संयुक्त राज्य अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य की एकतालिस वर्षीया टेरी शियावो अन्ततः परलोकवासी हो गयी। वे पिछले पन्द्रह वर्षों से अधिक से मूर्च्छा में थी। सन् 1990 में शियावो का मस्तिष्क क्षतिग्रस्त हो गया था। खाने-पीने में कुछ गड़बड़ी होने के कारण हुये रसायनिक असंतुलन से उनके हृदय ने काम करना बन्द कर दिया। इसी के चलते मस्तिष्क इस प्रकार से क्षतिग्रस्त हुआ कि उसके वापस पूर्व में आने की सम्भावना नहीं रही। लेकिन पति तथा परिजनों की इच्छानुसार उन्हें ट्यूब के जरिये भोजन पहुँचाकर डाक्टरों ने इतने दिनों तक जीवित रखा।
मस्तिष्क मृत-प्राय होने के बावजूद विशेषज्ञ चिकित्सकों ने पूरा प्रयास किया कि उन्हें सामान्य जिंदगी लौटा दी जाय लेकिन यह सम्भव नही हो पाया। इस हालत में अभी वे और भी पड़ी रह सकती थीं। लेकिन उनके पति माइकल शियावो ने अस्पताल अधिकारियों तथा न्यायालय से गुहार की कि जब टेरी शियावो के जीवन लौटने की आशा नहीं हैं, फिर उन्हें गरिमा के साथ मृत्यु का आलिंगन करने दिया जाय तथा भोजन-नली हटा ली जाय जिसके सहारे वह चल रही थी। उनकी इस गुहार पर सकारात्मक प्रतिक्रिया हुयी तथा अदालत ने डाक्टरी राय सुनिश्चित कर भोजन नलिका हटाने की अनुमति दे दी। लेकिन इसी बीच टेरी शियावो के माता-पिता बाब तथा मेरी शिंडलर ने प्रति-अपील की कि उनकी बेटी की ट्यूब न हटाई जाय तथा उसे इस हाल में भी जिन्दा रखा जाय। परन्तु कानून के जानकारों ने विवाहिता के बारे में रजामंदी देने का अधिकार पति में सिद्ध किया तथा अदालतों ने इसी पर अपनी मोहर लगाई। ट्यूब हटाने के पन्द्रह दिनों के भीतर टेरी की स्वाभाविक मौत हो गयी।
टेरी शियावो के निधन से धर्म, नीति और कानून के जटिल प्रश्न पैदा हुये हैं, जिनमें प्राण तथा दैहिक स्वतंत्रता, मानवाधिकार व मानव गरिमा के साथ जीने-मरने का अधिकार तथा किसी के शरीर के विषय में निर्णय लेने के अधिकारों का द्वन्द्व सम्मिलित है। एक ओर ईसाई धर्म के गृहकेन्द्र वैटिकन सिटी के कार्डिनल (धर्माचार्य) ने कहा है कि टेरी शियावो की भोजन देने वाली नलिका हटाना वस्तुतः "हत्या" करना है तथा इच्छा या दया-मृत्यु का बहाना बनाकर सम्बन्धित लोग ईश्वर के समक्ष मानव-वध के अपराध की जवाबदेही से मुक्त नहीं हो पायेंगे। जीवन की अनन्तता में अटूट विश्वास रखने वाले कई संगठनों के कर्त्ता-धर्ता अन्तिम क्षणों तक अस्पताल के सामने 'जो कानूनी है, वह आवश्यक नहीं कि नैतिक हो' की तख्तियां लिये प्रदर्शन करते रहे। दूसरी ओर टेरी के माता-पिता का कहना है कि वे अपनी बेटी की इस हाल में भी जिन्दगी बनी रहने देना चाहते थे, हो सकता है निकट भविष्य में इसका कोई इलाज निकल आता। वे इसके लिये खर्चा भी उठाने को तैयार थे। उनका कहना था कि उन्होंने टेरी को पैदा किया है तथा उसके बारे में निर्णय लेने का उनका भी अधिकार है। विवाह के बाद स्त्री का संरक्षकत्व पति में निहित होने के अधिकार को वह चुनौती नहीं देते लेकिन उनका कहना था कि 'मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है' तथा हम टेरी के पति को उसकी सेवा-सुश्रुषा के दारुण पक्ष से मुक्त कर सकने में सक्षम थे। अतः हमारी जिम्मेदारी पर टेरी को कृत्रिम विधि से भोजन देना जारी रखना था। लेकिन अदालतों ने उनकी दलील स्वीकार नहीं की और पति की इच्छानुसार नली हटा ली गयी।
टेरी शियावो की मरणासन्न स्थिति पर अन्तिम दिनों अमेरिका में उनकी स्थिति पर मीडिया का पर्याप्त फोकस रहा। वहाँ की संसद (कांग्रेस) ने विधेयक पारित किया कि ऐसे मरीज या उनके परिजनों को यह अधिकार नहीं होगा कि डॉक्टरों को इस बात के लिये बाध्य करें कि वे किसी की मृत्यु कारित करें। अमेरिकी इतिहास में ऐसे मौके कम आये हैं जब जनमत के दबाव में कांग्रेस की आपात बैठक की गयी है। इस बिल को कानूनी जामा पहनाने के लिये हस्ताक्षर करने हेतु प्रेसीडेंट बुश अपनी यात्रा अधबीच छोड़कर वाशिंगटन पहुँचे थे।
