हैं। जजों के अतिलंघन की घटनायें दुबारा न हों इसलिये इनकी नियुक्ति में न्यायपालिका ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली है। यह अभिनिर्धारित किया गया है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय सर्वोपरि तथा बाध्यकारी होगी। इस निर्णय के बाद न्यायपालिका स्वायत्त तथा स्वतन्त्र हो गयी है तथा पर संसद या व्यवस्थापिका का नियन्त्रण नहीं के बराबर हो गया है। अपने को संविधान से भी ऊपर तथा देश की सौ करोड़ से अधिक की जनसँख्या का भाग्य-विधाता मानने वाले कानून-निर्माताओं का इन घटनाओं से आहत होकर अतिउत्साह में बहक जाना स्वाभाविक तथा नैसर्गिक ही माना जायेगा। वर्चस्व के इस शीत युद्ध में लोकतंत्र कटी पतंग की तरह हवा में तैर रहा है।
हम एक लिखित संविधान के अन्तर्गत कार्य कर रहे हैं। सरकार के तीनों अंग यथा-कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका, इसी संविधान से उद्भूत हैं जो उनके कार्य फलक की सीमायें निर्धारित करता है। संविधान में इनकी परिधियाँ निश्चित और निर्धारित हैं तथा यह तीनों ही, सरकार का अवलम्ब हैं। इनमें खींच-तान या लाग-डाट देश तथा नागरिकों के लिये घातक होगी। देश हित के मुद्दों पर विचार करने का दायित्व संसद को है तथा वह इसमें स्वायत्त है, लेकिन यदि वह स्वेच्छाचारी हो जाय और जनमानस को मथने वाले विषयों पर विचार न करे तो उसे कौन याद दिलायेगा? यदि न्यायपालिका इस हेतु अपने को दायित्वधीन समझती है तथा सद्भावना पूर्वक अपेक्षा करती है तो यह स्वागत योग्य होना चाहिए। पद-ग्रहण करते हुये मंत्री-सांसद ही नहीं बल्कि न्यायमूर्तिगण भी "संविधान की रक्षा" करने की शपथ लेते हैं। सांविधानिक पदों पर सुशोभित व्यक्तियों को यह नहीं भूलना चाहिये कि "हम भारत के लोगों ने...... इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया है" तथा संसद या न्यायपालिका नहीं बल्कि देश की जनता सर्वोच्च है। संविधान की सर्वोच्चता तथा देश में कानून का शासन लागू करने के लिये तीनों अंगों के बीच प्रतिस्पर्धा तथा वर्चस्व के लिये लड़ाई नहीं बल्कि परस्पर सहयोग, सहकार एवं समन्वय अपेक्षित है ताकि जनतंत्र पल्लवित तथा पुष्पित होता रहे।