Friday, 16 March 2018

राज्य- ध्वज की मांग अनुचित,अनैतिक ही नहीं देश की अखंडता पर आंच हैं




कर्णाटक के मुख्य मंत्री ने केंद्र सरकार के पास अपने राज्य के लिए अलग ध्वज को मान्यता देने की मांग भेजी है. यह ध्वज पीले, लाल और श्वेत पट्टियों का है जिसमे राज्य के प्रतीक चिह्न को मध्य में उकेरा गया है. कन्नड़ अस्मिता के प्रतीक "गंडा भेरुन्दी" ( दो सिरों वाली मिथकीय मछली ) का यह चिह्न हिंदी को तथाकथित जबरन लादे जाने के विरोध में वर्षों से आन्दोलन के रूप में प्रदर्शित किया जाता रहा है. कतिपय राजनैतिक दलों ने श्वेत पट्टिका हटाने तथा पीली-लाल पट्टियों को ही राज्य ध्वज के रूप में स्वीकार किया है. केंद्र सरकार ने ऐसी मांग पर नकारात्मक रुख दिखलाया है , लेकिन वहां आसन्न  विधान सभा चुनाव के माहौल में यह क्या गुल खिलायेगा ,यह भविष्य ही बतलायेगा. कावेरी नदी के जल बटवारे पर तमिलनाडु के साथ विवाद में होने वाले आन्दोलन में यही  ध्वज लहराया जाता है.


वर्तमान में जम्मू-कश्मीर छोड़ कर किसी भी राज्य का अलग ध्वज नहीं है.ज्ञातव्य है कि संविधान के अनुच्छेद 370 के कारण वहां का संविधान ही अलग है तथा देश के अधिकांश क़ानून वहां के विधान मंडल द्वारा पारित होने के बाद ही लागू हैं.वहां के संविधान पर अंतिम निर्णय राष्ट्रपति की सहमति से ही होता है.


सन १९६९ में करूणानिधि के नेतृत्व वाली द्रमुक नें भी अलग झण्डे का प्रारूप प्रस्तुत किया था जिसमें ऊपर बांये किनारे पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज अंकित था. तत्समय राष्ट्रपति,राज्यपालों के  तथा कई अलग -अलग ध्वज प्रचलित थे. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने न केवल अलग ध्वज की मांग को कठोरता से ठुकरा दिया था बल्कि सेना के रेजीमेंटों को छोड़कर विभिन्न झण्डों का अस्तित्व समाप्त कर केवल तिरंगे को ही मान्यता दी थी.उसके बाद से अब विभिन्न सरकारी इमारतों, राष्ट्रपति भवन तथा राजभवनों आदि पर केवल तिरंगा ही फहराया जाता है.खालिस्तान, गोरखालैंड, बोडोलैंड वगैरह अलगाव वादी आन्दोलनकारियों ने अपने-अपने ध्वज घोषित कर रखे हैं तथा गाहे-बगाहे समाचार-पत्रों तथा मीडिया में नज़र आते हैं . यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि राज्यों ने अपने-अपने प्रतीक चिह्न बना रखें हैं लेकिन सरकारी पत्रों आदि में "भारत सरकार की सेवा में" ही अंकित किया जाता है .सरकारी पोस्टेज स्टैम्प केंद्र तथा राज्यों के लिए समान हैं. कुछ वर्ष पूर्व तक रसीदी टिकटों पर सम्बंधित राज्य का नाम छपा होता था लेकिन अब ऐसा नहीं है.


भारत के संविधान का पहला अनुच्छेद भारत को राज्यों का संघ होना उद्घोषित करता है तथा नये राज्यों का प्रवेश या स्थापना , नये राज्यों के निर्माण तथा वर्तमान राज्यों के क्षेत्रों , सीमाओं या नाम में परिवर्तन के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश पर कानून बनाकर लागू करने के लिए संसद को अधिकृत करता है.संविधान की पहली अनुसूची में राज्य तथा केंद्र शासित राज्य क्षेत्र वर्णित हैं तथा संसद साधारण बहुमत से इनमे कोई परिवर्तन करने के लिए स्वतंत्र है.भारतीय संविधान में यों तो एक परिसंघ संविधान के बहुत सारे लक्षण विद्यमान हैं तथा एस.आर.बोम्मई बनाम भारत संघ (१९९४ )के वाद में सुप्रीमकोर्ट ने परिसंघवाद को एक आधारिक लक्षण भी घोषित किया है लेकिन यह आदर्श परिसंघ माने जाने वाले अमेरिकी संविधान से इस मामले में फर्क है कि वहां तत्समय 13 विभिन्न देशों ने अपनी सुरक्षा अक्षुण रखने तथा कुछ अन्य अत्यंत सीमित विषयों पर कानून बनाने के लिए संविधान का निर्माण किया था .वहां राज्यों के अलग संविधान , झण्डे,राज्यगान, नागरिकता तथा कानून हैं.वहां केंद्र तथा राज्यों की कार्यपालिका तथा विधायिका ही नहीं न्यायपालिका भी अलग-अलग हैं.यह दूसरी बात है कि समय के साथ वहां केन्द्रीयकरण की प्रवृत्ति  आकार ले चुकी है तथा वहां के लोग अपने को संयुक्त राज्य का नागरिक बतलाने में अधिक गर्व महसूस करते हैं.


भारतीय संविधान केंद्र , राज्यों तथा केंद्र शासित क्षेत्रों के लिए प्रावधान करता है लेकिन यहाँ एकल नागरिकता है,राज्यपालों की नियुक्ति होती है तथा सिंगिल न्यायपालिका है जो संविधान तथा अन्य कानूनों का अर्थान्वयन करती है.भारत में एक राष्ट्र ध्वज, जो केसरिया,श्वेत तथा हरी पट्टियों का है तथा बीच में सारनाथ स्तूप का धर्म चक्र अंकित है जिसमे चौबीस तीलियाँ हैं . राष्ट्र ध्वज को फहराने/उतारने आदि को नियमित करने के लिए भारतीय ध्वज संहिता (२००२) है तथा इसके दुरुपयोग को रोकने/दण्डित  करने के लिए प्रतीक और नाम (अनुचित  प्रयोग निवारण ) अधिनियम ,1950 तथा राष्ट्रीय सम्मान (अपमान की रोकथाम) अधिनियम ,१९७१  क़ानून लागू हैं.संविधान में उल्लिखित मौलिक दायित्यों के अनुच्छेद 51 (क)में संविधान का पालन करने और उसके आदर्शों ; संस्थाओं; राष्ट्रध्वज और राष्ट्र गान का आदर करने का नागरिकों का पुनीत दायित्व बतलाया गया है.


राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा भारत के राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है.इस पर सभी को दिल से गर्व है और इसकी आन-बान-शान के लिए प्रत्येक देशवासी अपना सर्वस्व न्योच्छावर करने के लिए प्राणप्रण से तैयार रहता है. यह हमारी आशाओं तथा आकाक्षाओं का प्रतिबिम्ब है. भारत संघ बनाम नवीन जिंदल (2004) के वाद में सुप्रीमकोर्ट ने घोषणा की थी कि तिरंगे को फहराने का हर भारतीय को मौलिक अधिकार है.हालाँकि कई बार अति उत्साह में झण्डे के प्रयोग को लेकर दुश्वारियां भी आई हैं. १९९४ में मिस यूनिवर्स  बनी सुष्मिता सेन की बग्गी के पिछले हिस्से में तिरंगे को बांधने पर विवाद हुआ था, 2001 में मंदिरा बेदी द्वारा  तिरंगे बार्डर वाली साड़ी का प्रयोग करने तथा उसी वर्ष सचिन तेंदुलकर द्वारा  तिरंगे वाला केक काट   कर  आलोचना का शिकार हुए थे . कई फिल्मों में राष्ट्रध्वज तथा राष्ट्रगान के प्रतिषिद्ध उपयोग पर भी लोगों की भृकुटियाँ तनी हैं. अंतर्राष्ट्रीय मैचों तथा सांस्कृतिक कार्यक्रमों आदि में हम अपनी ख़ुशी जाहिर करने के लिए तिरंगे को लहराकर आनंदित होते हैं.


संविधान में राज्यों को अपना अलग ध्वज रखने/बनाने की अनुमति देने का कोई प्रावधान नहीं है.राज्यों का सृजन प्रशासकीय कारणों से हुआ है तथा अनुच्छेद 355 के अनुसार संघ का यह कर्तव्य है कि वाह्य आक्रमण और आतंरिक अशांति से प्रत्येक राज्य की संरक्षा करे और प्रत्येक राज्य की सरकार का इस संविधान के उपबंधों के अनुसार चलाया जाना सुनिश्चित करे.अनुच्छेद 256 से 263 तक के अनुच्छेदों में सामान्य स्थितियों में संघ को राज्य पर नियंत्रण के विभिन्न अधिकार उल्लिखित हैं जिसमे संसद द्वारा बनायी  गयी विधियों का अनुपालन सुनिश्चित कराना, राज्य की कार्य पालिका शक्ति को संघ की तत्विश्यक शक्ति में अड़चन न बनने देना,राष्ट्रीय और जलमार्ग सहित राष्ट्रीय महत्व के संचार साधनों की देख रेख तथा रेलों का संरक्षण करना इत्यादि शामिल है.अनुच्छेद 285 से 289में अंतर शासन- कर मुक्ति के प्रावधान करता है जिसके अंतर्गत संघ या राज्य आपस में एक-दूसरें के विरुद्ध करारोपण नहीं करेंगे. इन प्रावधानों से स्पष्ट है कि संविधान राज्यों को अलग इकाई के तौर पर नहीं देखता है -उनमे सहकारिता का भाव है-स्पर्धा का नहीं. राज्य केंद्र के अभिकर्ता या उपकरण नहीं हैं तथा शक्तिशाली केंद्र की तरह शक्तिशाली राज्य भी आज की आवश्यकता हैं. ऐसी मांगों से क्षुद्र राजनैतिक स्वार्थ भले ही सिद्ध हो जाएँ, देश में अलगाववाद का बीजारोपण होगा जो देश की अखंडता के लिए खतरा बन सकता है.परिसंघ हमारी राजव्यवस्था में विद्यमान है और हमें उसकी जीवंत उर्जा का अनुभव होता है 

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अनुच्छेद 1(1 ) में भारत को राज्यों का संघ कहा गया है. इसे सोंच समझ कर संघ कहा गया है , परिसंघ नहीं.प्रारूपण समिति यह स्पष्ट कर देना चाहती थी कि यद्यपि भारत एक परिसंघ है, यह परिसंघ राज्यों के साथ करार का परिणाम नहीं है. राज्यों को विलग होने का अधिकार नहीं है.वे संघ से अलग नहीं हो सकते. परिसंघ नष्ट नहीं किया जा सकता है. इसीलिये वह संघ है. प्रशासन की सुविधा के लिए देश को विभिन्न राज्यों में बांटा जा सकता है किन्तु देश एक अखंड और अविभाज्य इकाई है .कर्णाटक के मुख्यमंत्री की अलग झण्डे की मांग आज भले ही निश्छल लगे लेकिन यह ऐसा पैंडोरा बाक्स साबित हो  सकता है जिसके खुलते ही राष्ट्र घाती शक्तियां सर उठाने लगेंगी .यह अनुचित , अनैतिक और संविधान के शब्दों और भावों के विरुद्ध है. इससे देश की अखंडता पर आंच आ सकती है.



केंद्र सरकार को समय रहते इसे सख्ती से दबाना चाहिए तथा संविधान के उपलब्ध प्रावधानों में प्रशासकीय आदेश निर्गत करने चाहिए जिससे भविष्य में भी ऐसी मांगे न उठें.

अप्रतिरोधी मृत्यु-वरण की वैधता के निहितार्थ




कामनकाज बनाम भारत संघ की जनहित याचिका पर निर्णय देते हुए सुप्रीमकोर्ट की सांविधानिक पीठ ने गरिमा के साथ मृत्यु को एक मौलिक अधिकार मानते हुए अनिवारक / अप्रतिरोधी कृपा मृत्यु को संविधान के अनुच्छेद 21में शामिल मानते हुए वैधता प्रदान की है. अपनी आसन्न मृत्यु की स्थिति में जिन्दगी को अनावश्यक रूप से लम्बा करने हेतु कृत्रिम चिकित्सकीय सहायता को मना करने वाली वसीयत को भी वैधता प्रदान की गयी है. इस सम्बन्ध में केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित मैनेजमेंट आफ पेशेंट विद टर्मिनल इलनेस,विड्रावल आफ मेडिकल लाइफ सपोर्ट विधेयक का संज्ञान लेते हुए सुप्रीमकोर्टने व्यापक दिशा-निर्देश भी जारी किये हैं.

जस्टिस काटजू ने २०११ में अरुणा शानबाग बनाम भारत संघ के मामले में अप्रतिरोधी इच्छा मृत्यु की अनुमति दिए जाने पर सहमति व्यक्त की थी लेकिन इस पर विशदविचार-विनिमय की आवश्यकता पर भी जोर दिया था.उसी क्रम में उच्चतम न्यायालय ने उपरोक्त निर्णय दिया है.