चिकित्सकीय नीतिशास्त्र में जहां किसी का जीवन बचाने के लिये अन्तिम क्षणों तक प्रयास करने का अनुदेश है वहीं यह भी नीति है कि मानव जीवन की गरिमा का विशेष ख्याल रखा जाय तथा प्राकृतिक नियमों के साथ छेड़छाड़ न की जाय। इन नीति वचनों में मरीज तथा उसके परिजनों को पूरी, सच-सच तथा प्रामाणिक जानकारी देने तथा विपरीत परिस्थिति में उनसे सहमति प्राप्त करने का उल्लेख भी है।
टेरी शियावो के निधन के तुरन्त बाद हुए एक घटनाक्रम का उल्लेख भी समीचीन है। टेरी की मृत्यु के दो-तीन दिन के भीतर ही कैथोलिक पंथ के सबसे बड़े धर्मागुरु पोप जॉन पाल (द्वितीय) का वैटिकन सिटी में स्वर्गवास हो गया। वे काफी अर्से से बीमार थे, लेकिन अन्तिम दिनों में अस्पताल छोड़कर घर आ गये थे। उनका मानना था कि जीवन का अन्त भी ईश्वरीय इच्छा है, अतः उससे जूझने के लिये कृत्रिम उपाय करना अधर्म है तथा सर्वशक्तिमान का निरादर है। भारत में भी यह परम्परा है। जैन मुनियों द्वारा अन्तिम समय में जीवित समाधि लेने या अन्न-जल त्यागने के समाचार अक्सर देखने सुनने को मिलते है। किसी लाइलाज बीमारी से ग्रसित मरीज को डाक्टर यह कह कर छुट्टी दे देते हैं कि उसे अपने परिजनों के बीच में ले जायें जहां वह शांति से अन्तिम सांस ले सके।
जीवन की प्रत्याशा समाप्त होने पर गरिमा के साथ मृत्यु अंगीकार करने के कानून बनाने को लेकर जनमत विभाजित है। प्रायः प्रत्येक धर्म में जीवन की रक्षा हर एक मानव का पुनीत कर्त्तव्य माना गया है। मेडिकल सांइस में विकास के कारण पश्चिमी देशों में कई ऐसे लोगों ने अपनों को इस प्रत्याशा में शीतगृहों में सुरक्षित करा लिया है कि कभी न कभी उनकी बीमारी का इलाज निकल आयेगा। तब वे अपने को पुनर्जीवित करायेंगे तथा भरी-पूरी ज़िन्दगी जियेंगे। इसके लिये काफी बड़ी धनराशि दी जा रही है। उन्हें यह भी विश्वास है कि आने वाले समय में बुढ़ापे का भी समाधान मिल जायेगा तथा वे अपने धन-ऐश्वर्य के सहारे अनगिनत साल जीवित रहेंगे। उधर दूसरी तरफ, क्लोनिंग विधि के जरिये अपनी कलम लगाकर प्रतिरूप बनाने की सम्भावना से मानव जाति में अमरता प्राप्त करने की नई आकांक्षा प्रबल हुयी है।
हमारे कानून प्रकृति के सिद्धान्तों के अनुसार बनाये गये हैं जिसमें मृत्यु एक निश्चितता है। सम्पत्ति के उत्तराधिकार में "शाश्वतता के विरुद्ध" सिद्धान्त प्रतिपादित है तथा यह प्राविधानित है कि किसी की सम्पत्ति को अनिश्चित काल तक बाधित नहीं रखा जा सकता है। मानव-सम्बन्धों पर भी यही नियम लागू होते हैं। जीवन को एनकेन-प्रकारेण बचाये रखने में नैतिकता तथा मानव-संवेदनशीलता एक पक्ष है, लेकिन उसका कानूनी पक्ष अनिश्चित तथा अतार्किक नहीं हो सकता। विवाह के पश्चात पति के जीवित होते हुये भी माता-पिता को संरक्षक बनाने के अपने दुष्परिणाम होंगे। शारीरिक तथा मानसिक रूप से अक्षम व्यक्ति के विषय में निर्णय लेने के अधिकार में भी विवलन कहीं का नहीं छोड़ेगा।
भारतीय मनीषा में ब्रह्मा-विष्णु-महेश जीवन के जनक, पालक तथा संहारक के रूप में प्रतिष्ठित, पूज्य और स्तुत्य हैं। इनमें जहां विष्णु की उपासना धन-धान्यादि एवं ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिये विभिन्न सुअवसरों पर की जाती है, वही महामृत्युंजय मंत्र : "त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्, उर्वारुक मिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्" का जाप इस कामना के साथ किया जाता है कि हमारा जीवन हृष्ट-पुष्ट तथा सुगन्धपूर्ण हो तथा परिपक्व होने पर हम इस संसार से उसी प्रकार मुक्त हो जांय जिस प्रकार ककड़ी स्वयंमेव अपनी लता से अलग हो जाती है। जीवन की अभिलाषा, प्रत्याशा और रक्षा का यही धर्म है, यही नीति है और यही कानून है।
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