Wednesday, 1 July 2026

सांविधानिक शक्ति विभाजन और संसद की सम्प्रभुता

झारखण्ड राज्य में अल्पमत वाले गठबन्धन को सरकार बनाने का न्योता देने तथा अपना बहुमत सिद्ध करने के लिये मुनासिब से ज्यादा समय देने के राज्यपाल के निर्णय के खिलाफ उच्चतम न्यायालय द्वारा पारित आदेश के विरुद्ध लोकसभा में तीखी प्रतिक्रिया हुयी। एन०डी०ए० के नेता अर्जुन मुण्डा (अब मुख्यमंत्री) के द्वारा दायर की गयी याचिका में आरोप लगाया गया था कि राज्यपाल ने अपने संवैधानिक विवेकाधिकार का उपयोग सद्भावनापूर्वक नहीं किया तथा केन्द्र की यू०पी०ए० सरकार के घटकों को तुष्ट करने की नीयत से बहुमत वाले गठबन्धन के दावे को जानबूझकर तथा मनमाने तरीके से नजरअंदाज किया। उच्चतम न्यायालय ने सभी सम्बन्धित पक्षों को सुनने के बाद 11 मार्च को विधान सभा की बैठक आहूत कर बहुमत का फैसला उसी के पटल पर कराने का आदेश दिया। विधायकों पर जोर-जबरदस्ती करने तथा उनकी खरीद-फरोख्त करने के आरोप को दृष्टिगत रखते हुये यह भी आदेश दिया गया कि राज्य के मुख्यसचिव तथा डी०जी०पी० सदन की कार्यवाही पर निगाह रखें जिसकी वीडियोग्राफी की जाय तथा इस सारी कार्यवाही से न्यायालय को सूचित भी किया जाय।

इस आदेश के पारित होने के दूसरे ही दिन संसद के दोनों सदनों में भारी हंगामा हुआ तथा एन०डी०ए० को छोड़कर प्रायः सभी ने न्यायालय के इस आदेश की कटु आलोचना की एवं इसे विधायिका के कार्यक्षेत्र में खुला हस्तक्षेप करार दिया। लोकसभा के अध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी ने तो इसकी संसद की सम्प्रभुता को चुनौती के रूप में पेश किया तथा केन्द्र सरकार से यह अपील की कि संविधान के अनुच्छेद 143 के सलाहकारी क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत उच्चतम न्यायालय से ही उसकी राय मांगी जाय कि भारतीय संविधान में लागू शक्ति परीक्षण के सिद्धान्त के अनुसार कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका की परिधियां क्या हैं तथा संसद की प्रभुसत्ता में न्यायपालिका की दखलंदाजी कितनी अनुमत है। इस बैठक में उपस्थित दलों की सर्वसम्मत राय थी कि संसदीय कार्यवाही को डी०जी०पी० तथा मुख्य सचिव की निगरानी में कराना विधायिका की स्वायत्तता तथा गरिमा के प्रतिकूल है तथा कार्यवाही की वीडियो ग्राफी को गवाही के तौर पर सुप्रीम कोर्ट में पेश करने का आदेश अवाछिंत ही नहीं अनावश्यक है। झारखण्ड में विधान सभा की कार्यवाही पर न्यायपालिका की नजर का विरोध करने वालों का कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 122 तथा 212 के अन्तर्गत क्रमशः संसद तथा विधान मंडलों की कार्यवाहियों की विधि मान्यता की प्रक्रिया की किसी अनियमितत्ता के विषय में न्यायालय की अधिकारिता वर्जित है, संसद में क्रिया या कार्य संचालन का विनियमन करने की अथवा व्यवस्था बनाये रखने की शक्तियां सदन में ही निहित हैं तथा उस पर न्यायालय सहित कोई भी बाहरी हस्तक्षेप असंवैधानिक है। कतिपय सदस्यों का यह मानना है कि भारतीय संविधान में संसद सर्वोच्च है तथा उस पर कोई भी अंकुश या जवाबदेही अमान्य है अतः किसी का भी हस्तक्षेप सदन की अवमानना तथा उसे प्राप्त विशेषाधिकारों का हनन है।

