संसद के आगामी शीतकालीन अधिवेशन में पेश किये जाने वाला लोकपाल विधेयक एक बार पुनः ठंडे बस्ते में डाल दिया गया लगता है। तत्विषयक मंत्रिमण्डल की बैठक में जब इसे औपचारिक स्वीकृति देने के लिये विचारार्थ रखा गया तो दो मंत्रियों की अनुपस्थिति का बहाना बनाकर इसे आगे के लिये टाल दिया गया। कहा गया चूँकि इस विधेयक की परिधि में प्रधानमंत्री को शामिल किया जाना है तथा प्रधानमंत्री के दागी सिद्ध होने पर सम्पूर्ण मंत्रिमण्डल को 'सामूहिक उत्तरदायित्व' के अनुसार त्याग-पत्र देना आवश्यक होगा अतः इसको अन्तिम रूप देने के लिये प्रत्येक मंत्री का बैठक में मौजूद रहना अपरिहार्य है। विधेयक को संसद के विचारार्थ प्रस्तुत करने के लिये इसके अन्य प्रावधानों पर अभी और तथा गहन पड़ताल करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। यह विडम्बना ही है कि विधेयक को संसद में जाने से रोकने में एक ऐसे मंत्री की प्रमुख भूमिका बताई जा रही है जो स्वयं कथित भ्रष्ट आचरण के कारण कुख्यात हैं तथा उन्हें अपने विरुद्ध लगे आरोपों से क्लीन चिट पाना शेष है।
Sunday, 5 July 2026
लोकपाल विधेयक पर छद्म विवाद
अभी थोड़े ही दिन पूर्व उत्तरांचल में सम्पन्न प्रदेश लोकायुक्तों के अधिवेशन में बोलते हुए राष्ट्रपति डॉ० ए०पी०जे० अब्दुल कलाम तथा प्रधानमंत्री डॉ० मनमोहन सिंह ने राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति तथा प्रधानमंत्री तक को लोकपाल के दायरे में लाने का सुझाव दिया था। इसके विपरीत उपराष्ट्रपति श्री भैरों सिंह शेखावत, पूर्व प्रधानमंत्री श्री वी०पी० सिंह तथा कई अन्य नेता इन संवैधानिक पदधारियों को लोकपाल की परिधि से दूर ही रखने की वकालत कर रहे हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान में राष्ट्रपति को व्यवस्थापिका का नाममात्र का मुखिया मनोनीत किया गया है तथा शासन का उत्तरादायित्व प्रधानमंत्री तथा उसकी मंत्रिपरिषद पर है। संविधान के अनुच्छेद 361 के अन्तर्गत राष्ट्रपति तथा राज्यपालों को उनके कार्यकाल के दौरान पद की शक्तियों के प्रयोग और कर्तव्यों के पालन के लिये न्यायिक उत्तरदायित्व से छूट प्रदान की गयी है। उपराष्ट्रपति साधारणतया राज्य सभा का सभापति होता है तथा राष्ट्रपति की अनुपस्थिति में ही उसका दायित्व निर्वहन करता है। अतः इनको तो लोकपाल के दायरे में लाना सम्भव ही नहीं होगा। लेकिन बोफोर्स, सेंट किट्स, झारखण्ड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड तथा स्विस बैंकों में धन जमा कराने के प्रकरणों में तत्कालीन प्रधानमंत्रियों के नाम उछलने के कारण पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने स्वयं प्रधानमंत्री पद को भी लोकपाल की परिधि में लाने का प्रावधान करवाया था जिसका आम जनता ने स्वागत भी किया था। अब जब वर्तमान प्रधानमंत्री भी इस पद को लोकपाल विधेयक से आच्छादित करना चाहते हैं फिर इस पर किसी बहस की गुंजाइश नजर नहीं आती तथा प्रधानमंत्री को शामिल करने को लेकर विधेयक को ही लोकसभा से दूर रखने की कवायद किसी अन्यथा उद्देश्य की ओर इंगित करती प्रतीत हो रही है।
