गत दिनों केन्द्रीय सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा चार राज्यों के राज्यपालों को बर्खास्त कर उनकी जगह नयी नियुक्तियां करने पर खासा विवाद उत्पन्न हुआ है। इस पर जहाँ विपक्षी पार्टियों ने राज्यपाल पद की गरिमा न्यून करने, संघीय संविधान में राज्यों की स्वायत्तता क्षीण करने, एक 'खतरनाक परम्परा' डालने तथा अपने राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति में बाधक कुछ व्यक्तियों को बलि का बकरा बनाने जैसे आरोप लगाये हैं। वहीं सत्तापक्ष की ओर से विचारधारा से तारतम्य न होने, राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ जैसे कट्टरवादी संगठन से जुड़ा होने तथा संविधान प्रदत्त अधिकार के अन्तर्गत ही कार्यवाही करने की सफाई पेश की गयी है। सन् 1977 तथा बाद में कई बार सत्ता परिवर्तनों के कारण तत्कालीन केन्द्रीय सरकारों द्वारा काँगेसी राज्यपालों को पदच्युत करने की नजीरें भी पेश की गयी हैं तथा अपने कृत्य के पक्ष में उच्चतम न्यायालय के कई निर्णयों का हवाला देते हुये राज्यपालों को हटाने के अधिकार का औचित्य सिद्ध किया गया है। इन आरोपों-प्रत्यारोपों के बीच भाजपा सांसद श्री बी०पी० सिंहल ने राष्ट्रपति की इस कार्यवाही की सांविधानिकता को उच्चतम न्यायालय में एक जनहित याचिका द्वारा चुनौती दी है। इस रिट याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने कोई स्थगन आदेश तो नहीं पारित किया लेकिन इसे विचारार्थ स्वीकार करते हुये केन्द्र तथा सम्बन्धित पक्षों को नोटिस जारी कर मामले की सुनवाई के लिये तारीख तय कर दी है।
Monday, 6 July 2026
राज्यपाल पद: वैधानिकता एवं सांविधानिक मर्यादा के अंतर्द्वन्द
ज्ञातव्य है कि गत मई में केन्द्र में सत्ता परिवर्तन के बाद ही भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन द्वारा नियुक्त राज्यपालों पर स्वयं पद छोड़ने की अपेक्षा व्यक्त की जा रही थी। अन्त में केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने स्पष्ट शब्दों में इनसे इस्तीफा देने की मांग की और जब इसका पालन नहीं हुआ तो उसकी तार्किक परिणति बर्खास्तगी में हुयी। वैसे तो प्रायः सभी राज्यों में राजग द्वारा नियुक्त राज्यपाल कार्यरत हैं लेकिन फिलहाल आर०एस०एस० की पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों को ही हटाया गया है तथा राजस्थान के राज्यपाल श्री मदन लाल खुराना ऐसों को नहीं छुआ गया है जो भाजपा के टिकट पर विधायक, सांसद, तथा मुख्यमंत्री तक रह चुके हैं। इसके पीछे मंतव्य यही सिद्ध किया जाने का प्रयास है कि विरोधी राजनैतिक दलों से कोई दुराव नहीं है। जबकि संघ परिवार की ओर से आरोप किया गया है कि आर०एस०एस० कोई प्रतिबन्धित संगठन नहीं है तथा इसका सदस्य होना गैरकानूनी नहीं है।
भारत राज्यों का संघ है। राज्य इसकी अविभाज्य इकाईयाँ हैं। राज्य संघ से कभी अलग नहीं हो सकते। राजनैतिक एवं प्रशासनिक दृष्टि से यहाँ केन्द्र और राज्य में दोहरी शासन व्यवस्था है। देश का अध्यक्ष राष्ट्रपति होता है जिसमें कार्यपालिका की समस्त शक्तियाँ निहित होती हैं। राज्यों में उसी प्रकार राज्यपाल है। अंतर इतना है कि जहाँ राष्ट्रपति का निर्वाचन होता है वही राज्यपाल की नियुक्ति की जाती है। संविधान के अनुच्छेद 155 के अनुसार उसकी राष्ट्रपति का निर्वाचन होता है वही राज्यपाल की नियुक्ति की जाती है। राष्ट्रपति कार्यभार ग्रहण की तारीख से पांच वर्ष तक पद पर रहता है तथा इससे पूर्व संविधान के अतिक्रमण के लिये अनुच्छेद 61 में विहित प्रक्रिया द्वारा 'महाभियोग' लगाकर हटाया जा सकता है। वहीं राज्यपाल, राष्ट्रपति के 'प्रसाद पर्यन्त' पद धारण करता है। इसका तात्पर्य यह है कि वह अपने पद पर तभी तक रह सकता है, जब तक कि केन्द्रीय कार्यपालिका का विश्वास उसे प्राप्त हो।
