Wednesday, 1 July 2026

संसद और न्यायपालिका में वर्चस्व प्रदर्शन अनपेक्षित

 संसद और न्यायपालिका में वर्चस्व प्रदर्शन अनपेक्षित 


लोकसभा के अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी ने संयत लेकिन सपाट टिप्पणी करते हुये मत व्यक्त किया है कि उच्चतम न्यायालय (या कोई अन्य न्यायालय) यह निर्देश नहीं दे सकता कि संसद किन मुद्दों पर चर्चा करें। उन्होंने यह भी दोहराया कि कोई भी अधिवक्ता (सरकारी या अन्य) न्यायालय को यह आश्वासन नहीं दे सकता कि संसद किसी विषय विशेष पर चर्चा करके निर्णय लेगी। पत्रकारों से बात करते हुये श्री चटर्जी ने उन समाचारों पर अपना विचार रखते हुये स्थिति स्पष्ट की जिनके अनुसार 'दागी' मंत्रियों के खिलाफ दायर की गयी जनहित याचिका को उच्चतम न्यायालय ने इस आधार पर खारिज कर दिया था कि संसद स्वयं इस विषय पर चर्चा करेगी। बताया जाता है कि प्रधानमंत्री ने यह सूचित किया है कि सरकार की तरफ से उच्चतम न्यायालय में इस प्रकार का आश्वासन देने के लिये किसी को भी अधिकृत नहीं किया गया है। श्री सोमनाथ चटर्जी को "सर्वोत्तम सांसद" होने के लिये सम्मानित किया जा चुका है तथा वह स्वयं प्रख्यात संविधान विद् तथा एडवोकेट हैं।
अभी थोड़े दिन पूर्व जन प्रतिनिधित्व कानून, 1951 में संशोधन को लेकर विधायिका तथा न्यायपालिका में टकराव हो चुका है। पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने, तथा अपील होने पर उच्चतम न्यायालय ने यूनियन आफ इण्डिया बनाम असोसियेशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म (2002) के जनहित वाद का फैसला सुनाते हुये निर्वाचन आयोग को आदेश दिया था कि लोकसभा तथा राज्य विधान सभा का चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों से उनकी शैक्षिक योग्यता, चल-अचल सम्पत्ति तथा उनके खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमों का ब्योरे वाला शपथ-पत्र लिया जाय तथा उसे प्रचारित-प्रसारित किया जाय जिससे आम मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करने से पूर्व उम्मीदवारों के विषय में जानकारी प्राप्त कर सके। न्यायालय के इस आदेश पर तत्काल प्रतिक्रिया हुयी लेकिन जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में संशोधन करके यह व्यवस्था की गयी कि ऐसी जानकारी निर्वाचन आयोग को नहीं बल्कि चुनाव जीतने के बाद संसद या विधान मंडल के अधिष्ठाता को दी जाय। कानून के द्वारा यह भी प्राविधानित किया गया कि स्पीकर के अलावा यह सूचना अन्य किसी को भी न दी जाय। इस संशोधन को चुनौती देने वाली एक और जनहित याचिका को स्वीकारते हुये उच्चतम न्यायालय ने पीपुल्स यूनियन फार सिविल लिबर्टी बनाम भारत संघ (2003) के वाद में इस नियम को असंवैधानिक करार देते हुये सम्प्रेक्षण किया कि न्यायालय द्वारा प्रतिपादित कानून को बदलने की शक्ति संसद में नहीं है तथा उसके द्वारा अभिनिर्धारित विधि निर्वाचन आयोग तथा सरकार के सभी अवयवों पर बाध्यकारी है। स्वाभाविकतः यह निर्णय माननीय सांसदों  को रास नहीं आया लेकिन अवमानना तथा टकराव से बचने के लिये विरोधी स्वर मुखरित नहीं हो पाये।
न्यायपालिका तथा संसद के बीच लाग-डाट कोई नई बात नहीं है। दरअसल, ब्रितानी संसद की तर्ज पर संसद अपने को सम्प्रभु मानती आयी है तथा अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों के आधार पर भारतीय न्यायपालिका अपने को सर्वोच्च मानती रही है। इन दोनों के मध्य टकराव का सूत्रपात संविधान के लागू होते ही सन् 1950 में प्रारम्भ हो गया था जब न्यायालयों ने जमींदारी विनाश कानूनों को इस आधार पर असंवैधानिक करार दिया कि जमींदारी 'सम्पत्ति' थी, संविधान में इसको मौलिक अधिकार का दर्जा प्राप्त था तथा संसद उसको खत्म करने में अक्षम थी। प्रतिक्रिया स्वरूप संविधान में संशोधन किया गया तथा यह प्राविधानित किया गया कि "मुआवजा" देकर सम्पत्ति का अर्जन किया जा सकता है। तदनन्तर सम्पत्ति के अधिकार तथा मुआवजे की रकम को लेकर न्यायपालिका तथा संसद के अधिकारों में तनातनी और बढ़ी तथा भूतपूर्व राजाओं को दिये जाने वाले प्रिवी पर्स, बैंक राष्ट्रीयकरण तथा भूतपूर्व आई०सी०एस० अफसरों को मिलने वाले विशेषाधिकारों को समाप्त करने के लिये संविधान में कई संशोधन किये गये तथा सम्पत्ति का मौलिक अधिकार ही समाप्त कर दिया गया। इसकी परिणति 1973 में उच्चतम न्यायालय के तीन जजों के अतिलंघन में हुयी तथा "प्रतिबद्ध" न्यायपालिका की आवश्यकता रेखांकित की गयी। सम्भवतः इसी कारण 1975 के आपातकाल में नागरिक स्वतंत्रता को सीमित करने को वैधता प्रदान करने वाला निर्णय आया था जिसकी आज भी आलोचना होती है।
