पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने राज्य की झज्जर जिले की असंधा ग्राम की एक जातीय पंचायत के उस आदेश के अमल पर रोक लगा दी है जिसके द्वारा वहाँ विवाहित दम्पत्ति के रूप में रह रहे रामपाल तथा सोनिया के तथाकथित सगोत्र विवाह को मान्यता देने से मना कर दिया था तथा यह फतवा दिया था कि वे 'भाई-बहन' की तरह रहें। पंचायत के इस अवैध आदेश से सकते की स्थिति में पहुँचे गये रामपाल ने तो तलाकनामे पर हस्ताक्षर भी कर दिये थे तथा सोनिया को बहन मानकर 'शगुन' के तौर पर दस रुपये देने की पेशकश की थी लेकिन सोनिया ने पंचायत के फैसले को मानने से इंकार कर दिया। सोनिया के साथ उसकी ननद सहित ससुराल के लोग तथा नारीवादी संगठन एकजुट हो गये तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में प्रमुखता पाने के बाद विवाह को अवैध ठहराने वाले फतवे की तीखी आलोचना हुयी।
ज्ञातव्य है कि रामपाल का डेढ़ वर्ष पूर्व विवाह हुआ था तथा वर्तमान में सोनिया तीन माह की गर्भवती है। पंचायत का कथन था कि रामपाल का गोत्र 'दहिया' है तथा सोनिया 'राठी' गोत्र की है जिनमें विवाह वर्जित है क्योंकि दोनों में 'भाई-चारा' है। सोनिया की तरफ से पंचायत के समक्ष बताया गया कि वह वास्तव में 'हुड्डा' गोत्र की है जो सगोत्र की परिधि में नहीं आता है। लेकिन पंचायत ने इस तथ्य को नकारते हुए उनके विवाह को अवैध घोषित कर उन्हें 'भाई-बहन' के रूप में रहने का फरमान जारी कर दिया। गनीमत रही कि सोनिया ने पंचायत के फैसले के सामने आत्मसमर्पण नहीं किया बल्कि उसके विरुद्ध संघर्ष करते रहने का एलान किया। सोनिया ने आरोप लगाया है कि उसके ससुराल वालों की सम्पत्ति हथियाने के इरादे से गाँव के असरदार लोगों ने एक साजिश की तहत उनके विवाह को अवैध घोषित करवाया है। उच्च न्यायालय के अंतरिम आदेश पारित होने से पंचायत के निर्णय के प्रवर्तन पर फिलहाल रोक तो लग गयी है लेकिन कानून का मखौल उड़ाने वाले निर्णयों को प्रतिबन्धित करने के लिए प्रभावी कदम की आवश्यकता पर एक बार पुनः बहस छिड़ गयी है।
हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत वैध-विवाह की शर्तों में सगोत्र विवाह को अवैध, शून्य या शून्यकरणीय नहीं माना गया है। अधिनियम के अन्तर्गत 'सपिण्ड' तथा 'प्रतिबन्धित दाय' में पड़ने वाले स्त्री-पुरुष के मध्य विवाह अमान्य होता है। सपिण्ड में वे रिश्ते आते हैं जो हिन्दू विधि के अनुसार मृतक के लिए पिण्डदान करने के अधिकारी होते हैं यथा दादा, ताऊ, चाचा आदि के बच्चे। प्रतिबन्धित दाय के अन्तर्गत मातृ-पक्ष से बंधे हुये रिश्ते भी आते हैं। उदाहरणार्थ ममेरे, मौसेरे भाई-बहन आदि। इनके मध्य विवाह वर्जित है लेकिन यदि उनके यहाँ प्रथा हो तो ऐसे विवाह को भी मान्यता देने का प्राविधान है। कई हिन्दुओं में मामा-भांजी के मध्य विवाह की परिपाटी है। इन रिश्तों के बच्चों के बीच कभी-कभार सेक्स-सम्बन्ध हो जाते हैं, जिनका खुलासा होने पर दोनों पक्ष के माता-पिता बच्चों का विवाह कर देने में ही भलाई समझते हैं। ऐसे विवाह भी विधि सम्मत होते हैं।
सगोत्रियों के मध्य विवाह पर रोक के पीछे कोई ठोस कारण नहीं है। दरअसल, एक ऋषि के यहाँ शिक्षा पाये शिष्यों को सगोत्र (सः गोष्ठ) माना जाता था तथा उनके मध्य भाई का रिश्ता माना जाता था। यहीं उनके बच्चों के मध्य भी प्रचलित था अतः उनके मध्य विवाह वर्जित रहा है। सपिण्ड तथा प्रतिबन्धित दाय के रिश्तों में वैज्ञानिक कारणों से विवाह हतोत्साहित किया जाता है क्योंकि ऐसे दम्पत्ति की संतानें कमजोर तथा अल्पजीवी होती हैं। लेकिन जहाँ तक कानून का प्रश्न है, वह इस प्रकार के विवाहों को भी कतिपय स्थितियों में मान्यता देता है।
