संसद के आगामी शीतकालीन अधिवेशन में लोकपाल विधेयक को एक बार पुनः पेश किये जाने की कवायद के साथ ही अन्यों के अतिरिक्त राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री को भी लोकपाल के क्षेत्राधिकार की परिधि में लाने को लेकर एक नयी बहस छिड़ गयी है। जहाँ वर्तमान राष्ट्रपति डा० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम तथा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इन संवैधानिक पद-धारियों को प्रस्तावित कानून से आच्छादित करने को उचित करार दिया है, वहीं वर्तमान उपराष्ट्रपति श्री भैरोंसिंह शेखावत तथा पूर्व प्रधानमंत्री श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह समेत कतिपय नेताओं ने इस ऊंचे पद को कानून के क्षेत्राधिकार से बाहर ही रखने की वकालत की है। ज्ञातव्य है कि लोकपाल विधेयक पहली बार 1969 में पेश किया गया था लेकिन पारित न हो सका। तब से लेकर 1998 तक विभिन्न सरकारों ने कतिपय संशोधनों के साथ इसे आठ बार लोकसभा में पेश किया लेकिन अभी तक सम्बन्धित कानून मरीचिका ही साबित हुआ है। प्रस्तावित कानून पर नवी बहस के साथ ही वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इसकी प्रासंगिकता तथा उपादेयता पर भी शंका जाहिर की जा रही है।
बीसवीं शताब्दी में लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना के साथ सरकारी कृत्यों में अभूतपूर्व वृद्धि हुयी है। सामाजिक सेवाओं तथा अर्थव्यवस्था के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु प्रजातांत्रिक सरकारों द्वारा नागरिकों के दैनंदिनी जीवन के प्रायः प्रत्येक पहलू में हस्तक्षेप होने लगा है। ऐसे हस्तक्षेप में वे कार्य भी आते हैं जो कार्यपालिका के विवेकाधीन होते है तथा जिनमें भ्रष्टाचार, पक्षपात, प्रमाद, अक्षमता, अनैतिकता, मनमानापन तथा विलम्ब की पर्याप्त गुंजाइश होती है। प्रशासन तथा व्यवस्थापिका पर नजर रखने के लिये 'प्रहरी', 'परिवाद अधिकारी' अथवा 'प्रशासन का संसदीय कमिश्नर' के नामों से प्रचलित 'अम्बुड्समैन' की संस्था की शुरुआत 1809 में सर्वप्रथम स्वीडन में हुयी थी। फिनलैण्ड, डेनमार्क, तथा नार्वे, ऐसे स्कैंण्डिनेवियन देशों से पल्लवित-पुष्पित होती यह संस्था न्यूजीलैण्ड, अल्जीरिया, मारीशस, गुयाना, कनाडा तथा इंग्लैण्ड सहित, अन्यान्य प्रजातांत्रिक देशों में अपना स्थान बना चुकी है। भूतपूर्व अटार्नी जनरल एम०सी० सीतलवाड ने साठ के दशक के प्रारम्भ में अपने यहाँ भी 'अम्बुड्समैन' की तर्ज पर केन्द्र में 'लोकपाल' तथा राज्यों में 'लोकायुक्त' की संस्थायें गठित करने का सुझाव दिया था। उड़ीसा, महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश तथा उत्तरांचल समेत कई राज्यों में लोकायुक्त कार्यरत है लेकिन केन्द्र ने इसकी व्यवस्था अभी की जानी है।
शासन सत्ता के उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों के आचरण पर अंकुश के लिये भारतीय दण्ड संहिता, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम तथा जांच आयोग अधिनियम आदि कानून हैं तथा इनके प्रर्वतन के लिये पुलिस तंत्र के अलावा केंद्रीय सतर्कता आयोग तथा विभिन्न गुप्तचर एजेंसियां कार्यरत हैं। लेकिन एक आम नागरिक के लिए इनमें गति पैदा करना आसान नहीं है। अखबारों, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया चैनलों आदि में जब मामला उछलता है तो सरकारें हरकत में आती हैं तथा जांचें बैठायी जाती हैं। लेकिन इन जांचों को राजनीति से प्रेरित कह कर स्थिति को धुंधा-धुंधा करने के प्रयास होते हैं, इनमें इतनी देर भी होती है कि तत्कालीन आवेग चुक जाता है। बाद में पर्याप्त साक्ष्य न होने के कारण मामले न्यायालय से छूट जाते हैं और आरोपी अपने को दूध का धुला साबित कर ले जाते हैं। अपवादों को छोड़कर अभी तक कोई बड़ी मछली भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के चंगुल में नहीं फंस सकी है।
न्यायिक पुनर्विलोकन तथा संसदीय नियंत्रण के अपर्याप्त सिद्ध होने, प्रशासन के अधिकारों के प्रवर्धन में अधिक पारदर्शिता लाने, नागरिकों के सूचना प्राप्त करने के मौलिक अधिकारों को अमली जामा पहनाने तथा एक उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिये एक ऐसी संस्था की आवश्यकता है, जो प्रत्यक्ष तथा निष्पक्ष हो, जांच की कार्यवाहियां वैयक्तिक तथा औपचारिक प्रकृति की हों, कार्यवाहियां न्यायिक हस्तक्षेप से परे हों तथा उसे अपने कार्यों को पूरा करने में अधिक से अधिक स्वायत्तता तथा स्वतंत्रता हो। इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिये केन्द्र में लोकपाल तथा राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति की अनुशंसा हुयी थी।
