Monday, 6 July 2026

राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति पर उठे यक्ष प्रश्न!

 कोलकाता की चौदह वर्षीय स्कूल छात्रा हेतल पारिख के साथ दिसम्बर 1989 में बलात्कार तथा हत्या करने के दोषी धनंजय चटर्जी की क्षमादान याचिका खारिज किये जाने के बाद उसे अन्ततः चौदह अगस्त 2004 को फांसी दे दी गयी। ज्ञातव्य है कि धनंजय एक लिफ्टमैन था तथा कालोनी में रहने वाली उक्त हेतल पारिख के साथ छेड़-छाड़ करता था। मना करने पर उसने न सिर्फ उस बच्ची के साथ बलात्कार किया बल्कि भेद खुल जाने के डर से हत्या कर दी। पश्चिम बंगाल के अलीपुर की निचली अदालत ने उसे अप्रैल 1991 में फांसी की सजा सुनाई जो कोलकाता हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट द्वारा बहाल रही। उसकी फांसी की तिथि 25 फरवरी 1994 नियत की गयी थी लेकिन राष्ट्रपति के समक्ष प्राण-दान की याचिका लम्बित होने के कारण वह टाल दी गयी। इस याचिका के खारिज होने के बावजूद उनकी फांसी कतिपय कारणों से टलती रही प्रायः दस वर्ष बाद इस वर्ष पच्चीस जून को जब फांसी देने की तैयारी की जा रही थी, तभी राष्ट्रपति भवन के एक संदेश द्वारा जीवन-दान की आशा की किरण जागी तथा उच्चतम न्यायालय ने फांसी पर राष्ट्रपति के निर्णय तक रोक लगा दी, लेकिन अन्ततः उसकी पत्नी पूर्णिमा द्वारा दायर क्षमादान याचिका खारिज हो गयी। अंतिम दिनों धनंजय तथा इसके परिवार वालों को प्रेस तथा मीडिया का पर्याप्त कवरेज मिला तथा क्षमादान याचिका खारिज किये जाने की मांग को लेकर उसने बुड्ढे माता-पिता, पत्नी तथा बच्चों ने व्यथित होकर खाना-पीना छोड़ दिया भी दिया। यही नहीं, परिवार वालों ने इसके मृत शरीर को लेने से इंकार कर दिया। इसी के कारण धनंजय की अपनी आंखें दान करने की अंतिम इच्छा भी पूरी नहीं हो सकी।

धनंजय प्रकरण के प्रकाश में आते ही कई मानवाधिकार संगठनों ने इसे क्षमादान देने तथा दण्ड विधान से फांसी की सजा समाप्त करने की पुरजोर वकालत की। ब्रिटेन सरकार तथा कई राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्वयंसेवी संस्थाओं ने अधिकारिक तौर पर उसकी फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदलने की सलाह दी तो पश्चिम बंगाल सरकार तथा हेतल के स्कूल की प्राचार्या, शिक्षिकाओं तथा छात्राओं समेत नारी अस्मिता की रक्षा में संलग्न संगठनों ने इस जघन्य अपराधी के प्रति दयाभाव न दिखलाने की मांग की। मीडिया तथा प्रेस द्वारा इस सारे मामले को प्रमुखता दिये जाने से जहाँ अलीपुर जेल के जल्लाद नाटा मालिक को कतिपय कार्यक्रमों में मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाने का सिलसिला प्रारम्भ हो चला वहीं देश के अन्यान्य हिस्सों में फांसी-फांसी का खेल खेलते कम से कम पांच अबोध बच्चों की हृदय विदारक मृत्यु के समाचार आये हैं।
धनंजय को फांसी दिये जाने पर जहाँ भारतीय दण्ड विधान में मृत्युदण्ड की अपरिहार्यता पर एक बार पुनः बहस छिड़ गयी है, वहीं राष्ट्रपति के क्षमादान विवेकाधिकार की पात्रता तय करने के लिये मानक निर्देशक सिद्धान्त लिपिबद्ध करने की मांग की जा रही है। प्रश्न किया जा रहा है कि जब 1994 में इसकी क्षमादान याचिका निरस्त कर दी गयी थी फिर इतने दिनों तक उसे संशय में क्यों रखा गया? फांसी देने में हुयी देरी के कारण ही उसे जनता के एक वर्ग से सहानुभूति मिली। यह भी प्रश्न अनुत्तरित है कि जब राष्ट्रपति ने उसकी दया-याचिकाऐं