रामपाल तथा सोनिया के तथाकथित सगोत्र विवाह के अटठारह महीने के बाद और वह भी जब पत्नी गर्भवती है, तब विवाह को रद्द करना तथा उन्हें भाई-बहन के रूप में जीवन-यापन करने का आदेश देना विधि के विरुद्ध तो है ही, सामान्य नैतिकता के सिद्धान्तों, जीवन मूल्यों, तथा परिवार की संस्था के प्रति घोर अवमानना का परिचायक है। पंचायत के बुजुर्ग सदस्यों ने इस बात पर विचार ही नहीं किया कि ऐसे 'भाई-बहन के संसर्ग से उत्पन्न जातक को समाज में कलंकित होने का दंश आजीवन झेलना पड़ेगा। ऐसे जातक से तो अवैध या नाजायज संतान की प्रास्थिति अच्छी होगी। ऐसा मानने का पर्याप्त कारण है कि जातीय पंचायत का यह निर्णय या तो जैसा सोनिया ने आरोप लगाया है, किसी अन्यथा उद्देश्य से लिया गया है, अथवा पंच-लोग गंभीर मानसिक रोगी हो गये हैं।
झज्जर की पंचायत द्वारा लिए गये उक्त निर्णय से पहले भी कई अन्य जातीय पंचायतों द्वारा इससे मिलते-जुलते विधि विरुद्ध निर्णय लिये गये हैं। तथाकथित ऊंची तथा नीची जाति के लड़के-लड़कियों के मध्य प्रेम तथा विवाह को मान्यता न देकर उनको गांव-घर से बाहर करने तथा कई बार उनकी हत्या तक करने के फरमानों के समाचार अक्सर पढ़ने को मिलते हैं। अभी हाल मे मुजफ्फरनगर के गाँव की पंचायत द्वारा एक बलात्कारी से उसी लड़की का विवाह कराने का फरमान जारी कर दिया गया हालांकि व्यथित लड़की तथा उसके घर वाले उस कापुरुष से विवाह करने के बहुत खिलाफ थे।
रामपाल तथा सोनिया के उक्त प्रकरण से थोड़े ही दिन पूर्व आरिफ-गुड़िया-तौफीक के विवाह तथा गर्भ में पल रहे आठ माह के बच्चे को लेकर मुल्ला-मौलवियों की पंचायत ने अलग-अलग तथा परस्पर-विरोधी फतवे दिये थे। ज्ञातव्य है कि गुड़िया का विवाह भारतीय सेना के जवान आरिफ के साथ हुआ था। युद्ध भूमि में आरिफ लापता हो गया तथा भारतीय सेना ने उसे 'भगोड़ा' घोषित कर दिया था। आरिफ के आने की सम्भावना क्षीण होने पर गुड़िया का विवाह एक स्कूटर मैकेनिक तौफीक के साथ हो गया। वह तौफीक के बच्चे को गर्भ में आठ माह से पाल रही थी कि खबर आई कि आरिफ पाकिस्तान की जेल में बन्द है तथा शीघ्र ही छूट कर वापस अपने घर आ गया। आरिफ तथा तौफीक के बीच गेंद बनी गुड़िया तथा उसके पेट में पल रहे बच्चे को लेकर जिस प्रकार के फतवे विभिन्न मुस्लिम विचार-धारा के धर्मगुरुओं ने दिये है उससे स्थिति और अधिक उलझ गयी है तथा उस अजन्मे बच्चे की स्थिति पर चारों ओर से शंकायें की जा रही हैं।
अभी हाल ही में एक जाति विशेष की पंचायत द्वारा उन पुरुषों तथा महिलाओं को 'सम्मानित' कर अभिनन्दन किया गया जिनके आठ या उससे अधिक बच्चे हैं। राष्ट्रीय जनसंख्या नीति तथा उन पर बने कानूनों की खिल्ली उड़ाते हुए यह कार्यक्रम अल्पसंख्यकों के लिए प्रतिगामी संदेश ही देते हैं।
भारतीय संविधान में किसी पंचायत के अधिकार क्षेत्र में पति-पत्नी को भाई-बहन घोषित करना शामिल नहीं है। अतः हाईकोर्ट ने उस पर रोक लगा दी तथा मीडिया में प्रमुखता पाने के कारण रामपाल तथा सोनिया ने फिलहाल राहत की साँस ली होगी। इन जातीय पंचायतों का कोई वैधानिक अधिकार भी नहीं है लेकिन जाति में बेदखल कर दिये जाने के डर से भीरु लोग इनके निर्णय को आत्मसात् करने के लिए मजबूर होते हैं, तथा अधिकांश मामलों में इनका निर्णय अन्तिम और बाध्यकारी हो जाता है। वैसे हरियाणा, पंजाब, तथा पश्चिमी उत्तर-प्रदेश आदि क्षेत्र में गाँव की पंचायत तथा जातीय पंचायतें पर्याय के रूप में उभरी हैं क्योंकि वही व्यक्ति दोनों के कर्त्ताधर्त्ता होते हैं। स्थानीय दबंग लोगों के इशारे पर चलने वाली इन पंचायतों पर पुलिस तथा प्रशासन की पकड़ नहीं हो पाती तथा राजनीतिज्ञों एवं विधायकों का समर्थन होने के कारण इनका आतंकराज कायम रहता है। समय आ गया है कि ऐसी पंचायतों के गठन पर कानूनन रोक लगायी जाय तथा विधि विरुद्ध फरमानों को अपराध घोषित कर उनके लिए दण्ड की व्यवस्था की जाय। धार्मिक मामलों में कठमुल्लापन पर रोक के लिए त्वरित प्रयास अपरिहार्य हैं जिसमें समान नागरिक संहिता का परित होना शामिल है।
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