दरअसल पी.रथीराम बनाम भारत संघ (१९९४)में आत्महत्या को अपराध घोषित करने वाली भारतीय दण्ड संहिता की धारा 309के परिप्रेक्ष्य में सुप्रीमकोर्टने मृत्यु वरण को जीवन के अधिकार में शामिल माना था तथा आपवादिक स्थिति में न्यायालय की कड़ी निगरानी में इसकी अनुमति देने का मंतव्य व्यक्त किया था जिस पर व्यापक प्रतिक्रिया और विरोध हुआ था. और तो और इलाहाबाद उच्च न्यायालय में हेलमेट को अनिवार्य करने वाले ट्रेफिकनियम की संवैधानिकता को इस आधार पर चुनौती दी गयी थी कि जब आत्म हत्या करना एक अधिकार है तब ऐसे नियम बेमानी हैं.इसी के तुरंत बाद ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य ( १९९६ )में रथी राम के निर्णय को पलटते हुए सुप्रीमकोर्ट ने सहयोगात्मक आत्महत्या या कृपा मृत्यु को असंविधानिक  करार दिया था .पांच जजों की सांविधानिक पीठ ने संप्रेक्षण किया था कि मृत्यु वरण का अधिकार जीवन के अधिकार का प्रतिलोमी है तथा जीवन के नैसर्गिक अन्त तक गरिमा के साथ जीवन का अधिकार ही अनुच्छेद 21 में अनुमन्य है.
विश्व के कई देशों में कृपा मृत्यु अनुमत है.स्विट्ज़रलैंड ऐसे देश में तो बाकायदा नर्सिंग होम है जो लोगों को शान्ति से मरने की व्यवस्था का वादा करते हैं. जीवन की सँझा में कई लोग ऐसी व्यवस्था का स्वागत करते हैं तथा परम शान्ति से महाप्रयाण करते हैं. भारतीय मनीषा में भी सन्यास का प्रावधान है जब लोग सांसारिक क्रिया कलापों से अपने को मुक्त करके घर-परिवार छोड़ जाते हैं.जैन धर्म में 'संथारा"ऐसी परिपाटी प्रचलित है जब लोग आसन्न मृत्यु का आलिंगन करने के लिए भोजन- पानी छोड़ कर संसार से विदा लेने के लिए उद्दत होते हैं. संत बिनोबा भावे ने भी इसी प्रकार से  अपना शरीर छोड़ा था. "संथारा"को असंवैधानिक परिपाटी घोषित करनेवाले राजस्थान हाईकोर्टके निर्णय पर सुप्रीमकोर्ट ने रोक लगा रखी है. सद्य निर्णय से उसका वैधी करण हो गया है.

यह सर्व मान्य तथ्य है कि संविधान सहित सारे क़ानून न केवल जीवित लोगों के लिए हैं बल्कि गरिमा के साथ जीवन यापन करने के लिए आधार / वातावरण तैयार करते हैं.लेकिन यह भी सही है कि कई बार ऐसी शारीरिक व्याधियां हो जाती हैं कि जीवन दूभर ही नहीं असहनीय हो जाता है.परिवार तथा सम्बन्धियों से सहायता नहीं मिलती तथा तिल-तिल कर मरने की अपेक्षा मृत्यु वरण ही एकमात्र विकल्प होता है लेकिन कानून इसकी अनुमति नहीं देता. इस प्रसंग में वेंकटेश प्रकरण का स्मरण करके सिहरन होती है जब एन नवयुवक को असाध्य बीमारी के कारण धीरे-धीरे मरते हुए अभिशप्त माँ ने आंध्रप्रदेश हाईकोर्ट से अनुमति चाही थी कि उसके बेटे को कृपा मृत्यु दे दी जाये तथा उसकी आँखों तथा अन्य उपयोगी अंगों को ज़रूरत मंदों को दे दिया जाय, जिससे कइयों को रौशनी एवं जीवन दान मिल सके , लेकिन न्यायालय ने असमर्थता  व्यक्त की थी. यदि अनुमति दी गयी होती तो वेंकटेश आज भी जिन्दा होता!

सद्य प्रकरण पर बहस करते हुए यह भी आशंका व्यक्त की गयी थी कि ऐसी अनुमति का दुरुपयोग हो सकता है.समाचार पत्रों में अक्सर सुर्खियाँ दिखलाई पड़ती हैं जब संपत्ति / अनुकम्पा नियुक्ति आदि के लिए पिता तक की हत्या कर दी जाती है. सुप्रीमकोर्ट ने सिर्फ दुरूपयोग की आशंका के आधार पर अप्रतिरोधी कृपा मृत्यु को अवैध घोषित करने से मना कर दिया, तथा उन्नत राष्ट्रों के उदाहरण को आत्मसात करते हुए सहमति व्यक्त की है. अभी क्रियात्मक कृपा मृत्यु की अनुमति नहीं दी गयी है.

उपरोक्त के साथ ही जीवित व्यक्तियों द्वारा आसन्न मृत्यु की बेला में जिंदगी को अनावश्यक खीचने वाले कृत्रिम उपायों से विरत रहने की इच्छा व्यक्त करने वाली वसीयत को भी वैधता प्रदान कर दी है हालाँकि इसके लिए विशिष्ट दिशा निर्देश भी जारी किये हैं.अभी जटिल प्रक्रिया वाले आपरेशनों आदि में रोगी या उसके परिजनों से जोखिम की अनुमति वाला प्रोफोर्मा भरवाया जाता है लेकिन पूर्ण स्वस्थ व्यक्ति द्वारा अपने बारे में की गयी ऐसी वसीयत मान्य नहीं थी. यों तो मेडिकल साइंसेजकाफी उन्नति कर चुकी है तथा कईयों ने अपने असाध्य रोग से पीड़ित शरीर को इस आशा के साथ फ्रीज़ करा लिया है कि शायद किसी दिन उस रोग का इलाज निकल आये और वे फिर से सामान्य जीवन जीने लायक हो जाएँ लेकिन मृत्यु एक अटल सत्य है तथा सारे क़ानून मानव जीवन की स्वाभाविक प्रक्रियाओं को सामान्य मान कर ही बनाये गए हैं ,अतः गरिमा के साथ मृत्यु वरण के अधिकार को अमली जामा पहनाने के लिए आई.पी.सी.की धारा 309 सहित कई अन्य प्रावधानों को विधिस्वरूप देना अनिवार्य होगा.इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए भी आवश्यक व्यवस्था करनी होगी. मानव अंग प्रत्यारोपण के वाणिज्यिक उपयोग को रोकने वाले कानून को लागू करने में आ रही दिक्कतों के उदाहरण दृष्टव्य हैं जब बड़े नामी-गरामी अस्पतालों से विचलित करने वाले किस्से प्रायः रोज़ ही सुनने को मिल रहे हैं. 

