Wednesday, 1 July 2026

महिला कर्मियों के सांविधानिक तथा कानूनी अधिकार

 भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39 में राज्य द्वारा अनुसरणीय कुछ नीति तत्वों में उपबन्धित है कि राज्य अपनी नीति का, विशिष्टतया, इस प्रकार संचालन करेगा कि सुनिश्चित रूप से पुरुष और स्त्री सभी नागरिकों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो; पुरुषों एवं स्त्रियों दोनों का समान कार्य के लिये समान वेतन हो तथा इन कर्मकारों के स्वास्थ्य और शक्ति का तथा बालकों की सुकुमार अवस्था का दुरुपयोग न हो एवं आर्थिक आवश्यकता से विवश होकर नागरिकों को ऐसे रोजगारों में न जाना पड़े जो उनकी आयु या शक्ति के अनुकूल न हो। इसी प्रकार अनुच्छेद 42 काम की न्याय संगत और मानवोचित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता के लिये उपबन्ध करने का निर्देश देता है। अनुच्छेद 43 स्त्री एवं पुरुष कर्मकारों के लिये निर्वाह मजदूरी आदि की व्यवस्था करने का निर्देश देता है क्योंकि राष्ट्र के आर्थिक विकास में भागीदार स्त्री-पुरुष श्रमिकों की गरिमा एवं उनके व्यक्तित्व को बनाये रखने के लिये उन्हें निर्वाह योग्य मजदूरी दिया जाना तथा उन्हें सामाजिक सुरक्षा प्रदान करना अपरिहार्य है। अभी हाल में जोड़े गये अनुच्छेद 43-क के अनुसार उद्योगों के प्रबन्ध में स्त्री-पुरुष कर्मकारों की भागीदारी सुनिश्चित करने का राज्य को निर्देश है।

राज्य के नीति निर्देशक तत्वों के अनुपालन में संघ तथा राज्य सरकारों ने विभिन्न अधिनियम पारित किये हैं जिन्हें स्त्री-पुरुष कर्मियों की कार्यदशा सुधारने का प्रयास किया गया है। इनमें प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम; मजदूरी संदाय अधिनियम; न्यूनतम मजदूरी अधिनियम; बोनस संदाय अधिनियम; तथा कारखाना अधिनियम आदि प्रमुख हैं। कुछ अधिनियम स्त्री-पुरुष कर्मकारों के मध्य बराबरी लाने के इरादे से पारित किये गये जिनमें समान पारिश्रमिक अधिनियम प्रमुख है प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम केवल स्त्री कर्मकारों की विशिष्ट लैंगिक स्थिति के कारण उपबन्ध बनाने के लिये पारित किया गया है।
स्त्री की शारीरिक संरचना और मातृत्व-कृत्यों का पालन जीवन-निर्वाह के लिये उसे अलाभ की स्थिति में रखते हैं तथा उसकी शारीरिक भलाई, लोकहित और सावधानी का विषय हो जाती है, ताकि उसके परिवार की क्षमता और उत्साह का परिरक्षण किया जा सके। इस कारण स्त्रियों के पक्ष में विशेष उपबन्ध आवश्यक है। विधायिका ने इन वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर स्त्री कर्मकारों के कार्य के घण्टे, स्वास्थ्य व सुरक्षा हेतु उपबन्ध तथा शिशु-गृह आदि की व्यवस्था से सम्बन्धित विधि पारित की है जो विभिन्न अधिनियमों से परिलक्षित होती है।
स्वास्थ्य, सुरक्षा तथा काम के घंटे:-