संविधान सभा में कुछ सदस्यों ने यह प्रस्ताव किया था कि राज्यपाल राज्य की जनता द्वारा निर्वाचित होना चाहिए, जैसा कि संयुक्त राज्य अमेरिका में होता है। कुछ ने यह सुझाव दिया कि राज्यपाल राज्य के विधानमंडल द्वारा निर्वाचित होना चाहिए। परन्तु अन्त में संविधान-निर्माताओं ने कनाडियन पद्धति को अपनाते हुये यह उपबन्ध किया कि राज्यपाल की नियुक्ति की जाय। इसका मुख्य उद्देश्य केन्द्र को अधिक शक्तिशाली बनाना था। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि स्वतंत्रता से पूर्व भी प्रांतों में गवर्नर की नियुक्ति ब्रिटिश ताज द्वारा होती थी तथा वे राजा के प्रति सीधे जवाबदेह होते थे।
राज्यपाल का संविधान के अन्तर्गत बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। वह सम्बन्धित राज्य का राज्याधिपति होता है और साथ ही केन्द्र के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है। संसदीय प्रणाली का सामान्य नियम यही है कि राज्यपाल को मन्त्रिपरिषद की मंत्रणा के अनुसार ही कार्य करना चाहिए, अपने विवेक से नहीं। परन्तु अनुच्छेद 164 में यह स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है कि कतिपय मामलों में राज्यपाल से अपेक्षा की गयी है कि वह स्वविवेक से कार्य करें, मन्त्रिपरिषद की राय से नहीं। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि यदि कोई प्रश्न उठता है कि कोई विषय ऐसा है या नहीं जिसके सम्बन्ध में राज्यपाल से अपेक्षित है कि वह स्वविवेक से कार्य करे तो अनुच्छेद 163(2) के अनुसार राज्यपाल का स्वविवेक से किया हुआ विनिश्चय अन्तिम होगा तथा राज्यपाल द्वारा की गयी किसी बात की मान्यता पर इस कारण से कोई आपत्ति नहीं की जा सकती कि उसे स्व-विवेक से कार्य करना या नहीं करना चाहिए था। इन कार्यों में मुख्यमंत्री तथा अन्य मंत्रियों की नियुक्ति, मन्त्रि-परिषद को पद-च्युत करना, विधान-सभा का विघटन, राष्ट्रपति के विचारार्थ विधेयकों को रक्षित करना आदि शामिल हैं। इसके अतिरिक्त केन्द्र के प्रतिनिधि की हैसियत से उस पर यह दायित्व है कि वह केन्द्रीय सरकार को राज्य की सभी बातों से अवगत कराये जिससे कि केन्द्र अनुच्छेद 355 के अन्तर्गत अपना कर्त्तव्य निभा सके। जब कभी वह समझता है कि राज्य में सांविधानिक तंत्र विफल हो गया है तो इसकी सूचना राष्ट्रपति को देता है जो अनुच्छेद 356 के अन्तर्गत उद्घोषणा जारी कर सकता है। इसके अलावा राज्यपाल राज्य विधान मंडल के कानूनों पर भी ध्यान रखता है और किसी भी विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ रक्षित कर सकता है। इस प्रकार संघ सरकार के लिये राज्यपाल के कृत्य अत्यन्त महत्वपूर्ण होते हैं - विशेष रूप से जब केंद्र और राज्य की सरकारें एक ही दल या गठबन्धन की न हों।
उक्त सांविधानिक प्रावधानों से स्पष्ट है कि राज्यपाल पद पर आसीन व्यक्ति से देश और केंद्रीय सरकार को कई अपेक्षायें हैं। संविधान में राज्यपाल की पदावधि पांच वर्ष के लिये निर्धारित है तथा यह भी प्राविधानित है कि वह इस पद पर तब तक बना रहेगा जब कि इसके उत्तराधिकारी की नियुक्ति नहीं हो जाती। संविधान में राष्ट्रपति, उच्चतम तथा उच्च न्यायालयों के न्यायमूर्तियों, लोकसभा आयोग के अध्यक्ष तथा सदस्यों तथा निर्वाचन आयोग के सदस्यों आदि के हटाये जाने की प्रक्रिया विहित की गयी है। केन्द्र तथा राज्य सरकार के कर्मचारियों की पदच्युति तथा पदावनति से सम्बन्धित प्रक्रिया का भी अनुच्छेद 311 में उल्लेख है लेकिन राज्यपाल के विषय में संविधान मूक है। इसीलिये कतिपय राजनेता यह कह रहे हैं कि राज्यपालों को इनकी पदावधि पूर्ण होने से पूर्व केवल 'संविधान के अतिक्रमण' के आधार पर ही हटाया जा सकता है और वह भी संसद के दोनों सदनों का अनुमोदन प्राप्त करके। इनको हटाने से पूर्व नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों के अनुसार सुनवाई का एक अवसर तो प्रत्येक दशा में दिया जाना चाहिए।
