Sunday, 5 July 2026

साम्प्रदायिकता के खिलाफ कानून की मुहिम

 केन्द्रीय गृहमंत्री ने प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों के सम्मेलन में साम्प्रदायिकता के खिलाफ संहिताकृत कानून बनाने की सरकार की इच्छा दोहराई है। कानून-व्यवस्था के सुचारु संचालन के लिये पुलिस-तंत्र को आवश्यक कानूनी-अधिकार देकर स्थिति विशेष हेतु तैयार करने के लिये पैकेज-कानून की आवश्यकता बहुत दिनों से महसूस की जाती रही है। इस बीच साम्प्रदायिकता के खिलाफ एक समग्र-संहिता का मसविदा गृह मंत्रालय द्वारा विधि-मंत्रालय को भेजा जा चुका है तथा शीघ्र ही इसे परामर्श-पत्र के रूप में आम जनता से सुझाव के लिये प्रसारित किया जायेगा। अपेक्षा की जा रही है कि सम्बन्धित पक्षों से सुझाव और शिकायतें मिलने तथा प्रस्तावित कानून में अपेक्षित संशोधन करने के बाद इसे अधिनियमित किया जायेगा।

'कानून व्यवस्था' राज्य सूची का विषय है तथा साम्प्रदायिक दंगे होने पर स्थानीय पुलिस ही इस पर काबू पाने तथा सामान्य स्थिति बहाल करने का प्रयास करती रही है। लेकिन गत दशक में जिस प्रकार धार्मिकता को बढ़ावा मिला है तथा दंगों का फैलाव तेजी से हुआ है, उसे देखते हुये यह महसूस किया गया कि इस पर सारे देश के लिये एक सा कानून बनाया जाय तथा एक केन्द्रीय एजेंसी इसकी निगरानी करे। अभी तक राज्य सरकारें, सेना, केन्द्रीय रिजर्व पुलिस तथा अर्ध सैनिक बलों की मांग करती है तथा जातीय निपटने में असफल रहने पर केन्द्र पर दोषारोपण करती हैं। तर्क दिया जा रहा है कि यह धार्मिक तथा जातीय दंगे सिर्फ कानून-व्यवस्था का ही प्रश्न नहीं है बल्कि 'लोक-व्यवस्था' से सम्बन्धित है, अतः इसी परिप्रेक्ष्य में दृष्टिपात अपेक्षित है। ज्ञातव्य है कि 'लोक-व्यवस्था' संविधान की सातवीं अनुसूची की केन्द्र, राज्य तथा समवर्ती तीनों सूचियों में शामिल है तथा इस पर केन्द्र तथा राज्यों को कानून पारित करने का अधिकार है। इसी कारण अब केन्द्र इस पर कानून बनाने की पहल कर रहा है।
कतिपय राज्य, केन्द्र के इस कदम का यह कहकर अभी से विरोध कर रहे हैं कि साम्प्रदायिक वैमनस्य स्थानीय कारणों से होते हैं तथा इससे निपटने के लिये पर्याप्त कानून पहले से ही बने हुये हैं। अतः इस पर केन्द्रीय कानून बेमानी है और राज्य के क्षेत्र में अनावश्यक हस्तक्षेप है। संविधान के परिसंघीय ढांचे पर प्रहार तथा राज्यों के अधिकारों को न्यून करने की दिशा में बढ़ाया जा रहा कदम कहकर इसकी आलोचना हो रही है। वहीं दूसरी तरफ इस तरह के कानून की अपरिहार्यता के पक्षधरों का कहना है कि धार्मिक तथा जातीय फसादों में रेल, डाक, टेलीफोन आदि की सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाया जाता है तथा स्थानीय पुलिस प्रशासन के लोग भी दंगाईयों के एक तबके से मिलीभगत करके स्थिति को संभालने की बजाय उसे बिगाड़ने देते हैं, जिससे राजनीतिज्ञों को अपनी रोटियां सेकने का पर्याप्त अवसर मिलता है। ऐसे में त्वरित कार्यवाही ही नहीं बल्कि एक ऐसी एजेंसी की आवश्यकता है जो निर्णय तथा पक्षपात रहित होकर कार्यवाही करे। बाबरी विध्वंस के बाद बम्बई में हुये बम धमाकों, उससे उपजित जातीय दंगों तथा अभी हाल में गोधरा कांड के बाद गुजरात के कई इलाकों में फैले धार्मिक उन्माद को रोकने में सम्बन्धित राज्य सरकारों की भूमिका संदिग्ध रही है।
भारतीय संविधान में किसी भी मत को राजकीय धर्म मानने की व्यवस्था नहीं है। उद्देशिका में जिस विश्वास, धर्म, आस्था और उपासना की स्वतंत्रता का वचन दिया गया है, उसे अनुच्छेद 25 से 29 में धर्म की स्वतंत्रता से सम्बन्धित सभी नागरिकों के मूल अधिकार के रूप में समाविष्ट करके क्रियान्वित किया गया है। इन अधिकारों में अन्तःकरण तथा किसी धर्म को मानने की स्वतंत्रता; धार्मिक मामलों के प्रबन्ध की स्वतंत्रता; किसी धर्म विशेष की प्रोन्नति के लिये कर से स्वतंत्रता तथा अनिवार्य धार्मिक पूजा तथा प्रशिक्षण से स्वतंत्रता शामिल हैं। ये अधिकार प्रत्येक व्यक्ति के धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने का अधिकार देते हैं। उच्चतम न्यायालय ने एस०आर० बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) में कहा है कि यद्यपि 'पंथ-निरपेक्ष' शब्द उद्देशिका में बयालिसवें संशोधन द्वारा जोड़ा गया है तथापि यह हमारे संविधान दर्शन में अन्दर तक समाविष्ट थी। यही नहीं इस मामले में न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया है कि पंथ-निरपेक्षता हमारे संविधान की आधारिक संरचना है तथा संविधान में संशोधन करके भी इसे समाप्त या न्यून नहीं किया जा सकता है।