खारिज कर दी थी फिर 25 जून से तुरंत पहले किस मानवीय संवेदना से वशीभूत होकर उसकी फांसी की सजा रोकी गयी तथा उसके और उसके परिवार वालों को छद्म दिलासा दी गयी। इस प्रश्न का उत्तर भी समाज-शास्त्रियों तथा विधि-विशोषों से अपेक्षित है कि जब उच्चतम न्यायालय 'विरलों में भी विरलतम' मामलों में ही मौत की सजा सुनाता है, फिर ऐसे प्रकरणों में राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति का औचित्य ही क्या है? उच्चतम न्यायालय ने अपने एक निर्णय में अभिनिश्चित किया है कि फांसी देने में अत्यधिक देरी होने से कैदी को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 में वर्णित प्राण तथा दैहिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के अन्तर्गत फांसी की सजा बदल कर आजीवन कारावास करवाने का पर्याप्त कारण हो जाता है। बाद में न्यायालय ने अपने मत में संशोधन कर दिया लेकिन फांसी की सजा पाये लोग अभी इसी खुश-फहमी में रहते हैं कि यदि उनकी फांसी की सजा ऐन-केन टलती रहे तो फिर शायद वह दुर्दिन देखने की नौबत न आये। इस प्रकरण के बाद मीडिया ने खोज कर कई ऐसे अन्य मामलों को उजागर किया है जिनमें फांसी की सजा पाने तथा क्षमादान की याचिका खारिज होने के चौदह-पन्द्रह साल बाद भी उसे कार्यान्वित नहीं किया गया है। इनमें कुछ 75 वर्ष वय प्राप्त कर चुके सिद्ध दोष भी हैं जो अब वैसे भी मौत की कगार पर हैं।
लगभग सभी संविधान कार्यपालिका के प्रधान को ऐसे व्यक्तियों को क्षमा प्रदान करने की शक्ति देते हैं जिनका किसी अपराध के लिये विचारण और दोष सिद्धि हुयी है। इस शक्ति के अनुसरण में सम्प्रभु को यह विशेषाधिकार होता है कि समाज तथा राज्य के प्रति किये गये अपराध को क्षमा कर दे तथा सिद्धदोष व्यक्ति के दण्ड को बदल दे, कम कर दे, विलम्बित कर दे या समाप्त कर दे। यह विशेषाधिकार काल से प्रायः प्रत्येक सभ्य राष्ट्र के राष्ट्राध्यक्ष को प्राप्त रहा है। लेकिन भारत में अंग्रेजी हुकूमत स्वतंत्रता संग्राम के मतवालों को फांसी तथा काले पानी की सजा उनके मनोबल को तोड़ने तथा आंदोलन को कमजोर करने हेतु देती थी। अतः जब संविधान के अनुच्छेद 72 तथा 161 में क्रमशः राष्ट्रपति तथा राज्यपालों को क्षमादान की और कुछ मामलों में दण्डादेश के निलम्बन, परिहार तथा लघुकरण की शक्ति उल्लिखित की गयी तो सजा पाये व्यक्तियों को अपने किये पर पश्चाताप करने के अवसर के द्वारा खुलते दिखे।
क्षमादान शक्ति का उपयोग करने का मामला पहले-पहल सन् 1961 में पत्र-पत्रिकाओं में प्रमुखता पाया जब नौसेना के कमांडर कैप्टेन के० एम० नानावती को अपनी पत्नी सिल्विया के कथित प्रेमी प्रेम आहूजा की हत्या के लिये फांसी की सजा सुनाई गयी। यह सिद्ध हो गया कि सिल्विया तथा प्रेम आहूजा में अवैध शारीरिक सम्बन्ध थे। नानावती इससे बहुत ही क्षुब्ध और अपमानित हुये तथा उन्होंने अवसर खोज कर प्रेम आहूजा की हत्या कर दी तथा स्वयं को कानून के हवाले कर अपना अपराध स्वीकार कर लिया। बम्बई हाई कोर्ट ने उन्हें जानबूझ कर तथा योजनाबना हत्या करने का दोषी पाया तथा फांसी की सजा दे दी। पत्नी की बेवफाई तथा इसके कथित प्रेमी द्वारा अपना मखौल उड़ाये जाने पर की गयी हत्या आम जनमानस में न्यायसंगत तथा उचित मानी गयी थी तथा विधि के तकनीकी पहलुओं से परे होकर कैप्टेन को क्षमादान देने के पक्ष में जनमत था।