ज्ञातव्य है कि सन् 1961 में प्रशासनिक सुधार आयोग तथा तत्कालीन अटार्नी जनरल श्री एम०सी० सीतलवाड द्वारा अनुमोदित लोकपाल तथा लोक आयुक्त विधेयक 1969 में ही लोकसभा में पारित हो गया था लेकिन यह राज्यसभा से पारित हो पाता, इससे पूर्व लोकसभा का विघटन हो गया था, सांविधानिक उपबन्धों के अनुसार, यह विधेयक भी निरस्त हो गया। तब से लेकर आज तक विभिन्न केन्द्रीय सरकारों ने इसमें कतिपय संशोधनों के साथ आठ बार संसद के समक्ष अनुमोदनार्थ रखा है लेकिन किसी न किसी कारण यह अभी तक कानून का रूप नहीं ले सका है। प्रारम्भ में इस विधेयक के अन्तर्गत लोकसेवकों के भ्रष्ट आचरण के अलावा पक्षपात, पद का दुरुपयोग, प्रमाद, अक्षमता, अनैतिकता, मनमानापन तथा विलम्ब आदि के आधार शामिल थे तथा लोकसेवकों में केन्द्रीय तथा राज्य के मंत्रियों, सचिवों तथा अन्य समकक्ष अधिकारियों को शामिल किया गया था जिनपर कार्यपालिका के विवेकाधीन कार्यों को करने का उत्तरदायित्व रहता है। लेकिन इस बीच इसके क्षेत्रों को सीमित और संकुचित कर दिया गया तथा सन् 2001 में प्रस्तावित लोकपाल विधेयक के अधिकारक्षेत्र में केवल केन्द्रीय मंत्रिमण्डल के पूर्व तथा वर्तमान सदस्यों को ही रखा गया है। सांसदों तक को इसकी परिधि से बाहर कर दिया गया है।
शासन सत्ता के उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों के आचरण पर अंकुश के लिये भारतीय दण्ड संहिता, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम तथा जांच आयोग अधिनियम आदि कानून हैं तथा इनके आदेशों के प्रर्वतन के लिये सामान्य पुलिस तंत्र के अलावा केन्द्रीय सतर्कता आयोग तथा गुप्तचर एजेंसियां कार्यरत हैं। लेकिन एक आम नागरिक के लिये इनमें गति पैदा करना आसान नहीं है। अखबारों, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के चैनलों आदि में जब मामला उछलता है तो सरकारें हरकत में आती हैं तथा जांचें बैठायी जाती हैं। लेकिन इन जांचों को राजनीति या विद्वेष से प्रेरित कहकर स्थिति को धुंधा-धुंधा करने के प्रयास होते हैं। इनमें इतनी देर भी होती है कि तत्कालीन आवेग चुक जाता है तथा आरोपी बेदाग हो स्वच्छन्द विचरण करते रहते हैं। कुछेक प्रकरणों को छोड़कर अभी तक कोई बड़ी मछली भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के चंगुल में नहीं फंसी है। हालांकि तलाशियों में करोड़ों रुपये नकद तथा अकूत सम्पत्ति के प्रमाण मिले हैं।
न्यायिक पुनर्विलोकन तथा संसदीय नियंत्रण के अपर्याप्त सिद्ध होने, प्रशासन के अधिकारों में अधिक पारदर्शिता लाने, नागरिकों के सूचना प्राप्त करने के मौलिक अधिकारों को अमली जामा पहनाने तथा एक उत्तरदायी शासन की स्थापना के लिये एक ऐसी संस्था की आवश्यकता है, जो प्रत्यक्ष तथा निष्पक्ष हो, जांच की कार्यवाहियां वैयक्तिक तथा औपचारिक प्रकृति की हों, कार्यवाहियां न्यायिक हस्तक्षेप से परे हों तथा उसे अपने कार्यों को पूरा करने में अधिक से अधिक स्वायत्तता तथा स्वतंत्रता हो। इन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिये केन्द्र में लोकपाल तथा राज्यों में लोकायुक्त की नियुक्ति की अनुशंसा हुयी थी। उड़ीसा, महाराष्ट्र, बिहार, उत्तर प्रदेश तथा उत्तरांचल समेत कई राज्यों में लोकायुक्त की अधिनियमों के अन्तर्गत लोकायुक्त कार्यरत है लेकिन केन्द्र में इसकी व्यवस्था अभी की जानी है। लोकायुक्त की परिधि में मुख्यमंत्री को छोड़कर राज्य मंत्रिमण्डल के सभी कोटि के पूर्व तथा वर्तमान मंत्री, सरकार में सचिव तथा समकक्ष स्तर के पदाधिकारी, लोकनिगमों के अध्यक्ष तथा सदस्यगण, विश्वविद्यालयों के कुलपति एवं महत्त्वपूर्ण पदाधिकारियों को आच्छादित किया गया है जिनके विरुद्ध जनमानस को शिकायतें हो सकती हैं।