कारखाना अधिनियम में कर्मकारों के स्वास्थ्य, सुरक्षा, कल्याण, काम के घंटे तथा अल्पवयस्कों को नियोजित करने के लिये कानून बनाये गये हैं। इन नियमों में महिलाओं के लिये अलग से व्यवस्था की गयी है। धारा 19 में पुरुष और स्त्री कर्मकारों के लिये अलग-अलग टायलेट बनाने का प्रावधान है। धारा 27, रुई धुनाई के स्थानों के समीप स्त्रियों और बालकों को नियोजित किये जाने पर रोक लगाती है। धारा 34 के अनुसार किसी व्यक्ति को किसी कारखाने में इतना अधिक भार उठाने, ढोने या हिलाने के काम में नियोजित नहीं किया जायेगा कि जिसके द्वारा उसे क्षति कारित होने की सम्भावना हो जाय। यही धारा राज्य सरकार को ऐसे नियम बनाने के लिये प्राधिकृत करती है जिनमें महिलाओं व बच्चों के लिये अधिकतम भार विहित कर दिया जाय।
कारखाना अधिनियम के अध्याय 5 में कर्मकारों के कल्याण के लिये उपबन्ध है तथा धारा 42 पुरुष और महिला कर्मकारों के लिये पृथक और समुचित धुलाई की सुविधायें प्रदान करने की व्यवस्था करता है। इसमें प्रकार कपड़ों को इकट्ठा करने और सुखाने के सम्बन्ध में सुविधायें मुहैया करने, विश्राम के समय में बैठने की जगह प्रदान करने, प्राथमिक चिकित्सा उपकरण रखने, कैन्टीन, शरण-गृह, विश्राम-गृह आदि व्यवस्था करने के आदेशात्मक उपबन्ध हैं।
कई कारखानों में ऐसी स्त्रियां नियोजित होती हैं जिनके गोद खेलते बच्चे होते हैं। स्त्रियां ऐसे बच्चों को अपने साथ लाती हैं जिन्हें शिशु-गृहों के अभाव में इधर-उधर खेलने के लिये छोड़ दिया जाता है। मिलों में ये बच्चे आवारा की बड़बड़ाहट और चलती मशीनों के खतरे और धूल से लदे हुये वातावरण के शिकार बनते हैं। अतः धारा 48 ऐसे कारखानों में, जिसमें साधारणतः 30 या इससे अधिक स्त्रियां नियोजित हैं, छः वर्ष से कम आयु के बच्चों के उपयोग के लिये उपयुक्त कमरा या कमरे उपलब्ध करने का प्रावधान करता है जिसे सार्वजनिक शिशु-गृह में तब्दील किया जा सके। ऐसे शिशु-गृहों में समुचित स्थान प्रदान किया जायेगा, इन्हें पर्याप्त रूप से प्रकाश और हवा से युक्त रखा जायेगा तथा ऐसा गृह, बालकों एवं शिशुओं की देखभाल के कार्य में प्रशिक्षित, महिला के प्रभार के अन्तर्गत रखा जायेगा। इस सम्बन्ध में राज्य सरकार को यह भी शक्ति दी गयी है कि वह नियमावली बनाकर ऐसे शिशु-गृहों के लिये स्थान नियत करने और उन गृहों के निर्माण, उनमें उपलब्ध स्थान, फर्नीचर और योग्य साज-सज्जा के मानक स्थिर करे। ऐसे कारखानों में महिला कर्मकारों के शिशुओं की देख-रेख के लिये अन्य अतिरिक्त सुविधायें प्रदान करने, धुलाई के लिये समुचित सुविधायें और स्त्रियों के वस्त्र बदलने के सम्बन्ध में उचित व्यवस्था करने; ऐसे शिशुओं के लिये निःशुल्क दूध या नाश्ता या दोनों के लिये व्यवस्था कारखाने में ही करने तथा आवश्यक अन्तरालों पर ऐसे बच्चों की माताओं को उन्हें अपना दूध पिलाने की सुविधा देने की व्यवस्था करने का आदेशात्मक उपबन्ध करता है।