डा निरुपमा अशोक,
प्राचार्या, भगवानदीन आर्य कन्या पी. जी. कॉलेज , लखीमपुर -खीरी

व्यक्ति की गरिमा से जुड़ा है प्रजनन का अधिकार



अभी हाल में मद्रास हाईकोर्ट ने हत्या के जुर्म में आजीवन कारावास की सजा काट रहे एक बन्दी( 40वर्ष) को पंद्रह दिन के लिए अपने घर जाने हेतु अवकाश स्वीकृत किया है जिससे वह पत्नी के साथ वैवाहिक सन्सर्ग कर सके. उसकी पत्नी ( 32 वर्ष) की याचिका पर निर्णय सुनाते हुए न्यायमूर्ति एस बिमला तथा न्यायमूर्ति टी कृष्णा वल्ली की खण्डपीठ ने कहा है कि हालाँकि पत्नी को कैद नहीं किया गया है , लेकिन प्रजनन की एक वैध अपेक्षा को अस्वीकार नहीं जा सकता है. यह कैदी पिछले 18वर्ष से जेल में है तथा उसकी पत्नी में कुछ शारीरिक दोष है लेकिन चिकित्सकों का कहना है कि यदि पति-पत्नी एक विशिष्ट समयावधि में शारीरिक सम्बन्ध बनायें तो सन्तानोपत्ति की सम्भावना प्रबल है . कैदी को इस हेतु पैरोल या अवकाश देने का कोई नियम तामिलनाडु सस्पेंसन  ऑफ़ संटेंस रूल्स में नहीं है तथा सजायाफ्ता कैदी को जेल से  बाहर भेजने पर उसकी जान जोखिम में हो सकती है , के आधार पर सरकार की ओर से विरोध किया गया था . लेकिन न्यायालय ने पाया कि जिस व्यक्ति की हत्या के लिए उसे सजा मिली है, उसके परिवार के लोग अब वहां नहीं रहते हैं,तथा यह नियमों में उपलब्ध "अन्य किसी असाधारण कारण" के अन्तरगत आच्छादित है . न्यायालय का कहना है कि सन्तानोत्पत्ति व्यक्ति की गरिमा से जुड़ा हुआ है और प्रत्येक बंदी को भी प्राप्त है . अदालत ने यह भी संप्रेक्षण किया कि यदि एक बार में पत्नी गर्भाधान नहीं कर पाती है तो चिकित्सकों की अनुशंसा पर उसे बाद में पुनः रिहाई दी जा सकती है.


कुछ वर्ष पूर्व एक महिला ने पंजाब राज्य मानवाधिकार आयोग के समक्ष एक याचिका प्रस्तुत कर मांग की थी कि उसे अपने जेल में बंदी पति से सहवास की अनुमति दी जाये जिससे वह स्त्रीत्व का मौलिक अधिकार -- मातृत्व सुख , प्राप्त कर सके. अपनी याचिका में इस महिला ने सप्रमाण कहा था कि  वे विधिक रूप से विवाहित हैं  तथा उनके पति विधि की सम्यक प्रक्रिया के द्वारा सजायाफ्ता हो जेल में हैं  अतः वह मातृत्व सुख पाने से वंचित है.उनका कहना था चूँकि मातृत्व सुख प्राप्त करना उनका आधारिक  मानवाधिकार है , अतः उन्हें अपने पति से शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करने की छूट दी जाये  जिससे वे गर्भ धारण कर सकें. उस समय समाचार-पत्रों तथा मीडिया चैनलों में इस पर बहसें हुईं थी तथा एक बंदी के अधिकारों की सीमा रेखांकित करते हुए विरोध जताया गया था , वहीँ  मानवाधिकार क्षेत्र में कार्य रत कई संगठनों ने कैदियों के प्रति संवेदनशील एवं प्रगतिशील कदम उठाने की अपीलें प्रसारित की थीं .


मद्रास हाईकोर्ट ने अपने सद्य निर्णय में इसे व्यक्ति की गरिमा के साथ जोड़ा है जो किसी बंदी को भी प्राप्त है . दण्ड शास्त्र के सुधारवादी दृष्टिकोण को रेखांकित करते हुए न्यायालय ने सरकार से एक समिति गठित करने के लिए भी अनुरोध किया है जो बंदियों के मानवोचित अधिकारों पर विचार करे तथा अपेक्षित पाए जाने पर सहवास के लिए अवकाश प्रदान करे.


न्यायालय का कहना है कि पत्नी को जेल में रखने से व्यवहारिक कठिनाइयाँ होंगी अतः पति को ही बाहर जाने की अनुमति दी जानी चाहिए . यदि कोई महिला या पुरुष बंदी सन्तानोत्पत्ति के लिए अपने अण्डाणु या शुक्राणु देकर वैज्ञानिक पद्धति द्वारा प्रजनन चाहता है तो उसकी भी अनुमति है , हाईकोर्ट के सद्य निर्णय पर आशानुरूप व्यापक प्रतिक्रियाएं हुईं है तथा निर्णय की सराहना की जा रही है.


विवाह की संस्था स्त्री-पुरुष के मध्य शारीरिक सम्बन्धों का वैधीकरण है. हिन्दू विवाह एक संस्कार है  लेकिन योग्य संतान प्रजनन इसकी सार्थकता है , जिससे हर युगुल पितृ - ऋण से मुक्त होता  है. मुस्लिम विवाह तो संतानोपत्ति हेतु की गयी संविदा ही है .प्रायः सभी धर्मो में इसे एक पवित्र बंधन तथा प्रजनन का हेतु माना गया है.वंश वृद्धि के साथ एक सभ्य समाज का सृजन , अनादि काल से विवाह का औचित्य सिद्ध करते रहे हैं.
प्रकृति ने स्त्री को मातृत्व दायित्व सौंपा है और सामान्य विधि भी स्त्रीत्व की सार्थकता इसी कारण स्वीकार करता है . एयर इंडिया बनाम नरगिस मिर्ज़ा ( १९८१ ) के बहुप्रचारित वाद में उच्चतम न्यायालय ने एयरलाइन्स के उस परिनियम को  असंवैधानिक घोषित कर दिया था जो परिचारिकाओं को विवाह करने या/तथा मातृत्व सुख प्राप्त करने पर नौकरी से ही निकाल देने का था . सुप्रीमकोर्ट ने यह अभिनिर्धारित किया कि यह परिनियम मनमाना और सभ्य समाज की धारणाओं के विरोधी था.न्यायालय का मत था कि ऐसे प्रावधान से कोई भी विमान परिचारिका माँ बनने से अपने को वंचित करेगी जो प्रकृति का सहज और सामान्य अनुक्रम है . न्यायालय ने इसे भारतीय स्त्रीत्व की खुली अवमानना कहते हुए असंविधानिक  करार दिया था.इससे पूर्व 1979में सी बी मुथम्मा बनाम भारत संघ के प्रकरण में भारतीय विदेश सेवा  में कार्य रत महिलाओं को विवाह करने से पूर्व विभागीय अनुमति का प्रावधान करने वाले नियम को भी इसी आधार पर निरस्त कर दिया गया था.