गणेश उत्सव, दुर्गा मूर्ति विसर्जन तथा मोहर्रम के ताजिये के जुलूस के मार्ग आदि को लेकर दंगे भड़काये जाते हैं। दंगों के समय स्कूल-कॉलेज तथा बाजार आदि बंद रहते हैं, ट्रांसपोर्ट प्रभावित होता है, मरीजों तथा वादकारियों को परेशानी झेलनी पड़ती है तथा जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है जिससे भरपाई सम्भव नहीं होती है। इस उन्माद और जुनून में प्राइवेट तथा सार्वजनिक सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाया जाता है, औरतों तथा अबलाओं की इज्जत लूटी जाती है तथा लोगों को गाजर-मूली की तरह काटा और जिन्दा जलाया जाता है। कर्फ्यू तथा दफा 144 लगाने के बावजूद दंगाई निश्चित भाव से हिंसा का तांडव करते घूमते रहते हैं। और जब इन कांडों की जांच के लिये आयोग तथा अदालतें बैठती हैं तो फिर वह भी गवाही देने का साहस नहीं जुटा पाता जिसका सब कुछ लुट चुका होता है। गोधरा में बेस्ट बेकरी कांड की मुख्य गवाह जाहिरा शेख ने जिस प्रकार अपने बयान बदले हैं, इससे हमारी न्याय-व्यवस्था तथा उसके अलम्बरदारों के समक्ष एक साथ कई प्रश्न उत्तर के लिये मुँह बाये खड़े हो गये हैं।
दंगों और उसके दोषियों को कानून के सामने प्रस्तुत करने तथा उन्हें दण्ड दिलाने में विफलता, राज्य द्वारा उस महती दायित्व की अवहेलना, अवज्ञा तथा अवमानना है जो उसके वजूद की वजह है। कश्मीर में जातीय दंगों के समय लगाये गये कर्फ्यू में भी नागरिकों को पहुंचायी गयी सम्पत्ति की क्षति के मुआवजे के लिये प्रदेश सरकार को दायित्वाधीन अभिनिर्धारित करते हुये उच्चतम न्यायालय ने, थोड़े दिन पूर्व दिये गये अपने निर्णय में, नागरिकों की जान-माल की हिफाजत करने में असफल रहने पर अफसोस का इजहार किया था। इस प्रकरण में तो प्रतिकर दिला दिया गया लेकिन 1984 के सिक्ख दंगों में पीड़ित लोगों को अभी तक संतोषजनक आवंटन शेष है। इसी प्रकार कश्मीर घाटी से विस्थापित हुये पंडित दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं और अपनी जन्म-भूमि पर ही विदेशी हो गये हैं। गोधरा कांड में तो किसी मुआवजे की बात तक नहीं हो रही है।
साम्प्रदायिकता विरोधी कानून में जहाँ भारतीय दण्ड संहिता तथा दण्ड प्रक्रिया संहिता में संशोधन अपेक्षित है वहीं साक्ष्य अधिनियम में गवाहों की सुरक्षा की व्यवस्था अपरिहार्य है। दंगों में मारे गये तथा घायल लोगों को प्रतिकर तथा पुनर्वास के लिये युक्ति-युक्त धनराशि दी जानी चाहिए। उनकी बरबाद हुयी सम्पत्ति के लिये उचित प्रतिकर की व्यवस्था होनी अभिप्रेत है। दंगों में जान बचाकर भागे लोगों की भूमि, आवास तथा फैक्ट्री-दुकानों आदि की रक्षा की जिम्मेदारी सरकार की है तथा इसके असद्भावनापूर्ण अन्तरण पर रोक लगायी जानी चाहिए। उचित होगा कि इसके लिये विभिन्न धर्मावलम्बियों से युक्त फास्ट ट्रैक अदालत का गठन किया जाय जो नुकसान का आकलन फौरी तौर पर करे तथा तुरन्त मुआवजा दिलवाये। दंगे होने पर वहाँ आवश्यक रूप से न्यायिक जाँच कराई जाय तथा यह कार्य राज्यों में स्थापित मानवाधिकार आयोग या अल्पसंख्यक आयोग को सौंपा जाय। अनुच्छेद 17 में जिस प्रकार 'अस्पृश्यता' का अंत किया गया है और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध तथा दण्डनीय बनाया गया है, उसी प्रकार का उपबन्ध 'साम्प्रदायिकता' के लिये भी किया जाना चाहिए। इससे केवल सरकार ही नहीं बल्कि सामान्य भारतीयों को भी दायित्वाधीन किया जा सकेगा। बार-बार दंगे वाले क्षेत्रों को चिन्हित कर उन पर सामूहिक जुर्माना लगाया जा सकता है तथा इसके लिये अनुच्छेद 27 में संशोधन करके अपवाद का सृजन किया जाना अभीष्ट होगा। संविधान की उद्देशिका में धर्म, आस्था व उपासना की स्वतंत्रता के साथ व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिये भी दृढ़ संकल्प लिया गया था। दंगों से व्यक्ति की गरिमा क्षरित होती है तथा एकता और अखण्डता तार-तार होती दिखती है, अतः साम्प्रदायिक सौहार्द आज हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।

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