केन्द्रीय सरकार ने अन्ततः उन्यासीवें संविधान संशोधन विधेयक को वापस लेने का फैसला कर लिया है। यह विधेयक 1992 में लाया गया था तथा राज्य-सभा में लम्बित था। 1995 में यह मानव संसाधन विकास मंत्रालय की प्रवर समिति को संदर्भित किया गया था। इस विधेयक में यह व्यवस्था थी कि संसद तथा राज्य विधान-मंडलों में वही लोग सदस्यता के लिये पात्र होंगे जिनके अधिकतम दो जीवित बच्चे हैं। सन् 1992 में जब यह विधेयक लाया गया था तो इसका कई राजनीतिक दलों द्वारा पुरजोर विरोध हुआ था तथा तत्कालीन सरकार को इसे प्रवर समिति को भेजने पर मजबूर होना पड़ा था जिससे कि मीडिया तथा न्यायालयों की नजरों से बच सके। उल्लेखनीय है कि चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों में अधिकांश ऐसे होते हैं जो इस कानून के बन जाने से अयोग्य हो जायेंगे, अतः ऐसे विधेयक का भ्रूण-स्खलन तो प्रस्वावित था। आम नागरिकों से परिवार नियोजन अपनाने की सलाह देने वाले हमारे जनप्रतिनिधि स्वयं इसके प्रति कितना गम्भीर और ईमानदार हैं, इसको जानने के लिये अब किसी और प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।
Wednesday, 1 July 2026
दो बच्चों से अधिक पर चुनावी अयोग्यता का कानून- पर-उपदेश कुशल बहुतेरे
संविधान के चौहत्तरवें तथा चौहत्तरवें संशोधन अधिनियमों के द्वारा विभिन्न स्वायत्तशासी तथा स्थानीय संस्थाओं के संवैधानिक दर्जा दिया गया था तथा राज्यों को छूट दी गयी थी कि वे इन चुनावों हेतु उम्मीदवारों की पात्रता तथा आरक्षण आदि से सम्बन्धित विधि बनायें। हरियाणा, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र तथा गौआ आदि कई राज्यों ने अपने यहाँ परिवार नियोजन कार्यक्रमों को कठोरता से लागू किया है जिनमें अन्यों के अतिरिक्त यह भी व्यवस्था है कि नगर-पालिका तथा जिला परिषद जैसी स्वायत्तशासी संस्थाओं में ऐसे व्यक्तियों को चुनाव लड़ने के लिये अपात्र कर दिया है जिनके दो से अधिक जीवत बच्चे हैं।
इस सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्णीत जावेद बनाम हरियाणा राज्य (2003) का वाद विशेष रूप से उल्लेखनीय है जिसमें हरियाणा पंचायती राज अधिनियम, 1994 की उस धारा की संवैधानिकत्ता को चुनौती दी गयी जिसके अनुसार ऐसा कोई भी व्यक्ति पंचायती राज संस्थाओं की सदस्यता के लिये अपात्र होगा जिसके दो से अधिक संतानें जीवित हैं। न्यायालय में तर्क दिया गया कि यह धारा समता (अनु० 14), धर्म की स्वतंत्रता (अनु० 25), तथा प्राण एवं दैहिक स्वंतत्रता (अनु० 21) के अधिकार का उल्लंघन करती है जो संविधान के भाग 3 में वर्णित मौलिक अधिकार हैं। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने इस चुनौती को अमान्य करते हुये निर्धारित किया कि यह कानून मानव गरिमा के प्रतिकूल नहीं है। न्यायालय का कहना था कि इस प्रतिबन्ध का मुख्य उद्देश्य बढ़ती हुयी जनसंख्या को नियंत्रित करना तथा परिवार कल्याण के लक्ष्य को प्राप्त करना है। यह लोकतांत्रिक समाज की संरचना व देश के आर्थिक विकास के लिये आवश्यक है। राज्य की नीति के निदेशक तत्वों को मूर्त्त रूप प्रदान करने के लिये जनसंख्या पर प्रतिबन्ध लगाया जाना आवश्यक है।
मुस्लिम याचिका कर्ताओं द्वारा अपने वैयक्तिक विधि की दुहाई देकर यह भी तर्क दिया गया कि उनका पंथ परिवार नियोजन के लिये अनुमति नहीं देता, लेकिन न्यायालय ने इसे अमान्य करते हुये निर्धारित किया कि वैयक्तिक विधियाँ मौलिक अधिकार नहीं हैं तथा अनुच्छेद 25 अन्तःकरण की और धर्म को अबाध रूप से मानने, आचरण करने तथा प्रचार करने की स्वतंत्रता ही प्रदान करता है। यह मौलिक अधिकार होते हुये भी लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के लिये लगाये जा सकने वाले निर्बन्धनों के अधीन है। न्यायालय ने इस तथ्य की ओर भी इंगित किया कि पवित्र कुरान में चार विवाह करने तथा प्रत्येक पत्नी से बच्चे पैदा करने की अपरिहार्यता नहीं है तथा परिवार नियोजन की मनाही नहीं है।
न्यायालय ने यह माना कि दो बच्चों से अधिक होने से सम्बन्धित व्यक्ति की पंच/सरपंच पद पर कार्य करने की क्षमता पर प्रत्यक्षतः कोई असर नहीं पड़ता लेकिन यह प्रावधान 'हाइड्रोजन बम' से भी अधिक खतरनाक 'जनसंख्या विस्फोट' को सीमित करने के उद्देश्य से बनाया गया है, अतः संविधान के शब्दों तथा आत्मा के अनुरूप है। जहाँ तक राज्य विधान-मण्डलों एवं संसद के चुनाव हेतु तौर-पृथक अपात्रता न होने का तर्क था, न्यायालय ने अपेक्षा व्यक्त की थी कि निस्सन्देह इस नियम को राष्ट्रीय स्तर पर लागू किये जाने की आवश्यकता है। प्रस्तावित संविधान विधेयक की वापस लेकर केन्द्र सरकार ने देश के प्रबुद्ध वर्ग की आशाओं पर ही तुषारापात नहीं किया वरन् उच्चतम न्यायालय द्वारा अभिनिर्धारित कानून का मखौल उड़ाया है।