सन्तानोत्पत्ति के अधिकार को लेकर कई रोचक मुक़दमे हुए हैं . पंजाब तथा हरियाणा हाईकोर्ट ने पुरुष बंदी के शुक्राणुओं को जेल से बाहर ले जाने की अनुमति दे दी थी जिससे उसकी पत्नी गर्भवती हो सके , लेकिन न्यायालय ने महिला बंदियों को उनके पतियों द्वारा गर्भवती करने के प्रश्न पर कहने से इन्कार कर दिया था क्योंकि गर्भाधान के बाद तथा प्रसूति की कितनी जिम्मेदारी राज्य की है, इस पर विचार नहीं किया गया था.
हरियाणा में पंचायत चुनाव में दो से अधिक जीवित बच्चों वाले नागरिकों के चुनाव लड़ने पर रोक है . एक मुस्लिम नागरिक ने इस प्रावधान की साम्विधानिकता को इस आधार पर चुनौती दी कि उनके धर्म में चार विवाह की अनुमति है तथा नरगिस मिर्ज़ा के केस में सुप्रीमकोर्ट ने स्वयं अभिनिर्धारित किया था कि मातृत्व का अधिकार हर स्त्री का मौलिक अधिकार है . लेकिन न्यायालय ने भारत की अधिक जनसँख्या पर रोक लगाने वाले इस प्रावधान को संविधानिक  घोषित किया था तथा कहा था कि ऐसे लोगों पर लगाया यह प्रतिबन्ध युक्तियुक्त है.न्यायालय का मत था कि चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं है तथा यह प्रतिबन्ध मुस्लिमों को चार शादी करने से वंचित नहीं करता है.


स्त्रियों के मातृत्व अधिकार पर सुप्रीमकोर्ट द्वारा निर्णीत वह वाद भी उल्लेखनीय है जिसके द्वारा कर्नाटक में विक्षिप्त महिलाओं के वन्ध्याकरण पर रोक लगायी गयी थी. यह पागल औरतें सड़क पर इधर-उधर पायी जाती थीं और निचले तबके के पुरुष इन्हें अपनी हवस का शिकार बनाते थे.एक गैर सरकारी संगठन ने मांग की थी कि इनका वन्ध्याकरण कर दिया जाय नहीं तो जो सन्ताने होंगी,उनकी देख-रेख कौन करेगा. लेकिन सुप्रीमकोर्ट ने अपनी असहमति जताई थी कि किसी भी स्त्री को मातृत्व सुखहीन नहीं बनाया जा सकता है.


सुरक्षित मातृत्व के लिए केंद्र तथा  राज्य सरकारों द्वारा कई योजनायें चलायी जा रहीं हैं . कैजुअल कर्मकारों को भी मातृत्व अवकाश देने का नियम लागू किया गया है.महिला अभ्यर्थियों को पीएचडी करने में अतिरिक्त समय दिया जाता है यदि इस बीच वे गर्भवती हो जाती हैं . सरोगेसी ( किराये की कोख ) के माध्यम से मातृत्व सुख भोग रही  महिलाओं के लिए भी मातृत्व अवकाश तथा चाइल्ड केयर लीव का प्रावधान किया गया है.
यदि कोई अनब्याही महिला माँ बनती है तो उसे उस बच्चे के पिता का नाम बताने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है.एक मसीही अनब्याही महिला ने शिशु को जन्म दिया था.जब वह इसके लिए पासपोर्ट बनवाने गयी तो अधिकारियों ने पिता का नाम उल्लेख किये बिना पासपोर्ट बनाने से इन्कार कर दिया.सुप्रीमकोर्टने अभिनिर्धारित किया कि महिला को शिशु के पिता का नाम बताने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है.वैसे भी अब पिता के नाम की बजाय या साथ में माँ के नाम का उल्लेख वैकल्पिक कर दिया गया है.


मद्रास हाईकोर्ट के सद्य निर्णय से जहां मातृत्व-पितृत्व के अधिकारों पर विषद विवेचन हुआ है वहीँ एक बंदी के अधिकारों पर नयी  बहस प्रारम्भ हुई है.सुनील बत्रा बनाम राज्य (१९७८) में सुप्रीमकोर्ट ने संप्रेक्षण किया था कि जेल में रहने का अर्थ यह नहीं है कि बंदी के मौलिक अधिकारों की बिदाई हो गयी है. इधर हाल के वर्षों में विकसित हुए कारागार विधिशास्त्र में कैदियों के विभिन्न  अधिकार रेखांकित हुए है जिनमें मामले का त्वरित विचारण, परिवार के लोगों से सम्पर्क तथा कैदियों को यातना एवं उत्पीड़न के विरुद्ध सुरक्षा उपलब्ध है. जेलें लोक विरुद्ध संस्थायें हैं जो राज्य के दाण्डिक सिद्धांत, यथा असामर्थ्य, दण्ड,भायारोपन तथा सुधार  का कार्य करती हैं.दरअसल कारागार से अभिप्रेत है व्यक्ति की स्वाधीनता का हरण  तथा उसके अधिकारों पर प्रतिबन्ध .कारागार विन्यास में स्वायत्तता , विचरण की स्वतंत्रता , साहचर्य  तथा निजत्व अत्यंत सीमित हो जाते हैं तथा व्यक्ति के सार्वजनिक एवं वैयक्तिक अधिकारों में कठोर संतुलन बनाये रखना मजबूरी होती है.


संतानोत्पत्ति एक स्वस्फूर्त अधिकार है जो अनेकानेक प्रश्न उपस्थित करता है.क्या राज्य का यह दायित्व है कि वह इस अधिकार में सहायक बने? क्या इसमें महिला बंदियों द्वारा आई वी एफ से गर्भाधान कराना शामिल है ?इस अधिकार को देने से अन्यों के अधिकारों पर असर पड़ सकता है. क्या सभी बंदियों को हरेक परिस्थितियों में यह अधिकार उपलब्ध किया जाना चाहिए? क्या प्रजनन से सम्बंधित सभी कार्यकलाप मौलिक अधिकारों के छाते के नीचे लाये जा सकते हैं? इन तथा ऐसे प्रश्नों के उत्तर खोजे जाने चाहिये तभी बंदी की गरिमा अक्षुण्य की जा सकती है.



डा. निरुपमा अशोक
प्राचार्य, भगवानदीन आर्य कन्या महाविद्यालय , लखीमपुर-खीरी

Tuesday, 20 February 2018

एक देश-एक चुनाव : सरकार इसके लिए पहले जनमत बनाए और पूरा होमवर्क करके ही इस पर कोई निर्णय ले...



राष्ट्रपति ने अपने अभिभाषण में एक बार पुनः लोकसभा तथा विधान सभाओं के चुनाव एक साथ कराने की आवश्यकता पर बल दिया है.प्रधान मंत्री ने भी पिछले कई मौकों पर" एक देश एक चुनाव" के लिए जनमत बनाने हेतु अपील की है. कहा जा रहा है कि28 राज्यों वाले देश में हमेशा कहीं ना कहीं के चुनाव हो रहे हैं,जिससे  दैनिन्दिनी काम में रूकावट आती है और विकास बाधित होता है . सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों इलेक्शन मोड में रहते हैं , आरोपों-प्रत्यारोपों  का सतत दौर चला करता है तथा आदर्श चुनाव संहिता लगने के कारण सरकारी कामकाज पर दुष्प्रभाव पड़ता है. यही नहीं इन चुनावों के नतीजे केंद्र सरकार के कामकाज का प्रतिबिम्ब करार दिए जाते  है तथा हर विजेता इनका अर्थान्वयन अपने पक्ष में प्रचारित करता पाया जाता है.यों तो जनतन्त्र में चुनाव रूटीन की बात होनी चाहिए तथा परिणामों को सतही स्तर पर ही लिया जाना चाहिए लेकिन हर हार जीत पर मीडिया भी चटखारे लेकर विश्लेषण और आकलन करती है.

