Wednesday, 1 July 2026

जाति निर्धारण के सांविधानिक पहलू

 उच्चतम न्यायालय ने अपने एक निर्णय में अभिनिर्धारित किया है कि किसी जातक की 'जाति' वही होगी जो उसके पिता की है तथा 'जाति' विशेष के कारण मिलने वाले लाभों या निरर्हताओं के निर्धारण में निर्णायक होगी। पिता की जाति उन मामलों में भी निर्णायक होगी जहां बच्चा अवैध है अर्थात वैध-विवाह सम्बन्धी से इतर उसका जन्म हुआ है। जातक की 'जाति' निर्धारण में माता की भूमिका को सिरे से नकार दिया गया है। नारीवादी संगठनों ने इस पर तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की है।

मामले के तथ्यों के अनुसार आंध्र-प्रदेश के आदिवासी सुरक्षित क्षेत्र से चुनी गयी एक एम०एल०ए० का चुनाव इस आधार पर अवैध घोषित कर दिया गया कि उसका पिता अनुसूचित जनजाति का नहीं था। न्यायालय ने विधायिका की यह दलील स्वीकारने से मना कर दिया कि वह नाजायज सम्बन्धों से उपजी संतान है, उसकी मां निर्विवाद रूप से अनुसूचित जनजाति की है, उसका पालन-पोषण अनुसूचित जनजाति के रीति रिवाज के अनुसार हुआ तथा वह स्वयं अब एक अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति की पत्नी है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि वोटर लिस्ट बनाते हुये किसी व्यक्ति की पहचान निश्चित करने हेतु उसके नाम के साथ पिता का नाम लिखा जाता है, लेकिन पिता का नाम न मालूम होने पर माता का नाम ही लिखा जाता है। वेश्याओं के बच्चों के नाम के आगे उनकी माता का नाम लिखा जाता है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश आर०सी० लोहाटी तथा न्यायमूर्ति जी०पी० माथुर व न्यायमूर्ति पी०के० बाल सुब्रह्मण्यम की तीन सदस्यीय पीठ ने तेलगूदेशम पार्टी के टिकट पर श्रींगारापुकोटा की अनुसूचित जनजाति के लिये आरक्षित सीट पर चुनी गयी सुश्री शोभा हेमवती देवी का चुनाव इस आधार पर रद्द कर दिया क्योंकि वह दावा की गयी 'बगाठा' जाति की नहीं है, जो वहाँ एक अनुसूचित जनजाति नोटिफाइड है। न्यायालय को बतलाया गया कि उक्त विधायिका की मां 'बगाठा' थी तथा उसका पिता दूसरी जाति का था लेकिन उसके माता-पिता के मध्य विवाह नहीं हुआ था। जन्म के बाद हेमवती का लालन-पालन मां के द्वारा हुआ तथा बाद में उसका विवाह भी 'बगाठा' जाति के व्यक्ति के साथ हुआ। चुनाव का पर्चा भरने से पूर्व उसने जिला कलेक्टर से 'बगाठा' होने का प्रमाण-पत्र भी प्राप्त किया था। न्यायालय ने इस प्रमाण-पत्र को भी अवैध करार दे दिया। न्यायालय ने निर्णय दिया कि हेमवती की वही जाति होगी जो उसके पिता की है तथा वह अपनी मां की जाति के प्रताप नहीं प्राप्त कर सकेगी।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 तथा 16 विधि के समक्ष समता तथा विधियों के समान संरक्षण का अधिकार देते हैं तथा धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, जन्मस्थान, उद्भव तथा निवास आदि के आधार पर, नागरिकों के लिए अपात्रता तथा विभेद का प्रतिषेध करते हैं लेकिन कतिपय परिस्थितियों में अनुसूचित जाति, जनजाति तथा आर्थिक एवं शैक्षिक रूप से पिछड़े नागरिकों के लिए विशिष्ट प्रावधान करने की