सन् 2001 में जिस लोकपाल विधेयक को प्रस्तावित किया गया था उसमें एक त्रि-स्तरीय संस्था के गठन का प्राविधान था। इसके अध्यक्ष तथा दो सदस्यों के लिये क्रमशः भारत का मुख्य न्यायाधीश तथा उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश अथवा उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश होना अर्हता रखी गयी है। इनका कार्यकाल पांच वर्ष तथा इन्हें एक सामान्य सिविल न्यायालय की शक्ति दी गयी थी। इस विधेयक में 33 खण्ड हैं और यह भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के हेतु दिये गये समस्त परिवादों को सम्मिलित करता है। लोकपाल किसी भी लोककृत्यकारी के सम्बन्ध में किसी अभिकथन या आरोप की जांच करने की अधिकारिता रखता है। लोकपाल के समक्षवाद दायर करने की समयावधि पांच वर्ष है तथा जांच करते समय वह किसी को भी गवाही के लिये बुला सकता है या दस्तावेज मंगा सकता है। इसे अपनी अवमानना के लिये दण्ड देने की भी शक्ति है। लोकपाल शिकायतों की जांच करता है तथा अपनी सिफारिशें प्रधानमंत्री को देता है जो उसपर समुचित कार्यवाही करने के लिये स्वतंत्र होगा। प्रधानमंत्री की स्थिति में उसके खिलाफ कार्यवाही करने का अधिकार अंततोगत्वा लोकसभा के ऊपर छोड़ दिया गया है, क्योंकि वह लोकसभा के प्रति जवाबदेह होता है। लोकपाल की सिफारिशें अनुशांसात्मक होती हैं तथा उन पर कार्यवाही करना या न करना प्रधानमंत्री के विवेकाधिकार में होता है।
आज की वर्तमान परिस्थितियों में लोकपाल की प्रासंगिकता पर ही प्रश्न किये जा रहे हैं कि क्या उसके द्वारा चिह्नित व्यक्तियों को मंत्रिमण्डल से हटा कर उनके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही कर पाना सम्भव होगा? हमारे देश में पिछले दिनों घटित घटनायें कुछ और ही कहानी कहती हैं। पिछली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन सरकार के घटक दलों के नेताओं के खिलाफ 'तहलका' मचा तथा गुप्त कैमरे के सामने रिश्वत लेते हुये पकड़े गये। एक मंत्री ने आवेग में आकर त्याग-पत्र भी दे दिया लेकिन शीघ्र ही वापस मंत्रिमण्डल में ले लिये गये। विरोध पक्ष ने लोकसभा में उनका बहिष्कार जारी रखा। वर्तमान संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन में भी कई मंत्रियों को 'दागी' कहते हुये विरोध पक्ष द्वारा सदन का बहिष्कार किया गया। गठबन्धन की राजनीति में ऐसे तत्वों को मंत्रिपद देने के अपने कारण तथा विवशतायें हैं। जिस मोल-भाव तथा जोड़-तोड़ से सरकारें बन रही हैं उसमें भ्रष्टाचारियों को मंत्री बनाना हमारी नियति बन गयी है। ऐसे तत्व प्रत्येक राजनीतिक दल में हैं तथा इनके विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य भी हैं लेकिन इन्हें फिर-फिर मंत्रिमण्डल में जगह देना मजबूरी है। ऐसे लोगों के खिलाफ लोकपाल अपनी अनुशंसा देगा लेकिन प्रधानमंत्री के पास ऐसी फाइल को अलमारी में बंद रखने के अलावा कोई चारा नहीं होगा तथा लोकपाल की संस्था 'कागजी शेर' और 'सफेद हाथी' बन कर रह जायेगी।
भारतीय राजनीति आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हुयी है तथा नेता-नौकरशाह-माफिया की तिकड़ी बड़ी बेशर्मी से जनता के धन का दोहन कर रही है। अभी हाल में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार हम भ्रष्टतम देशों की अगली पंक्ति में स्थान बना चुके हैं तथा इसको रोकने के सारे प्रयास विफल रहे हैं। ऐसे में लोकपाल विधेयक की उपादेयता संदेहास्पद है तथा इसकी परिधि को लेकर छिड़ी बहस बेमानी है।
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