सन १९६७ तक , अपवादों को छोड़कर ,लोकसभा तथा विधान सभाओं के चुनाव साथ ही होते थे. लेकिन १९७१ में इंदिराजी ने लोकसभा को भंग कर कराके समय से पूर्व चुनाव कराये थे, कांग्रेस विभाजन के बाद हुए इस चुनाव में उन्हें भारी बहुमत मिला था . १९७५ में आपातकाल के समय लोकसभा का कार्यकाल बढाया गया लेकिन जब १९७७ मे चुनाव हुए तो जनता पार्टी प्रचंड बहुमत में जीती.उस समय उत्तर भारत के नौ राज्यों में कांग्रेस की सरकारें थीं लेकिन सभी में कांग्रेस का सफाया हो गया था राष्ट्रपति ने इनकी विधान सभाओं को भंग कर नया जनादेश प्राप्त करने की सलाह दी जिसे न्यायलय में चुनौती दी गयी. राजस्थान राज्य बनाम भारत संघ (१९७७) में उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रपति की सलाह को राजनैतिक प्रश्न मानते हुए दखलंदाजी से मना कर दिया था. केंद्र सरकार  का मत  था किलोकसभा चुनाव में हार का अर्थ है कि कांग्रेस नागरिकों का विश्वास खो चुकी है अतः इसे सत्ता में बने रहने का औचित्य नहीं है.बाद में हुए चुनावों में सभी जगह जनता पार्टी की सरकार विजयी हुई थी.


केंद्र में किसी दल की विजय पर राज्य की विधान सभा को भंग कर चुनाव कराने  का येह सिलसिला चलता रहता  यदि १९९४ में एस. आर बोम्मई बनाम भारत संघ के सुप्रसिद्ध वाद में सुप्रीम कोर्ट ने अन्यथा सम्प्रेक्षण न  किया होता.इस वाद में निर्धारित किया गया कि एक परिसंघीय संविधान में केंद्र और राज्यों के चुनाव अलग-अलग आधारों पर होते हैं अतः राज्य सरकार को इस आधार पर बर्खास्त नहीं किया जा सकता कि लोकसभा में वह दल पराजित हो गया है जिसकी सरकार  है. इस निर्णय के बाद से राज्य सरकारों को बर्खास्त कर मध्यावधि चुनाव की परिपाटी पर लगाम लग गया .सुप्रीमकोर्टका यह निर्णय उन दलों के लिए संजीवनी बन कर आया जो क्षेत्रीय हैं और प्रायः राज्य विशेष तक ही सीमित हैं."एक देश -एक चुनाव" का मुखर विरोध भी येही दल कर रहे हैं.


एक परिसंघीय संविधान में राज्य तथा केंद्र दो इकाई हैं.सातवीं अनुसूची में इनके मध्य विधायी शक्तियों का बटवारा है. अन्य उपबन्धों में प्रशासकीय तथा वित्तीय सम्बंधों का प्रावधान है . तर्क की कसौटी पर यह कहना सही हो सकता है किदोनों के क्षेत्र अलग अलग हैं तथा जनादेश भी उन्ही कार्यों के लिए होगा लेकिन जमीनी हक़ीकत यह है कि नगर पालिका या जिला पंचायतों तक के चुनाओं की हार-जीत का विश्लेषण केंद्र में सत्तासीन दल के परिप्रेक्ष्य में किया जाता है. अमेरिका या इंग्लॅण्ड की भांति भारत में दो ही राष्ट्रीय दल नहीं हैं.यहाँ गठबन्धन हैं तथा विभिन्न दल अपने स्थानीय हितों के लिए अधिक संवेदनशील हैं. चुनावों में अक्सर दल की बजाय व्यक्ति विशेष की महत्ता होती है. अमेरिका की भांति भारत में किसी भी दल में प्राइमरी या दलीय चुनाव नहीं होते हैं.


संसदीय प्रणाली तथा अध्यक्षीय प्रणाली की अपनी विशेषताएं हैं.यह माना जाता है किसंसदीय प्रणाली एक उत्तरदाई शासन देती है जब कि अध्यक्षीय प्रणाली स्थायित्व देती है . अमेरिका में राष्ट्रपति तथा संसद दोनों का कार्यकाल निश्चित होता है तथा वहां चुनाव तय समय पर ही होता है जबकि इंग्लॅण्ड में संसद भंग करना कोई विशेष बात नहीं होती. वहां माना जाता  है किजैसेही आवश्यकता महसूस हो नया जनादेश लेना ही बेहतर विकल्प है.अक्सर सत्तारूढ़ दल में नेतृत्व परिवर्तन चुनाव की सीटी बजा देता है.संविधान निर्माताओं ने अपने यहाँ स्थायित्व से अधिक उत्तरदाई शासन पर विश्वास व्यक्त किया था . यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि इंग्लॅण्ड हमारे उत्तर प्रदेश से भी छोटा है , परिसंघीय नहीं बल्कि ऐकिक है तथा वहां राज्यों की स्थिति वही है जो हमारे यहाँ नगरपालिकाओं की है.


इसमें कोई सन्देह नहीं है किबार-बार चुनाओं से आर्थिकव्यय  भार पड़ता है, प्रशासकीय दिक्कतें आती हैं तथा सरकारी कामकाज थम सा जाता है.आचारसंहिता लगते ही ओपिनियन पोल पर रोक लगा दी जाती है और नीति सम्बन्धी नयी घोषणाओं पर पाबन्दी लग जाती है.यदि कई जगह चुनाव हो रहे हैं तो वोट पड़ने के बाद मतपेटियां हफ़्तों बंद रहती हैं क्योंकि परिणामो से अगले चरण के चुनाव या दूसरे राज्य में होने वाले चुनाव प्रभावित हो सकते हैं.चुनाव परिणामों का राजनैतिक ही नहीं बल्कि अपना मनोवैज्ञानिक प्रभाव होता है जो देश के अन्दर ही नहीं बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बहस का मुद्दा बनता है. भारत ऐसे विकासशील देश को हमेशा चुनावी मोड में रखने की वकालत नहीं की जा सकती . लेकिन जैसा परिसंघ हमने विकसित किया है उसमे क्षेत्रीय दलों की अनदेखी भी नहीं की जा सकती .यह क्षेत्रीय दल लोकसभा में अपनी स्थिति के कारण राजनैतिक मोल-भाव करते हैं और सत्तासीन सरकारें अक्सर उनके सामने निरीह सिद्ध हुईं हैं. 


