Monday, 6 July 2026

राष्ट्रीय हितों के विपरीत हैं राज्यों के जल-युद्ध

तमिलनाडु, कर्नाटक तथा पांडिचेरी के मध्य कावेरी नदी के जल के बंटवारे को लेकर खिंची तलवारें अभी अपनी चमक बिखेर ही रही थी कि पंजाब विधान-सभा ने सर्वसम्मति से पंजाब राज्यों के निरसन विधेयक, 2004 पारित कर रवी तथा बियास नदियों के जल को पड़ोसी राज्यों को देने सम्बन्धी करारों से अपने को अलग कर लिया। उसने ऐसी सभी संविदाओं से पल्ला झाड़ लिया है जिसके द्वारा इन नदियों के जल के बंटवारे को लेकर उस पर विधिक दायित्व थे। यह दोनों नदियां पंजाब से होकर जाती हैं तथा जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान तथा हिमाचल प्रदेश में प्रमुख जल स्रोत के रूप में उपयोगी हैं। सर्वसम्मति से पारित इस विवादास्पद विधेयक को राज्यपाल ने राष्ट्रपति के पास अनुमोदनार्थ भेज तथा राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 143 के अन्तर्गत मामला उच्चतम न्यायालय को उसकी सलाह के लिए भेज दिया। भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति आर०सी० लोहाटी ने स्वयं की अध्यक्षता में एक पांच-सदस्यीय संविधान-पीठ का गठन किया है तथा राष्ट्रपति के इस संदर्भ की सुनवाई के लिये स्वीकार कर लिया है।
राष्ट्रपति ने उच्चतम न्यायालय से आग्रह किया है कि वह पंजाब विधान-सभा द्वारा पारित उक्त विधेयक की सांविधानिकता का अन्वेषण करे तथा यह देखें कि क्या अंतर्राज्यिक जल विवाद अधिनियम, 1956 की धारा 14, पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 की धारा 78 तथा इसके अन्तर्गत निर्गत 24 मार्च 1976 के नोटिफिकेशन का अतिक्रमण तो नहीं हो रहा है। राष्ट्रपति ने यह भी जानना चाहा है कि प्रस्तावित अधिनियम द्वारा पूर्व में 31 दिसम्बर 1981 को लागू हुये रवी-बियास नदियों के पानी के बंटवारे से सम्बन्धित समझौते को समाप्त करने का अधिकार पंजाब विधान-सभा को है अथवा नहीं, तथा क्या ऐसा कानून पारित कर, राज्य अपने को दायित्वों से मुक्त कर सकता है।

ज्ञातव्य है कि सतलज-यमुना नदियों को जोड़ने के लिये नहर बनवाने को लेकर दिल्ली, हरियाणा तथा पंजाब में एक समझौता हुआ था। लेकिन पंजाब ने अपने हिस्से की यह लिंक नहर बनवाने से यह कह कर इंकार कर दिया कि इससे पंजाब का पानी दूसरे राज्यों में चला जायेगा जब कि वहाँ कृषि कार्यों, सिंचाई तथा बिजली के लिये पानी की भारी किल्लत है। थोड़े समय पूर्व हरियाणा सरकार ने उच्चतम न्यायालय में रिट याचिका दायर कर पंजाब राज्य या केन्द्रीय सरकार को लिंक नहर बनाने के लिये आदेश देने की मांग की थी। न्यायालय ने इस प्रार्थना को स्वीकार भी कर लिया तथा केन्द्र से यह अपेक्षा की कि वह पंजाब के हिस्से की नहर पूरी करने में मदद करे। इससे पहले कि कोई प्रभावी कदम उठाया जाता, पंजाब विधान-सभा ने उक्त विधेयक पारित कर अपने को किसी भी दायित्व से अलग कर लिया।