जन-संख्या नियंत्रण सतत भारत की शीर्ष प्राथमिकताओं में रहा है तथा इसके लिये प्रथम पंचवर्षीय योजना से लेकर आज तक विभिन्न योजनायें केन्द्र तथा राज्य सरकारों द्वारा संचालित की गयी हैं। केन्द्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार नियोजन मंत्रालय का कहना है कि राष्ट्रीय जनसंख्या नीति के अनुसार सन् 2010 तक जन्मदर 2.1 तक सीमित करने का लक्ष्य प्राप्त करना है जिससे सन् 2045 तक जनसंख्या की वृद्धि दर को सीमित किया जा सके। इसके लिये अनेक प्रोत्साहनों तथा हतोत्साहनों की योजनायें लागू की गयी हैं। दो बच्चों के बाद स्थाई बन्ध्याकरण कराने वाले दम्पत्तियों को नकद वेतन वृद्धि, प्रोत्साहन भत्ता, ग्रीन कार्ड आदि की सुविधायें देना शामिल हैं वहीं यह भी प्राविधानित किया गया है कि किसी स्त्री कर्मकार को पूरे सेवाकाल में अधिकतम दो बार प्रसूति अवकाश देय होगा तथा इनमें कम से कम तीन वर्ष का अंतर होना चाहिए।
बच्चे ईश्वर की देन हैं, देश का भविष्य हैं तथा प्रत्येक दम्पत्ति की आशाओं-आकांक्षाओं की प्रतिमूर्त्ति हैं। संविधान में भी स्त्री के मातृत्व का अधिकार एक मूल अधिकार के रूप में सृजित है। राज्य नीति निर्देशक तत्वों में काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता का उपबन्ध करने, पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊँचा करने के उपबन्ध हैं। वैसे भी प्रत्येक स्त्री के जीवन की पूर्णता माँ बनने में है तथा सभ्यता के विकास क्रम में स्त्रियों को इसीलिये पूज्य और वंदनीय माना गया है। एयर इण्डिया बनाम नरगिस मिर्जा (1981) के वाद में उच्चतम न्यायालय ने विमान परिचारिकाओं से सम्बन्धित एयर इण्डिया के उस विनियम को असंवैधानिक घोषित कर दिया था जिसके अन्तर्गत सेवा में आने के तीन वर्ष के भीतर तथा इसी मध्य गर्भ-धारण करने पर सेवा निवृत्ति का प्रावधान था। न्यायालय ने इसे मनमाना तथा सभ्य समाज की अवधारणा के विरुद्ध करार दिया था। उसका कहना था कि भारतीय स्त्रीत्व का यह अपमान होगा यदि उसे विवाह तथा मातृत्व के सुख से हतोत्साहित किया जाय। इसी विनिश्चय के आधार पर बाद में उच्चतम न्यायालय ने उन स्त्री कर्मकारों को भी मातृत्व-अवकाश का अधिकारी करार दिया जो अस्थाई, तदर्थ या नित्य-मजदूरी के आधार पर कार्यरत हैं। जहाँ मातृत्व के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा दिया गया है वहीं राष्ट्र की आर्थिक, सामाजिक तथा राजनैतिक प्रगति के लिये परिवार नियोजन हेतु उठाये गये कदमों को भी वैध करार दिया गया है। नरगिस मिर्जा के उक्त वर्णित वाद में भी उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि यदि विमान परिचारिकाओं का तीसरा बच्चा होने के बाद सेवा-निवृत्त किये जाने का प्रावधान होता तो वह युक्ति संगत होता।
दो बच्चे के सिद्धान्त को कठोरता से लागू करने की मांग कतिपय क्षेत्रों में की जा रही है। कहा जा रहा है कि सरकारी तथा अर्ध-सरकारी क्षेत्र की नौकरियों, विभिन्न योजनाओं के तहत दी जाने वाली सुविधाओं तथा जनतांत्रिक संस्थाओं के विभिन्न पदों पर चयनित होने के लिये दो बच्चों की शर्त अनिवार्य रूप से होनी चाहिए। इसके लिये शीर्ष स्थानों पर बैठे लोगों को पहल करनी होगी जिससे अन्यों को अनुसरण करने की प्रेरणा प्राप्त हो। सलाह तो यहाँ तक दी जाती है कि वोट देने का अधिकार उन्हीं तक सीमित कर दिया जाना चाहिए जो परिवार नियोजन की राष्ट्रीय नीति के पालनकर्ता हैं। संविधान के भाग 4 (क) के अन्तर्गत भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्त्तव्य है कि वह संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों तथा संस्थाओं का आदर करे, ऐसी प्रथाओं का त्याग करें जो स्त्रियों के सम्मान के विरुद्ध है; तथा व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करें जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुये उपलब्धि की नयी ऊँचाइयों को प्राप्त कर सके। इसको पूरा करने के लिये जनसंख्या नियंत्रण पहली शर्त है। प्रस्तावित संविधान संशोधन विधेयक को वापस लेकर जनप्रतिनिधियों ने अपने को कानून से ऊपर तथा 'पर उपदेश कुशल बहुतेरे' की उक्ति चरितार्थ की है जिससे उनके प्रति सम्मान में कमी आयेगी।
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