इसी अधिनियम के अध्याय 6 में वयस्कों के काम के घंटों के सम्बन्ध में विशद विवेचन है कि इनसे अधिकतम कितने घंटे काम लिया जा सकता है तथा ओवर-टाइम लेने पर मजदूरी की दर क्या होगी। श्रम विषयक रायल कमीशन ने अपने प्रतिवेदन में यह संकेत किया था कि स्त्रियों के लिये पुरुषों की अपेक्षा काम के घंटों की अधिकतम सीमा कम निर्धारित करनी चाहिये क्योंकि स्त्रियों को किसी भी घरेलू काम भी करने पड़ते हैं। अतः धारा 66 यह प्राविधानित करती है कि स्त्रियों को कारखाने में 6 बजे प्रातः से 7 बजे सायं तक की अवधि के उपरान्त की अवधि में काम करने की न तो अपेक्षा की जायेगी और न ही आज्ञा दी जायेगी। लेकिन राज्य सरकार को कतिपय परिस्थितियों में इसमें ढील देने की अनुमति है जैसे मत्स्य-उपचार या मत्सय-कैनिंग के कारोबार में जहाँ कि कथित निर्बंधनों की सीमा से बाहर की अवधियों में काम करना आवश्यक हो ताकि कच्चे माल की बिगड़ने या क्षतिग्रस्त होने से बचाया जा सके। लेकिन यह छूट सिर्फ एक सीमा तक दी जा सकती है तथा महिलाओं को 10 बजे रात्रि से 5 बजे प्रातः तक के नियोजन से मुक्त रखना आवश्यक है। इस प्रसंग में ओमान वूमेन बनाम ए०सी०टी० लिमिटेड (1991) का वाद उल्लेखनीय है जिसमें कर्मचारियों को नियमित रूप से आत्मसात्करण हेतु ली जा रही आन्तरिक परीक्षा में महिला कर्मकारों को शामिल किये जाने से इस कारण मना कर दिया गया कि वे स्त्रियां थीं तथा कारखाने की रात समेत सभी पालियों में काम करने में अक्षम थीं। लिंगभेद के आधार पर महिलाओं को परीक्षा से वंचित किया जाना संविधान के अनुच्छेद 14 एवं 15 का उल्लंघन करार देते हुये केरल उच्च न्यायालय ने निर्धारित किया कि स्त्रियां केवल रात दस बजे से प्रातः 5 बजे तक ही उपलब्ध नहीं हैं, बाकी पालियों में वे पुरुषों के साथ काम करने में सक्षम हैं अतः उनके परीक्षा में बैठने का अधिकार है।
मातृत्व एवं प्रसूति अवकाश:-
कारखाना अधिनियम की धारा 79 मजदूरी सहित वार्षिक छुट्टी की गणना में किसी स्त्री कर्मकार द्वारा ली गयी बारह सप्ताह से अधिक की प्रसूति छुट्टी का आकलन करने का प्रावधान करती है। अध्याय 9 की धारा 87 में राज्य सरकार को यह शक्ति दी गयी है कि खतरनाक या जोखिम भरी क्रियाओं वाले कारखानों में स्त्रियों तथा बच्चों के नियोजन पर रोक लगा सकती है।
मातृत्व प्रत्येक स्त्री का पवित्र अधिकार तथा ईश्वर द्वारा दिया गया दायित्व है जिसकी पूर्ति करते हुए वह स्वयं को धन्य मानती है। प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम, 1961 शिशु-प्रसव से पूर्व और उसके बाद की कुछ अवधि में स्त्रियों के नियोजन को विनियमित करने के उद्देश्य से बनाया गया है। इसका उद्देश्य महिला कर्मकारों को सामाजिक न्याय प्रदान करना है। उच्चतम न्यायालय ने अपने विनिश्चयों में कहा है कि इस अधिनियम के उपबन्धों का निर्वचन करने में न्यायालय को उदारवादी नियम का पालन करना चाहिए जिससे कि न केवल महिला कर्मकारों का भरण-पोषण हो सके बल्कि वे अपनी क्षीण शक्ति को पुनः प्राप्त कर सकें, शिशुओं का पालन-पोषण हो सके तथा अपनी पूर्व कार्य क्षमता को बनाये भी रख सकें।
प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम की धारा-4 के अनुसार उद्योग में नियोजित प्रत्येक महिला को प्रसव तथा गर्भपात के लिये सब मिलाकर 12 सप्ताह का विश्राम पाने का वैधानिक अधिकार प्राप्त है। कई राज्यों में तथा कई सेवाओं में प्रसूति अवकाश बढ़ाकर 135 दिन कर दिया गया है। इस अधिकार को प्रदान करना नियोजक के लिये बन्धनकारी है क्योंकि यह प्रावधान आदेशात्मक है। अधिकारों को प्रदान न करने पर उसे दण्डित किया जा सकता है। कोई भी नियोजक जानबूझकर ऐसी महिला को काम पर नहीं लगायेगा जिसे 6 सप्ताह के अंदर ही बच्चे को जन्म देने की सम्भावना है।