वैसे तो बलात्कार तथा हत्या के सैकड़ों प्रकरण निर्णीत हुये है तथा उन पर जनमानस की रोष और आक्रोश भरी प्रतिक्रिया देखने-सुनने को मिली है लेकिन हितल पारेख के साथ घटित लोमहर्षक घटना पर सत्तर के दशक के उत्तरार्द्ध में दिल्ली की एक स्कूली छात्रा गीता चोपड़ा के साथ बलात्कार तथा विरोध करने पर उसकी और उसके भाई, संजय चोपड़ा की हत्या का मामला मनोमस्तिष्क में कौंध जाता है। एक सैन्य अधिकारी के दोनों बच्चे स्कूल जाने के लिये सामने से गुजरती हुयी एक कार से लिफ्ट मांग बैठे। कार में सवार कुख्यात अपराधी रंगा-बिल्ला ने कार में ही गीता के साथ बलात्कार किया और प्रतिरोध करने पर भाई-बहन को मौत के घाट उतार दिया। बाद में दोनों को फांसी की सजा हुयी। इनके द्वारा प्रस्तुत की गयी क्षमादान याचिका राष्ट्रपति द्वारा निरस्त कर दी गयी और उच्चतम न्यायालय ने कुलजीत सिंह बनाम उपराज्यपाल, दिल्ली (1982) के इस मुकदमे में राष्ट्रपति के क्षमादान सम्बन्धी अधिकारों तथा याचिकाओं पर अन्वेषण करने से यह कहकर इंकार कर दिया था कि इस बर्बर का जघन्य कांड की सजा सिर्फ फांसी ही हो सकती है तथा अपराधी किसी भी प्रकार से दया के पात्र नहीं है। स्वाभाविकतः इसी केस के आधार पर ही धनंजय की दया-याचिका निरस्त की गयी है।
स्वर्गीय इन्दिरा गाँधी के कथित हत्यारों को पर्याप्त सबूत के अभाव में मृत्युदण्ड दिये जाने पर सवाल खड़े किये गये थे तथा क्षमादान याचिका को साधिकार पाने के लिये उच्चतम न्यायालय में असफल प्रयास हुआ। केहर सिंह बनाम भारत संघ (1989) के इस वाद में उच्चतम न्यायालय ने क्षमादान की शक्ति के सम्बन्ध में निर्धारित किया था कि जो व्यक्ति राष्ट्रपति को क्षमादान के लिये आवेदन करता है, उसे राष्ट्रपति के समक्ष मौखिक सुनवाई का अधिकार नहीं है तथा इस शक्ति का प्रयोग राष्ट्रपति के विवेकाधीन है। न्यायालय ने यह भी कहा कि शक्ति का प्रयोग केन्द्रीय सरकार की सलाह पर किया जायेगा तथा न्यायालय मार्गदर्शन के सिद्धान्त अधिकथित करने की आवश्यकता नहीं समझता। एक अन्य मुकदमें, मारूराम बनाम भारत संघ (1980) में अभिनिर्धारित किया गया था कि न्यायालय वहाँ हस्तक्षेप कर सकेगा जहाँ राष्ट्रपति का निर्णय अनुच्छेद 72 के उद्देश्यों से पूर्णतया असंगत है या तर्कहीन, मनमाना, विभेदकारी असम्भावी है। राष्ट्रपति की क्षमादान आदि की शक्ति पर न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति से सम्बन्धित एक अन्य महत्त्वपूर्ण मुकदमा कृष्णा गाउंड बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1976) निर्णीत हुआ है। इसमें दो व्यक्तियों को कई हत्याओं के आरोप में फांसी की सजा दी गयी थी। अभियुक्तों का कथन था कि मृतकों से उनकी कोई निजी दुश्मनी नहीं थी तथा सामाजिक समानता लागू करने के लिये उन्होंने अमीर और सरमायदार लोगों की हत्या की थी। उच्चतम न्यायालय ने दुश्मनी के अन्तर्गत की गयी हत्या और राजनैतिक हत्या के फर्क को मानने से इंकार कर दिया था तथा स्थापित किया कि फांसी की सजा विरलतम प्रकरणों में ही दी जाती है। अतः अनुच्छेद 72 के अन्तर्गत विचार करते हुये किसी अन्यथा परिप्रेक्ष्य पर दृष्टिपात की आवश्यकता नहीं है।
क्षमादान की शक्ति ऐतिहासिक रूप से एक सम्प्रभु की शक्ति है, राजनैतिक रूप से एक अवशिष्ट शक्ति है तथा मानवतावादी दृष्टिकोण से यह एक अव्यक्त न्याय है जो वर्तमान न्याय प्रणाली से ऊपर उठकर समाज के कल्याण के लिये कार्य करती है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि क्षमा आदि की शक्ति भारत की सम्प्रभु जनता की है और जनता ने इसे देश के सर्वोच्च अधिकारी राष्ट्रपति को सौंप दिया है जिससे यह अपेक्षा की जा सकती है कि इसका प्रयोग युक्तिमुक्त तथा समाज के वृहत्तर हितों को ध्यान में रखकर किया जायेगा। 