न्यायपालिका तथा विधायिका के मध्य टकराव का अप्रतिम उदाहरण 1965 में उत्तर प्रदेश में केशव सिंह के प्रकरण में सतह पर आया था जब अपनी कथित अवमानना के लिये विधान-सभा ने इस नाम के एक सोशलिस्ट कार्यकर्ता को जेल भेज दिया था। लेकिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय की एक खण्डपीठ ने उसकी बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को स्वीकार करते हुये उसे छोड़ने का आदेश पारित किया था। न्यायालय के इस आदेश से कुपित होकर विधान-सभा ने अपनी इस कथित अवमानना के लिये सम्बन्धित न्यायाधीशों को गिरफ्तार करने का प्रस्ताव पारित कर दिया था। स्थिति नाजुक हो जाने पर राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 143 के अन्तर्गत उच्चतम न्यायालय से 'सलाह' मांगी थी तथा मामला ठंडा कर दिया गया था। संसदीय विशेषाधिकारों तथा उन्मुक्तियों को लेकर कहा सुनी यदा-कदा होती रहती है। थोड़े समय पूर्व नागालैण्ड विधान-सभा के स्पीकर ने उच्चतम न्यायालय के आदेश पर उसके समक्ष उपस्थित होने से इंकार कर दिया था तथा बाद में केन्द्रीय गृह सचिव के द्वारा उन्हें बुलवाया गया था। हाल ही में तमिलनाडु विधान-सभा द्वारा 'हिन्दू' के सम्पादक समेत कुछ पत्रकारों के विरुद्ध मर्यादा हनन के आधार पर जेल भेजने के आदेश पर न्यायालयी रोक लगाये जाने पर सम्बन्धित सरकार द्वारा विधायिका की सम्प्रभुता तथा सर्वोच्चता की पुनः दुहाई दी गयी थी। दल-बदल कानून के अन्तर्गत प्राप्त अधिकारों के प्रवर्तन में स्पीकर अपने को सर्वोच्च मानते हैं तथा न्यायालय के क्षेत्राधिकार को पूरी तरह नकारा जाता है।
संसद द्वारा पारित कानूनों को असंवैधानिक करार देने की बढ़ती प्रवृत्ति, लम्बित मुकदमों के द्वारा कार्यपालिका तथा विधायिका के कामों पर गिद्ध-दृष्टि रखने; भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने तथा जनतांत्रिक मूल्यों, परिपाटियों तथा संस्थाओं को सुरक्षा-संरक्षा आदि के लिये पारित विभिन्न आदेश विधायिका तथा कार्यपालिका के गले नहीं उतरते हैं। जजों के अतिलंघन की घटनायें दुबारा न हों इसलिये इनकी नियुक्ति में न्यायपालिका ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली है। यह अभिनिर्धारित किया गया है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की राय सर्वोपरि तथा बाध्यकारी होगी। इस निर्णय के बाद न्यायपालिका स्वायत्त तथा स्वतन्त्र हो गयी है तथा पर संसद या व्यवस्थापिका का नियन्त्रण नहीं के बराबर हो गया है। अपने को संविधान से भी ऊपर तथा देश की सौ करोड़ से अधिक की जनसँख्या का भाग्य-विधाता मानने वाले कानून-निर्माताओं का इन घटनाओं से आहत होकर अतिउत्साह में बहक जाना स्वाभाविक तथा नैसर्गिक ही माना जायेगा। वर्चस्व के इस शीत युद्ध में लोकतंत्र कटी पतंग की तरह हवा में तैर रहा है।
हम एक लिखित संविधान के अन्तर्गत कार्य कर रहे हैं। सरकार के तीनों अंग यथा-कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका, इसी संविधान से उद्भूत हैं जो उनके कार्य फलक की सीमायें निर्धारित करता है। संविधान में इनकी परिधियाँ निश्चित और निर्धारित हैं तथा यह तीनों ही, सरकार का अवलम्ब हैं। इनमें खींच-तान या लाग-डाट देश तथा नागरिकों के लिये घातक होगी। देश हित के मुद्दों पर विचार करने का दायित्व संसद को है तथा वह इसमें स्वायत्त है, लेकिन यदि वह स्वेच्छाचारी हो जाय और जनमानस को मथने वाले विषयों पर विचार न करे तो उसे कौन याद दिलायेगा? यदि न्यायपालिका इस हेतु अपने को दायित्वधीन समझती है तथा सद्भावना पूर्वक अपेक्षा करती है तो यह स्वागत योग्य होना चाहिए। पद-ग्रहण करते हुये मंत्री-सांसद ही नहीं बल्कि न्यायमूर्तिगण भी "संविधान की रक्षा" करने की शपथ लेते हैं। सांविधानिक पदों पर सुशोभित व्यक्तियों को यह नहीं भूलना चाहिये कि "हम भारत के लोगों ने...... इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित किया है" तथा संसद या न्यायपालिका नहीं बल्कि देश की जनता सर्वोच्च है। संविधान की सर्वोच्चता तथा देश में कानून का शासन लागू करने के लिये तीनों अंगों के बीच प्रतिस्पर्धा तथा वर्चस्व के लिये लड़ाई नहीं बल्कि परस्पर सहयोग, सहकार एवं समन्वय अपेक्षित है ताकि जनतंत्र पल्लवित तथा पुष्पित होता रहे।




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