महान फ्रांसीसी विधिशास्त्री तथा संविधानविद् मान्टेस्क्यू ने प्रजातंत्र के सुचारु संचालन के लिये शक्ति पृथक्करण का सिद्धान्त प्रतिपादित किया था। इसके अनुसार सरकार के तीनों अंगों, यथा विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका में स्पष्ट विभाजक रेखा होनी चाहिए तथा किसी को दूसरे के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। मान्टेस्क्यू के अनुसार यदि शक्ति विभाजन को कठोरता से लागू नहीं किया गया तो शक्ति का मनमाना प्रयोग होगा तथा जनता में त्राहि-त्राहि मच जायेगी। शक्ति पृथक्करण के इस सिद्धान्त को अमेरिकी संविधान में आदर्श रूप से प्रतिष्ठित किया गया है तथा वहाँ के लिखित संविधान में कार्यपालिका, विधायिका तथा न्यायपालिका की शक्तियां क्रमशः राष्ट्रपति, काँग्रेस तथा सर्वोच्च न्यायालय में इस प्रकार विभाजित हैं कि उनमें आपस में टकराव न हो। इसके विपरीत इंगलैंड में संसद सर्वोच्च है। वहाँ का प्रधानमंत्री संसद के निचले सदन का नेता होता है जिसे कार्यपालिका के मुखिया के कार्य करने की अपरिहार्यता होती है। वहाँ का सर्वोच्च न्यायालय कोई और नहीं बल्कि हाउस आफ लार्ड्स (उच्च सदन) की जुडीशियल कमेटी होती है। वहाँ अलिखित संविधान है तथा संसद कोई भी कानून पारित करने में या सांविधानिक विधि में परिवर्तन करने में पूर्णतः सक्षम है। हालांकि भारत में अमेरिका की तरह लिखित संविधान है लेकिन हमने ब्रितानी संसदीय प्रणाली अपनायी है जिसके कारण शक्ति पृथक्करण का सिद्धान्त कड़ाई से लागू नहीं हो पाया है। भारत में भी व्यावहारिक रूप में कार्यपालिका तथा विधायिका के मध्य विभाजक रेखा नहीं है। हाँ, न्यायपालिका को स्वायत्त तथा स्वतंत्र अवश्य बनाया गया है जिससे नागरिकों के मूल अधिकारों, मानवाधिकारों तथा केन्द्र और राज्यों के मध्य विवादों का निपटारा हो सके। लेकिन जहाँ अनुच्छेद 122 तथा 212 में संसद तथा विधानमंडलों की कार्यवाहियों में उन्हें खुदमुख्तारी दी गयी है तथा अनु० 105 एवं 194 में सांसदों तथा विधायकों एवं उनकी समितियों को शक्तियां, उन्मुक्तियां तथा विशेषाधिकार प्रदान किये गये हैं वहीं अनु० 129 में उच्चतम न्यायालय को अभिलेख न्यायालय का दर्जा दिया गया है, अनुच्छेद 131 में संविधान के संघीय स्वरूप की रक्षार्थ आरम्भिक अधिकारिता दी गयी है, अनुच्छेद 141 में इसके निर्णय देश में सभी पर बाध्यकारी बनाये गये हैं तथा अनुच्छेद 142 के अन्तर्गत किसी वाद या विषय में 'पूर्णन्याय' करने के लिये डिक्री या आदेश पारित करने की अधिकारिता है। इसके निर्णयों को भारत के सम्पूर्ण राज्य क्षेत्र में प्रर्वतन सुनिश्चित किया गया है। संविधान सभा में स्थिति स्पष्ट करते हुये बाबा साहब अम्बेडकर ने कहा था कि भारत में वस्तुतः संविधान सर्वोपरि है, कानून का शासन है तथा  विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका संविधान से उद्भूत है जो इनका नियामक तथा नियंता है। देश की सम्प्रभुता सरकार के किसी अंग विशेष में नहीं बल्कि 'भारत के लोगों' में बसती है।

संसदीय कार्यवाही में स्वेच्छाचार, विशेषाधिकार को लेकर न्यायालयी क्षेत्राधिकार को कई बार प्रश्नगत किया गया है। आपात स्थिति के दौरान जब शासक दल सहित कई सांसद नजरबन्द थे तब संविधान में संशोधन किया गया तथा प्रधानमंत्री के चुनाव को अदालती कार्यवाही से अलग कर दिया गया था। लोक प्रतिनिधित्व कानून में भी संशोधन किया गया था। इन कानूनों को इस आधार पर चुनौती दी गयी थी कि संसद ठीक तरह से गठित नहीं है अतः उसके द्वारा पारित कानून विधिमान्य नहीं है। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने इस आधार को खारिज कर दिया था। केशव सिंह के बहु प्रचारित विवाद में अनुच्छेद 143 के अन्तर्गत किये गये सन्दर्भ का उत्तर देते हुये भी उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि भारत में शक्ति पृथक्करण का सिद्धान्त कड़ाई से लागू नहीं होता है लेकिन तीनों अंगों की सीमायें स्पष्ट हैं तथा यदि वे सद्भावनावूर्ण एवं प्रजातंत्र की भावना से काम करें तो उनमें टकराव की गुंजाइश ही नहीं है। नरसिंहराव सरकार को विश्वास मत दिलाने के लिये कतिपय सांसदों द्वारा कथित रूप से रिश्वत लेकर वोट देने के प्रश्न पर भी उच्चतम न्यायालय का मत था कि सदन के अंदर की कार्यवाहियों को न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जा सकता।
लेकिन यहाँ पर जम्मू कश्मीर विधान सभा के सदस्य श्री भीम सिंह का वाद भी उल्लेखनीय है जिसमें उन्होंने उच्चतम न्यायालय के समक्ष अपनी अवैध गिरफ्तारी को यह कहते हुये चुनौती दी थी कि व्यवस्थापिका ने उन्हें सदन की कार्यवाही में भाग लेने से विरत करने के लिये नजरबन्द किया है। न्यायालय ने न सिर्फ उनकी बन्दी-प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार की बल्कि असद्भावनापूर्ण निरोध तथा मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के लिये मुआवजा भी दिलवाया था।

इंग्लैंड की संसद ने अपनी कार्यवाही को स्वयं संचालित करने का अधिकार इसलिये विकसित किया था क्योंकि तत्कालीन राजा इन प्रतिनिधियों को तरह-तरह से प्रताड़ित और परेशान करता था। भारत में तथा वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इस प्रकार का कोई खतरा नहीं है तथा कानून के शासन का दम भरने वाली शासन व्यवस्था में कोई भी व्यक्ति या संस्था कानून तथा संविधान से ऊपर नहीं है। इन परिस्थितियों में विधायिका तथा न्यायपालिका में सम्प्रभुता का विवाद अनौचित्यपूर्ण ही नहीं बल्कि दुर्भाग्यपूर्ण है। आगामी 20 मार्च को राज्य विधान मण्डलों के पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में इस विषय पर विचार स्वायत योग्य होगा लेकिन इस प्रकरण को विधायिका बनाम न्यायपालिका बनाने से जनमानस में गलत संदेश जायेगा।

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