इसी से जुड़ा हुआ दूसरा अधिकार है कि प्रसव से 6 सप्ताह की छुट्टी पर जाने के एक माह पूर्व यदि वह स्वामी से लिखित प्रार्थना करती है कि उससे अधिक और भारी काम न लिया जाये जिससे उसको तथा होने वाले बच्चे पर कुप्रभाव का डर या स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ने की सम्भावना है तो नियोजक उसकी प्रार्थना पर कार्य करते तथा उसे श्रम साध्य कार्य न देने के लिये अपेक्षित है।
मातृत्व लाभ के आकलन विधि पर प्रकाश डालते हुये कहा गया है कि सप्ताह में बिना मजदूरी वाली छुट्टियां भी सम्मिलित होगी। 6 सप्ताह की अवधि में, आने वाले रविवार तथा अन्य अवैतनिक अवकाश सम्मिलित माने जायेंगे। यदि वह स्त्री प्रसव-कार्य के पूर्व ही मर जाती है तो उसकी मृत्यु के दिन तक का मातृत्व लाभ देय होगा। यदि स्त्री बच्चे को जन्म देने के बाद मर जाती है और बच्चा जीवित रहता है तो प्रसव के 6 सप्ताह का मातृत्व-लाभ देय होगा। लेकिन यदि जच्चा-बच्चा दोनों ही काल-कवलित हो जाते हैं तो उनके जीवित रहने के अन्तिम दिन तक का लाभ दिया जायेगा। यदि माता की मृत्यु के समय नवजात शिशु जीवित है और मां के मरने के बाद मरता है तो जितने दिन वह जीवित रहा उस समय तक का मातृत्व-लाभ स्त्री के नामित व्यक्ति या उसके वैधानिक उत्तराधिकारी को देना होगा। मातृत्व-लाभ देने का उत्तरदायित्व नियोजक का होता है। यदि वह मातृत्व-लाभ बोनस अनुचित ढंग से रोकता है तो दोषसिद्ध किया जा सकता है तथा दण्ड का भागीदार हो सकता है। बी०शाह बनाम प्रिसाइडिंग लेबर कोर्ट, कोयम्बटूर (1977) के मामले में उच्चतम न्यायालय में यह मत व्यक्त किया है कि अनु० 42 में अभिव्यक्त निर्देशों की बहुत उपयोगिता है तथा यह अनुच्छेद महिला कार्यमियों को अपने नवजात शिशु की देख-रेख, कार्यकमी के रूप में अपनी कार्यकुशलता का पोषण, अपनी कार्य क्षमता व उत्पादन शक्ति का पुनः संग्रह करने का अवसर प्राप्त करने की नीति प्रस्तुत करता है।
सी०बी० मुथम्मा बनाम भारत संघ (1979) में उच्चतम न्यायालय ने उस नियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया जिसमें यह प्रतिबन्ध था कि यदि कोई स्त्री कर्मचारी विवाह करना चाहती है तो पहले सरकार से लिखित अनुज्ञा प्राप्त करे और यदि सरकार का समाधान हो जाय कि वैवाहिक जिम्मेदारियों के कारण सेवा में विघ्न होगा तो उसे इस्तीफा देना होगा। ऐसे ही दूसरे नियम के अनुसार किसी विवाहित स्त्री को सेवा में नियुक्ति का अधिकार नहीं होगा। न्यायालय ने कहा कि यदि स्त्रियों के मामले में पारिवारिक जिम्मेदारियों से सेवा में विघ्न हो सकता है तो पुरुषों के मामले में भी उतना ही विघ्न हो सकता है।