मीडिया में कयास लगाए जारहे हैं किसन २०१९ के लोकसभा चुनाव के साथ किसप्रकार अधिसंख्य राज्यों के चुनाव कराये जा सकते हैं कतिपय क्षेत्रों में संविधान में संशोधन करने की भी बात कही जा रही है, लेकिन यह इतना आसाननहीं है क्योंकि क्षेत्रीय दल विरोध कर रहे हैं.


एक साथ चुनाव कराने से राजनीति में धनबल तथा अपराधीकरण पर अंकुश लगेगा तथा स्थानीय कार्यकर्ताओं की अहमियत बढ़ेगी . सन १९६७ तक संसद का चुनाव लड़ने वाले लोकल नेताओं पर ही निर्भर रहते थे.तब राजनीति नीचे से ऊपर होती थी जबकि अब उसका विलोम है. "एक देश -एक चुनाव" के लिए जनमत जागृत करने की आवश्यकता है तथा इस पर पूरा होमवर्क करके ही कोई निर्णय लिया जाना बेहतर होगा.स्थायित्व तथा उत्तरदायित्व एक दूसरे के स्पर्धी नहीं बल्कि पूरक बनने चाहिए.

यह सुप्रीम कोर्ट का आतंरिक मामला नहीं, न्यायालय की अस्मिता, स्वतंत्रता और स्वायत्तता का प्रश्न है...



बारह जनवरी को सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों  द्वारा प्रेस कांफ्रेंस करने की घटना जितनी अप्रत्याशित है उतनी ही विस्मय कारक और दुर्भाग्य पूर्ण. वरिष्ठ जज जब विकल्प हीन हो गए तो उन्हें अपना चैम्बर छोड़ , जनता की अदालत में गुहार लगानी पड़ी. गनीमत रही कि उन्होंने मर्यादा बनाये रखी और आरोप-प्रत्यारोप की बजायविसिल-ब्लोअर तक ही अपने को सीमित रखा।


वरिष्ठ जजों के इस कृत्य पर विभिन्न प्रतिक्रियाएं आई  हैं--आ रही हैं  .कुछ ने सराहा , कुछ ने इसी बहाने न्यायपालिका में कथित मनमानेपन पर रोष-क्षोभ व्यक्त किया और कईयों ने इसकी जैम कर आलोचना की .इसे राजनीति से प्रेरित भी करार दिया गया .कई सीनियर वकीलों तथा पूर्व जजों ने मत व्यक्त किया कि यह आतंरिक मामला है और इसलिए कमरे में बैठ कर सुलझा लिया जाये.   हरेक अपने अपने नज़रिए से आंकलन कर रहा है . अभी यह निश्चित नहीं हो पा रहा है कि जजों द्वारा उठए गए मुद्दों का कोई सम्मानजनक हल निकलेगा या यह एक ऐसे चेन रिएक्शन की शुरुआत होगी जिसमे न्यायपालिका को सामान्य जन की आलोचना-प्रत्यालोचना सहनी पड़ेगी।

यह घटना किसी सर्जिकल स्ट्राइक का परिणाम नहीं है. यह अन्दर ही अन्दर सुलग रहे एक ज्वालामुखी का विस्फोट है.जब गर्मी और धुवाँ घुटन पैदा करने लगा तो यह इस रूप में बाहर आया.न्यायपालिका से सरोकार रखने वाले कई तबकों ने इसके उन अनदिखे और अनकहे पहलुओं को रेखांकित भी किया है जो अभी तक दबे छुपे पड़े थे।

दरअसल , अप्रैल १९७३ में तीन जजों की वरिष्ठता को दरकिनार करके मुख्य न्यायाधीश नियुक्त   करने की घटना की यह अगली कड़ी है.उस समय बड़ा हो-हल्ला हुआ था. संसद से सड़क तक जजों के व्यक्तित्व तथा उनके सामाजिक-राजनीतिक दर्शन पर चर्चाएँ हुईं थीं . हमें याद है कि तत्कालीन एक मंत्री ने संसद में कहा था कि मुख्य न्यायाधीश के रूप में हमें  FORWARD LOOKING (  प्रगतिशील दृष्टिकोण  ) वाला व्यक्ति चाहिए.इस पर प्रख्यात न्यायविद पालकीवाला ने कहा इस अतिलंघन से FORWARD LOOKING नहीं बल्कि LOOKING FORWARD (अपना आगे का देखने वाला ) वाले व्यक्ति संस्था में स्थापित हो जायेंगे. संपत्ति तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकारों पर उच्चतर न्यायपालिका द्वारा दिए गए निर्णयों पर तत्कालीन सरकार इतनी क्षुब्ध थी किवर्षों से चली आ रही परम्परा को तोड़ कर असहज जजों को दरकिनार कर दिया गया था.इसकी प्रतिक्रिया स्वरुप तीनों जजों ने इस्तीफा दे दिया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट यथावत कार्य करती रही. यहाँ एक बात का उल्लेख आवश्यक है --सुपर सीड हुए जजों को छोड़ कर एक भी जज ने न्यायपालिका की स्वायत्ता तथा स्वतंत्रता के सम्मान में या अतिलान्घित जजों के समर्थन में त्यागपत्र नहीं दिया था. क्या बाकियों की अंतरात्मा नहीं कसमसाई थी? क्या उनकी नज़र में सब ठीक हुआ था?ऐसे प्रश्न अभी अनुत्तरित ही हैं .

अतिलंघन का ही परिणाम था कि ए. डी. एम. जबलपुर  बनाम शिव कान्त शुक्ल ऐसा निर्णय आया जिसमे कार्यपालिका को ब्लैंक चेक दे दी गयी. उसके बाद बयालीसवें संशोधन विधेयक द्वारा न्यायपालिका की शक्तियों को जिस प्रकार काटा-छांटा गया , वह यदि चौवालिस्वें संशोधन द्वारा वापस न लिया गया होता तो न्यायिक पुनरावलोकन की शक्ति नाम मात्र को ही बची होती.हालाँकि इसमें संपत्ति का अधिकार तो शहीद ही हो गया.और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को क्षीण करने के नए तरीके निकल लिए गए.
संघ तथा राज्यों में एक पार्टी की सरकार के बर्चस्व के समाप्त होते ही न्यायपालिका मुखर हुई और धीरे-धीरे नियुक्तियों तथा स्थानांतरण का अधिकार स्वयं हस्तगत कर लिया, जिससे १९७३ की पुनरावृत्ति न हो सके . लेकिन इसके बाद कतिपय  जजों के खिलाफ जितने और जैसे आरोप लगे, हटाने की प्रक्रिया प्रारंभ की गयी और एक को तो अदालत की अवमानना के लिए जेल रहना पड़ा--यह किस्से कहानियां नहीं बल्कि संस्था की शुचिता पर प्रश्न चिन्ह हैं..भारत के मुख्य न्यायाधीश के विवेकाधिकार की चुनौती के सार्वजानिक हो जाने पर वे सारे किस्से चटखारे लेकर बखाने जा रहे हैं।