अन्तर्राज्यीय नदियों के पानी को लेकर सम्बन्धित राज्यों में विवाद पुराने हैं। सन् 1951 में कृष्णा नदी के पानी के बटवारे को लेकर तत्कालीन मद्रास, मैसूर, हैदराबाद तथा बम्बई राज्यों में विवाद हुआ था। लेकिन तब चूंकि केन्द्र तथा राज्यों में काँग्रेस की ही सरकारें थीं अतः दोस्ताना तरीके से हल निकाल लिया गया। साठ के दशक के उत्तरार्द्ध में नर्मदा नदी के लिये महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश तथा गुजरात में विवाद हुआ तथा तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी के तमाम प्रयासों के बावजूद कोई सर्वमान्य हल नहीं निकल पाया। तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश तथा पांडिचेरी राज्यों के मध्य कावेरी जल विवाद अभी भी अनसुलझा पड़ा है।
भूमि तथा जल राज्यों के विषय हैं। संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची के सत्रहवें आइटम में जल अर्थात जल प्रदाय, सिंचाई और नहरें, जल-निकास और तटबन्ध, जल भंडारण और जल शक्ति के विषय में राज्यों को विधि बनाने की अधिकारिता है। जब कि केन्द्र सूची के छप्पनवें आइटम में अंतर्राज्यिक नदियों तथा नदी-दूनों के विनियमन तथा विकास से सम्बन्धित लोक हित में विधि बनाने की शक्ति संघ को दी गयी है। संविधान का अनुच्छेद 262 अन्तर्राज्यिक नदी या नदी-दूनों के या उसमें जल के प्रयोग, वितरण या नियंत्रण के सम्बन्ध में किसी विवाद या परिवाद को सुलझाने तथा न्याय निर्णयन के लिये उपबन्ध करने के लिये विधि बनाने के लिये संसद को अधिकृत करता है। इसी अनुच्छेद में यह भी प्राविधानित है कि इन विवादों को निपटने के लिये उच्चतम न्यायालय समेत किसी भी न्यायालय के अधिकार को समाप्त किया जा सकता है। न्यायालय का क्षेत्राधिकार प्रतिबन्धित होने के कारण इन पर पूर्व-निर्णय की नजीरें उपलब्ध नहीं है।
संसद ने इस सम्बन्ध में नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 तथा अन्तर्राज्यिक जल विवाद अधिनियम, 1956 पारित किये। पहले अधिनियम के अन्तर्गत नदी बोर्ड बनाये जाने थे लेकिन आज तक उन पर कार्यवाही नहीं हुयी तथा यह अधिनियम मृत प्राय है। दूसरे अधिनियम के अन्तर्गत समय-समय पर विशिष्ट विवादों को सुलझाने के लिये प्राधिकरण गठित किये गये। इनमें सम्बन्धित पक्षों के नुमाइंदे तथा जल विशेषज्ञ शामिल किये गये, लेकिन इनकी अनुशंसाये राजनीतिक आरोपों-प्रत्यारोपों का शिकार हुयीं तथा राज्यों ने इनको लागू करने में हीला-हवाली की। कावेरी जल विवाद पर बने प्राधिकरण के निर्णय को लागू कराने के लिये तमिलनाडु को उच्चतम न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ा लेकिन कर्नाटक ने न्यायालय की अवमानना के खतरे के बावजूद पूरा पानी नहीं दिया। इन मामलों में राज्य का हर एक राजनीतिक दल एक ही स्वर से बोलता है क्योंकि उसको अलग-अलग पड़ने तथा चुनाव में खामियाजा भुगतने की तलवार लटकती दिखती है।
संविधान में राज्य की नीति के निर्देशक तत्वों के अनुच्छेद 39 में राज्य से अपेक्षित है कि वह अपनी नीति का इस प्रकार संचालन करे कि समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बंटा हो जिससे सामूहिक हित का सर्वोत्तम रूप से साधन हो तथा आर्थिक व्यवस्था इस प्रकार चले जिससे धन और उत्पादन-साधनों का सर्वसाधारण के लिये अहितकारी संकेंद्रण न हो। संघीय संविधान में राज्य विशेष को यह अधिकार नहीं मिल जाता कि जल तथा भूमि ऐसे प्राकृतिक संसाधनों का वह केवल अपने स्वार्थ के लिये दोहन करे। नदी का जल स्थिर नहीं है तथा सदा प्रवाहमान है। अतः कोई भी राज्य इस जल पर एकाधिकार का दावा नहीं कर सकता तथा न ही दूसरे राज्य में इसके आवागमन पर प्रतिबन्ध लगा सकता है। यह अंतर्राष्ट्रीय विधि का भी तकाजा है।
भारत में राज्यों का गठन भाषाई आधार पर तथा प्रशासनिक सुविधा के लिये किया गया है। स्वतंत्रता से पूर्व राज्य स्वतंत्र इकाई नहीं थे, अतः अपनी भूमि या जल पर उन्हें सम्प्रभुता नहीं प्राप्त है। भारत के प्राकृतिक तथा भौतिक संसाधनों पर भारत के लोगों का स्वामित्व है तथा इनके निर्बाध उपयोग का उन्हें हक है। राज्य सरकारों से यह अपेक्षित है कि वृहत्तर राष्ट्रीय हितों के लिये वे संकीर्ण क्षेत्रीय हितों को महत्त्व न दें तथा पानी ऐसे मूल जीवन-तत्व पर राजनीति करने से बाज आवें।

 

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