इसी प्रकार एयर इण्डिया बनाम नरगिस मिर्जा (1981) के मुकदमें में एयर इण्डिया कार्पोरेशन के विनियम में यह उपबन्ध था कि एयर होस्टेस चार साल के अंदर विवाह करने या प्रथम गर्भावस्था (जो भी पहले हो) पर सेवा मुक्त कर दी जायेगी। उच्चतम न्यायालय ने चार वर्ष विवाह न करने का प्रतिबन्ध उचित ठहराया, पर इस शर्त को पूरा करने के बाद प्रथम गर्भावस्था पर सेवामुक्ति करने की शर्त अवैध घोषित की।
समान कार्य के लिये समान वेतन:-
यद्यपि समान कार्य के लिये समान वेतन का सिद्धान्त संविधान के भाग-3 में दिये गये मौलिक अधिकारों में नहीं दिया गया है, लेकिन भाग-4 के अनुच्छेद 39 (ड.) में राज्य की नीति के निदेशक तत्व के रूप में यह उपबन्ध है कि पुरुषों और स्त्रियों दोनों का समान कार्य के लिये समान वेतन हो। उच्चतम न्यायालय ने डी०एस० नकारा बनाम भारत संघ (1983) में कहा है कि यदि अनुच्छेद 14 व 16 का निर्वचन उद्देशिका और अनुच्छेद 39 (ड.) को ध्यान में रखकर किया जाय तो समान कार्य के लिये समान वेतन का सिद्धान्त इन प्रावधानों से स्वतः सिद्ध है।
इस सिद्धान्त को अमली जामा पहनाने के लिये समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 पारित किया गया। यह अधिनियम पुरुष और स्त्री कर्मकारों के समान पारिश्रमिक का भुगतान करने और नियोजन में लिंग के आधार पर स्त्रियों के विरुद्ध विभेद किये जाने का निवारण करने और उससे सम्बन्धित विषयों पर उपबन्ध के लिये अधिनियमित किया गया है। एक ही काम या समान प्रकृति के काम से आशय उस काम से है जिसमें काम करने की दशायें व अपेक्षित कौशल, प्रयत्न तथा उत्तरदायित्व में अंतर नहीं है।
अधिनियम की धारा 4 पुरुष और स्त्री कर्मकारों को एक ही काम या समान प्रकृति के काम के लिये समान वेतन करने के लिये नियोजक को कर्त्तव्यबद्ध करती है जबकि धारा 5 एक ही काम या समान प्रकृति के काम के लिये भर्ती, प्रोन्नति, प्रशिक्षण या स्थानान्तरण आदि में स्त्रियों के विरुद्ध किसी विभेद को प्रतिषिद्ध करती है। विभेद करने वाले पर शास्ति अधिरोपित किया गया है।
नियोजन के दौरान यौन शोषण के विरुद्ध उपचार:-
कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन शोषण को रोकने की मांग कतिपय नारी संगठनों द्वारा की जाती रही है। दिल्ली डोमेस्टिक वर्किंग विमेंस फोरम बनाम भारत संघ (1995) के मामले में उच्चतम न्यायालय ने श्रमजीवी महिलाओं के साथ बढ़ते हुये यौन अपराधों के प्रति गम्भीर चिंता व्यक्त करते हुये इन मामलों के शीघ्र परीक्षण, उन्हें प्रतिकर प्रदान करने तथा उनके पुनर्वास के लिये विस्तृत मार्ग दर्शक सिद्धान्तों को अधिक्विठित किया है।
विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997) के बहुचर्चित मामले में उच्चतम न्यायालय ने नियोजन के दौरान यौन शोषण के विरुद्ध यौन/लैंगिक समानता के मानव अधिकार के प्रभावशाली प्रवर्तन के लिये कानून बनाने की आवश्यकता रेखांकित की तथा अभिनिर्धारित किया कि जब तक ऐसा कानून पारित नहीं होता तब तक न्यायालय के मार्गदर्शक सिद्धान्तों को लागू किया जाय। उच्चतम न्यायालय के अनुसार 'यौन शोषण' के अन्तर्गत ऐसा प्रत्यक्ष व उलझन भरा अप्रसन्न व्यवहार शामिल है जिसमें शारीरिक सम्पर्क करना या उसके लिये आगे बढ़ना, यौन सम्बन्ध बनाने की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लालसा प्रकट करना, सेक्स से भरे हुए कथन कहना, कामोद्दीपक लेख या चित्र दिखाना तथा इसी प्रकार के कोई अन्य शारीरिक, मौखिक या अमौखिक यौन प्रकृति का कुत्सित व्यवहार अथवा कृत्य।