व्यवस्थापिका के अपने हित हैं, न्यस्त स्वार्थ हैं. यह नहीं भूलना चाहिए कि संसद तथा आधे से अधिक राज्य विधान सभाओं ने समवेत स्वर से संविधान में संशोधन करके एन.जे. ए. सी. कानून पारित किया था. इसे निरस्त तो कर दिया गया लेकिन कोई ऐसी प्रक्रिया उदभूतनहीं की सकी है जिसमे किसी रामास्वामी या करणनके लिए "नो इंट्री" का बोर्ड हमको आपको दिखाई पड़े. जैसा हर जगह है--वैसा  ही भाई-भतीजा वाद वहां भी दिखलाई पद रहा है. दूसरों के लिए सूचना का अधिकार अधिनियम है लेकिन उन्हें मुक्ति चाहिए.औरों के विवेकधिकारों की न्यायिक समीक्षा हो सकती है लेकिन "माई लार्ड"की नहीं ....न्यायालय अवमानना की सुरक्षा जो है।


दरअसल १९७३ में वरिष्ठता को लेकर जो संघर्ष प्रारंभ हुआ था - बारह जनवरी की घटना उसकी तार्किक परिणित है. आरोप यही है कि बेंच बनाने तथा उसको मैटर सौंपने में मनमानी की जा रही है, महत्त्व पूर्ण मुकदमों को अपेक्षकृत कनिष्ठ जजों को दिया जा रहा है  तथा वरिष्ठ जजों को हाशिये पर डाला जा रहा है. यह आतंरिक मामला न होकर एक गंभीर मामला है  क्योंकि यह न्यायलय की अस्मिता,स्वतंत्रता और स्वायत्तता से जुदा है. न्याय का यह सर्व मान्य सिद्धांत है कि न्याय किया ही नहीं जाना चाहिए बल्कि किया जाता दिखना भी चाहिए. यदि इसकी रक्षा नहीं की गयी तो न्यायपालिका के स्वच्छंद होने में देर नहीं लगेगी और वह जनतंत्र के तीसर स्तम्भ के लिए ही नहींदेश के लिए भी संघातक होगी|

Friday, 24 March 2017

गौरय्या संरक्षण : एक उत्तर कथा

तुमसब बुलाते हो मुझे.
संरक्षण के लिए .
बनाते हो 'माडल घर'
खिंचवाते हो फोटो,
दाना-पानी भी रखते हो,
छत पर और मुंडेरों पर--

सच बताना कि
इतने आयोजनों से भी
क्या लौटीं हूँ घर , मैं ?
नहीं , न
कारण जानने की कोशिश तो करो
बाहरी उपचारों से ही ,
कहीं ठीक होती हैं अन्दर की बातें?

झांको तो अन्दर
कंकरीट के घने जंगलों में
साफ़-सुथरी हवा को तरसती
गलियों,चौबारों.
आँगन रहित घरों में ,
अंधेरों की धुंध में -
दम घुटता है मेरा , मनुज पुत्र !

रोशनीके विस्तार को
सकुचा दिया है तुमने
बाट जोहती अब तुम्हारी आँखों में
मेरे लिए कोई नेह निमंत्रण भी तो नहीं है
संवेदनाओं के सूखे घर परिवेश में ,
अखबारी चिंताओं में.
बहुत सारी ऊब ने
मुझे तुम्हारे प्रति उचाट बना दिया है,मेरे साथी !
सभ्यता के तुंग शिखरों पर
बैठी तुम्हारी "गूगल संस्कृति " ने
मेरे प्रति वर्चुअल सरोकार इकट्ठे तो कर लिए हैं ,
पर,
नहीं की वे सच्ची बातें
जिनसे फुदकती हुई मै और मेरी टोली
सहज और निधड़क स्फुरण से
तुम्हारे अस्तित्व में कोई हिस्सा
अन्तरंग छुवन सा महसूसती
और तिनके चिन्ती
फिर
आहिस्ते -से  निर्माण करती
अपने नीड़ का
और क्या तुम नहीं जानते ,
नीड़--भरोसे का, भरोसे से और,
भरोसे के लिए बनाये जाते हैं !
ताकि ,
उन्मुक्त आज़ादी के साथ
हम रह सकें साथ-साथ
आगे तक............
न जाने कितने जन्मों तक

Thursday, 29 September 2016

शिशु प्रजनन में 'तीसरे ' की भूमिका



मैक्सिको में एक  ऐसे शिशु का जन्म हुआ है जिसमे तीन लोगों के डी एन ए  मौजूद हैं।  दरअसल शिशु की माँ के अंडाणुओं में ऐसे जीन्स थे जिनके कारण  उन्हें संतति सुख नहीं मिल पा रहा था।  बीस वर्षों के प्रयास के बाद वैज्ञानिकों ने एक नई तकनीक से शिशु प्रजनन में सफलता पाई है। 

 इस तकनीक में स्त्री के अंडाणु(एग) के न्यूक्लिएस  (केंद्र  ) को निकाल कर डोनर स्त्री के एग के न्यूक्लिएस से प्रतिस्थापित कर दिया गया था।  फिर पति के शुक्राणु से निषेचित कर पत्नी के गर्भाशय में प्रत्यारोपित कर दिया गया।  फलस्वरूप एक पूर्ण विकसित स्वस्थ शिशु ने जन्म लिया जो पांच  महीने  का हो गया है।  वैज्ञानिक इस प्रयोग से उत्साहित हैं तथा कहा जा रहा है कि 'टेलर मेड ' बेबी पाने की राह में यह एक बड़ी सफलता है। 

कयास लगाए जा रहे हैं कि भविष्य में इस तकनीक से मनचाही संतान भी मिल सकेगी।  डॉक्टर,इंजीनियर , वकील, वैज्ञानिक, फौजी आदि मनचाही संतान पाने के लिए इसी प्रकार स्त्री के एग और पुरुष के शुक्राणु में आवश्यक परिवर्तन करके आजीवन रोगमुक्त तथा सब प्रकार से सक्षम संतान पाई जा सकेगी। 

मेडिकल साइंस तथा जेनेटिक इंजीनियरिंग में विकसित हो रहे अनुसंधानों ने पुरुष -स्त्री संबंधों, परिवार  तथा सामाजिक मान्यतायों पर नए सिरे से विचार करने तथा तथा विधि प्रतिपादित करने की प्रेरणा दी है। एक शिशु पर दो मांओं  या दो से अधिक पिताओं को आगे आने पीढ़ी कैसे आत्मसात करेगी यह रोचक और रोमांचक होगा।  नीति , नैतिकता तथा मर्यादा की नई इबारत लिखनी होगी तथा मैरिज,मेंटेनेंस तथा सक्सेशन के नए कानून पास करने होंगे।