राज्यपाल की संवैधानिक स्थिति को जानने के लिये हरगोविन्द वर्मा बनाम रघुकुल तिलक (1979) का वाद विशेष उल्लेखनीय है जो उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णीत हुआ था। इस वाद में श्री रघुकुल तिलक के राजस्थान के राज्यपाल नियुक्त किये जाने को इस आधार पर चुनौती दी गयी थी कि इससे पूर्व वे राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्य रह चुके थे तथा अनुच्छेद 319 के अन्तर्गत भारत सरकार या राज्य सरकार के अधीन किसी भी नियोजन के लिये अपात्र थे। इस वाद में उच्चतम न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया था कि राज्यपाल का पद संवैधानिक है तथा यह केंद्रीय या राज्य सरकार के अधीन "नियोजन" नहीं है। न्यायालय का कहना था कि न्यायमूर्तियों या अन्य स्वायत्तशासी संस्थाओं के सदस्यों की भांति राज्यपाल भी सांविधानिक पद ग्रहण करते हैं तथा एक बार शपथ ग्रहण करने के बाद उन पर 'मालिक-नौकर' के सिद्धान्त लागू नहीं होते। उच्चतम न्यायालय ने इस तथ्य को रेखांकित किया कि राष्ट्रपति की भांति राज्यपाल भी अपना पद ग्रहण करने से पूर्व अपने कृत्यों का श्रद्धापूर्वक निर्वहन करने तथा अपनी पूरी योग्यता से संविधान और विधि का परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण करने तथा सम्बन्धित राज्य की जनता की सेवा और कल्याण में निरत रहने की शपथ लेते हैं। ऐसे पदधारी व्यक्ति को कैसे हटाया जाय इस पर तो न्यायालय ने कोई मत व्यक्त नहीं किया लेकिन आम सिविल सेवकों पर लागू होने वाले सेवा-विधिशास्त्र से इन्हें पृथक कर दिया। इस विवेचन से स्पष्ट है कि पांच वर्षों की कार्यविधि से पूर्व हटाने की स्थिति में सुनवाई का युक्ति-युक्त अवसर देने की अनिवार्यता नहीं है।
जनतांत्रिक शासन पद्धति में सरकार या राष्ट्राध्यक्ष बदलने की स्थिति में उसे अपनी विचारधारा के व्यक्तियों को मंत्री तथा उच्च अधिशासी पदों पर नियुक्त करने की परिपाटी रही है। संयुक्त राज्य अमेरिका में तो नये राष्ट्रपति का चुनाव नवम्बर में समाप्त हो जाता है तथा वह अगली जनवरी के तीसरे सप्ताह में कार्यभार ग्रहण करता है। इस बीच के समय में वह अपनी पार्टी तथा विचारधारा के लोगों की लिस्ट बनाने में लगाता है जिन्हें उच्च संवैधानिक तथा प्रशासकीय पदों पर नियुक्त करना है। वहाँ यह भी परिपाटी है कि राष्ट्रपति के बदलने के साथ ही उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति अपने पदों से स्वतः इस्तीफा दे देते हैं। भारत में ऐसी परिपाटी विकसित नहीं हो पायी है। अतः सरकारों को ऐसे अप्रिय कदम उठाने के लिये विवश होना पड़ता है।
राज्यपाल का पद केंद्र और राज्यों के बीच टकरावत तथा विवाद का पद बनता जा रहा है। इस पद पर सक्रिय राजनीतिज्ञों को अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये नियुक्त करने की परम्परा स्वस्थ नहीं कही जा सकती। ऐसे व्यक्तियों को ही हटाने की जरूरत महसूस की जाती है। सरकारिया कमीशन ने राज्यपालों की नियुक्त में सम्बन्धित राज्य के मुख्यमंत्री की सहमति के लिये अनुशंसा की थी लेकिन समय से पूर्व होते लोकसभा के चुनाव तथा दल-बदल कर बनती-बिगड़ती राज्य सरकारों के कारण उत्पन्न होती राजनैतिक स्थिति में राज्यपाल के दायित्वों तथा सत्ता परिवर्तन के साथ स्वयंमेव पद-त्यागने के विषय में कुछ नहीं कहा।
संविधान सभा में हुयी बहस तथा इस पद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के अवलोकन से स्पष्ट है कि राज्यपाल, राष्ट्रपति के 'प्रसाद पर्यन्त' पद धारण करता है तथा वह तभी तक इस पद पर रह सकता है जब तक केन्द्रीय सरकार का वरद् हस्त प्राप्त है। एक बार नियुक्त होने के बाद उसे इस पद पर अधिकार के साथ-साथ सांविधिक मर्यादाओं तथा दायित्वों का भी निर्वहन करना पड़ता है तथा इसका तकाजा है कि केन्द्र में सत्ता परिवर्तन के साथ वह स्वयं पद छोड़ने की पहल करे जिससे उसे हटाने की स्थिति न आये। लोकसभा का कार्यकाल यदि निश्चित हो जाये तथा इन पदों पर गैर-राजनैतिक व्यक्तियों की नियुक्तियाँ होने लगें तब भी इन अप्रिय स्थितियों से बचा जा सकता है।
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