भी छूट देते हैं। शिक्षा संस्थाओं में प्रवेश तथा लोकनियोजन में इन वर्गों के लोगों के लिए आरक्षण की व्यवस्था इसी नीति का परिणाम है। लोकसभा, विधान सभा तथा अब स्थानीय स्वायत्तशासी संस्थाओं में इन वर्गों के लिये सीटें निर्धारित हैं। स्वतंत्रता के बाद केन्द्र तथा राज्य सरकारों की विभिन्न आर्थिक, सामाजिक तथा कल्याणकारी योजनाओं का लाभ इस तबके को देने के लिये वरीयता के आधार पर कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं जिनमें खेती हेतु भूमि का निःशुल्क पट्टा, पेट्रोल पम्पों का आवंटन, विभिन्न विकास प्राधिकरणों द्वारा दुकानों, भू-खण्डों एवं भवनों में आरक्षण, बैंक तथा अन्य वित्तीय संस्थानों से ऋण की सुविधा आदि प्रायः अधिकांश क्षेत्रों में इनके लिये विशिष्ट व्यवस्था है। उच्चतम न्यायालय ने कई निर्णयों में यह अभिनिश्चित किया है कि यह एक 'संरक्षित वर्ग' है तथा इसके लिये आरक्षण तथा अन्य उपबन्ध वैध ही नहीं बल्कि आवश्यक है।
इन वर्गों के लिये विनिर्दिष्ट लाभों तथा सुविधाओं को प्राप्त करने के लिये जाली प्रमाण-पत्र के आधार पर प्रवेश तथा नौकरी पाने के कई किस्से न्यायालय द्वारा निश्चित किये गये हैं। कई मामलों में जाति संदेहास्पद तथा विवादास्पद रही है तथा कई बार धर्मान्तरण, दत्तक ग्रहण तथा विवाह के आधार पर जाति में शामिल होने के प्रकरण न्यायालय की दहलीज़ पर पहुँचे हैं। कई मामलों में 'बौद्ध धर्म' ग्रहण करने वालों ने अनुसूचित जाति के लाभ चाहे हैं तो अनेकनेक प्रकरणों में ऐसी जाति के द्वारा दत्तक ग्रहण करने या ऐसी जाति के व्यक्ति के साथ विवाह करने पर लाभों हेतु अर्हता दावा की गयी है।
इस प्रसंग में वलसम्मा पाल बनाम कोचीन विश्वविद्यालय (1996) का वाद महत्वपूर्ण है। इस वाद के तथ्यों के अनुसार श्रीमती वलसम्मा पाल सीरियन कैथोलिक (उच्च जाति) थीं तथा उन्होंने एक लैटिन कैथोलिक (अनुसूचित जनजाति) पुरुष से विवाह किया था। स्थानीय प्रथाओं के अनुसार विवाह के बाद पत्नी की जाति व धर्म वही हो जाती है जो उसके पति की होती है। इसी आधार पर वलसम्मा ने अनुसूचित जनजाति के कोटे वाले प्रवक्ता पद पर नियुक्ति पा ली। विवाह से पूर्व वलसम्मा ने जनरल सीट पर प्रवेश लेकर एल०एल०एम० तथा एम०डी० की परीक्षा उत्तीर्ण की थी। उनकी नियुक्ति को अवैध ठहराते हुये उच्चतम न्यायालय ने कहा कि उनका जन्म ऊँची जाति में हुआ था तथा उनका लालन-पालन भी उसी प्रकार हुआ, अतः मात्र विवाह से वे अनुसूचित जनजाति के लाभों को प्राप्त करने के लिये अपात्र हैं। न्यायालय ने आरक्षण के औचित्य को रेखांकित करते हुये अभिनिर्धारित किया कि अनुच्छेद 15 तथा 16 में आरक्षण की इस आधार पर मान्यता दी गयी है जिससे दलित तथा जनजाति के नागरिकों की स्थिति सुधारी जा सके जिसके चलते वे सदियों से अवांछित, अलाभ, प्रताड़ना एवं निषेध झेलने के लिये अभिशप्त रहे हैं। न्यायालय का कहना है कि जब कोई अगड़ी जाति का व्यक्ति दलित, जनजाति अथवा पिछड़ी जाति में प्रत्यारोपित किया जाता है तो वह उस आरक्षण का सिर्फ इस कारण अधिकारी नहीं हो जाता क्योंकि धर्म, जाति या वर्ग की प्रथा और परिपाटी इसके लिये अनुमति या मान्यता देती है। न्यायमूर्तियों का कहना था कि आरक्षण का लाभ पाने के लिये यह आवश्यक है कि सम्बन्धित व्यक्ति उसी कठिनाई, प्रताड़ना, शोषण, अपंगता तथा अपात्रता से गुजरा हो। न्यायालय का मत है कि इन वर्गों में स्वेच्छा गमन को स्वीकृति देना संविधान की मंशा के विपरीत ही नहीं बल्कि उसके प्रति कपट है।