सन् 1998 में जिस लोकपाल विधेयक को पेश किया गया था उसमें एक त्रिस्तरीय संस्था के गठन का प्राविधान था। इसके अध्यक्ष तथा दो सदस्यों के लिये क्रमशः भारत का मुख्य न्यायाधीश तथा उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश या उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश होना अर्हता रखी गयी थी। इनका कार्यकाल पांच वर्ष था तथा इन्हें एक सामान्य सिविल न्यायालय की शक्ति दी गयी थी। इस विधेयक में 33 खण्ड हैं और यह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के हेतु दिये गये समस्त परिवादों को सम्मिलित करता है। लोकपाल लोकाभिमुखकारी वह है जो संघ में प्रधानमंत्री, उपमंत्री का पद धारित करता है अथवा कर चुका है। इस प्रकार यह विधेयक बहुत ही संकुचित प्रकार के मामलों में एक सीमित दायरे वाले प्राधिकारियों के लिये लागू होगा। राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, उच्चतम न्यायपालिका के न्यायाधीशों आदि संवैधानिक पदाधिकारियों पर इसका अधिकार क्षेत्र नहीं रखा गया है।
लोकपाल शिकायतों की जांच करता है तथा अपनी सिफारिश प्रधानमंत्री को देगा जो उस पर कार्यवाही करने के लिये स्वतंत्र होगा। प्रधानमंत्री की स्थिति में उसके विरुद्ध कार्यवाही करने का अधिकार अंततोगत्वा लोकसभा के ऊपर छोड़ दिया गया है, क्योंकि वह लोकसभा के प्रति जिम्मेदार होता है। लोकपाल की सिफारिशें अनुशांसात्मक होती हैं, तथा उन पर कार्यवाही करना या न करना प्रधानमंत्री के विवेकाधिकार में होता है।
भारतीय संविधान में राष्ट्रपति नाममात्र का शासक है। उपराष्ट्रपति राज्य-सभा का सभापति होता है तथा राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में उसके पद पर कार्यवाहक के रूप में कार्य करता है। राष्ट्रपति के रूप में वह मंत्रिपरिषद की सलाह से बाध्य होता है। प्रधानमंत्री पर सरकार चलाने का दायित्व होता है तथा वह अपने अधीनस्थ मंत्रियों पर लगाम रखता है। वह अपने पार्टी, लोकसभा तथा भारत की जनता के प्रति जवाबदेह होता है, अतः उससे भ्रष्ट आचरण की अपेक्षा नहीं है। लेकिन जहाँ ऐसे भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ कार्यवाही करने का प्रश्न है - हमारे देश में पिछले दिनों घटित घटनायें कुछ और ही कहानी कहती हैं। पिछली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन सरकार के कुछ मंत्रियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामले आये जो गम्भीर थे तथा पर्याप्त साक्ष्य भी थे। सम्बन्धित मंत्री ने क्षोभ में आकर त्याग-पत्र भी दिया लेकिन शीघ्र ही वापस मंत्रिमण्डल में ले लिए गये। वर्तमान संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन में भी ऐसे मंत्री हैं जिनके विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामले चल रहे हैं। गठबन्धन की राजनीति में ऐसे तत्वों को मंत्रिपद देने के अपने कारण तथा विवशतायें हैं। जिस मोल-भाव तथा जोड़-तोड़ से सरकारें बन रही हैं उसमें भ्रष्टाचारियों को मंत्री बनाना हमारी नियति बन गया है। ऐसे तत्व प्रत्येक राजनीतिक दल में हैं तथा इनके विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य भी हैं लेकिन इन्हें फिर-फिर मंत्रिमण्डल में जगह देना मजबूरी है। ऐसे लोगों के विरुद्ध लोकपाल अपनी अनुशंसा देगा लेकिन प्रधानमंत्री के पास ऐसी फाइल को अलमारी में बंद रखने के सिवाय कोई चारा नहीं होगा तथा लोकपाल की संस्था 'कागजी शेर' बन कर रह जायेगी। अपने विरुद्ध लोकपाल द्वारा की गयी किसी टिप्पणी पर सम्बन्धित मंत्री उल्टे लोकपाल पर राजनीति से प्रेरित होकर कार्य करने का आरोप लगायेगा।
थोड़े दिनों पूर्व उच्चतम न्यायालय के एक न्यायाधीश के विरुद्ध सरकारी धन के दुरुपयोग को लेकर महाभियोग चलाया गया था लेकिन लोकसभा में वोटिंग के समय सांसद उत्तर-दक्षिण के नाम पर बंट गये तथा प्रस्ताव गिर गया। लगभग उसी समय उच्चतम न्यायालय ने हवाला कांड की सुनवाई हो रही थी। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने भरी अदालत में कहा कि उनको इस मामले को न बढ़ाने के लिए धमकियाँ दी जा रही हैं तथा धमकी देने वाला अदालत में मौजूद है। लेकिन उन्होंने उसका नाम बताने से इंकार कर दिया। प्रश्न यह है कि यदि भारत के मुख्य न्यायाधीश को धमकियाँ दी जा सकती हैं तथा वह किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है फिर एक सामान्य नागरिक की हैसियत ही क्या है?
कौटिल्य ने कहा था कि समुद्र में रहने वाली मछली कितना पानी पीती है और कितना निकालती है, वह कोई नहीं जान सकता। इसी प्रकार लोक-कोष पर कब्जा जमाये अधिकारी कितना इधर-उधर करते हैं, यह जानना आसान नहीं है। भारतीय राजनीति आंकठ भ्रष्टाचार में डूबी हुयी है तथा नेता-नौकरशाही-अपराधी की तिकड़ी बड़ी बेशर्मी से जनता के धन का दोहन कर रही है। इनको काबू में करने के लिए सतर्क, जानकार तथा उच्च मानव मूल्यों की पोषक जनता को आगे आना होगा तथा अपने धन की रक्षा स्वयं करने के लिए दृढ़ संकल्पित होना पड़ेगा।
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