न्यायालय ने निर्धारित किया है कि यह नियोजक या कार्यस्थल पर जिम्मेदार व्यक्ति या संस्थान का दायित्व होगा कि वे यौन शोषण के कृत्यों के लिये सभी आवश्यक कदम लेते हुए निवारण, समझौते या अभियोजन के लिये प्रक्रिया की व्यवस्था करें। यौन शोषण को प्रतिबन्धित करने के लिये कार्यस्थल पर प्रत्येक नियोजक या इंचार्ज व्यक्ति चाहे पब्लिक सेक्टर में अथवा प्राइवेट सेक्टर में है, उसे इस समस्या से निजात पाने के लिये निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए;
(1) परिभाषित कार्यस्थल पर यौन शोषण निषेध को नोटिफाई, प्रकाशित तथा प्रचारित करना चाहिए। (2) पब्लिक सेक्टर संस्थाओं व सरकार के व्यवहार एवं अनुशासन से सम्बन्धित नियमों तथा उपनियमों में यौन शोषण निषेध शामिल किया जाना चाहिए तथा अपराधी के विरुद्ध उचित शास्ति के लिये नियम में व्यवस्था करें। (3) प्राइवेट नियोजकों द्वारा औद्योगिक नियोजन (स्थायी आदेश) अधिनियम, 1946 के तहत  स्थायी आदेशों में उपर्युक्त निषेधों को शामिल करने के लिये कदम उठाये जाने चाहिए। (4) कार्य, आराम, स्वास्थ्य तथा सफाई आदि की उचित व्यवस्था होनी चाहिए ताकि स्त्रियों के विरुद्ध कार्यस्थल पर विपरीत तथा प्रतिकूल वातावरण न हो तथा किसी स्त्री को यह विश्वास करने का कोई आधार नहीं होना चाहिए कि वह नियोजन से सम्बन्धित अलाभप्रद स्थिति में है।
मार्ग दर्शक सिद्धान्तों में अन्तर्निहित है कि यौन शोषण से पीड़ित महिला को यह स्वेच्छा है कि वह या तो अपना स्थानान्तरण चाह सकती है या दोषी व्यक्ति को स्थानान्तरित करवा सकती है। प्रत्येक विभाग में किसी महिला की अध्यक्षता में शिकायत समिति का गठन किया जाना भी आवश्यक बनाया गया है जो आरोपी व्यक्ति के विरुद्ध जांच कर सके। इस तरह की समितियों में गैर सरकारी संगठनों को भी शामिल किया जाना चाहिए तथा शिकायत समिति की वार्षिक रिपोर्ट कृत कार्यवाही की सूचना के साथ सरकार को भेजीनी चाहिए। उच्चतम न्यायालय के इस दिशा निर्देश को अक्षशः स्वीकार कर इसे लागू करने के आदेश पारित कर दिये गये हैं। संसद ने राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम, 1990 द्वारा महिलाओं के लिये एक आयोग का गठन भी किया है। आयोग का प्रमुख कार्य महिलाओं को दी गयी सांविधानिक और विधिक सुरक्षाओं से सम्बन्धित विषयों का अध्ययन करना और मानीटर करना है।
भारतीय संविधान के मौलिक अधिकारों वाले अध्याय में स्त्रियों के लिये विशिष्ट व्यवस्था करने का प्रावधान है। अनुच्छेद 51, प्रत्येक नागरिक पर एक मौलिक दायित्व अधिरोपित करता है कि ऐसी प्रथाओं का परित्याग करे जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध हो। स्त्री कर्मकारों को दी गयी वैज्ञानिक सुरक्षा इसी दायित्व की सम्पूर्ति है।

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