शिक्षा के प्रचार-प्रसार तथा सामाजिक परिवर्तनों के चलते जाति-बन्धन ढीले पड़ते जा रहे हैं। समता पर आधारित समाज के विकास के लिये इन अतार्किक तथा अवैज्ञानिक असमानताओं को समाप्त करना ही अभीष्ट है। तथाकथित अगड़े-पिछड़े का भेद मिटाने के लिये तथा इनके बीच सामंजस्य, सौमनस्य तथा परस्पर निर्भरता बढ़ाने के लिये रोटी-बेटी का सम्बन्ध बनाने की वकालत की जाती रही है। उत्तर प्रदेश समेत कतिपय राज्यों ने इसको प्रोत्साहित करने के लिये कानून तक पारित किये हैं जिनके अनुसार इनके मध्य विवाह होने पर न केवल सरकार की तरफ से प्रोत्साहन धनराशि दी जाती है बल्कि ऐसे विवाह-सम्बन्धों से उत्पन्न बच्चों को वही अधिकार सुलभ कराये गये हैं जो दलितों, आदिवासियों तथा पिछड़े वर्गों के लिये आरक्षित हैं। इधर इन लाभों को प्राप्त करने के लिये विधि के दुरुपयोग के किस्से भी बढ़े हैं। एक राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री तक पर यह आरोप लगाया गया कि उन्होंने अनुसूचित जनजाति का जाली प्रमाण-पत्र बनवाया है।
चिकित्सकीय विज्ञान के अनुसार पुरुष के शुक्राणु तथा स्त्री के डिम्ब से निकले अण्डाणु के समागम से बच्चे का प्रादुर्भाव होता है। इस बच्चे के गुण-सूत्र अपने माता-पिता के गुण-सूत्रों से मिलते हैं। यह अन्तिम तौर पर निर्धारित नहीं हो पाया है कि इनमें अभिभावी भूमिका शुक्राणु की है या अण्डाणु की। पितु-सत्तात्मक समाज में अभी तक पुरुष का नाम तथा जाति जातक को मिलती रही है तथा कानून भी इसी को मान्यता देता है। लेकिन अब यह विवाद के घेरे में है। नारी अस्मिता तथा गरिमा को प्रतिस्थापित करने का हौसला रखने वाले माता की भूमिका को महत्व दे रहे हैं तथा इसी कारण शैक्षिक प्रमाण-पत्रों तथा डिग्रियों में पिता के साथ माता का नाम लिखने का प्रचलन बढ़ता जा रहा है।
उच्चतम न्यायालय के उक्त निर्णय से नाजायज सम्बन्धों से उत्पन्न जातक को पिता की जाति तो दे दी गयी लेकिन क्या इसी आधार पर उसे अपने पिता की सम्पत्ति में हिस्सा तथा कतिपय परिस्थितियों में गुजारा-भत्ता प्राप्त होगा? 'मैत्री-सम्बन्धों' का प्रचलन बढ़ रहा है तथा स्त्रियों के मध्य बिन-ब्याहे मां बनने की इच्छा को कानूनी मान्यता दिये जाने की मांग की जा रही है। नैतिकता के माप-दण्डों तथा जीवन मूल्यों में संक्रमण की स्थिति है। इन परिस्थितियों में विधायिका को आगे आना होगा तथा कानून बनाकर स्थिति स्पष्ट करनी होगी। संविधान के अनुच्छेद 44 के निर्देशानुसार समान नागरिक संहिता बनाने के लिये अब और अधिक देर, पंथ-निरपेक्ष गणराज्य में प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने तथा व्यक्ति की गरिमा अक्षुण्ण कराने में, बाधक सिद्ध हो रही है।

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