भारतीय विधिक इतिहास में राजा नन्द कुमार परीक्षण (1779) एक महत्त्वपूर्ण मील का पत्थर है जिसमें तत्कालीन गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स के खिलाफ बोलने की जुर्रत करने वाले बंगाल के अति प्रतिभाशाली जमींदार नन्द कुमार को एक छोटा सा ऋण न चुका पाने के आरोप में फांसी की सजा दे दी गयी थी। इतिहास में इसे राजा नन्द कुमार की 'न्यायिक हत्या' माना जाता है। थोड़े समय पूर्व अपने पड़ोसी देश पाकिस्तान के भूतपूर्व प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो को एक व्यक्ति की हत्या के प्रयास के षड्यन्त्र में शामिल होने के आरोप में फांसी दे दी गयी थी तथा तत्कालीन पाक राष्ट्रपति जिया उलहक ने एमनेस्टी इंटरनेशनल सहित दुनिया भर से पहुंची क्षमादान की अपीलों को नजर अंदाज कर भुट्टो को 'शहीद' बना दिया था। इसके विपरीत भारत में अभी हाल में स्वर्गीय राजीव गांधी की हत्या में शामिल नलिनी को उनके अबोध बच्चे की परवरिश करने देने के लिये श्रीमती सोनिया गांधी ने स्वयं राष्ट्रपति से उसे क्षमादान देने की गुजारिश की है। आस्ट्रेलियाई मिशनरी ग्राहम स्टेन्स को उनके दो बच्चों के साथ जिंदा जलाकर मार डालने के दिल दहला देने वाले अपराध में फांसी की सजा पाये कुख्यात अपराधी दारा सिंह के प्रति दया दिखलाते हुये स्टेन्स की पत्नी ने भी क्षमा करने की अपील की है।
प्रमुख विधि शास्त्री ब्लैक स्टोन का कहना है कि क्षमादान की शक्ति राजतंत्र के लिये लाभदायक है लेकिन 'कानून के शासन' का हौसला रखने वाले प्रजातंत्र में इसके लिये कोई जगह नहीं है। लार्ड डेनिंग का मानना है कि न्यायिक प्रशासन की कोई भी मानवीय प्रणाली पूर्णतया दोषमुक्त नहीं हो सकती, लेकिन यदि किसी को इस पर शिकायत हो तो उसे न्यायिक प्रणाली में सुधार करने, उपचार देना चाहिए। लेकिन एक दोष सिद्ध व्यक्ति को क्षमादान देकर निर्दोष घोषित करना अनुचित है।
धनंजय के प्रति सहानुभूति इसलिये उपजी क्योंकि वह चौदह साल से जेल काट रहा था तथा पिछले दस साल से उस पर फांसी की सजा की तलवार लटकी रही। यदि उसे समय फांसी दे दी जाती तो सम्भवतः ऐसी प्रतिक्रिया नहीं होती। और इसका प्रमाण भी उसकी फांसी के एक दिन पहले ही देखने को मिला जब नागपुर में कई लड़कियों तथा औरतों की इज्जत के साथ खिलवाड़ करने के आरोपी अक्कू यादव को भरी अदालत में मार दिया गया। ऐसे व्यक्ति की हत्या पर आंसू बहाने की बजाय सभी ने राहत की सांस ली है।
राष्ट्रपति की क्षमादान की शक्ति न्यायिक शक्ति से भिन्न है। यह शक्ति मुख्य रूप से मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित है। कई बार कोई व्यक्ति आवेश, भावावेश अथवा अकल्पित परिस्थितियों में कोई अपराध कारित कर देता है, तब राष्ट्रपति उस व्यक्ति की स्थिति, भावनाओं, परिस्थितियों, समाज पर उसके प्रभाव आदि को ध्यान में रखते हुये इस शक्ति का प्रयोग करता है। लेकिन इसका अभिप्राय यह नहीं है कि इस शक्ति का प्रयोग जघन्य अपराधियों के लिये भी किया जा सकता है। जीवनदान के इस अनुग्रह को पाने की स्थितियां स्पष्ट की जानी चाहिये तथा अनावश्यक विलम्ब नहीं होना चाहिये।

 

No comments:

Post a Comment